श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ८ ] विलासकाण्डम् २८५
सर्गः ८ ] विलासकाण्डम् २८५
तुलसीकाष्ठहारैश्च पुष्पहारैरनेकधाः। प्रवालमणिकण्ठाग्रैर्मुक्ताः काञ्चनोद्भवाः ॥२८॥
पदकानि विचित्राणि रत्नमिश्रितयन्त्रितैः। रमाशङ्खात्मदाकारै रत्नरूपविचित्रितान् ॥२९॥
रत्नमाणिक्यसंयुक्तमुकुटैर्निनिषेवितान् । शेषमण्डलमध्यस्थान् प्रतापांश्चेतनावान् च ॥३०॥
अङ्गुलीष्वपि बिभ्रन्तं हस्तयोर्मुद्रिकाः शुभाः। मध्यमण्डलयुक्तांश्च विचित्रा रत्नकैरन्विताः ॥३१॥
रामनामाङ्किताश्चापि पत्रिका उज्ज्वला अपि। सम्मुक्तेहाहेममये कर्णयोः कुण्डले वरे ॥३२॥
बिभ्रन्तं मकुटाग्रस्थानलङ्काराननेकधाः। बिभ्रन्तं मौलिवाऽऽडम्बरं मुकुटं रविविचित्रितम् ॥३३॥
नानामणिममायुक्तं कलशैरपि शोभितम्। मुक्ताप्रवालवैदूर्ययुतं हेममयं वरम् ॥३४॥
एवं गुणवती रामं कोटिसूर्यसमप्रभम्। हेमवर्णं महारम्यं कंजपत्रायतेक्षणम् ॥३५॥
सौमाननं कंजहस्तं दृष्ट्वा तं प्रणनाम सा। तं समुत्थाप्य राघवस्तु सम्यक् सम्पूजितः ॥३६॥
वहुतैरुपहारार्यैः सुप्रीतस्त्वाह राघवः। वरं दत्तं मया तुभ्यं यत्ते मनसि वर्तते ॥३७॥
इति रामवचः श्रुत्वा सा तुष्टा राममब्रवीत्। राम राजीवपत्राक्ष यथेमास्ते सहस्रशः ॥३८॥
दास्यः सन्ति तथा मां त्वमङ्गीकर्तुमर्हसि। इति तद्वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह संस्मितः ॥३९॥
कथं त्वं ब्राह्मणी चेत्थं वदस्यद्य शुभानने। मन्मंत्रां कृतमुल्लासात्सन तां नहि वदाम्यहम् ॥४०॥
शृणुष्व त्वं गुणवति कृष्णरूपधरो ह्यहम्। द्वापरे द्वारकायां हि भविष्याम्यन्यजन्मनि ॥४१॥
भजिष्यसि तदा मां त्वं स्त्रीरूपेण न संशयः। सत्राजितो देवशर्मा ते भविष्यति पिता पुनः ॥४२॥
यश्चन्द्रनामा सोऽक्रूरो भविष्यति सखा मम। सत्यभामेति नाम्ना त्वं भविष्यसि प्रिया मम ॥४३॥
तदा कुरुष्व दास्यं मे यत्ते मनसि वर्तते। इति रामवचः श्रुत्वा तुष्टा गुणवती मुहुः ॥४४॥
नत्वा श्रीराघवं सीतां ययौ सा स्वगृहं प्रति। धेरुस्नानानन्तरं सा हरिद्रान्नं ददौ जने ॥४५॥
वे तुलसीके काठकी माला, पुष्पोंकी माला, प्रवाल और मणिकी बनी माला पहने हुए थे। गलेमें विचित्र प्रकारके पदक पड़े थे, जिनमें रत्न और पवित्र... काम किया हुआ था। पद्म, शङ्ख तथा कमलका सा ही उनका आकार था। उनमें जगह जगह रत्न और मणियोंसे जड़े हुए... रामनामपद लिखे हुए थे ॥ २८-३० ॥ दोनों हाथोंकी अँगुलियोंमें सुन्दर अँगूठियाँ पहन व वे भी रत्न तथा माणिक आदिसे जड़े हुए मानों लहलहाते हुए थे ॥ ३१ ॥ उनमें भी रामका नाम लिखा था और वे पत्रिकाओंसे युक्त थीं। रत्न तथा मुक्तासे जड़ित कुण्डल उनके कानोंमें झूल रहे थे। वे मुकुटमें... धारण किये थे ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ मुकुटमें विविध प्रकारके जतीक जड़ेहुये होनेसे वह और भी सुन्दर लग रहा था। उसमें भी जगह-जगह मुक्ता-प्रवाल-वैदूर्य आदिका सुन्दर काम बना हुआ था ॥ ३४ ॥ इस तरह करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी तथा सुवर्णकी भाँति जिनका वर्ण था, कमलनयन समान जिनके नेत्र थे, चन्द्रमाके समान जिनका मुख था और कमलकी भाँति हाथ थे उन रामको गुणवतीने देखा और प्रणाम किया। रामचन्द्रने उसे उठाया और उसने विविध प्रकारके उपचारोंसे रामकी पूजा की ॥ ३५ । ३६ ॥ और भेंट दिये। जिससे राम अतिशय प्रसन्न होकर कहने लगे कि "तुम्हारी जो इच्छा हो सो वर माँग लो" ॥ ३७ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर वह बोली—हे राजीवपत्राक्ष राम ! जैसे आपकी ये हजार दासियाँ हैं, वैसे ही मुझे भी अपनी एक दासी बना लीजिए। इसका ऐसा वचन सुनकर मुस्कुराते हुए राम कहने लगे—॥ ३८ । ३९ ॥ तुम ब्राह्मणी होकर ऐसी अशुभ बात क्यों कह रही हो ? यदि तुम्हें मेरी सेवा करनेकी इच्छा है, तो मैं बताता हूँ ॥ ४० ॥ हे गुणवती ! सुनो, द्वापरयुग में कृष्णरूप धारण करके अवतार लूँगा । तब द्वारिकामें तुम मेरी स्त्री होकर इच्छानुसार मेरा सेवा करोगी। इसमें कुछ भी संशय नहीं है। उस समय देवशर्मा यादवधन् सत्राजित तुम्हारा पिता होगा, चन्द्र अक्रूरनामका मेरा प्रिय होगा और तुम सत्यभामा नामकी मेरी पटरानी होओगी
२८६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८
आयुःशेषं समाप्यैाथ गंगायां कृत्वर निजम् । मज्जन् स्नानसमये न्यञ्चन्त्या नाकं चिरं गता ॥४६॥
ततः कालान्तरेषामीत्सत्राजितनया भुवि । बभूव पत्नी कृष्णस्य द्वापरे द्वारकापुरि ॥४७॥
एकदा पिङ्गलानाम्नी वेश्या रात्रौ विनिद्रितम् । सीतया दिव्यपर्यङ्के ययौ सा राघवं रहः ॥४८॥
विहाय नूपुरादीनि स्वनवंति पदैः शनैः । इतस्ततो निरीक्षन्ती दिव्यवस्त्रैर्विभूषिता ॥४९॥
सीताभयात्प्रकंपन्ती कामबाणप्रपीडिता । मण्डिता पुष्पमालाद्यैर्भूषितातिशोभिता ॥५०॥
अज्ञाता द्वारपालैः सा निद्रितैर्मञ्चकं ययौ । स्वकरेण पदस्पर्शं कृत्वा रामं प्रबोधयत् ॥५१॥
तदा प्रबुद्धः श्रीरामस्तां ददर्श पुरःस्थिताम् । सा धृत्वा तत्पदे गाढं प्रार्थयामास राघवम् ॥५२॥
राम राजीवपत्राक्ष मया तेऽद्यापराधिनम् । त्वं क्षमस्व कृपां कृत्वा मयि चानुग्रहं कुरु ॥५३॥
तस्याश्च वचनं श्रुत्वा ज्ञात्वा तां कामपीडिताम् । तां समाश्वासितुं प्राह राघवः कञ्जलोचनाम् ॥५४॥
एकपत्नीव्रतं मेऽस्मिन्भवे त्वं वेत्सि पिंगले । अतस्त्वत्कामपूर्त्यर्थे वदामि तच्छृणुष्व हि ॥५५॥
यदाऽहं मधुरामध्ये व्रजाच्छ्रीकृष्णरूपधृक् । यास्याम मातुलं कंसं हन्ता स्थास्यामि तत्पुरेम् ॥५६॥
तदा भजिष्यसि त्वं मां कुब्जारूपेण पिंगले । गच्छ दास स्वरूपेण निजायुः क्षपयिष्यसि ॥५७॥
आयुःशेषे स्थिरं देहं विमृज्य बहुसुकरम् । इत्युक्त्वा पिंगलां गेहे ददावाज्ञां भयान्विताम् ॥५८॥
शिक्षयामास द्वारस्थान्दासीन्दासींर्विनिद्रिताः । ततः सीतां प्रबोध्यैाथ वेश्यावृत्तं न्यवेदयत् ॥५९॥
तच्छ्रुत्वा जानकी रुष्टा त्यक्त्वा पर्यङ्कमुत्तमम् । राघव प्राह सक्रोधा कथं नाहं प्रबोधिता ॥६०॥
सर्वदाऽत्र मया ज्ञातमेकपत्नीव्रतं सुधा । भृकुटीं पिंगलां नूनंमीर्ष्याच्छ्रोधिता त्वतः ॥६१॥
