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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ५ ] सारकाण्डम् ५१

सर्गः ५ ] सारकाण्डम् ५१

पुनर्वस्त्राणि सम्धाय सुवस्त्रांश्च सदारकम् । धनुर्बाणं करं कृत्वा गथे पञ्चाऽथ बन्धुभिः ॥९६॥
मृगागमौद्यानकं दौरं दृष्ट्वा तु कातुकं च । वीक्ष्य पर्वतनद्यग्न्यां स्वार्थं गृहं पुनः ॥९७॥
सायंमध्यादि मरुत्वं पुनर्नुत्वा महेश्वरम् । शंभुं भक्त्या पुनः पूज्य कृत्वा चैवापहारकम् ॥९८॥
रत्नकांचनमणिस्वर्निर्मितं मञ्चके वरं । दिव्यप्रासादमध्यं च सीतया रघूनायकः । ९९
रात्र्यगातां विनोदेन्योन्या चक्रे ततः परम् । एव नानासमुत्सहैर्दिनेनायारुमनाः सुखम् ॥१००
एकदा राघव राजा ज्ञात्वा मुद्रलयस्ततः । वावष्टककरतश्चापि यत्रत्वं व्याप्यमानुषः ॥१०१॥
साक्षात्तनारायणं विष्णुं मन्वानुच रहः स्थितं । पप्रच्छ विनयेनैव हृदि भयं विधाय च । १०२।
राम नारायणस्त्वं हि भूभारहरणाय च । मत्तो जातोऽसि नै लोका वदन्त्यज्ञानबुद्धयः ॥१०३॥
अतः पृच्छामि ते राम म यया मोहितस्त्वहं । किंचिज्ज्ञानापदेशेन नामयाज्ञानजा मतिम् । १०४।
रागबन्धादिगेहेषु व्यथा नैवोपशाम्यति । तन्निपुत्वचनं श्रुत्वा गजानं रामनोऽब्रवीत् । १०५।

श्रीराम उवाच
शृणु राजन् प्रवक्ष्यामि तव ज्ञानार्थमुत्तमम् । शृणोतु मम मातेयं कौशल्याऽपि तव प्रिया ॥१०६॥
नश्वरं भासते चेतद्विद्य मायाद्भवं नृप । यथा शुक्तौ रौप्यभानः कामभूम्या जलस्य च ॥१०७॥
यथा रज्जौ सर्पभासो मृगतोये जलस्पृहा । तद्वदात्मनि भासोऽय कल्प्यते नश्वरोऽबुधैः १०८॥
अज्ञानादिभिर्नान्यं मन्यते न तु पण्डितैः । आत्मा शुद्धो निर्व्यतीकः सच्चिदानन्दलक्षणः । १०९।
यस्याऽज्ञानेन विधेशा ब्रह्माद्याः सकला वयम् । स्थिति-त्पत्तिविनाशार्थं नानारूपाणि मायया । ११० ।
धार्यंते नटवद्राजन्न लेपामक्त एव सः । यथा पत्रं न स्पृशति जलं मायो तथा नरुः ॥१११॥
आत्मा नित्यो न स्पृशति परमानन्दरिग्रहः । देहागारसुतस्त्रीषु मामकेति च या मतिः ॥११२॥


वस्त्र सम्भालकर भोजन दसरथके बाद साताके साथ आराम करते थे ॥ ९५ ॥ फिर वस्त्र पहिन तथा नाना ग्राम अनुप ज्ञान नगर बन्धुओंके साथ रथपर सवार होकर उद्यान, वन तथा बाका दृश्य, अनेक गान सुनन तथा नाच देखते हुए पुन अपने घर आ सायंमध्यादि नित्य कर्म करते और यथाविधि स्नान करके अनिश शिवजीका पूजा करते थे सायंकालका भोजन कर रत्नकाञ्चन तथा माणिक्यके सुन्दर शय्यापर दिव्य महलमे सीताके साथ हरवखत तथा विनोदपूर्वक शयन करते थे । इस प्रकार नानाप्रकारके सुखपूर्वक बारह वर्ष बीते गये ॥९६-१००। एक समय मुनि मुकुद तथा मुंड वासिष्ठक कह दि- और समझ कर वशिष्ठका दोष राजा दशरथने रामका साक्षात् नारायण समझकर एकान्तमें बुलाकर और भय स्वभाव तथा विनयपूर्वक कहने लगे-॥ १०१ ॥ १०२ ॥ हे राम ! तुम साक्षात् नारायण हो, तुमने भूमिके भार हरण करनेके लिए मेरे घर अवतार लिया है, ऐसा अज्ञानयुक्त बुद्धिवाले लोग कहते हैं। इस कारण हे राम ! तुम्हारी मायासे मोहित मैं प्रार्थना करता हूँ कि तुम ज्ञानका उपदेश देकर मेरा अज्ञान दूर कर दो ॥ १०३ । १०४॥ स्त्री, पुत्र एवं गृह आदिम अनुरागके कारण मेरी बुद्धि कभी शान्ति तथा सुखका अनुभव नहीं करती। पिताके इस वचनको सुनकर राम राजा दशरथसे बोले ॥१०५॥ श्रीरामने कहा- हे राजन् ! मैं आपका अज्ञाननाशके लिए उत्तम उपदेश देता हूँ। उसे आप तथा आपकी प्राणप्रिया और मेरी माता कौसल्या भी श्रवण करें सुनें ॥ १०६ । हे नृप ! मायासे उत्पन्न यह समस्त संसार आत्ममय उसी प्रकार सून भासित होता है जैसे कि सीपीमें चाँदी, रेतामें जल, रज्जुमें सांप तथा धूपमृगतृष्णाका सलिल भासित होता है। अज्ञानी लोग इस आत्म सत्ता को भिन्न तथा अनाश्वर समझते हैं, परन्तु पण्डित लोग तो इससे विपरीत ही मानते हैं। उनके मतमें आत्मा शुद्ध, नित्य तथा सच्चिदानन्दरूप है ॥ १०७ ॥ १०८। उनके अज्ञामात्रसे समस्त विश्वके स्वामी ब्रह्मादि तथा हम सब प्राणी मायाके अधीन होकर जगत्का स्थिति उत्पत्ति तथा विनाशके लिये नटकी तरह विविध रूपोंको धारण करते हैं किन्तु आत्मा स्वयं जिसमें आसक्त नहीं होता। जिस प्रकार कमल-पत्र जलका स्पर्श नहीं करता उसी प्रकार अमल, नित्य और परम आनन्दस्वरूप आत्मा भी मायासे निर्लिप्त

