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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ५ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४११

सर्गः ५ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४११

रामवाक्यादाहृत्य गरुडं वेगवत्तरम् अग्निहोत्रं पुरस्कृत्य ऋत्विग्भिश्च पुरोधसा ॥ ५२ ॥
पतिं विनाऽग्निदा नारी सीमामुल्लङ्घ्य न व्रजेत् । मदाज्ञारूढ न विज्ञेयः सीताप्यागो विहाय माम् ॥ ५३ ॥
मदे प्राप्ते प्रवामोऽपि स्त्रीणामुक्तोऽग्निभिः सह, पतिना रहितानां च न दोषः कथ्यतेऽत्र हि ॥ ५४ ॥
भूमिगेहाद्यपायंच न देशचरितं चरेत् । ततः स रथमाराप्य मारुतिस्त्वरितं व्रजेत् ॥ ५५ ॥
पश्यती विविधान् देशान् सीता लङ्कां ययौ मुदा । ददर्श कल्पवृक्षाधः पुष्पकस्थं रघूत्तमम् ॥ ५६ ॥
ननाम शिरसा पद्भ्यां प्राञ्जल्या समाधिवान् । तां दृष्ट्वा राघवः प्राह सीते तेऽद्य मुखं कथम् ॥ ५७ ॥
विवर्णमगयस्तिम्ने कृशाङ्ग्य पल्लिश्यते । तद्रामवचनं श्रुत्वा जानकी सस्मितानना ॥ ५८ ॥
विलज्जती विनोदेन राघवं प्राह सादरम् । स्वामिन्मद्विरहाद्देशात्सर्वं त्वं विद्धि राघव ॥ ५९ ॥
न निद्रामि न जागर्मि नाश्नामि न पिबाम्यहम् । ध्यायन्त्यहं केवलं त्वां योगिनीव वियोगिनी ॥ ६० ॥
निद्रादृग्दिनधना स्वप्नेऽपि न त्वदाननम् । आनंदि सर्वथा यन्मे मंदभाग्या विलोकये ॥ ६१ ॥
त्वदाननप्रतिनिधिं पुरैन्दुर्या मया । उदितोऽपि न चालोकि नायं वै त्यक्तुकामया ॥ ६२ ॥
त्वदालापममालाप कल्पयन् किल काकवाक् । कोकिलोऽपि मयाऽऽकर्णि नालङ्कारोपकर्णया ॥ ६३ ॥
त्वदङ्गसंगजं मन्दं न च शीतमहं क्वचित् । आलिङ्गितवती वातं तद्विद्वन्निन्द्यभाविना ॥ ६४ ॥
नाना यथाश्च नियमा अर्थार्थ तव राघव । कुर्वन्त्या मम नैवाभूत्सुखं त्वद्विरहाग्निना ॥ ६५ ॥
ततो विहस्य श्रीरामस्तामालिङ्ग्य पुनः पुनः । साध्वीं हस्तौनी स्पृष्ट्वा वपो विचारराग्रतः ॥ ६६ ॥
अथापरेदिने रामः स्नात्वा स्नातां विदेहजाम् । अशिक्षियां शस्त्रविद्यामस्वादानविसर्जने ॥ ६७ ॥