॥ ४१-४३। उस समय जैसी तुम्हारी इच्छा होगी वैसा मेरा सेवा कर लेना इस प्रकार रामकी बात सुनकर शूर्पणखा बहुत प्रसन्न हुई। ४४॥ यह रामचन्द्र तथा सीताको प्रणाम करके अपने डेरेपर लौट गयी इस प्रकार वह आठों आश्रम चरितार्थ करके अन्तमें शिवलोक साथ हरिद्वार चली गयी। वहाँपर उसकी जितनी आयु शेष थी, उस समाप्त करके एक दिन स्नान करनेको गङ्गा गयी और वहीं शरीर त्यागकर स्वर्गात्तारोहण चली गयी । ४५ । ४६ ।। जन्मान्तरम गुणवती सत्राजितकी पुत्री होकर जन्मी और कृष्णकी पत्नी बनकर द्वारकामे निवास करन लगी ॥ ४७॥ एक दिन पिङ्गला नामकी एक वेश्या रात्रिके समय रामचन्द्रके पास पहुंची। उस समय राम सीताके साथ एक दिव्य पलंगपर सो रहे थे। वह वहां गयी ॥ ४८ । नूपुरादि बालनेवाले आभूषणोंको पैरोंस उतारकर बहुसुन्दर कपडे पहने भयवश इधर उधर देखती जा रही थी। सीताके भयसे उसके अङ्ग अङ्ग काँप रहे थे और वह कामके बाणसे पीडित थी। उसने सुगन्धित फूलोंका माल्य तथा अनेक आभूषण पहिन रक्खा था जिससे वह बडा सुन्दरी मालूम पडती थी । ४९ ॥ ५० ॥ जिस समय द्वारपालगण निद्रित थे तब चुपकेसे भीतर चली आयी और रामचन्द्रके मंचके पास जा पहुँची। उसने हयत्न रामके पैर छूकर उन्ह जगाया ॥ ५१ । राम जाग गये और सामने उस पिंगला वेश्याको देखा, तब वह जागस रामके पैरोंको पकडकर प्रार्थना करने और कहने लगी—हे राम ! हे राजीवपत्र क्ष ! आज मैंने बडा भारी अपराध किया है। मेर ऊपर कृपा करके आप उसे क्षमा कर दें और मरेपर दया कर ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ उसकी यह बात सुनकर रामन समझ लिया कि यह कामपीडित है। तब उस आश्वासन दनके लिए कहने लगे—। ५४ । हे पिंगले ! तुम जानती होगी कि इस जन्ममें मैं एकपत्नीव्रतधारी हूँ। अतएव तुम्हारी कामवासनाको शान्तिका जा उपाय बतलाता हूँ, उसे सावधान होकर सुनो । ५५ ।। जिस समय कृष्णअवतार में ब्रजस मधुरा जाऊँगा और कंसको म रकर उस पुरीमें ठहरूँगा तब हे पिंगले ! तुम कुब्जा के रूपमें मेरा सेवा करोगी। जाओ, मेरे आशीर्वादसे तुम इस शरीरको शेष आयु बिताकर कंसके यहीं दासी हाओगी क्या सीता के भयसे रामने केवल इतना कहकर उसे विदा कर दिया । ५६-५८ । तब उन्होंने द्वारपाला तथा दास दासी आदिकोंको जगाकर डाँटा-फटकारा और सीताको जगाकर उस वेश्याका समस्त वत्तान्त कह सुनाया । ५६ ॥ सो सुना तो काधित होकर जानकी शय्या छोडकर उठ खडी हुई और रामसे कहने लगी कि वह आयी थी, तब तुमने मुझे
सर्गः ८ ] विलासकाण्डम् २८७
त्वां विसृज्य चिरादद्य ज्ञातुं ते चरितं मया। मृषा त्वया प्रतिज्ञातं पुरा व्यासमुनेः पुरः ॥६२॥
एकपत्नीव्रतं मेऽस्ति कौसल्यापदवी सम। अन्याः स्त्रीति मृषा वाक्यं कत्थसे त्वं पुनः पुनः ॥६३॥
क्व गतं तद्वचस्तेऽद्य क्व गतं तद्व्रतं तव। अद्यैव जीवितं स्वीयं त्यजामि सरयूजले ॥६४॥
वेश्यायाः पृष्ठसंलग्नां शय्यां नाथ स्पृशाम्यहम्।
वैश्यासक्त स्वामिन न्यां दृष्ट्वा द्वेषो भवेन्मयि ॥६५॥
मृषायां मयि रुष्टश्च वेश्यासक्तस्य ते मदेन। वेश्यासक्तपवित्रस्य चिरं राज्यं न तिष्ठति। ६६॥
इत्युक्त्वा राघवं नत्वा देहत्यागसमुद्यता। ययौ वेगेन सरयूं वस्त्रगेहाद्विनिर्गता। ६७॥
गच्छन्तीं राघवो दृष्ट्वा मुक्तकच्छः प्रदुद्रुवे। संभ्रमाज्जानकीं धृत्वा भुजाभ्यां सैकतेऽस्थले ॥६८॥
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं मा रुष त्वं विदेहजे। शृणुष्व वचनं मे त्वं दिव्यं ते प्रददाम्यहम् ॥६९॥
