श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ६ ] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४२५
सर्गः ६ ] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४२५
पूजितो दानमानैश्च नृपैः स्वनगरीं ययौ । तदा निनेदुर्वाद्वानि ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥६१॥
प्रत्युज्जगाम श्रीरामं यूपकेतुः समागतः । प्रासादशिखराङ्गलग्नाः पौरनार्यः सहस्रशः ॥६२॥
सीतां रामं निरीक्ष्याथ ववृषुः पुष्पवृष्टिभिः । ततो विवेश श्रीरामः सभां तां पार्थिवैः सह ॥६३॥
विवेश स्वीयगेहं सा जानकी तुप्रसन्नधीः । गेहे कायलजन्दैर्मात् रामो न्यवेशयत् ॥६४॥
एकदा राघवस्तुष्टः शत्रुघ्नाय हि तां दृढौ मंत्राउविमु पुरा न्यकर्मोभ नियमादिकान् ॥६५॥
मङ्गळ्ययामास मंत्रौस्तांश्चकार यथाविधि । उद्यापनन्यनेकानि सर्वेषा माङ्गळैर्मुदा ॥६६॥
एकदा मुनयः सर्वे यमुनातीरवासिनः । आजग्मु राघवं द्रष्टुं भयाल्लवणाक्षसः ॥६७॥
कुम्भाडग्रे तु मुनिश्रेष्ठ मार्गेपं च्यवनं द्विजाः । अमन्वान्ताः सशिष्यास्ते राघवद्ययकांक्षिणः ॥६८॥
तान् पूजयित्वा परया भक्त्या रघुकुलोद्वहः । उवाच मधुरं वाक्यं हर्षयन् मुनिमण्डलम् ॥६९॥
करवाणि मुनिश्रेष्ठाः किमागमनकारणम् । धन्योऽस्म्यद्य यदिह्यूयं मां प्रीत्या द्रष्टुमिहागताः ॥७०॥
सुदुष्करं वा यत्कार्यं भवतां त-करोम्यहम् । प्रताडयन्त मां अन्य ब्राह्मण दर्शनं हि मे ॥७१॥
तच्छ्रुत्वा सहसा हृष्टश्च्यवनो वाक्यमब्रवीत् । मधुर्नामा महादैत्यः पुरा राम कृते युगे ॥७२॥
आसीदतीव धर्मात्मा देवब्राह्मणपूजकः । तस्मै तुष्टो महादेवो दत्तं शूलमनुत्तमम् ॥७३॥
तं शूलानेन यं हन्सि स तु भस्मीभविष्यति । सवणगण्पुत्र तस्य भार्या कुंभीनसी स्मृता ॥७४॥
तस्यां तु लवणो नाम राक्षसो भीमविक्रमः । आसीद्रुद्रेण या दर्षतो देत्य क्षणात्मकः ॥७५॥
मधुः स तत्र हस्तेन सूनः पूर्वं यतस्तदा । मधुसूदनामाभवत् ख्यातस्तदनम ॥७६॥
पीडिता लवणेनाथ वयं त्वां शरणं गताः । तच्छ्रुत्वा राघवोऽप्याह मा भैष्टेति मुनिपुङ्गवाः ॥७७॥
बैठे और अनेक देशोंको देखते हुए अयोध्याको चल पड़े ॥ ६० ॥ राम उस जनक महाराजके भटको स्वीकार करत
हुए व अपनी नगरीमे पहुँचे । रामके वहाँ पहुँचनेपर नाना प्रकारके बाजे बजे और अप्सरागण नाची ॥ ६१ ॥
यूपकेतु बहुतसे लोगोंके साथ फिरते हुए रामकी अगवानी करने पहुंचे । अयोध्यानिवासिनी नारियोंने कोठेपर
चढ़कर सीता और रामका दर्शन कर करके उनपर फूलोंकी वृष्टि की । सब बाद राम अनेक महिपालोंके साथ
अपने सभाभवनमें गये । सीता अपने महलमें चली गयीं । बादम रामचन्द्रज ने वहां रखिलवाराङ्गमूर्तिकी स्थापना
की ॥६२-६४॥ एक दिन रामचन्द्रजात प्रसन्न होकर बड़े भक्ति पूर्वकसम दर १ मंचागत रामक विशामकालम
जिन व्रतों और नियमांका मनोक्षा माना सो, उनका वर्णविधि विधान समेत सम्पन्न करके उनका उद्यापन भो
