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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ८ ] मनोहरकाण्डम् ६५७

सर्गः ८ ] मनोहरकाण्डम् ६५७

भारतं वेदतुल्यं स्यादर्थादौऽधिकमुच्यते । तत्रापि भगवद्गीता विष्णोर्नामसहस्रकम् ॥५८॥
दशाधिकफलं प्रोक्तं भारतादपि नरैः । श्रोताऽर्द्धं फलंमाप्नोति भक्तितः शृणुयात्तु यः ॥५९॥
भारतं त्वितिहासञ्च रामायणसमुद्भवम् । यद्वेदात्पुण्यं तज्ज्ञेयं रामायणस्य च ॥६०॥
पाठात्तदर्द्धं श्रवणे व्याख्यानात्तु दशाधिकम् । वाल्मीकिना कृतं यच्च शतकोटिप्रविस्तरम् ॥६१॥
तत्सर्वेषामादिभूतं महामंगलकारकम् । रामायणादेव नाना सन्ति रामायणानि हि ॥६२॥
शेषभूतं चतुर्विंशत्सहस्रं प्रथमं स्मृतम् । तथा च योग वासिष्ठमध्यात्मञ्च तथामृतम् ॥६३॥
वायुपुत्रकृतं वापि नारदोक्तं तथा पुनः । लघुरामायणं चैव बृहद्रामायणं तथा ॥६४॥
अगस्त्योक्तं महाश्रेष्ठं साररामायणं तथा । देहरामायणं वापि वृत्तरामायणं पुनः ॥६५॥
मङ्गल रामायणं रम्यं भारद्वाजं तथैव च । शिवरामायणं कौञ्चं भारतस्य च जैमिनेः ॥६६॥
आत्मधर्मं श्वेतकेतुऋषेस्तथैव जटायुषः ॥६७॥
रवेः पुलस्तेर्देव्याश्च गुहस्य मङ्गलं तथा । गाधिनः सुतीक्ष्णस्य च सुग्रीव च विभीषणम् ॥६८॥
तथ ऽऽनन्दरामायणमेतन्मङ्गलदायकम् । एवं सहस्रशः सन्ति श्रीरामचरितानि हि ॥६९॥
कः समर्थोऽस्ति तेषां हि संख्यां वक्तुं सविस्तराम्
वाल्मीकिनिर्मितेभ्यः विभक्तानि पृथक् पृथक् ॥७०॥
सर्वेष्वप्यानंदसंज्ञं वरिष्ठं प्रोच्यते त्विदम् अस्य पाठेन यत्पुण्यं तन्ते शिष्य वदाम्यहम् ॥७१॥
शतकोटिमितं श्रुत्वा यत्फलं लभ्यते नरैः । तस्यार्धं तद्वदं हि ज्ञेयं शिष्य शुभप्रदम् ॥७२॥
श्रवणाद्द्विगुणं पाठे व्याख्यानात्तु दशाधिकम् । तस्मादेतन्महाऽऽनंदमत श्रव्यं नरोत्तमैः ॥७३॥
नानेन सदृशं किञ्चित्पूतं नान्ये भविष्यति सर्वेष्वपि च शास्त्रेषु पाञ्चरात्रागमोऽधिकः ॥७४॥