मयि ते शपथंश्च अन्यथो न भविष्यति। दुष्टं यत्पुनैरपि च तद्दिव्यं प्रददाम्यहम् ॥७०।
वद शीघ्रं जनकजे मा क्रोधं भज भामिनि। इति रामवचः श्रुत्वा जानकी प्राह राघवम् ॥७१॥
जानक्यवाच
राम ब्रूयामहे किं ते येन दिव्यं ददामि ते। अनलस्त्वन्मुखोद्भूतो नयने शशिभास्करौ ७२॥
वामस्ते जलधौ राम पृथ्वीयं विभृता त्वया। शेषस्त्वदल्पसंशाय लक्ष्मणस्त्वद्वपुषो बहिः। ७३।
शास्त्राणि त्वन्मुखाज्जातानि सर्वाण्यत्र न संशयः यद्यत्पश्यामि तन्मयं तव रूपं न संशयः। ७४॥
न दुघंटं ते दिव्यार्थं किंचित्पश्यामि राघव। किं ब्रूयामश्चुना नेद्य येन मे प्रत्ययो भवेत् ॥७५॥
एकमेवास्ति जानेऽहं अनुकुरुष्व पृच्छनम्। इदानीमेव स्वगुरुं समाहूय रघूद्वह ॥७६॥
क्यों नहीं जगाया ? ॥ ६० । आज तुम्हारा एकपत्नीव्रत समाप्त हो गया । त्रिजटा आयी, उसके साथ तुम रस भोग कर लिया और जब वह चली गयी, तब मुझे जगाया ॥ ६१ । बहुत दिनों बाद आज तुम्हारी यह चाल खुला है। उस दिन व्यासमुनिके सामने जो एकपत्नीव्रत धारण करनेकी कसम खायी थी, सो सब दगा था ॥ ६२ ॥ 'कहो न !' राघवने प्रणामपूर्वक कहा—"वास्तवमें मैं एक पत्नीव्रतधारी हूँ। तुम्हारे सिवाय संसारकी समस्त स्त्रियां मेरे लिए कौशल्याके समान है। तुम व्यर्थ मेरे ऊपर रुष्ट हो रही हो'। ६३ । तब सीता और भी तमतमाकर कहने लगी कि तुम्हारी वह प्रतिज्ञावाली बात कहाँ गयी ? वह व्रत कहाँ गया ? आज ही मैं सरयूँके जलमें डूबकर अपना जीवन समाप्त कर दूँगी ॥ ६४॥ मैं ऐसी शय्यापर अब नहीं सोना चाहती, जिसपर कि एक वेश्याको पीठ लग चुकी है। तुम्हारे जैसे वेश्यासक्त राजाकी जो दशा होनी होगी, सो होगी लेकिन यह समझ रखियेगा कि वेश्यासक्त राजाका राज्य ज्यादा दिन नहीं ठहरता ॥६५- ६६॥ इतना कहकर सीताने रामको प्रणाम किया और अपना देह त्याग करनेके लिए पटगृहसे बाहर होकर सरयूके तीरकी ओर चली ॥ ६७ । सीताको जाती देखकर राम भी पीछे-पीछे दौड़ पड़े और जलके पास पहुँचनेसे पहले ही उन्हें रेतामें पकड़ लिया । ६८ ॥ फिर वे मीठी-मीठी बातें कहने लगे—हे विदेहजे ! मेरे ऊपर इतना नाराज मत होओ। मेरी बात सुनो—यदि मेरी बातपर विश्वास न हो तो मैं शपथ खानेको भी तैयार हूँ ॥ ६९- ७० ॥ हे सीते ! बोलो, क्या कहती हो ? हे भामिनि ! इस तरह क्यों क्रोध करती हो ? इस प्रकार रामकी बात सुनकर सीताने कहा—मैं तुम्हें कुछ कहती ही नहीं। फिर तुम कसम किसलिए खानेको तैयार हो ? क्यों दिव्य परीक्षा कराना चाहते हो ? फिर यदि मैं दिव्य परीक्षा लेनाभी चाहूँ, तो कैसे दूँ। अग्नि तुम्हारे मुखसे निकला है, सूर्य-चन्द्रमा तुम्हारे दोनों नेत्र हैं, समुद्र तुम्हारा निवासस्थान है, पृथ्वीको तुमने अपने ऊपर रख छोड़ा है, शेष तुम्हारी शय्या है, सो वे भी लक्ष्मणके रूपमें बाहर बैठे हुए हैं । ७१-७३ ॥ इसमें कोई सन्देह नहीं है कि समस्त शास्त्र तुम्हारे मुखसे जायमान हुए हैं, मैं जिधर देखती हूँ, जो कुछ भी देखती हूँ, सब तुम्हारा ही रूप है ॥ ७४ । मैं कोई भी दुघट दिव्य (कसम) नहीं देखती,
२८८ आनन्दरामायणे [सर्गः ८
पदयोस्तस्य शपथं कृत्वा ने प्रत्ययो मम। भविष्यति न सन्देहस्त्वं कुरुष्व रघूत्तम ॥७७॥
