श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्ग. २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५४१
सर्ग. २१ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ५४१
शत्रुघ्ने याति किं जातं तच्छृणुष्व सविस्तरात् । गते शून्या तु दूतानां वाग्भिर्देशेषु ये नराः ॥५१॥
तेऽपि सर्वे वरानन्दरामायणश्रवादिभिः । नानाविमानसंस्थास्ते ययुः स्वलोकमुत्तमम् ॥५२॥
शून्यं दृष्ट्वा निजं लोकं यमो विधिमन्वितः । कैलासे शङ्करं गत्वा सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥५३॥
शिवः श्रुत्वा निशम्याथ यमेन सह दुर्गया । ययौ स वृषमारूढः साकेतं वेष्टितोऽमरैः ॥५४॥
शिवमागतमाज्ञाय प्रत्युद्गम्य रघूद्वहः । वरासनं शिवं देव्या निवेश्य पूजनं व्यधात् ॥५५॥
ससीतो ब्रह्मशक्रापि सुराणां च यमस्य च । एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा राघवं प्राह वै तदा ॥५६॥
राम राजीवपत्राक्ष यमं पश्य निरामयम् । शून्या ह्ययमनी जाताऽऽनन्दरामायणश्रवात् ॥५७॥
शून्यो जातोऽस्तिभूलोकः खेऽवकाशो न दृश्यते । सर्वेषां तत्र वै वस्तुमग्र किंचिद्विधारय ॥५८॥
इति तस्य वचः श्रुत्वा समाहूय रघूत्तमः । शत्रुघ्नं प्रेष्य गम्भीरि तस्मै वृत्तं न्यवेदयत् ॥५९॥
सोऽपि श्रुत्वा विहस्याथ राघवं वाक्यमब्रवीत् । येन मत्कार्यतानाशो न भविष्यति वै भुवि ॥६०॥
तथा सुखं च सर्वेषां तेन तत्कुरु राघव । तथेति राघवश्चोक्त्वा तदा वचनमब्रवीत् ॥६१॥
सप्तजन्मार्जितं पुण्यं ममार्चनसमुद्भवम् । यस्य स्यात्तस्य चानन्दरामायणकथारुचिः ॥६२॥
भविष्यति न सर्वेषां भवन्त्वत्र कदाचन । इति रामवचः श्रुत्वा सर्वे स्तुष्टमानसाः ॥६३॥
ययुः स्वं स्वं पदं देवाः स्वं स्वं देशं नृपाः ययुः । तदारभ्य विष्णुदास मुक्काटामत शुभे ॥६४॥
रामायणे शिवेनोक्तमानन्दाख्यामिदं शुभम् । रामायणं क्वचिन्मूर्त काश्रद्वेत्स्यति मानवः ॥६५॥
न भूम्यां सकला लोका वेत्स्यंति द्वापरे कलौ । सप्तजन्मार्जितं पुण्यं येषां वेत्स्यंति ते नराः ॥६६॥
कह सुनाया ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ भविष्यम अब जो कुछ करना चाहत हो, सो करत चलिए । इस प्रकार वसिष्ठ रामसे कह ही रहे थे, तब तक पृथ्वीमण्डलमें क्या हुआ सो कहते हैं । उन दूतांकी गति सुनकर संसारके जितने मनुष्य थे ॥ ५० ॥ वे सब आनन्दरामायणक पढन और श्रवणस अनेक प्रकारके विमानांपर चढ़-चढ़कर उत्तम स्वर्गलोकको चल गये ॥ ५१ ॥ ५२ ॥ अपन लोकको शून्य देख यमराज ब्रह्माको साथ लेकर शङ्करजीके पास पहुँचे और प्रणाम करके उन्हें सारा वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ५३ ॥ शिवजी यह समाचार सुनकर ब्रह्मा, पार्वती और यमराजको साथ ले तथा बहुतसे देवताओंसे वेष्टित होकर अयोध्यामें रामके पास गये ॥ ५४ ॥ जब रामको यह समाचार मिला कि शिवजी आये हैं तो प्रेमपूर्वक अगवानी करक गवतीक साथ शिवजीको एक दिव्य सिंहासनपर बिठाकर उनकी पूजा की ॥ ५५ ॥ इसके अनन्तर ब्रह्मा तथा शक्रादि देवताओंकी भी पूजा की। वांहीं बैठ बार ब्रह्माने रामसे कहा—॥ ५६ ॥ हे राजीवपत्राक्ष राम अथवा निरामय इस यमराजको ओर निहारिए । आनन्दरामायणके श्रवणसे इनका सयमनी पुरी शून्य हो गयी है ॥ ५७ ॥ भूलोक खाली हो चुका है और स्वर्गमें उन सबके रहनक लिए कुछ जगह ही नहीं रह गयी है । अब उनको रहनेके लिए कोई और स्थान सोचिये ॥ ५८ ॥ इस प्रकार शिवजीकी बात सुनकर रामने शत्रुघ्नको बुलाया और उनको यह समाचार सुनानेके लिये वाल्मीकिक पास भेजा ॥ ५९ ॥ शत्रुघ्न गये और वाल्मीकिको बुला लाये । रामके मुखसे यह वृत्तान्त सुना तो वाल्मीक हंसकर कहने लगे—जिस तरह संसारमें मेरी कविताका नाश न हो ॥ ६० ॥ और सब लोग प्रसन्न भी रह ऐसा कोई उचित उपाय सोचकर करिये । रामने उनकी बात मान श्री ओर बोले—॥ ६१ ॥ मेरा पूजन करत-करत जिनके पास सात जन्मोंका पुण्य एकत्रित होगा, उनको ही रुचि आनन्दरामायण सुननेकी होगी ॥ ६२ । भविष्यम साधारण लोगोंकी रुचि ही इस ओर नहीं होगी। इस प्रकार रामकी वाणी सुनकर सबका मन प्रसन्न हो गया ॥ ६३ । तब देवतागण अपने-अपने लोकोंको तथा राजा लोग अपन-अपन देशोंको लोट गये । तभीसे हे विष्णुदास ! मत्तकटारामचरितान्तर्गत इस आनन्दरामायणके विषयमें ऐसा हो गया कि कहीं-कहीं कोई ही कोई मनुष्य आनन्दरामायणको जानने लगा ॥ ६४ ॥ ६५ ॥ द्वापर और कलिमं तो बहुत ही कम लोग इसे जाननवाल होंगे। क्योंकि उस समयसे यह नियम बन गया है कि रामचन्द्रके पूजनसे सात जन्मोंके पुण्य जब एकत्रित होंगे, तब आनन्दरामायणमें
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तद्रामवचनाद्भ्रान्त्या बभूव पूर्ववत्सदा । नाभूकस्य कदा मेधाऽऽनन्दरामायणं प्रति ॥ ६७॥
सहस्रेषु नरः कश्चित्सप्तजन्मसु पुण्यवान् । आनन्दरामचरितं वेद स्तोत्रं न चापरः ॥६८॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे
उत्तरार्द्धे आनन्दरामायणमहिमावर्णनं नाम त्रयोविंशः सर्गः ॥ २३ ॥
चतुर्विंशः सर्गः
( रामका यमको उपदेश, सुमन्त्रका वैकुण्ठगमन और प्रजाको रामकी शिक्षा )
श्रीरामदास उवाच
एकदा संस्थितं रामं सभायां सेवकोऽब्रवीत् । राजराज महाराज रविवंशैकभूषण ॥ १ ॥
सुमन्त्रस्तेऽन्वितोवृद्धः स मन्त्री नाकं गतः प्रभो । तपन्त्यस्तं गन्तुमन्वाज्ञां पृच्छन्ति राघव ॥ २ ॥
तद्दूतवचनं श्रुत्वा चकितः हृष्टमानसः । शीघ्रं सुमन्त्रगेहं स ययौ यानेन राघवः ॥ ३ ॥
सुमन्त्रजन्मपट्टं तस्यायुःसंख्यां ददर्श सः । जन्मकालात्सहस्राणि नव नवशतानि च ॥ ४ ॥