५२ आनन्दरामायणे [ सर्गः ५

उपसंहृत्य बुद्ध्या मन्मयं ब्रह्मणि क्षिपेत् । यद्यत्कर्मावसानेऽथ तन्मन्मत्तोऽभवत्स्मरेत् ॥११३॥
एवं त्वं सर्वभावेन मुच्यसे भवसंकटात् । सत्यं शौचं दया शांतिः क्षमा चेन्द्रियनिग्रहः ॥११४॥
अहिंसा मत्पदद्वन्द्वमार्गालोकनमेव च । इत्याद्या ये गुणांस्तांस्तान् भजस्व निरन्तरम् ॥११५॥
शौर्यं द्यूतं विवादं च मात्सर्ये दंभमेव च । द्रोहेर्ष्यासंश्रयं चैव लोकनिन्द्यप्रवर्तनम् ॥११६॥
संतविप्रसतां चैव भक्तानां मानभंजनम् । निंदा पैशुन्यनृशंसं त्यज दूरं स्वतो नृप ॥११७॥
एवं मया नृपश्रेष्ठ पूर्वत्वं यत्कृतं मम । जन्मज्ञानोपसम्पन्नोऽहं कौशल्यायां नृपोद्भव ॥११८॥
यन्मया कथितं चैतदज्ञानमलनाशनम् । गोपनीयं प्रयत्नेन त्वयेदं न कुत्रचित् ॥११९॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा नष्टमोदस्ततो नृपः । सञ्जातपरितोषस्तु रोमांचितवपुस्ततः ॥१२०॥
प्रणनाम राघवस्य पादौ दृढभावतः । ततो रामः पुनः प्राह पितरं निर्मलाशयम् ॥१२१॥
नेदं वाच्यं त्वया राजन् वदनादि शिशुं प्रति । मायया मानवेषस्य मम उपहासकारणात् ॥१२२॥
मन्मयं च मां नित्यं भज भावेन सादरम् । मयि न्यस्ते महन्प्राणो मयि भक्तिं दृढां कुरु ॥१२३॥
इत्युक्त्वा पितरौ नत्वा गृहाद्याज्ञां तयोः प्रभुः । ययौ सभगवद्रूपः श्रीरामः स्वनिकेतनम् ॥१२४॥
कदा मातुर्गृहं गत्वा सीतया भोजनं व्यधात् । कदा भ्रातृगृहेष्वेव कदा पर्यंक पितुः स्वयम् ॥१२५॥
कदा दशरथं तातं भोजनार्थं निजे गृहे । भार्यापुत्रादिसंयुक्तं षड्रसैर्विप्रैः समन्वितम् ॥१२६॥
हृष्टो रामः समाहूय भोजयामास सादरम् । श्रीरामदर्शनार्थं ते तपोवननिवासिनः ॥१२७॥
अयोध्या नगरीमेत्य द्वारपालैरनिवारिताः । शतशः प्रत्यहं रामं दृष्ट्वा स्तुत्वा पुनः पुनः ॥१२८॥
आतिथ्यं रघुनाथस्य गृहीत्वा तुष्टमानसाः । सपद्मनादनाम्यैव रथन्त्या पुष्पकादिभिः ॥१२९॥
रमयित्वा सप्ताहादिं जग्मुः स्वं स्वं मदाश्रमम् । यत्र यत्र हि संपश्येत्प्रीत्या लीलां विदेहजा ॥१३०॥