इति सीतावतः श्रुत्वा प्रहस्य रघुनन्दनः। दूत्यं सौमित्रिमाहूय वसिष्ठं प्रेषयत्तदा ॥७८॥
लक्ष्मणः शिबिकारूढः पुरद्वारान्तिकं ययौ । मञ्चकाद्द्वारपं प्राह द्रागुद्घाटय सत्वरम् ॥७९॥
गत्वा पूर्यो लक्ष्मणः स गुरोर्द्वारे स्थितोऽभवत् । वसिष्ठद्वारपो गत्वा वसिष्ठाय न्यवेदयत् ॥८०॥
निशीथे लक्ष्मणं द्राग्मागतं न्यवि सम्भ्रमात् । अरुन्धत्या वसिष्ठोऽपि तच्छ्रुत्वा विह्वलोऽभवत् ८१।
निशीथे लक्ष्मणश्चात्र किमर्थं मां समागतः । इति विह्वलचित्तः स गवाहूयाथ लक्ष्मणम् ॥८२
पप्रच्छ रामभद्रस्य कारणं मुनिसत्तमः। तं वन्द्वा लक्ष्मणः प्राह प्रेषितस्त्वरितोऽस्मि हि।८३॥
कारणं न तु जानामि समुत्तिष्ठाधुनैव हि । शिबिकामधिरूढश्च द्वाग्द्वाहिरस्ते मुनिसत्तम ८४ ।
इति श्रुत्वा गत्वाऽऽश्रममथवाऽऽलिप्रार्थितः । शिबिकामारुह्यान्त्यान्वित्या शीघ्रं ययौ गुरुः । ८५ ।
तत्पृष्ठे शिबिकामध्ये सौमित्रिस्त्वरितो ययौ । रत्नदीपप्रकाशश्च चेष्टितो वेत्रपाणिभिः ८६
समागतं गुरुं ज्ञात्वा प्रत्युद्गम्य रघूत्तमः । दत्तासनं वेष्टितां भीत्या प्रणनाम सः ॥८७॥
कृत्वा पूजां सविस्तारां वस्त्रैरभरणादिभिः। कथयामास सकलं पिंगलावृत्तमद्भुतम् ८८।
कथयामास सीतायाः क्रोधसद्भावमपि प्रभुः । दिव्यं दातुं न किंचिच्च दृष्ट्वाऽन्यत्प्रीतये मम ॥८९॥
निर्धारितं ते पदयोर्दिव्यं तन्मे वदाम्यहम् । मनसाऽपि न भुक्ता सा मया वेश्याऽधुना परा ॥९०॥
इदं चेद्वचनं सत्यं स्पृशामि तर्हि त्वत्पदं । इत्युक्त्वा राघवः शीघ्रं वसिष्ठपदयोः करौ ॥९१॥
स्वीयौ संस्थाप्य शिरसा प्रणनाम गुरुं पुनः । सतुष्टा लज्जिता सीता ज्ञात्वा शुद्धं रघूत्तमम् ॥९२॥
जिससे पर मनम विश्वास हो ॥७५॥ बहुत कुछ सोच विचारकर मैने भी यही निश्चय किया है और आप
भी वही करें अभी अपने गुरु (वसिष्ठ) को बुलाकर यदि आप उनके पैरोंकी शपथ खा लें तो मुझे विश्वास
हो जायगा। हे रघूत्तम ! ऐसा करनेपर फिर इस पर किसी प्रकारका संशय नहीं रह सकेगा। अतएव आप यही
करें ॥७६ । ७७। इस प्रकार सीताका वचन सुनकर प्रसन्न मुखसे दागे द्राग लक्ष्मणको बुलवाया और
वसिष्ठजीके पास भेजा । ७८। पालकीपर चढकर लक्ष्मण राजदु आर पहुंचे। वहां पहरदू गाम फाटक
खुलवाकर तुरन्त गुरु वसिष्ठके दरबाजेपर जा पहुंचे। द्वारपालने राजा कुमार लक्ष्मणके आनेका सं देश वसिष्ठ-
के पास भिजवाया ॥ ७९ । ८० । आधी रातके समय लक्ष्मणको द्वारपर आया सुनकर वसिष्ठ तथा अरु-
न्धती दोनों घबराहटम विह्वल हो गये ॥ ८१ ॥ वे सोचने लगे कि आधी रातको लक्ष्मण मेरे पास क्यो
आये । इस प्रकार व्याकुलताके साथ उन्होंने लक्ष्मणको अपने पास बुलाया ॥८२, और आनेका कारण
पूछा। वसिष्ठका प्रणाम करके लक्ष्मणने कहा कि आपको रामने स्मरण किया है ॥८३॥ आपको बुलाने
का कारण मै भी नहीं जानता। हां, यह जानता हूँ कि आप अभी उठकर मेरे साथ चल दें बाहर पालकी
तैयार है ॥८४ । इस तरह लक्ष्मण द्वारा रामकी बात सुनकर अरुन्धती के प्रार्थना करनेपर वसिष्ठ उन्हें भी
अपने साथ लिये हुए झटपट चल दिये ८५॥ उनके पीछे-पीछे लक्ष्मणकी पालकी चली जिस समय
वसिष्ठ राजभवनपर पहुंचे तब चारों ओर रत्नों के दीपकोंका प्रकाश फैल रहा था । अनेक पहरेदार अपनी-