विष्णुपुराणस्य से अष्टादश उपपुराण हुए ! इनका पाठ करनेस पुराणपाठका आधा फल मिलता है ॥ ५४ ॥ ॥ ५५ ॥ ५७ ॥ महाभारत तो साक्षात् वेदके समान है। उसमें कही हुई भगवद्गीता और विष्णुसहस्रनाम ये दोनों महाभारतसे भी दशगुना अधिक फलद हैं। जो श्रोता भक्तिपूर्वक उन्हें सुनता है, वह आधा फल पाता है। महाभारत रामायण ही निकला हुआ इतिहास है। वेदके पाठसे जो पुण्य होता है, वही फल रामायणके पाठसे है । ५८-६० । सुननेसे आधा फल और व्याख्या करनेसे दसगुना अधिक फल प्राप्त होता है। श्री करांग विनिर्मित शतकोटि प्रविस्तर जिस रामायणकी रचना की है, वह सब रामायणोंका मूल और महा मङ्गलदायक है। उसी रामायण से ही विविध प्रकारकी रामायणोंकी रचना हुई है ॥ ६१ ॥ उसीरा परिशिष्ट अङ्गरूप बना और शेषके समान रूप कहेतो हुई चौबीस हजार श्लोकोंवाली वाल्मीकिरामायण, योगवासिष्ठ, अध्यात्मरामायण, वायुपुत्र (हनुमान्‌जी) की रामायण, नारदरामायण, लघुरामायण, बृहद्रामायण, अगस्त्यजीका बनाये महाश्रेष्ठ साररामायण, देहरामायण, वृत्तरामायण, भारद्वाजरामायण, शिवरामायण, क्रौञ्चरामायण, भरतरामायण, जैमिनिरामायण आदि बहुतसी रामायणें हैं ॥ ६२-६६ ॥ इनके अतिरिक्त आत्मधर्मी, जटायुकी, श्वेतकेतु ऋषिकी, पुलस्त्यकी, देवीजीकी, विश्वामित्रकी, सुतीक्ष्णकी, सुग्रीवकी, विभीषणकी और यह मङ्गलमय आनन्दरामायण, इस तरह रामचरित्रका वर्णन करनेवाली हजारों रामायणें बनी हैं ॥ ६७-६९ ॥ उन सबकी सविस्तार संख्या बतलानेमें कोई भी समर्थ नहीं हो सकता । वाल्मीकिजीके सौ करोड़ श्लोकात्मक रामायणसे ही इन सबका निर्माण हुआ है ॥ ७० ॥ किन्तु ऊपर गिनाई हुई सब रामायणोंमें यह आनन्दरामायण ही श्रेष्ठ है। ऐसा लोगोंने कहा है। इसके पढ़नेसे क्या पुण्य होता है, सो हे शिष्य ! मैं तुमको इसका माहात्म्य बतला रहा हूँ ॥ ७१ ॥ पूर्वोक्त शतकोटिमहात्मक वाल्मीकिरामायणके सुननेसे जो पुण्य प्राप्त होता है, उसका आधा पुण्य इस आनन्दरामायणके पाठसे होता है। इसको सुननेसे दुगुना और व्याख्या करनेसे दसगुना पुण्य होता है। इस कारण लोगोंको चाहिए कि इस आनन्दरामायणका श्रवण करें ॥ ७२ ॥ ७३ ॥ इसके सदृश पावन कोई अन्य न अबतक हुआ है और न

६५८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

भगवद्गीतया तुल्यं फलं तस्याखिलस्य च । मद्धर्मकथकश्रेष्ठैर्मद्भक्तैश्च विनिर्मितम् ॥७५॥
तत्काव्यं यः पठेत्प्राज्ञो दशांशं फलमाप्नुयात् । मद्भक्तैर्निर्मितं तच्च शतशःफलदं स्मृतम् ॥७६॥
यः करोति स्वयं काव्यं कल्पयित्वा स्वयंकथाम् तच्छ्रमो व्यर्थतामेति तच्छ्रोता च दोषभाक् ॥७७॥
पौराणीं भारतीं वापि तथा रामायणस्थिताम् । तथा पद्मपुराणस्थां कथां ग्रथति यः स्वयम् ॥७८॥
रामभक्तोऽपि लभते शक्रलोकाधिवासताम् । प्रत्यक्षरं वर्षमेकं वासस्तस्य भवेद्ध्रुवम् ॥७९॥
रामभक्तः पुराणेभ्यः कथां ग्रथति यः पुनः व्यासमूर्तिः स लभते बृहस्पतिसलोकताम् ॥८०॥
दौहित्रपोषितः शिष्यः शतग्रन्थः जलाशयः मद्धर्मप्रवणः पुत्रः षट् पुत्रा वै प्रकीर्तिताः ॥८१॥
एवं भूयामंशभूतैस्तैस्ते विचरन्ति हि अश्वत्थामादयः सप्त ते चिरञ्जीवितः सदा ॥८२॥
अतः श्रीरामभक्तैश्च कवित्वेऽस्मत्स्तुतिः कृता । मयि भक्त्या सदा श्रव्याऽहर्निशं बुधैर्मुदा ॥८३॥
भारताच्च शतांशेन फलदात्री स्मृताऽत्र हि । निन्दन्ति ये भक्तकृतां वाणीं ते खराः स्मृताः ॥८४॥
तत्तद्प्राकृतं काव्यं रामवर्णनसंयुतम् । भारतस्य सहस्रांशं श्रोतुः फलं स्मृतम् ॥८५॥
निर्मातुस्तु भवेन्न्यूनं मद्युच्छब्दशतांशतः । गौडीयादिप्रान्तेषु संस्तुतो व्याससन्निभाः ॥८६॥
स्वस्वभाषाकवित्वानां कर्तारस्ते कवीश्वराः । नैवाभिनन्दितं क्वापि पदान्वयसमन्वितम् ॥८७॥
अर्थप्रमाणसहिता सैव मान्या न चेतरा । स्तवन्ति तु ये मूर्खा वा कुर्युर्वा वित्तार्थं काः कश्चित् ॥८८॥
निष्फलान्तत्क्रमः प्रोक्तस्तदध्येता च दोषभाक् । उन्मादेन तु यः कुर्यात्स्त्रीकामानां तु वर्णनम् ॥८९॥
स हि श्वयोनिं प्राप्नोति वर्षाण्यक्षरसंख्यया । वेदोक्तधर्मानुसारेण पन्थानः स्मारकाः स्मृताः ॥९०॥