रहते हैं। उपसंहृत्य उस ब्रह्म का विचार करके जब तक ब्रह्म का ज्ञान न हो जाय, समस्त वासनाओंको छोड़-
कर यह जो दृश्यमान संसार है उसको चिद्धन ब्रह्ममें अर्पित कर, यह सब जान गया और ईश्वरको सबमें
व्याप्त देखकर आप इस भवसङ्कटसे मुक्त हो जायेंगे, हे राजन् ! पहिले आप सत्यभाषण, पवित्रता, दया
शान्ति, क्षमा, इन्द्रियनिग्रह, अहिंसा, अमल ज्ञान तथा हमारे स्वरूप के दर्शन आदि गुणोंका निरन्तर धारण
करें ॥ १०६-११५ ॥ हे नृप ! मार, जुआ, द्यूतो, परिवाद, ममता, द्रोह, मद, काम, अन्य निन्द्यवान् कामके
दृष्टान्त, संत-विप्र-साधु-सज्जनोंके धार्मिक कार्योंका भंजन, निन्दा और चुगलखोरी आदिको अपने चित्तसे दूर कर दें
॥ ११६ व ११७ ॥ हे नृप ! आपने पूर्वजन्ममें जो कुछ पूजन, गुणगान किया था। इसी कारण से आपके
द्वारा कौशल्याके गर्भसे पुत्ररूपमें जन्मवान् हुआ हूँ ॥११८॥ यह जो मैंने आपको अज्ञानरूपी मल नष्ट करने-
वाला उपदेश दिया है, उसे आप अपने मनमें ही गोपनीय रखना किसीसे कहिएगा नहीं ॥ ११९ ॥ रामके इस
उपदेशको सुनते ही राजाके मनका मायाकृत मोह दूर हो गया और वे इस समय परिपूर्ण तथा रोमांचित शरीर
होकर हर्षातिरेकसे राजा दशरथने रामके चरणोंको वन्दन किया । इस प्रकार निर्मल हृदयवाले पितासे
राम फिर कहने लगे - ॥ १२० ॥ १२१ ॥ हे राजन् ! मुझको प्रणाम करना आपका उचित नहीं है। मायासे
मनुष्यदेहधारी मेरा इससे उपहास होगा। इस कारण आप सदा आदरभावसे मनमें ही मेरा भजन किया
करें। मन तथा प्राणको मुझे अर्पण करके मेरी दृढ़ भक्ति करें ॥ १२२ ॥ ऐसा कह तथा माता पिताकी
आज्ञा लेकर श्रीरामने उनको नमस्कार किया और सादर सवार होकर अपने भवनको चले गये ॥ १२४ ॥
वे सीताके साथ कभी माताके महलमें आकर भोजन करते, कभी भाइयोंके भवनमें और कभी पिताके साथ
पंक्तिमें बैठकर भोजन करते थे। कभी स्त्रियों पुत्रों ब्राह्मणों तथा नागरिकोंके साथ पिता दशरथको अपने भवनमें
बुलाकर सादर हर्षपूर्वक भोजन कराते थे। प्रतिदिन सैकड़ोंकी संख्यामें वनवासी मुनिजन भी श्रीरामचन्द्रका
दर्शन करनेके लिये अयोध्या आते रहते थे। वे बिना रोकटोक भीतर जाकर रामका दर्शन तथा स्तुति करके
और रामके द्वारा किये हुए सत्कारको ग्रहण करके प्रसन्नतापूर्वक पाँच-सात दिन वहीं रहकर अपने-अपने

सर्गः ६ | सारकाण्डम् | ५३

तत्तच्चकार सा साध्वी हास्यक्रीडासनादिकम्। विवाहानन्तरं रामः समा द्वादश सीतया ॥१३१॥
रमयामास साकेते महाक्रीडापुरःसरम्। सहस्रवर्षविज्ञेयं श्रेष्ठं वर्षं कृते युगे ॥१३२
शतवर्षञ्च त्रेतायां द्वापरे दशवर्षजम्। कलेर्मासेन बोद्धव्यं शून्यद्वयान्त्रिदिकक्रमात् ॥१३३॥
एवं श्रीरामचन्द्रेण भोगा भुक्ताः सुरोपमाः। यस्मिन् ऋतौ च यद्रूपं फलपुष्पादिकं शुभम् ॥१३४॥
तत्स्र्वं सर्वदेशमात्रासे साकेतमवस्थिते। अनावृष्टिर्न वै कुत्र तस्कराणां भयं न हि ॥१३५
हिंस्रादीनां भयं नासीदयोध्याविषये प्रिये। युधाजित्नाम कैकेयीभ्राता मग्नमातुलः ॥१३६॥
निनाय भरतं स्वीयराज्ये शत्रुघ्नसंवृतम्। कौतुकेन नृपं पृष्ट्वा कैकेयीं प्रणिपत्य च ॥१३७॥
एवं रामस्य माहात्म्यं बाल्यत्वेऽपि सुखावहम्। ये शृण्वन्ति नरा भक्त्या न तेषामस्त्यमङ्गलम् ॥१३८।
एवं यथा त्वया पृष्टं तथा सर्वं मयोदितम्। रामेण चरितं यच्च नृणां माङ्गल्यदायकम् ॥ १३९।
एवं गिरीन्द्रजे प्रोक्तं बाललीलादिकौतुकम्। रामचन्द्रस्य संक्षेपात्तत्र प्रीत्यै सुखावहम् ॥१४०॥

इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे
रामदिनचर्यावर्णनं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥


षष्ठः सर्गः

( रामका दण्डकवनमें प्रवेश )
श्रीशिव उवाच

एवं त्रेतायुगे रामं नगर्यां सीतया सुखम्। क्रीडतं नारदोऽभ्यैद्दे ययावाकाशवर्त्मना ॥१॥
अथ रामो मुनिं पूज्य सीतया लक्ष्मणेन च। शुश्राव वचनं तस्य सुरैर्विज्ञापितं च यत् ॥२॥
निहत्य रावणं युद्धे ततो राज्यं कुरुष्व हि। अंगीकृत्य रघुश्रेष्ठस्तं मुनिं च व्यसर्जयत् ॥३॥
अथ रामोऽब्रवीत्सीतां मम राज्याभिषेचनम्। कर्तुकामोऽस्ति तत्प्राप्तं विघ्नमुत्पाद्य दण्डकम् ॥४॥


आश्रमको चले आते थे । जो काम करनेसे राम प्रसन्न होते थे, पतिव्रता सीता उन-उन हास्य-क्रीड़ा तथा आसनादिका विधान करती थीं । विवाहके बाद रामने बारह वर्ष तक सीताके साथ अयोध्यामे आनन्दपूर्वक विलास किया । कलियुगके हजार वर्षोंके बराबर सत्ययुगका एक वर्ष जानना चाहिये । कलियुगके सौ वर्षोंके बराबर त्रेतायुगका एक वर्ष और कलियुगके बारह वर्षके बराबर द्वापरका एक वर्ष होता है ॥१२५-१३३॥
इस प्रकार श्रीरामचन्द्रने बारह वर्ष तक देवताओंके योग्य भोगोका भोगा। रामचन्द्रजीके अयोध्यामे रहत समय जिस ऋतुमे जो पुष्प-फल आदि होना चाहिए, वह सब नियमसे उत्पन्न हुआ करते थे। कभी अनावृष्टि नहीं हुई और चोरोका भय नहीं रहा । हे प्रिये पार्वती ! उस राज्यमे कभी किसीको हिंसक पशुओका भय नहीं हुआ । एक दिन युधाजित् नामक कैकेयीका भाई तथा भरतका मामा वहा आया और राजासे पूछतया कैकयीको मनाकर शत्रुघ्नसहित भरतको अपने राज्यमे ले गया । ॥१३४-१३७ ॥ बाल्यावस्थासे ही मङ्गलस्वरूप तथा सुखदायक रामके चरित्रको जो मनुष्य भक्तिभावसे सुनता है उसका कभी अमङ्गल नहीं होता । १३८॥
इस प्रकार मनुष्यमात्रके लिए कल्याणकारी श्रीरामचन्द्रका चरित्र मैने तुमको कह सुनाया ॥ १३९॥ १४०॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तगते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये बाळचरित्रे भाषाटीकाया सारकाण्डे रामदिनचर्य्यावर्णनं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥

श्रीशिवजी बोले—इस तरह अयोध्या नगरीमें सुखपूर्वक सीताके साथ क्रीडा करते हुए रामके पास बारहवें वर्षमें एक दिन आकाशमार्गसे नारद मुनि पधारे , १ ॥ सीता तथा लक्ष्मणके साथ रामने मुनिकी पूजा की और उनके मुखसे देवताओंका यह संदेश सुना कि आप पहले रावणको मारकर पश्चात् राज्य करें रघुश्रेष्ठ रामने भी 'बहुत अच्छा' कहकर उन्ह विदा किया ॥ २ ॥ ३ ॥ तदनन्तर राम सीतासे कहने लगे-हे सीते