तथा अग्निका साथ लेकर गरुडपर जा बैठी ॥ ५२ । ५३ ॥ यह एक नियम है कि स्त्री बिना अग्निके अपने गांवकी सीमाको लाँघकर कहीं नहीं जातीं । अग्निका साथ न तनने वह दोष रह्यो रहता ॥ ५४ ॥ दूसरे एक जगह मान्य यह भी माना देता है कि यदि किस प्रकारके खतरेका अवसर आ जाय तो अग्निको साथ लेकर वह प्रवास भी कर सकती है। यदि उस समय वह पतिसे वियुक्त हो तो उसको ऐसा करनेपर कोई दोष नहीं लगता ॥ ५५ ॥ मद्यन्त्यादिवादियों मदा ब्राह्मणोंको चाहिए कि व देववालोंका अनुकरण न करें । अस्तु, सीता गरुड़पर सवार हुई । हनूमान् माताकी रक्षा करत सब ओर मारुत रास्तेके अनेक देशोंको देखती हुई लङ्काकी तरफ चली । इस प्रकार बहुत शीघ्र लङ्कामे पहुंचकर उन्होंने देखा कि रामचन्द्रजी वहीं कल्पवृक्षके नीचे बैठे हुए हैं ॥ ५६ । ५७ ॥ वहीं पहुंचकर उतरकर उन्होंने उनको प्रणाम किया । रामने कहा-सते ! मै देखता हूँ कि तुम्हारा मुँह कुम्हलाया हुआ है और शरीर दुर्बल हो गया है। रामकी बात सुनकर मुस्कराती हुई सीता लज्जाके साथ कहने लगीं- हे स्वामिन् ! यह सब आपके विरहका प्रभाव है ॥ ५८-६० ॥ मुझे न नींद आती है, न जाग ही पाती हूँ और न खाती पीती हूँ । आपसे वियुक्त होकर योगिनीके समान सदा आपका ध्यान किया करती हूँ ॥ ६१ ॥ निद्राकी वन्दि मेरी आँख स्वप्नमें आपके ही मुखको देखा करती है। उसीमें इनको आनन्द मिलता है ॥ ६२ ॥ आपके मुखका प्रतिनिधस्वरूप चन्द्रमा भी उदित होता है तो मुझे अच्छा नहीं लगता , सन्तापको दूर करनेका कामनासे भी उसकी ओर निहारनेको मन नहीं करता ॥ ६३ ॥ यद्यपि तुम्हारी ही बोलीके सदृश कोकिलकी बोल होती है, किन्तु वह भी सुननेको इच्छा नहीं होती । उसकी बोल कानोंको शल्यके समान लगती है ॥ ६४ ॥ यद्यपि तुम्हारे अङ्गोंके स्पर्शके समान ही मधुर वृक्षके स्पर्शसे मिली वायु भी है किन्तु उसका भी मैने कभी आलिङ्गन नहीं किया ॥ ६५ ॥ आपकी विजयके लिए मैं विविध प्रकारके व्रतों और उपवासोंको करती रही । आपकी विरहाग्निसे संतप्त होनेके कारण कभी मुझे सुख नहीं मिला । ६६ ॥ इसके अनन्तर हँसकर रामने बार-बार सीताको अपने छाती से लगाया, स्तनस्पर्श किया और होठोंको चूमा । ६७ ॥ इसके बाद दूसरे दिन रामने स्नान किया, सीताको भी स्नान करवाया और सब अस्त्रविद्या शस्त्राविद्या एवं उनके आवाहन तथा विसर्जनकी रीति सिखलायी । कहनेका तात्पर्य यह कि उन्होंने थोड़े ही समयमें सीताको समस्त धनुर्वेदकी शिक्षा दे दी । रामकी आज्ञासे लक्ष्मणने रथ तैयार

४२० आनन्दरामायणे [ सर्गः ६


शिक्षयामास सकलां धनुर्विद्यां सविस्तराम् । रामाज्ञया लक्ष्मणेोऽपि रथं सिद्धं चकार सः ॥ ६९ ।
दारुकः सारथिर्यस्मिन् शस्त्राण्यस्त्राण्यनेकशः । गदापद्मं तु यत्रास्ति यत्रास्ति गरुडो ध्वजे । ७०॥
यस्मिन् शैब्यश्च सुग्रीवस्तथा चैव बलाहकः । मेघपुष्पश्च चत्वारो वायुगास्तुरगोत्तमा ॥७१॥
यत्र छत्रं वरं दिव्यं हेमदंडं विराजते । यस्मिन् शुक्ले चामरे द्वे यस्मिन्कीलादिरुक्मजम् ७२।
तं रथं राघवो दृष्ट्वा जानकीं वाक्यमब्रवीत् । सीते स्थित्वा स्यदनेऽस्मिन् जहि त्वं मूलकासुरम् ७३।
तथेति रामवाक्याच्छायां सीतां प्रचोदयत् । तामसी साऽपि तं नत्वा परिक्रम्य पुनः पुनः ॥७४॥
आरुरोह रथं वेगाद्घोरा घर्घरनिःस्वना । एतस्मिन्नन्तरे रामप्रेरिता वानरोत्तमाः ॥७५॥
लंका गत्वा पूर्ववच्च हवनार्च प्रचालयन् । ततस्ते वानराः सर्वे ययुः श्रीरामवत्रं पुनः ॥७६॥
ययौ स्थित्वा रथे योद्धुं कोपेन मूलकासुरः । मार्गे श्रुति पथात्ताम्य मुकुटः स्खलितो भुवि ॥७७॥
अनिवर्त्यासुरो गर्वाद्वयौ रणभुवं जवात् । सीताछायाऽपि सैन्येन ययौ भालक्ष्मणादिभिः ।७८।
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे राज्यकांडे पूर्वार्ध सीताविग्रहो नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥


षष्ठः सर्गः

( रामके द्वारा राज्यका विभाजन )

श्रीरामदास उवाच
अथ छाया टणत्कृत्य शाङ्गं दध्रुष महत्धनुः । ययौ रणभुवं वेगात्तां ददर्शासुरोऽपि सः ॥ १ ॥
करालदंष्ट्रानयनां विद्युत्प्रद्युतशिरोरुहाम् । तालजंघां शूर्पपादां दरिवक्त्रां घनप्रभाम् ॥ २ ॥
लोमशां प्रललज्जिह्वां विदीर्णास्यां महच्छिलाम् । तां दृष्ट्वा कौंभकर्णिः स भीतः प्राह स्खलद्गिरा ।। ३ ।
का त्वं समागताऽध्यक्ष किमर्थं रोद्धुमिच्छसि । मम सर्वं वदस्व त्वं सदग्रे मा स्थिरा भव ॥ ४ ।