पत्नके साथ किया ॥६५॥६६॥ एक दिन यमुना तटपर रहनेवाले सब ऋषि लवणासुर नामक राक्षससे भयभीत
होकर रामके पास आये ॥ ६७ ॥ सब ऋषिन भगवन् दर्शन बुद्धिभ अपना अगुआ बनाया और हजारोंक
अधिक संख्या में एकत्रित होकर रामके पास जा पहुंचे ॥ ६८ ॥ रामन उन ऋषियोंका विधिवत् पूजन किया
और उनका प्रसन्न करत हुए इस प्रकार कहन लगे - 'हे मुनिगण आप लोग किस वास्ते मेरे पास आये
हैं ? आपकी जो आज्ञा हो, उस पूर्ण करने में तत्पर हूँ। मैं अत्यन्त धन्य समझता हूँ जो आप सब मुझे
दर्शनके लिए मेरे यहाँ पधारे ॥ ६९ । ७० ॥ यदि कोई अत्यन्त दुष्कर काय होगा तो उसको भी करनेके लिए
बराबर प्रस्तुत हूं । क्योंकि ब्राह्मण महान्का दर्शन सदृश है । आपलोग बिना संकोच उच्चारिये, मुझ सेवकको
आज्ञा दीजिए ॥ ७१ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर उनमेंसे च्यवन नामक ऋषि गद्गद होकर कहने
लगे - 'हे राम ! बहुत दिन हुए, मधु नामका एक महादैत्य था। वह ब्राह्मणोंका पूजक एवं बड़ा धर्मात्मा
था उसकी इस सद्वृत्ततास प्रसन्न होकर शिवजीने एक त्रिशूल दिया और कहा- ॥ ७२ । ७३ । तुम
इस त्रिशूलसे जिसे मारोगे, वह भस्म हो जायगा। रावणके छोटे भाई कुम्भीनसी कुम्भीनसी नामकी
भार्या थी । उससे लवण नामके एक राक्षसकी उत्पत्ति हुई । वह दुष्ट भारी दुराचारी दुष्ट हृदय देवताओं
और ब्राह्मणोंके लिए दुखदायी है ॥ ७४-७५ ॥ भगवान् शंकरने कुम्भीनसी राक्षसको मारा था । इसलिए
आपका मधुसूदन नाम पड़ा था । मधुके समान ही आज लवणासुरसे अकुलाकर हम आपको शरणमें आये
४२६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
लवणं नाशयिष्यामि गच्छंतु विगतज्वराः । इत्युक्त्वा प्राह रामोऽपि शत्रुघ्नं सदसि स्थितम् ॥७८॥
अद्य त्वामभिषेक्ष्यामि मधुरागाज्यकारणात् । तद्रामवचनं श्रुत्वा शत्रुघ्नो वाक्यमब्रवीत् ॥७९॥
नाङ्गीकरोम्यहं राज्यं त्वं मा निजपदात्प्रभो । न दूरं कुरु राजेन्द्र प्रार्थयामीति ते मुहुः ॥८०॥
तत्तस्य वचनं श्रुत्वा शत्रुघ्नस्य रघूत्तमः । तथैव भरतं प्राह न सोऽप्यङ्गीचकार तत् ॥८१॥
ततो रामः सुबाहुं च यूपकेतुं द्विजैर्नृपैः । अभिषिच्याब्रवीद्वाक्यं शत्रुघ्नं पुरतः स्थितम् ॥८२॥
दत्त्वा तस्मै शरं दिव्यं निजनामाङ्कितं शुभम् । अनेनैव हि बाणेन लवणं लोककंटकम् ॥८३॥
हनिष्यसि क्षणादेव वृत्रं देवपतिर्यथा । स तु संपूज्य तं शूलं गेहे गच्छति काननम् ॥८४॥
भक्षणार्थं हि जंतूनां धार्यं कर्तुं समुद्यतः । स तु नायाति सदनं यावद्धनचरो भवेत् ॥८५॥
तावदेव पुरद्वारि तिष्ठ त्वं धृतकार्मुकः । योत्स्यते स त्वया क्रुद्धस्तदा बाणेन घानय ॥८६॥
अनेनैकेन बाणेन क्षणादेव मरिष्यति । तं हन्त्वा लवणं क्रूरं तद्वने मधुमन्दिते ॥८७॥
निर्माय मथुरानाम्नीं नगरीं यमुनातटे । तस्यां स्थाप्य सुबाहुं वै पत्नीभ्यां बालकैः सह ॥८८॥
यूपकेतुं च विदिशानगरे ऽशत्रुनिषूदन । संस्थाप्य दयिताभ्यां च सैन्येन बालकैः सह ॥८९॥