५४आनन्दरामायणे[ सर्गः १

गच्छामि रावणादीनां वधार्थं लक्ष्मणेन च । अयोध्यायां वसञ् त्वं कौसल्यां पार्थिवं भज ॥५५॥
तद्भार्यावचनं श्रुत्वा प्रणिपत्य रघूत्तमम् । उवाच मधुरं वाक्यं वनं मां त्वं नय प्रभो ॥५६॥
कारणान्यत्र त्रीणि मन्ति तानि वदाम्यहम् । मन्वन्वय प्रयाणं मे दण्डके हि त्वया सह ॥५७॥
वनप्रवासे मामाह भर्त्रा च मन्वयाद्विजः । बान्धवे कन्यका मे दृष्टा कश्चिद्द्विजप्रणीः ॥५८॥
अन्यन्मन्वन्तरं पूर्वं सुरेन्द्रापि मयाऽदितम् । यदा चार्त्तारिकं प्राप्तः यज्जितुं त्वं समागतः ॥५९॥
चतुर्दश वत्सरानि मुनिवृत्त्यनुवर्तिनी । त्रिषष्टिव्याख्यावहेह धनुः सज्जं करोम्यहम् ॥६०॥
मन्यन्य कुरु मद्वाक्यं प्रयणाद्दण्डक मया । अन्यच्छ्रुत मया पूर्वं रामायणमनुत्तमम् ॥६१॥
तत्र मीतां विना रामो न गतोऽस्ति हि दण्डकम् तस्मात्त्वं मां गृहीत्वा दण्डकं नेतुमर्हसि ॥६२॥
तन्सीतावचनं श्रुत्वा दर्शयित्वापि रघूद्वहान् । विहस्य राघवः अत्मान् समालिंग्य विदेहजाम् ॥६३॥
अथ राजा दशरथः श्रीरामस्याभिषेचनम् यौवराज्यपदे कत्तुमुद्युक्तः प्राह वै गुरुम् ॥६४॥
यौवराज्यपदे राममभिषेकं त्वमाहर । तद्वाजवचनं श्रुत्वा गुरुर्दशरथ नृपम् ॥६५॥
कौसल्यागृहमापीय बोधयामास वै रहः । राजन शृणु त्वं कौसल्यासुमित्रं शृणुतं त्रियमे ॥६६॥
रावणस्य वधार्थं हि रामः श्री दारक वनम् । गमिष्यति लक्ष्मणेन सीतया कैकयीवशात् ॥६७॥
तस्मात्प्रमत्रमवनूपौ सभागनाभिषेकितुम् । कारयस्व सुमन्त्रेण समाहूय नृपादिकात् ॥६८॥
श्रीरामविरहाद्द्वाजन् ब्राह्मणस्यापि शापतः । अचिरादेव स्वर्लोकं त्वं यास्यसि पार्थिव ॥६९॥
कौसल्येथ रामराज्योत्सवं पश्यतु वै पुनः । स्वर्गस्थाद्विमानस्थस्त्वं पश्यसि महोत्शवम् ॥२०॥
दुर्लंघ्या भाविनी रेखा ब्रह्मादीना सुरोत्तम । इति श्रुत्वा गुरोर्वाक्यं तेन राजा सभां ययौ ॥२१॥
रामराज्याभिषेकाय समारब्धंकरेन्मुदा । दूतात्कारयामास नृपान् दशरथस्तदा ॥२२॥

पिताजी मेरा राज्याभिषेक करना चाहते हैं, परन्तु मैं उनम विघ्न खड़ा करके रावण आदिका नाशके लिए लक्ष्मणके साथ दण्डकारण्य जानेको तैयार हूँ। तुम यहाँ रहकर माता कौशल्याका और महाराजकी सेवा करना ॥ ५५ ॥ रामका यह वचन सुनकर सीताजीने उनके चरण पर गिर पडी और वह मधुर वचन बोली—हे प्रभो ! मुझे भा अपने साथ वनको ले चलिए । ५६ ॥ इसमें तीन कारण हैं। उन्हें मैं बताती हूँ। एक तो यह कि बाल्यकालमें मेरे हाथको देखकर एक ब्राह्मणने कहा था कि तुम अपने पतिके साथ वनवास करोगी। सो आपका साथ वनमें जानेसे उस ब्राह्मणका व्रीत सत्य हो जायगा ॥ ५७-५८॥
दूसरा कारण यह है कि जब आप सभाके बीच स्वयंवरके समय धनुष चढाने चले थे, तब मैंने देवताओंसे प्रार्थना की थी—हे देवताओं ! यदि राम धनुष चढा लें तो चौदह वर्ष तक मुनिवृत्ति धारण करके वनमें विचरण करूँगी ॥ ६० ? ६० ॥ अतएव आप मुझे वनमें ले जाकर मेरी प्रार्थनाको भी सच्चा बनाएँ । तीसरा कारण यह है कि मैंने सर्वोत्तम रामायण महाकाव्य में सुना है कि सीताके बिना राम अबतक कभी वनमें नहीं गये । सो आपको मुझे दण्डकारण्यम साथ ले चलना चाहिये ॥ ६१ । ६२ ॥ सीताके वचन सुनकर रामने उनको आलिङ्गन करके "तथास्तु" कहा ॥ ६३ । इधर राजा दशरथने रामका युवराजपदपर अभिषेक करनेका निश्चय करके गुरु वशिष्ठसे कहा कि आप श्रीरामका युव राजपदपर अभिषेक करें। इस बातको सुनकर वे राज दशरथको कौशल्याके भवनमें ले आये और एकान्तमें कहने लगे— । ६४-६६ ॥ हे राजन् ! आप तथा यह कौशल्या और सुमित्रा मेरे कथनको सुनें। राम कैकेयीके वशस सीता तथा लक्ष्मणके साथ लेकर रावणको मारनेके लिए कल ही दण्डकवन चले जायँगे ॥६७॥ इसलिए प्रजाजनकी तरह आप चुपचाप रामका अभिषेक करनेके लिए सुमन्त्रको कहकर सब सामग्री मंगवाइए और समस्त राजाओंको निमन्त्रित कीजिए ॥ ६८ ॥ हे पार्थिव ! श्रीरामके विरह तथा ब्राह्मणके शापसे आप शीघ्र स्वर्ग सिधारेंगे । ६९ ॥ बादमें कौशल्या रामके राज्यात्सवको देखेंगी और स्वर्गीय विमानमें बैठकर आप अन्तरिक्षसे वह उत्सव देखेंगे ॥ २० ॥ हे नरोत्तम ! भविष्यकी रेखा ब्रह्मादिकोंके लिए भी दुल्लङ्घीय होती है। गुरु वशिष्ठका यह वचन