लिया ॥ ६८ ॥ ६९ ॥ उस रथका दारुक सारथी था, विविध प्रकारके अस्त्र शस्त्र एवं गदापद्म उसमें रक्खे थे और रथके ऊपर गरुड़से अंकित पताका फहरा रही थी ॥ ७० ॥ उसमें शैव्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामवाले चार घोड़े जुते हुए थे ॥ ७१ ॥ उसपर बढ़िया छत्र लगा था और सुवर्णके दण्ड लगे दो सफेद चमर रक्खे थे । उस रथमें जगह-जगह सुवर्णकी कीलें लगी हुई थीं ॥ ७२ ॥ इस प्रकार उस सुसज्जित रथको देखकर रामने सीतासे कहा - सीते अब तुम इस रथपर बैठकर मूलकासुरको मारो ॥ ७३ । सीताने रामकी बात अङ्गीकार की और अपनी तामसी छायाको प्रेरित किया । उस तामसी छायारूपिणी सीताने बार-बार रामकी प्रदक्षिणा की और घर्घर शब्द करते हुए रथपर जा बैठी उसी समय रामके द्वारा प्रेरित वानर लङ्कामें पहुंचे और उन्होंने मूलकासुरको हवनकर्मसे विचलित कर दिया। फिर लौटकर वे वानर रामके पास पहुंचे और सब समाचार सुनाया। उधर मूलकासुर कुपित होकर रथपर जा बैठा और संग्रामके लिए चल पड़ा। जात-जात रास्तेमें एक जगह उसका मुकुट माथेसे खिसककर जमीनपर गिरा और वह स्वयं भी फिसलकर गिर पड़ा ॥ ७४-७७ ॥ फिर भी वह लौटा नहीं, उसी गवके साथ रणभूमिमें पहुंचा इधर सीता भी रथपर बैठी और अपने लक्ष्मणादि वीर सैनिकों के साथ रणभूमिकी ओर चल पड़ीं ॥ ७८ ॥ इति शतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपांडेयकृत 'ज्योत्स्ना' भाषाटीकासमन्विते राज्यकांडे पूर्वार्द्ध पंचमः सर्गः ॥ ५ ॥

श्रीरामदासने कहा-इसके अनन्तर उस छायामयी सीताने अपने धनुषका विकराल टंकोर किया और संग्रामभूमिमें जा डटीं। तब मूलकासुरने भी उन्हें देखा ॥ १ ॥ उस समय सीताके बड़े बड़े दांत, डरावनी आंखें, बिजलीके समान पोतवर्णके केशपाश, तालकी नाई लम्बी चौड़ी जांघे, सूपकी तरह चौड़े पैर, कन्दराके समान भयावना तथा मेघके समान काला मुंह, लपलपाती जीभ और बड़ा भारी माथा था। उन्हें देखकर कुंभकर्णके बेटेने घबराकर कहा-॥ २ ॥ ३ ॥ तुम कौन हो ? यहाँ युद्ध करनेके लिये क्यों आयी हो ? इन बातोंका