नवनवतिवर्षाणि मासांस्त्वेकादशैव हि । एकविंशद्दिनान्यास्तांस्तथा शेषा दिना नव ॥ ५ ॥
ज्ञात्वैवं रामचन्द्रः स तदा प्राह गुरुं प्रति । कृत युगे तु लक्षायुः सहस्रं द्वापरे स्मृतम् ॥ ६ ॥
शतवर्षं कलौ प्रोक्तं सहस्राणि दशाथ वा । त्रेतायां कायतं चायुस्तन्मद्राज्ये मृषा कृतम् ॥ ७ ॥
यमेन मामवज्ञाय महद्दण्डं लघ्वामहेच्छता । दिनानिनव शेषाणि सांत मे मन्त्रिणः कथम् ॥ ८ ॥
यमेन नीतस्त्वद्यैव यमं दण्ड्या नयाम्यहम् । सुमन्त्रं त्रापयाम्यद्य पश्य मे त्वं पराक्रमम् ॥ ९ ॥
इत्युक्त्वा गरुडारूढः कोदण्डं कलयन् करे । वेगेन रघुनन्दनः स ययौ संयमनीं पुरीम् ॥ १०॥
तावन्मार्गे सुमन्त्रं तं पाशबद्धं यमानुगाः । गच्छन्तं राघवो दृष्ट्वा तान्त्सर्वांस्ताडयन्मुहुः ॥११॥
सुमन्त्रं मोचयामास लिंगरूपधरो प्रभुः । तदा तं राघवं प्रोचुश्चापराधं तवाद्य किम् ॥१२॥
लोगोंके हाथ होंगे और तथा लोग इस जानग । तबस रामके कथनानुसार किसीकी बुद्धि आनन्दरामायणकी ओर नहीं गयी ॥ ६६ ॥ ६७ ॥ क्योंकि हजारोंमे कोई एक-आध मनुष्य ही संत जन्मोंका पुण्यवान् होगा और वही आनन्दरामायणको जान पायगा ॥ ६८ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयरचित व्याख्याभावाटीकासहित राज्यकाण्डे उत्तरार्द्धे त्रयोविंशः सर्गः ॥ २३ ॥
श्रीरामदास कहते लग—एक बार राम अपनी सभामें बैठे थे । तभी एक सेवकने आकर कहा—हे राज-राज ! हे सूर्यवंशके अलङ्कारस्वरूप महाराज आपका वृद्ध मन्त्री सुमन्त्रस्वर्ग चल गये। उनकी स्त्रियां सती होकर पतिकी अनुसरण करनेके लिये आपकी आज्ञा चाहती हैं ॥ १ ॥ २ ॥ इस प्रकारका सन्देश सुनकर राम एक रथपर सवार होकर सुमन्त्रके घर गय ॥ ३ ॥ वहाँ उन्होने उनकी जन्मकुण्डली मँगाकर देखा, जिससे ज्ञात हुआ कि ९९९९ वर्ष ग्यारह महीना सुमन्त्रकी आयु थी । जिसमे सब तो बीत गये, केवल नौ दिन बाकी रह गय थे ॥ ४ ॥ ५ ॥ ऐसा जानकर रामने गुरु वशिष्ठको बुलवाकर उनसे कहा कि सत्ययुगमें मनुष्यकी वायु लाख वर्षोंकी, द्वापरमें हजारकी, कलियुगमे सो वर्षकी तथा त्रेतायुगमें दस हजार वर्षकी कही गयी है । सो यमराजने मेरे राज्यमें मेरा अपमान करके उस नियमका उल्लङ्घन किया है ॥ ६ ॥ ७ ॥ ऐसा ज्ञात होता है कि वह मेरे द्वारा दण्ड पाना चाहता है । मेरे मन्त्रीकी वायुके अभी नौ दिन बाकी हैं तो यम उसे यहाँसे क्या ले गया ? मैं आज यमको दण्डकर लाता हूँ और सुमन्त्रको जिलाता हूँ। मेरा पराक्रम देखिए ॥ ८ ॥ ९ ॥ ऐसा कहकर राम गरुड़पर बैठ और धनुषको टङ्कार करत हुए यमकी संयमनी पुरीको चल दिये । तब तक रास्ते ही में उन्होंने पाशबद्ध सुमन्त्रको ले जात हुए कुछ यमदूतोंको दृष्टा । देखते ही रामने मुष्टियोंका मारकर लिंगरूपधारण सुमन्त्रको छुड़ा लिया। तब यमदूतोंने विनयपूर्वक