[ सर्गः ६ ] सारकाण्डम् ५५

कपीश्वराः समायान्तु नानाश्रमनिवासिनः । नगरीं शोभायामासुर्नानाचित्रध्वजैरलंैः ॥ २३ ॥
पताकाभिर्मनोज्ञाभिश्च हेमदण्डैर्मनोरमैः । सुगन्धारूपामशाम सुगन्धं रूपमाविशम् ॥ २४ ॥
यः प्रमाणे मध्यदेशे कन्यकाः स्वलंकृतिः । तिष्ठन्तु षोडश गजाः स्वर्णदण्डैर्विभूषिताः ॥ २५ ॥
चतुर्दन्तः समायातु ऐरावतकुलोद्भवः । नानातीर्थोदकैः पूर्णाः स्वर्णकुम्भाः सहस्त्रशः ॥ २६ ॥
स्थाप्यन्तां तत्र वैदूर्यचामराणि छविानि च । श्वेतच्छत्रं रत्नदण्डं मुक्तामणिविराजितम् ॥ २७ ॥
दिव्यमाल्यानि वस्त्राणि दिव्याान्याभरणानि च । मुनयः संस्कृतास्तत्र तिष्ठन्तु कुशपाणयः ॥ २८ ॥
नर्तक्यो वारमुख्याश्च गायका वैदिकास्तथा । नानावादित्रकुशला वादयन्तु नृपांगणे ॥ २९ ॥
हस्त्यश्वपदरक्षातां बहिस्तिष्ठन्तु मायधुाः । नगरे यानि तिष्ठन्ति देवनायतनानि च ॥ ३० ॥
तेषु प्रवर्त्यतां पूजा नानावैलिभिरुहृताः । राजानः शीघ्रमायान्तु नानोपायनपाणयः ॥ ३१ ॥
इत्यादिश्य वसिष्ठस्तु रथेन रघुनन्दनम् । गत्वा सम्मानितस्तेन सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् ॥ ३२ ॥
निमित्तमात्रस्त्वं राम श्वो गमिष्यसि दण्डकान् । चतुर्दश समास्तत्र स्थित्वा महत्य खरवधम् ॥ ३३ ॥
बंधुना सीतया सार्धं ततो राज्यं करिष्यसि । लौकिकं शास्त्रमान्दव्यं स्त्रीकुरुष्व पितुर्वचः । ३४ ॥
अद्य त्वं सीतया सार्धमुपवासं यथाविधि । कृत्वा शुचिर्भूमिदायी भव राम जितेन्द्रियः ॥ ३५ ॥
इत्युक्त्वा रथमूहूढो दृष्ट्वा रामं सलक्ष्मणम् । जानकीं चापि स गुरुर्ययौ राजगृहं पुनः ॥ ३६ ॥
कौसल्या च सुमित्रा च रामराज्याभिषेचनम् । मुखांग्रपं श्रुत्वा भ्रातृरोगस्थान्स्नेहमन्वितौ ॥ ३७ ॥
चक्रतुः पूजनं देव्यास्तदिष्टोपशमस्पृहे । बलिदानैः शांतिपाठैर्मुनिष्टदममन्विते । ३८ ।
अथापरूहे संधभ्या दास्या पुत्री तु मंथरा । शोभितां नगरीं दृष्ट्वा पृष्ट्वा वृद्धां पथि स्थिताम् ॥ ३९ ॥