ततो ममान्तिकं याहि शीघ्रं शत्रुनिषूदन । अश्वानां पञ्चसाहस्रं रथानां च तदर्द्धकम् ॥९०॥
गजानां षट्सतान्येव पत्तीनामयुतत्रयम् । आगमिष्यन्ति त्वत्पश्चादग्रे साधय राक्षसम् ॥९१॥
मागते त्वयि पश्चाद्धि नृपान् जेतुं पुनस्त्वहम् । गन्तुमिच्छामि तस्मात्त्वं शीघ्रमागच्छ मां प्रति ॥९२॥
इत्युक्त्वा मूर्द्धन्यवघ्राय शत्रुघ्नं रघुनन्दनः प्रेषयामास तैर्वैप्रैराशीर्भिरभिनन्दितः ॥९३॥
शत्रुघ्नोऽपि नमस्कृत्य रामं मधुवनं ययौ । निनाय पूजनात्थं तां मूर्ति सोऽप्यात्मनः प्रियाम् ॥९४॥
अग्रे संप्रेष्य शत्रुघ्नं ततः श्रीरघुनन्दनः । सुबाहुयूपकेतू तौ स्वस्वस्त्रीभ्यां च बालकैः ॥९५॥
हैं । मुनिश्रेष्ठ च्यवनकी बात सुनकर रामने कहा हे ऋषियों आप लोग मत डरें ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ आप सब अपने-अपने आश्रमको जाते जायें । मैं उस दुष्ट लवणासुरको मारूँगा । उनसे इतना कहकर राम शत्रुघ्नसे बोले—शत्रुघ्न ! आज मैं तुम्हारा अभिषेक करके तुम्हें मथुरा राज्यको भेजूँगा। उत्तरमें शत्रुघ्नने कहा- हे राजेन्द्र ! मुझे राज्य नहीं चाहिए । मेर ऊपर कृपा करके आप मुझे अपने चरणोंसे दूर न कीजिए । इसके बाद रामने वही बात भरतसे कही और उन्होंने भी अस्वीकार कर दिया ॥ ७८-८१ । तब रामने सुबाहु और यूपकेतुको तैयार करके अनेक ब्राह्मणोंके साथ उनका अभिषेक किया और सामने बैठे हुए शत्रुघ्नको अपने नामसे अङ्कित बाण देते हुए कहा कि लोगोंके लिए कंटकस्वरूप लवणासुरको तुम इसी बाणसे क्षण भरमें उसी तरह मार डालोगे, जैसे इन्द्रने वृत्रासुरको मारा था। वह लवणासुर सदा घरमें उस त्रिशूलका पूजन करके जङ्गलमें पशुओंको मारनके लिए चला जाया करता है। सो तुम ऐस ही समय उसके घर पहुंचो, जब वह वनको चला गया हो । उनके द्वारपर तबतक बैठे रही, जबतक वह वनसे न लौट आये । जब वह आये तो उसे भीतर जानेका अवसर मत दो, द्वारपर ही छेड़-छाड़ करके युद्ध शुरू कर दो। वह भी तुरन्त क्रोधातुर होकर लड़ने लगेगा सब तुम इसी बाणसे उसे क्षणभरमे मार डालोगे। उस दुष्ट लवणासुरको मारकर मधुवनमें ॥८२-८७॥ यमुना नदीके तटपर मथुरा नामकी नगरी बसा तथा उसमें स्त्री-बच्चों समेत सुबाहुको बिठाकर विदिशा नगरीमें बच्चों तथा सेनाके साथ जाकर यूपकेतुको राजगद्दीपर बिठा देना। यह सब काम करके हे शत्रुनिषूदन ! तुम फिर मेरे पास लौट आओ । तुम आगे-आगे जाओ, तुम्हारे पीछे पांच हजार घोड़े, ढाई हजार रथ, छः सौ हाथियाँ और तीस हजार पैदल सैनिक तुम्हारी सहायताके लिए भेजता हूँ। जब तुम वहाँसे लौट आवोगे, तब मैं एकवार फिर राजाओंको जीतनेके लिये यात्रा करूँगा ॥ ८८-९२ इतना कहकर रामने शत्रुघ्नका माथा सूंघा और अनकझ आशीर्वाद देकर उन ब्राह्मणोंके साथ भेज दिया ॥ ९३ ॥ शत्रुघ्न भी रामको प्रणाम करके मधुवनकी ओर चल पड़े । साथमें रामकी दी हुई वह कपिल वाराहीकी मूर्ति भी लेते गये। रामने उन दोनोंके साथ