[सर्गः ६] आनन्दरामायणे पूर्वार्द्धे । ४२१

यदि जीवितुमिच्छाऽस्ति न ममाऽग्रे स्थितो भव । श्रीरामेण समं तन्मां विमानस्थमुदीक्षताम् ॥ ५ ॥
इत्युवाच तदा छाया गिरं निर्भर्त्सनीं गिरम् । श्रुत्वा सुरगणाःसर्वे व्योमस्थाश्चाऽभवन्मुदा ॥ ६ ॥
यस्मिंस्त्वनुकूलं नष्टं मम लक्ष्यं प्रवर्तिता । मच्छापेनास्ति विद्धं पूर्वं त्वं तु दावानलो मयि ॥ ७ ॥
तस्यानुपदं गमिष्यामि त्वां हत्वाऽद्य रणाजिरे । इत्युक्त्वा चापमादाय संदधे तीक्ष्णबाण तम् । ८ ।
ततः सोऽपि धनुर्गृह्य छायायां बाणमुत्सृजत् । तं दृष्ट्वा पादचारेण जीविता ये हनूमता ॥ ९ ।
ददृशू रानराः सर्वे पुष्पकस्थानमास्थिताः । सीताया अनुगोभूत्वा कल्पवृक्षतले स्थितः । १० ।
रत्नमाणिक्यपर्यङ्के दामोभिः परिशोभिते । उपरहर्षपुष्टः स भुजयोरुपबर्हणः ॥ ११ ॥
युद्धं ददर्श तच्छायामूलकासुरयोर्महत् । मूलकासुरमुक्तांस्तद् बाणांश्छाया गवाक्षतान् ॥ १२ ॥
छित्त्वा स्वबाणजालैस्तान्मुनूर्बाणांन्मुमोच सा । चतुर्भिस्तुहयान् हत्वा मुकुटं कवचं धनुः ॥ १३ ॥
सा चिच्छेद त्रिभिर्बाणैस्ततः पद्भ्यां महासुरः । रथान्तरं समारुह्य छायां योद्धुं पुनर्ययौ । १४ ।
ततश्छायां मुमोचाऽसौ वह्न्यस्त्रं मूलकासुरः । छायया मुमोच मेद्यास्त्रं तद्वह्न्यस्त्रं न्यवर्तयत् ॥ १५ ॥
पर्वतास्त्रं कौम्भकर्णिस्ततश्छायां मुमोच सः । व्यदारयत्सच्छायां सा पवनास्त्रेण पर्वतम् ॥ १६ ॥
पुनर्मुमोच वेगेन सर्पास्त्रं मूलकासुरः । गारुडास्त्रेण तच्छाया चकार विफलं क्षणात् ॥ १७ ॥
एवं तन्मुलकं युद्धं बभूव दिनसप्तकम् । तदा छाया महारेष्ट्रा चण्डकाऽस्त्रेण तं रिपुम् ॥ १८ ॥
हन्तुकामा महास्त्रं तन्मुमोच मूलकासुरम् । तदा चचाल जगती मर्यादाऽत्यज्यतस्तदा ॥ १९ ॥
लंघयामासु रत्नाद्या स्वामाशामभयं दिशि । पण्डितोऽथ तु चिच्छेद मूलकासुरसच्छिरः ॥ २० ॥
पपात काये लङ्कायां शतकोटिर्मदन्तिके । हाहाकारो महानासील्लंकायां रक्षसां तदा ॥ २१ ॥


उत्तर दो और यदि तुम्हें अपने प्राण प्रिय हो तो मेरे आगेसे हट जाओ। विश्राम लेनेके लिए मुझे दुष्प्राप्य नहीं है। थोड़ी ही देर बाद सीता श्रीरामके साथ विमानपर बैठी हुई दिखायी पड़ोगी ॥ ५ ॥ यह बात अपनी फटकार वाणीसे धमकाती हुई सीता कहने लगी हे मूलकासुर! इस समय उस रूप धारण किये मैं चण्डिकारूपा हूं। जिसक कारण तुम्हारा सारा कुल नष्ट हो गया था और लंका ध्वस्त हो गयी थी, वही सीता मैं हूँ। उसके मर पश्चात् अब तुम्हारा नम्बर आ रहा है ॥ ६ ॥ ७ ॥ उसके बाद आज तुम्हे मारकर मैं उसीका अनुगमन करुँगी। इतना कहकर सीताने अपना धनुष उठाया और चंचल बाण बाणोंसे मूलकासुरपर प्रहार किया ॥ ८ ॥ इसके अनन्तर उस दुष्टने भी अपना धनुष सम्हालकर छायाके ऊपर कई बाण चलाये। उस दोनोंके उस तुमुल युद्धको देखनेके लिए वे बहुतसे राजर्षि तथा वानर पुष्पक विमानपर बैठे थे जिनको हनुमानजीने संजीवनी बूटीसे जीवित कर दिया था ॥ ९ ॥ इसके बाद वानरोंने देखा कि राम सीताके साथ व सुग्रीव छायाके स्वर्णजटित आसनपर बैठे हैं ॥ १० ॥ वे हिंडोलेमें झूल रही है और उनके आगे-पीछे सेविका लगी हुई हैं ॥ ११ ॥ रामचन्द्रजी बहुत प्रसन्न होकर छायामयी सीता तथा मूलकासुरका युद्ध देखन लगे। सीता मूलकासुरकी ओरसे आये बाणोंको क्षणमात्रके साथ काट-काटकर अपने बाणोंको उसके ऊपर छोड़ने लगी थी। चार बाणोंसे सीताने मूलकासुरके रथके सूत व घोडे और वाणसे उसका माथेका मुकुट, धनुष तथा कवच काट डाला ॥ १२ ॥ १३ ॥ ऐसी अवस्थामे वह पैदल दौडता हुआ गया और एक दूसरे रथपर सवार होकर फिर सीतासे युद्ध करनेके लिए आ डटा ॥ १४ ॥ वहाँ पहुंचते ही उसने सीतापर वह्न्यस्त्र छोड़ा। सीताने मेद्यास्त्रका प्रयोग करके उसके बह्व्यस्त्रका अन्त कर दिया ॥ १५ ॥ फिर उसने सीतापर पर्वतास्त्र छोड़ा। सीताने पवनास्त्र छोड़कर इसका निवारण किया। इसके अनन्तर बड़े वेगसे उसने सर्पास्त्र चलाया। सीताने गरुडास्त्र छोड़कर उसे व्यर्थ कर दिया ॥ १६ ॥ १७ ॥ इस प्रकार सीता और मूलकासुरमें सात दिन पर्यन्त महान् युद्ध होता रहा। तदनन्तर कुपित होकर सीताने मूलकासुरका नाश करनेके लिए अपना एक महान् अस्त्र चलाया। जिससे पृथ्वी डगमगाने लगी और समुद्र अपनी मर्यादाका उल्लङ्घन करके बड़ी-बड़ी लहरें उछालने लगा ॥ १८ ॥ १९ ॥ दसो दिशाएं धूरसे व्याप्त हो गयी और उस अमोघबाणने ही