अपनी नौकरीपर डट हुए थे और बहुतसे यष्टिधरा धरकर साथ चल रहे थे ॥८६ । अब रामने सुना कि
गुरुजी आ गये हैं तो उन्हें तथा थोडा दूर आगे जाकर मिले और संतोके साथ उनको प्रणाम किया ।
फिर एक दिव्य आसनपर बिठाकर वस्त्रभूषणादि विविधवत् पूजन करनेके पश्चात् उस पिंगला वेश्याका
वृत्तान्त कह दिया ॥ ८७ । ८८ ॥ फिर यह बात भी बतायी, जो क्रोधमे सीताने रामको कही थीं । फिर
कहने लगे कि सीताको विश्वामके किसी भी प्रकार विश्वास नही है ८९ । अन्तमें आपके चरणोंकी
शपथ दिलानापर राजी हुई हैं। मैंने कभी मनसे भी उस वेश्या तथा अन्य किसी स्त्रीके साथ व्यभिचार नहीं
किया है ॥९० । यदि मेरा ये बात सच है तो मैं आपके पैर छूकर शपथ खाता हूँ। ऐसा कहकर झटपट रामने
वसिष्ठजीके पैर पकड़ लिये ॥ ९१ ॥ फिर अपना मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। यह देखकर सीता लज्जित हो
सर्गः ९] विलासकाण्डम् २८९
प्रणम्य मेऽपराधं त्वं क्षमस्वेति प्रमाद्यदत् । ततः सीता गुरोः पत्न्यै ददौ चित्राणि भक्तितः ॥९२॥
भूषणादि वरान्न्यैव दिव्यान्यस्त्राणि सादरम् । रामेण पूजितश्चापि वसिष्ठः पूर्ववत्तया ॥९३॥
सहितः शिबिकामारुह्यतुष्टः स्वौयगृहं ययौ । ततः सीतां समालिङ्ग्य रामो निद्रां चकार सः ॥९४॥
प्रभाते पिंगलां दास्या समाहूयाय जानकी । धिग्विधकृन्त्वा सखीभिस्तां ताडयामास बंधिताम् ॥९६॥
सीतोवाच वदा वेश्यां वस्मान्मंघापराधितम् । भविष्यसि त्रिवक्रा त्वं मथुरायां हि कुत्सिता ॥९७॥
वेश्यया प्रार्थिता प्राह कृष्णान्तेस्युद्भविष्यति ॥९८॥
श्रुत्वा तौ बंधितां वेश्यां मोषयामास राघवः ।
एवं नानाकोतुकानि चकार रघुनंदनः । सीतां सञ्चरामास स्वचरित्रैर्मनोहरैः ॥९९॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विलासकाण्डे सीतालङ्कारवर्णनं नामाष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
नवमः सर्गः
(सूर्यग्रहणपर रामकी कुरुक्षेत्रयात्रा)
श्रीरामदास उवाच
एकदा सीतया रामः कुरुक्षेत्रं स्वबंधुभिः । ययौ सूर्योपरागे वै स्नातुं पुष्पकसंस्थितः ॥ १ ॥
तत्र देवाः सगन्धर्वाः किन्नराः पन्नगा ययुः । नानाऽऽश्रमेभ्यो मुनयः पार्थिवाश्च सहस्रशः ॥ २ ॥
तत्र स्नात्वा रवौ ग्रस्ते राघवः सीतया सह चकार नानादानानि हस्त्युष्ट्ररथवाजिनाम् ॥ ३ ॥
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे नानोपायनपाणयः । ययुस्ते राघवं दृष्टुं राजपत्न्यश्च जानकीम् ॥ ४ ॥
अथ सीता राजपत्नीः समालिङ्ग्य वरामने । सखीभिर्मुनिदारैश्च सुखं चोपाविशत्तदा ॥ ५ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र सीतया पूजिता स्थिता । लोपामुद्राऽब्रवीद्वाक्यं जानकीं रंजयन्मुदा ॥ ६ ॥
हे सीते कञ्जनयने धन्याऽसि गजनामिनि । किंचिद्वर्णय रामस्य पौरुषं श्रुतितोषदम् ॥ ७ ॥