सुनकर राजा दशरथ सनाथ हुए ॥ २१ ॥ वदा मन्त्राय नामक राज्याभिषेकक वास्ते सब सामग्री जुटवायी और प्रसन्नतापूर्वक दूतका भेजकर राजाज्ञाका सम्भाषण कराया ॥ उस समय आश्रमोंमे रहनेवाले अनेक कपीश्वर भी वहाँ आ पहुंचे। उन्होंने चित्र विचित्र ध्वजा, पताका और लाउगोंसे नगरीको सजाया। स्थान स्थानपर उत्तम तथा मनोहर मण्डप सजाय स्थापित किये गये। उस देखि में मन्त्री मण्डलोको आज्ञा दी कि सबही ही सुगन्धक बस्तूरियोंसे अलंकृत कराओ और सब वार वारांगना रंगारत जुल्प्य उत्तम भूषण तथा जो अढिस अनुकूल सांगोके इर्य मध्यस्थलपर उपस्थित रहन चाहिये। वहां अनेक तीर्थोंके जलसे परिपूर्ण घट रक्खे ॥ २२-२६ ॥ तज था नौ वांधवबर, मन्त्री और मणिशाम सुशोभित रत्नजटित दण्डवाला श्वेत छत्र सुन्दर मालायें, सुन्दर वस्त्र तथा दिव्य आभूषण भी तैयार रहे। स्नान आदि संस्कारोंसे मस्कृत मुनोजन हाथमे कुशा लिये हुए तैयार रहें ॥ २७ ॥ २८ ॥ नर्तकियाँ, वेण्यायें, गायक, वेदघोष करनेवाले विप्र तथा नाना प्रकार बाजा बजानेमें कुशल शिल्प मिलकर राजमहलके सामने गाना-बजाना प्रारम्भ कर दें ॥ २९ ॥ हाथी, घोडे, रथ और पैदल सेना कवच धारण करके बाहर खड़ी रहे। नगरमें जहाँ जहाँ देवालय हैं, वहाँ-वहाँ अनेक सामग्रियोंसे प्रेमपूर्वक पूजा का जाय और सब राज भेंट लेकर उपस्थित हों ॥ ३० ॥ ३१ ॥ इस प्रकार कहकर वशिष्ठ रथपर सवार हुए और रघुनन्दन रामके पास गये। रामने उनका आदरपूर्वक आसन दिया तब मुनि ने उन्हें सब वृत्तान्त सुनाते हुए कहा - ॥ ३२ ॥ हे राम ! तुम निमित्तमात्र हो। कल तुम दण्डकवनको चले जाओगे। वहाँ चौदह वर्ष रहकर राक्षसोंको मारोगे। उसके पश्चात् भाई लक्ष्मण तथा सीताके साथ प्रसन्नतापूर्वक राज्य करोगे। अतएव शास्त्रव्यवहार निभानेके लिए पिताके वचनको मान लो ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ आज तुम सीताके साथ पवित्रतापूर्वक विधिवत् फलाहारस रहो और भूमीपर शयन करो ॥ ३५ ॥ ऐसा कह वशिष्ठ राम-लक्ष्मण तथा सीता से मिलकर गुरुदेव रथपर सवार हुए और वहाँसे राजमहलको चल दिये ॥ ३६ ॥ तदनन्तर कौसल्या और सुमित्रा गुरुदेवके मुखसे रामके राज्याभिषेककी आज्ञा सुनकर भी स्नेहवश वियोगकी उत्कण्ठी इच्छासे मुनियोंकी मण्डली समेत पूजाद्रव्यो तथा शान्तिपाठोंसे देवीका पूजन करने लगीं ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ इसके पश्चात् छतपर चढ़ी दासीपुत्री मंथराने नगरको सुशोभित देखकर रास्तेकी एक बुढ़ियासे इसका

५६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

श्रुत्वा श्रीरामगभ्भ्यार्थं ययौ वेगेन कैकयीम् । सर्वं वृत्तं निवेद्याथ तूष्णीमासीत्तदा क्षणम् ॥४०॥
तच्छ्रुत्वा कैकयी चापि तस्मै भूषणमर्पयत् । एतस्मिन्नन्तरे वाण्या देववाक्यानुमोदिता ॥४१॥
मन्था दृष्ट्वा तु कैकेयीं मन्थेर्येन्याह सा पुनः । मूढे कथंन्व तुष्टाऽसि हतभाग्याऽसि वेद्यहम् ॥४२॥
रामे राज्यपदं प्राप्ते कौसल्यायाश्च कैकयि । दासी भविष्यसि त्वं हि अतो मद्वचनं कुरु ॥४३॥
वरणं न्यासभूतेन राज्यं श्रीभरताय हि । नृपं प्रार्थय रामस्य द्वितीयेन वरेण च ॥४४॥
दंडकारण्यगमनं चतुर्दश समाः वदा । क्रोधागारं प्रविश्याद्य कुरुष्व यन्मयेरितम् ॥४५॥
तन्मन्थरोक्तं स्वहितं मन्त्वा सापि तथाऽकरोत् । मोहिता मायविवेकन श्रीरामवृत्तरेच्छया ॥४६॥
ततो निशायां राजा मा ज्ञात्वा कोधगृहास्थिता । गत्वा तत्र नृपः शीघं ददर्श कैकयीं तदा ॥४७॥
विकीर्यमाणकेशां तां त्यक्ताऽलङ्करणमदनाम् । भूमौ शयाना तां दृष्ट्वा ज्ञात्वा तस्या मनोरथम् ॥४८॥
रामाय दंडकारण्यं यैवराज्यं सुताय च वराभ्यां याचितं ज्ञात्वा हेत्युक्त्वा मूच्छितोऽभवत् ॥४९।
पश्चात् तन्मुखवेगो वृत्तं श्रुत्वा नृप ययौ । कैकेयी मन्त्रिणा पृष्टा सुमंत्रं प्राह सा तदा ॥५०॥
श्रीमानयश्व श्रीरामं द्रष्टुं न वांछते नृपः सोऽप्याह गतं नृपतेमपृष्ट्वा नानयाम्यहम् ॥५१॥
तदा शनैर्नृपः प्राह शीघ्रमानय राघवम् । सुमंतोऽप्यानयामास राघव पार्थिवाज्ञया ॥५२॥
तता रामो नृप गत्वा श्रुत्वा कैकेयजागिग । आत्मानं दंडके वास वरदानं पितुः पुरा ॥५३॥
तथेत्यांगीचकारार्थ नृपं वचनमब्रवीत् । ता ते शोकोऽस्तु हे तात बैह गच्छामि दण्डकान् ॥५४॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा हाहेत्युक्त्या नृपोऽब्रवीत् मा विहाय कथं घोरं विपिनं गन्तुमिच्छसि ॥५५॥
तस्य तद्वचनं श्रुत्वा सांत्वयामास राघवः । अहं प्रतिज्ञां निस्तीर्य शीघ्रं यास्यामि ते गृहम् ॥५६॥