४२२आनन्दरामायणे[ सर्गः ६ ]

निनेदुर्देववाद्यानि देवाश्चाकाशसंस्थिताः । ववर्षुः कुसुमौघांश्च रामं सीतां मुहुर्मुहुः ॥२२॥
रथो निवर्त्य सा छाया ययौ श्रीरामसन्निधौ पुनः । नत्वा रामं च सीतां च सतारुह्रदयं ययौ ॥२३॥
तदा निनेदुर्वाद्यानि ननृतुश्चाप्सरोगणाः । तुष्टुवुर्मुनयश्चाथ जगुर्गीतं नटादयः ॥२४॥
ततः सुभगैः सर्वैर्देवाः श्रीराघवं ययौ । नत्वा रामं च सीतां च तुष्टुव जानकीं मुदा ॥२५॥

ब्रह्मोवाच
कनककन्यके राघवप्रिये कनकभासुरे भक्तपालिके ।
दशशतास्यप्राणनाशके तव पदांबुजालिः शिरोऽस्तु मे ॥२६॥
मूलकासुरप्राणनाशके रामरक्षिते रथमर्द्दिने ।
राममोहिनि स्यदनास्थिते त्वत्पदाम्बुजालिः शिरोऽस्तु मे ॥२७॥
रामसङ्गकाश्रिष्ठिते रमे रामजीविते रामलालिते ।
रामसंगुते रामरञ्जिते त्वत्पदाम्बुजालिः शिरोऽस्तु मे ॥२८॥
लोकपावनि धीरजे वरे भूमिकन्यके लोकपालिके ।
पद्मलोचने धरामजे परे त्वत्पदाम्बुजालिः शिरोऽस्तु मे ॥२९॥
कंजलोचने नागगामिनि स्वीयसत्सुखे रम्यरूपिणि ।
रुक्मभूषिते मौक्तिकार्त्तिते त्वत्पदाम्बुजालिः शिरोऽस्तु मे ॥३०॥
जलरुहानने विश्वभामिनि त्वमवसि सर्वदा स्वीयसेवकान् ।
मुनिद्रिपून् सदा दुःखदायिके त्वत्पदाम्बुजालिः शिरोऽस्तु मे ॥३१॥