भविष्यम् होगा। सब शास्त्रोंमें पाञ्चरात्रके आगमका विशेष महत्त्व गिना गया है। उसका पाठ करनेसे भगवद्गीता-पाठके तुल्य फल प्राप्त होता है। मदाधारस्थ कथाप्रवक्ता और जिनका अच्छे-अच्छे भगवद्भक्तोंने बनाया है॥७४॥७५॥ उन काव्योंको जो मनुष्य पढ़ता है, उसे महाभारत पाठका दशांश पुण्य प्राप्त होता है। अन्य जनोंके बनाये काव्योंका अध्ययन करनेसे शतांश फल मिलता है॥७६॥ जो मनुष्य कथाकी कल्पना करके स्वयं काव्य बनाता है, उसका परिश्रम व्यर्थ जाता है और उसका पाठ करनेवाला भी दोषका भागी बनता है॥७७॥ जो कवि पुराणोंमें, महाभारतमें रामायणमें तथा पद्मपुराणमें लिखी हुई कथाओंका संग्रह करता है। वह रामभक्त होकर इन्द्रधाममें निवास करता है। वह प्राणी जितने अक्षरोंको लिखे रहता है, उतने ही वर्षांतक इन्द्रलोकमें रहता है॥७८, ७९॥ जो रामभक्त पुराणोंसे कथाओंका संग्रह करता है, वह साक्षात् व्यासदेवके समान पूज्य होता हुआ बृहस्पतिलोकमें निवास करता है ॥८०॥ अपनी लड़कीका लड़का, पोष्य पुत्र, शिष्य, बगीचा, तालाब तथा सद्धर्मग्रन्थका रचना, अपना निजी पुत्र, इतने सद्पुत्र मान गये हैं॥८१॥ वे लोग अनुभूत मनुष्यो अर्थात् अश्वत्थामा आदि जो सात चिरंजीवी बतलाये गये हैं, उनके साथ पृथ्वीमण्डलपर विचरते हैं॥८२॥ अतएव बहुतसे रामभक्तोंने अपनी कवितामें श्रीरामकी स्तुति की है। इसलिए लोग उनकी भी कविताओंका आदर कर, बारम्बार सुनो और पढ़ो॥८३॥ रामभक्तोंकी कविता महाभारतका शतांश फल देनेवाली होती है। जो लोग किसी रामभक्तकी बनायी कविताका निरादर करते हैं वे एक प्रकारके गधे हैं॥८४॥ संस्कृतप्राकृत अनभिज्ञ इतर-और भाषाओंमें रामके चरित्रवर्णन युक्त कवितायें श्रोताजनोंको महाभारतके सहस्र अंशका फल देनेवाले होती हैं॥८५॥ अच्छे शब्दोंमें की हुई कविता कविको शतशः फल देती है। संस्कृतमें कविता करनेवाला प्राणी व्यास-का वंश होता है॥८६॥ अपनी-अपनी भाषा में कविता करनेवाले कवीश्वर अथवा संस्कृतमे रचना करने-वाले कवियोंगोंसे जिनकी कविता पद और अन्वय संयुक्त हो, जिसमे अर्थ तथा प्रमाण दोनो विद्यमान हों, व ही मान्य हैं, और नहीं। जो कवि अपने स्वार्थके लिए किसी मनुष्यकी स्तुतिमयी कविता करता है, उसका परिश्रम व्यर्थ जाता है अन्य उसका अध्ययन करनेवाला प्राणी भी दोषका भागी बनता है। जो कवि उन्मादवश स्त्रियोंका वर्णन करता है, वह कवितामे लिखे हुए जितन अक्षर हैं, उतने वर्षंतक श्वानकी योनिमें