• ० पृष्ठा • ३९॥ उनके मुखसे समग्र राज्याभिषेकका नाम सुनकर वह शीघ्र कैकयीके पास गयी और सब वृत्तांत सुनाकर क्षण भर चुपचाप रहगयी ॥ ४० ॥ इसके बाद सुनकर कैकेयीने उसको अपना एक आभूषण दे दिया। इतनेमें देववाणीद्वारा प्रेरणा तथा मन्थराकी मतिमें प्रवेश कराकर उस डराती हुई कहने लगी अरे मूढ़े! गामके राज्याभिषेकका समाचार सुनकर तू प्रसन्न क्यो हुई? ऐसा ज्ञात होता है कि तेरा भाग्य नुक्सान हो गया है। यदि रामको राज्य मिल गया तो आ कैकयी ! बहा कौसल्याकी दासी बनना पडेगा। इस कारण जा मै कहूँ, वैसा कर ।। ४१॥ ४२॥ अपने पति राजा दशरथके पास जाकर रखे हुए दो वरोंमेंसे एकत्र द्वारा तू भरतके लिये राज्य माँग और दूसरे वरके द्वारा चौदह वर्षके लिए रामका पैदल दण्डकारण्यगमन माँग तू अभी कोपभवनमें चली जा ॥ ४३-४५ ।। उसने भी श्रीरामचन्द्र तथा देवताओकी इच्छासे और अविवेकके कारण मोहित मन्थराके उस कथनको अपना हितकारक समझकर वैसा ही किया ।। ४६ ।। सायंकालके समय जब राजाको ज्ञात हुआ कि कैकेयी कोपभवनमें है, तब वे उनक पास गये और देखा कि कैकेयी सिरके बाल खोले, भूषण तथा वस्त्रांको फेंककर धरणीपर पडी हुई है पश्चात जब राजा दशरथने उसका अभिप्रायको जाना तो उक्त कथनानुसार दो वरोंप्रथम एक द्वारा रामका दण्डकारण्यवास और दूसरके द्वारा भरतको यौवराज्य दानका दाल स्वीकार करके मूच्छित हो गये ॥ ४७-४९ । प्रातः काल मंत्री सुमंत्र इस वृत्तान्तको सुनकर राजाके पास गये सुमन्त्रके पूछनेपर कैकयीने कहा ॥ ५० ॥ राजा रामको देखना चाहते हैं। जाओ, उन्हें यहाँ बुला लाओ। सुमन्त्रने कहा कि राजासे बिना पूछे मै रामको यहाँ नहीं ले आ सकता ॥ ५१ । तब राजाने धीरेसे कहा कि 'रामको शीघ्र ले आओ।' सुमंत्र भी महाराजकी आज्ञासे शीघ्र रामको ले आये ।। ५२ ।। रामने राजाके पास आकर कैकेयीकी वाणीसे अपने दण्डकारण्यवास तथा पिताका पूर्वकालमें वरदान देनेका हाल सुना तो 'तथास्तु' कहकर स्वीकार किया उन्होंने राजासे कहा--हे तात ! आप शोक न करे, मै अभी दण्डकारण्य जाता हूँ ।। ५३ ।। ५४ ।। रामका वचनसुनकर राजा दशरथ कहने लगे - हे राम ! मुझको छोडकर तुम बनमें कैसे जाओगे ? ॥ ५५ । पिताके इस करुण वचनको सुनकर राम उन्हें