सीताके उस महान् अस्त्रने बातकी बातमें सहस्राननक मस्तकको काट पृथक् कर दिया ॥ २० ॥ उसका धड़ रावणके राजद्वारपर जा गिरा । इस घटनासे लंकाके दैत्योंमें हाहाकार मच गया ॥ २१ ॥ उधर देवताओंने प्रसन्न होकर अपने दुन्दुभी बाज भी बजाये तथा विमानोंमें बैठकर आकाशमें आये और राम तथा सीतापर उन्होंने पुष्पवृष्टि की ॥ २२ ॥ इसके बाद सहस्रका छाया रावण-धड़से लोटकर रामके समीप पहुंची। वहाँ वह राम तथा जानकी सीताको प्रणाम करके उन्होंने विलीनरूपमें हो गयी ॥ २३ ॥ उस समय फिर देवताओंने अपने मंगलवाद्य बजाये और अप्सराएँ नाचने लगीं । मुनि कवीजनादिकोंने सीता-की स्तुति की और नटाने उनका यशगान किया ॥ २४ ॥ थोडी देर बाद ब्रह्मा आदि समस्त देवताओंके साथ रामचन्द्रके पास पहुंचे और उनको नवां प्रणाम करके इस प्रकार स्तोत्र करने लगे। ब्रह्माजीने कहा- हे कनककन्यजे ! हे सुवर्णसदृश चमकनेवाली भक्तरक्षाकारिणी सब रङ्ग-रागप्रिये ! हे भक्तोंका पालन करनेवाली माँ ! हे रामचन्द्रकी प्रेयसी, हम ऐसा आशीर्वाद दो कि हमारा मस्तक सदा तुम्हारे चरणकमलका भौंरा बना रहे ॥ २५ ॥ २६ ॥ हे मूलकासुरघातिनि ! हे रामरक्षित हे रामहर्षित ! हे रामको मुग्ध करनेवाली ! हे रथपर आरूढ होकर दुष्टोंका दर्प दूर करनेवाली सति ! हम आशीर्वाद दो कि हमारा मस्तक सदैव तुम्हारे चरणकमलका भ्रमर बना रहे ॥ २७ ॥ हे रामके साथ दिव्य सिंहासनपर बैठनेवाली ! हे लक्ष्मी ! हे राम-जीविते ! हे रामलालिते ! हे रामसंग्रुत ! हे रामरञ्जित सति हम आशीर्वाद दो कि हमारा मस्तक सदा तुम्हारे चरणकमलका भ्रमर बना रहे ॥ २८ ॥ हे लोकपावनि ! हे धीरा ! हे अजे ! हे वरे ! हे भूमिकन्यके ! हे लोकपालिके ! हे पद्मलोचने ! हे धरातनजे सीते ! हम आशीर्वाद दो कि हमारा मस्तक सर्वदा तुम्हारे चरणकमलका मधुकल बना रहे ॥ २९ ॥ हे कंजलोचने ! हे गजगामिनि ! हे स्वीयसत्सुखे ! हे रम्यरूपिणि ! हे रुक्मभूषिते ! हे मौक्तिकार्चिते सीते ! हमें आशीर्वाद दो कि हमारा मस्तक सर्वदा तुम्हारे चरणोंका भौंरा बना रहे ॥ ३० ॥ हे कमल सदृश मुखवाली सीते ! हे विश्ववसने तुम सदा अपने भक्तोंकी रक्षा करती हो । ऋषियोंको दुःख देनेवाले राक्षसोंको दुःख देनेवाली हे सीते ! तुम ऐसा कुछ करो कि जिससे हमारा मस्तक सर्वदा तुम्हारे चरणकमलका भृङ्ग बना रहे ॥ ३१ ॥

सर्गः ६] राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्) ४२३


न्वन्मुखेक्षणसङ्गात्संपतिः प्राप मध्वर्यं रामसन्निधौ ।
त्वन्मुखेक्षणालाज्जिता मृगी त्वत्पदोङ्गुष्ठाग्रिः शिरोऽस्तु मे ॥३२॥
कुशलयन्त्रिके जलरुहानने जलरुहेक्षणे पापदारिके ।
मधुरसुस्वने नूपुरस्वने त्वत्पदभृङ्गालिः शिरोऽस्तु मे ॥३३॥
प्रहसनयुते स्मितवदने नेत्रभ्रुः शुभो बिम्बोष्ठिः ।
अद्य वै त्वया मन्दरप्रसुतो मारितो रणे तद्विधातम् ॥३४॥
ब्रह्मणेरितं स्तवमुत्तमं मान्यस्त्वह्ये पठति यः पुमान् ।
सर्ववाञ्छितं लभति सोऽत्र ना प्राप्नुयात्सुखं गरुडसिद्धिम् ॥३५॥
इति स्तुत्वाऽथार्चयित्वा वस्त्रकुण्डलमण्डनैः । सीतां रामं च सम्पूज्य राघवेणापि पूजितः ॥३६॥
प्रययौ राघवमनु सम्यक् च स्वलोकम् । ततो विभीषणः प्राह लक्ष्म्या न स्वया पुरा ॥३७॥
ममागतमिदानीं त्वं मां कृतं कुरु प्रभो । गच्छेति प्रतिज्ञाय तद्वाक्यं रघुनन्दनः ॥३८॥
विमानेन ययौ लङ्कामध्ये मित्रगृहं प्रति । ततो विभीषणं राज्ये लङ्कायां त्वभ्यषेचयत् ॥३९॥
तदा महोत्सवश्चासील्लङ्कायां नृपतेर्गृहे । ततो विभीषणो रामं सीतां च लक्ष्मणादिकान् ॥४०॥
वस्त्रै रत्नैश्च विविधैः पूजयामास सादरम् । शेषमस्मै सर्वस्वं स्वीयं रामाय राक्षसः ॥४१॥
ददौ कपिलावराहमूर्तिः शम्भुपूजिताम् । रामस्तां रोचयामास सोऽपि रामाय तां ददौ ॥४२॥
मनसा कपिलेनैव पुरा मूर्तिर्विमानिता । चिरकाले कदाप्यथ लब्ध्वा मघवना तु या ॥४३॥