गयीं और उन्हें विश्वास हो गया कि रामचन्द्रजी परम पवित्र हैं । ९२ । तब सीताने प्रणाम करके रामसे प्रार्थना की कि मेरी भूल थी, आप मुझे क्षमा करें । इसके अनन्तर सीताने गुरुपत्नी अरुन्धतीको विविध प्रकारके आभूषण वस्त्रादि दिये । रामचन्द्रजीने फिर वसिष्ठजीकी पूजा की । थोड़ी देर बाद गुरुपत्नीके साथ-साथ पाल्कीपर बैठकर वसिष्ठजी अपने घरको चले गये । तदनन्तर राम भी सीताका आलिंगन करके सो रहे ॥ ९३-६५ ॥ सबेरे दासी द्वारा सीताने पिंगला वेश्याको बुलवाया । उसे बार-बार धिक्कार और बांधकर सखियोंके हाथो पिटवाया ॥ ९६ ॥ इसके पश्चात् उस वेश्यासे कहा कि तूने आज बड़ा भारी अपराध किया है । इससे भविष्यमें जब तू जन्म लेगी, तब तेरे शरीरमे तीन कूबड़ होंगे और तुझसे सब घृणा करेंगे ॥ ९७ ॥ तदनन्तर उस वेश्याने अनेक प्रकारसे सीताकी प्रार्थना की । तब सीताने कहा-'अच्छा, जा तेरा उद्धार कृष्णके हाथों होगा' । उधर जब रामने सुना कि पिंगला बँधी पिट रही है, तब उसे छुड़वा दिया ॥ ९८ ॥ इस तरह राम विविध प्रकारके कौतुक करके अपने मनोहर चरित्रोंसे सीताको प्रसन्न करते रहते थे ॥ ९९ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयावरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासमन्विते विलासकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
श्रीरामदासने कहा—एक बार रामचन्द्रजी सीता तथा अपने समस्त भ्राताओंके साथ पुष्पक विमानपर सवार होकर सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्र गये । १ ॥ वहाँ समस्त देवता, गन्धर्व, किन्नर, पन्नग तथा कितने ही आश्रमोंके मुनि और हजारों राजे आये हुए थे ॥ २ ॥ जब सूर्यग्रहण लगा, उस समय सीताके साथ रामने स्नान किया तथा हाथी-घोड़े ऊँट और रथ आदि दान दिया ॥ ३ ॥ इसके अनन्तर वहाँ आये हुए राजे अनेक प्रकारके उपहार ले-लेकर रामका दर्शन करने आये और रानियां भी सीताको देखनेके लिए उनके साथ आयीं ॥ ४ ॥ जब रानियां सीताके पास पहुंचीं तो उन्होंने बड़े आदरके साथ उन्हें उनकी सखियों और मुनिपत्नियोंके साथ एक सुन्दर आसनपर बिठलाया ॥ ५ ॥ सीताके विधिवत् पूजन कर लेनेके बाद मुनिपत्नियोंमेंसे अगस्त्यपत्नी लोपामुद्रा सीताको प्रसन्न करती हुई कहने लगीं—॥ ६ ॥ हे कमलनयने
२९० आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
तत्तस्या वचनं श्रुत्वा वर्णयामास जानकी। स्वपाणिग्रहणारभ्यः कुरुक्षेत्रावधिं कथाम् ॥ ८ ॥
लोपामुद्राऽपि तच्छ्रुत्वा विहस्य प्राह जानकीम् । सर्वं योग्यं कृतं सीते राघवेण महात्मना ॥ ९ ॥
एक एव वृथा क्लेशः कृतस्तेनेति चेन्मम । महान् श्रमः सेतुबन्धे किमर्थं हि कृतः पुरा ॥ १० ॥
कथं न कथितं कुम्भजन्मने राघवेण हि । सणार्वं चुलुके कृत्वा पीत्वेमं मूत्रमार्गतः ॥ ११ ॥
शुष्कं कृत्वा कपीन्मार्गोऽभविष्यदन एव हि । वृथा ते श्रमिताः सर्वे वानराः सेतुबन्धने ॥ १२ ॥
इति तस्या वचः श्रुत्वा सगर्वं जानकी तदा । लोपामुद्रां विहस्याह लोपामुद्रे पतिव्रते ॥ १३ ॥
सम्यक्कृतं राघवेण यन्सेतोर्बंधनं वरम् । तत्कारणं वदाम्यद्य शृणु त्वं स्वस्थमानसा ॥ १४ ॥
शृण्वन्विमाः समायाता मद्वाक्यं पार्थिवस्त्रियः । बाणेन शोषणीयश्चेन्मार्गो राघवेण हि ॥ १५ ॥
भविष्यति तदा हन्धा बह्वयश्चेति शङ्कितम् । उल्लंघनीयो जलधिर्वेदांशेव विहायसा ॥ १६ ॥
तदा गर्मं मनुष्यं च कदा ज्ञास्यति रावणः । हनुमत्पृष्ठमारुह्य गन्तव्यं चेत्परे तटे ॥ १७ ॥
लङ्कां प्रति तदा रामपौरुषं किं वदन्ति हि । यदि तीर्त्वा प्रगन्तव्यं बाहुभ्यां राघवेण हि ॥ १८ ॥