हे रामप्राणप्रिये ! तुम्हे देखने से सम्पाती का शरीर सुन्दर काट हो गया। तुम्हारी आँखोंकी शोभा देखकर मृगी लज्जित हो जाती है, इस प्रकार आदर के साथ, हे सीते ! हमें यह आशीर्वाद दो कि हमारा मस्तक सदा तुम्हारे चरणकमलका भ्रमर बना रहे ॥३२॥ हे कुशलकारी माता ! हे कमलके समान मुखवाली, हे कमलके समान आँखोंवाली ! हे पाप का नाश करनेवाला ! हे मीठे स्वरवाली ! हे नूपुर सदृश मधुर स्वर-वाली सीते ! हमें आशीर्वाद दो कि हमारा मस्तक सदा तुम्हारे चरणकमलोका भौंरा बना रहे ॥३३॥ हे मुस्कुराहट भरे मुखवाली सीते ! तुम्हारे नासिका बहुत सुन्दर है। बिम्बफलके समान तुम्हारे लाल ओष्ठ हैं। आज तुमने संग्रामभूमिमें मन्दोदरी को मार डाला इस प्रकार, संसारका उद्धार हो गया ॥३४॥ श्रीरघूदासने कहा या प्रातःकालके समय जो कोई मनुष्य इस स्तोत्रका पाठ करता है, उसकी समग्र कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं और अन्त समयमें उस रामचन्द्रजीके समीप स्थान मिलता है ॥३५॥ इस तरह ब्रह्माने स्तुति करके विविध प्रकारके वस्त्रभूषणोंसे राम और सीताकी पूजा की। रामने भी ब्रह्माजीका विधि-वत् पूजन किया ॥३६॥ तदनन्तर रामसे आज्ञा पाकर समस्त देवताओंके साथ ब्रह्मा अपने लोकको लौट गये। तब विभीषणने भगवान्‌से प्रार्थना की कि पहले जब आप रावणको मारनेके लिए लंकामें आये थे तो पिताकी आज्ञा न होनेके कारण आपने नगर में प्रवेश नहीं किया था ॥३७॥ किन्तु अबकी बार आप मेरे घर पधारकर मुझे कृतार्थ कीजिए। रामने यह प्रार्थना स्वीकार कर ली और अपने पुष्पक विमानपर बैठकर लंकाके अपने मित्र विभीषणके भवनमें पधारे। वहाँ पहुँचकर रामने विभीषणका अभिषेक करके लंकाके राजसिंहासनपर बिठाया। उस समय लंकामें बड़ा उत्सव मनाया गया। इसके बाद विभीषणने राम, सीता तथा लक्ष्मणादिका विविध रत्नों और वस्त्राभूषणोंसे सत्कार किया। तदनन्तर उन्होंने अपना सारी सम्पत्ति रामको अर्पण कर दी ॥३८-४१॥ उस समय विभीषणकी सारी सम्पत्तिमेंसे रामको कपिलवाराहकी मूर्ति अच्छी लगी। जिसको पूजा रावण स्वयं करता था। विभीषणने रामको वह मूर्ति दे दी ॥४२॥ उस मूर्तिके विषयमें ऐसा सुना जाता है कि कपिल भगवान्‌ने अपने मनःशक्तिसे उस मूर्तिकी रचना की थी। बहुत दिनों तक कपिल मुनिने स्वयं उसको पूजा की। उसके बाद वह इन्द्रके हाथ लग गयी।

४२४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

तं जित्वा रावणेनैव प्रमाथीता निजां पुरीम्। यां सदा पूजयामास लङ्कायां रावणश्चिरम् ॥४४॥
विभीषणेन सा दत्ता राघवाय वृषन्मयी। तां मुदा स्थापयामास विमाने रघुनन्दनः ॥४५॥
ततः सीताऽथ रामेण देवेनालर्कगेण सा। अशोकनिनिकां गत्वा शिंशपावृक्षमन्वगात् ॥४६॥
दर्शयामास रामाय यत्र पूर्वं स्थिता स्वयम्। रामे वामकरेणैव रामस्य हि कनिष्ठिकाम् ॥४७॥
धृत्वा दक्षिणहस्तेन सीता बभ्राम तद्वने। स्वान्तमन्तर्ददह पूर्वं यत्र यत्र कृतं वने ॥४८॥
गमं नीत्वा तत्र तत्र दर्शयामास जानकी। ततोऽसां त्रिजटां नीत्वा वस्त्रैराभरणादिभिः ॥४९॥
कृत्वाऽतिसंतुष्टां रामग्रे साऽथ वाक्यमब्रवीत्। यत्तया रक्षिता पूर्वं राक्षसीगृहभीतिभिः ॥५०॥
मनुज्या सादरंनेयेयं सर्वदा सरमे त्वया। इत्युक्त्वा सरमाहस्ते त्रिजटाकरमर्पयत् ॥५१॥
ततो वासस्थलं नीता ययौ रामेण सा शनैः। अथ निकुम्भिलादीनि दृष्ट्वा नानास्थलानि हि ॥५२॥
पुष्पकस्थो ययौ रामो विभीषणसमन्वितः। विभीषणस्य याञ्चया लङ्कायां भूम्यवेक्षणम् ॥५३॥
रामः करे धनुर्धृत्वा लङ्कायाः परितस्तदा। दर्शयिष्येऽपरं देत्याद्लङ्कायामाम सादरम् ॥५४॥
ततो विभीषणं प्राह वचनं रघुनन्दनः। राक्षसेन्द्र मया बाण रक्षार्थं भ्रामितं तव ॥५५॥
हतो रामो विमानेन ययौ शीघ्रं विहायसा। विभीषणेन रक्षार्थं तस्यैवानुमतेन च ॥५६॥
मच्चापरेखाऽप्यन्येषां दुःखोत्तीर्णा भविष्यसि। अमुं बाणं समादाय स्वं गृहाण विभीषण ॥५७॥
मम नामाङ्कितं तीक्ष्णं तव प्राणान् रक्षिष्यति। मच्चाप्या बाणहस्तो देत्यांस्त्रां धर्षयिष्यति ॥५८॥
महाबाणहस्तं त्वां कश्चिन्न रिपुर्धर्षयिष्यति। इत्युक्त्वा स ददौ बाणं विभीषणकरे प्रभुः ॥५९॥
प्रणनाम मुदा बाणं बाणहस्तो विभीषणः। ततो रामो विमानेन पश्यन् देशान् मनोरमान् ॥६०॥

जब रावणने इन्द्रसे संग्राम करके उसे पराजित किया, तब वह भी उस मूर्तिको इन्द्रसे छीन लाया और बहुत समय तक उसका पूजन करता रहा॥४३।४४॥ आज उसे ही विभीषणने रामको अर्पण कर दिया। रामचन्द्रने प्रसन्न उसे अपने पुष्पक विमानपर रक्खा॥४५॥ इसके पश्चात् अपने पति राम और लक्ष्मणानि देवरो तथा इन्द्र आदि इन्द्रवेध गाम स वा सब शिंशपा वृक्षके नीचे पहुँची, जहाँ रावणके हर ले जानेपर बहुत दिन तक रह चुका था। उस स्थानपर सीताने बतलाया कि यह वही स्थान है जहाँ आपसे वियुक्त होकर मैं बहुत दिन तक रही। यह कहकर रामचन्द्रसहित उनकी उँगली पकड़कर सीता अशोकवाटिका में इधर-उधर घूमती हुई उन स्थानोंको दिखाने लगी, जहाँ अनादि कृत्य करती थी। घूमती-घूमती सीता त्रिजटाके स्थानपर पहुँची और विविध प्रकारके वस्त्राभरणोंसे त्रिजटाका सत्कार किया॥४६-४९॥ जब त्रिजटा प्रसन्न हो गयी तो विभीषणकी स्त्री सरमासे सीताने कहा—जिस समय राक्षसियाँ अपना भयानक मुंह दिखाकर मुझे डराती रहतीं थीं, तब यह त्रिजटा ही मेरी रक्षा करती थी, हे सरमे ! मैं तुमसे विनयपूर्वक कहती हूँ कि सर्वदा तुम मेरी तरह इसका सम्मान करना। इतना कहकर सीताने त्रिजटाका हाथ सरमा के हाथोंने पकड़ा दिया ॥५०।५१॥ इस तरह घूम-फिरकर राम सीताके हाथ डेरेपर पहुँचे और लंका में मन्त्रीको राज्यकी देखभाल करनेके लिए छोड़कर विभीषणको अपने साथ लिये हुए ही अयोध्याको प्रस्थान कर दिया। अपने भक्त विभीषणके प्रार्थना करनेपर रामने उसकी रक्षाके लिए अपना धनुष उठाकर बड़े बांके साथ लंकाके चारो ओर घुमाया और इस प्रकार कहने लगे हे राक्षसेन्द्र, मैंने तुम्हारी रक्षाके लिये यह धनुष घुमाया है। मेरे धनुष री यह रेखा शत्रुओंके लिए दुस्तर होगी। तुम्हें यह बाण भी दे रहा हूँ इसे ग्रहण करो॥५२-५७॥ इसपर मेरा नाम लिखा हुआ है। यह सदा तुम्हारे प्राणोंका रक्षक होगा। एक बात और भी है, वह यह कि तुम इस बाणको लिए हुए मेरे धनुषको इस रेखाको लांघोगे तो तुम्हें यह कोई कष्ट नहीं पहुँचायेगी ॥५८। मेरा बाण जब लिये रहोगे, उस समय कोई शत्रु भी तुम्हारे ऊपर आक्रमण नहीं करेगा। इतना कहकर रामने अपना बाण विभीषणको दे दिया ॥५९॥ बाणको हाथोंमें लेकर विभीषणने रामको प्रणाम किया। इसके अनन्तर राम पुष्पक विमानपर