नोल्लंघनीयं विप्रस्य मूत्रं चेति विशङ्कितम् । चेन्मुनिः कुंभजन्मा वै प्रार्थनीयः पतिस्तव ॥ १९ ॥
रामेण चुलुकं कर्तुं तदा तल्लवणाम्बुधेः । अत्रैव राघवेणापि तदा हृदि विचारितम् ॥ २० ॥
पीतोऽयं जलधिः पूर्वं श्रुतं क्रोधादगस्तिना । मूत्रद्वारेण देवेभ्यो यस्मान्क्षारत्वमागतः ॥ २१ ॥
सर्वथा मूत्रसञ्चारः स कथं पातुमर्हति । स ऋषिर्धम वचनेन चुलुकं तु करिष्यति ॥ २२ ॥
भविष्यति ममाकीर्तिः सर्वत्र जगतीतले । मूत्रपानं ब्राह्मणेन स्वकार्यार्थं निजोक्तिभिः ॥ २३ ॥
कारितं येन रामेण सोऽयं चेनीति शङ्कितः । न मुनिं प्रार्थयामास राघवो धर्मतत्परः ॥ २४ ॥
एवं समन्त्य रामेण स्वकीर्त्यै सेतुबंधनम् । कृतं केनापि न कृतं न कोऽप्यग्रे करिष्यति ॥ २५ ॥
येन रामेण जलधौ शिलाः सत्तारिताः पुरा । सोऽय दाशरथी रामश्चेति ख्यातिं गतो भुवि ॥ २६ ॥
होते ! हे गजगामिनि ! तुम धन्य हो । हमारे कानोंको आनन्द देनेवाले रामजीके किसी पौरुषका तो वर्णन करो ॥ ७ ॥ लोपामुद्राका यह कहनेपर सीताने अपने विवाहसे लेकर कुरुक्षेत्रकी यात्रा पर्यन्तका समस्त वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ८ ॥ लोपामुद्राने कथा सुनकर सीतासे कहा—हे सीते ! महात्मा रामचन्द्रने अबहतक जो कुछ किया वह बहुत ठीक किया । केवल एक बातम भूल गये और उन्होंने इतना क्लेश उठाया । मैं नहीं समझ पाया कि समुद्रपर चढ़ाई करते समय रामने समुद्रपर सेतु बनानेका कष्ट क्यों किया ॥ ९, १० ॥ उन्होंने अगस्त्यजीसे क्यों नहीं कह दिया, वे एक अञ्जल में भरकर क्षणभरमें उस सारे समुद्रको पी जाते ॥ ११ । समुद्र सूख जाता और कपियोंको समुद्र जानेके लिए मार्ग मिल जाता। नाहक सेतु बांधनेके लिए उन्होंने उन बानरोंको कष्ट दिया ॥ १२ । इस प्रकार लोपामुद्राकी बात सुनकर सगर्व वाणी से सीताजी कहने लगीं-हे पतिव्रता लोपामुद्रे ! रामने जो सेतु बाँधा, वह बहुत अच्छा किया । मैं उसका कारण भी बतलाती हूँ, भली प्रकार सावधान होकर सुनो ॥ १३ । १४ । यहाँ आयी हुईं ये राजरानियाँ भी सावधानसे मेरी बात सुनें । यदि राम अपने बाणसे समुद्रको सुखाते तो बहुतसे प्राणियोंकी हत्या होनेकी आशङ्का थी । यदि राम आकाशमार्गसे समुद्रको लांघ जाते तो रावण और वानर यह कैसे जानते कि राम मनुष्य हैं यदि हनुमान जीकी पीठपर चढ़कर चले जाते ॥ १५-१७ ॥ तब रामका क्या पराक्रम देख पड़ता ? यदि हाथोंसे तैरते हुए उस पार चले जाते ॥ १८ ॥ तब उन्हें यह ख्याल होता कि ब्राह्मणके मूत्रको कैसे लाँघूं । यदि आपका पति अगस्त्यजीसे पीनेकी प्रार्थना करनेको सोचते तो यह विचार होता कि एक बार अगस्त्य इस समुद्रको पी चुके हैं और मूत्रमार्गसे बाहर निकाला है। इसीसे यह खारा है । १६-२१ । उसी मूत्रके समान खारे समुद्रको अगस्त्यजी कैसे पियेंगे। मान लिया जाय कि रामके कहनेसे अगस्त्यजी समुद्रको पी जाते तो संसारमें रामका बड़ा अपयश होता कि रामने अपना मतलब साधनेके लिए एक ब्राह्मणको मूत्र पिलाया। इन्हीं बातोंको सोचकर धर्मात्मा रामने अगस्त्यसे समुद्र पीनेको नहीं कहा ॥ २२-२४ ॥ इन बातोंका खूब अच्छी तरह सोच विचारकर ही रामचन्द्रजीने अपनी कीर्तिवृद्धिके लिए समुद्रपर सेतु