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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ५ ]

सर्गः ५ ]
विलासकाण्डम्
२७५

चुचुम्ब ताञ्च द्वित्रीन् पूर्णयामास तन्मुखे । मुखान्तो तन्मखंलग्नमाश्लिष्य हृदयेन ताम् ॥५३॥
मुमोच कञ्चुकं श्रीरामः सीतायाः स्वकरेण सः । दृष्ट्वैव तन्मुखं स्तनौ तन्त्रभोक्त्रं ददर्श सः ॥५४॥
ततः करेण सर्वाङ्गे रामश्चाकंपयन्मुदा । मानापशक्यैधुग्भावात्तन्वी स्मितमुखी ॥५५॥
एवं पम्पारू क्रीडां चक्रतुर्दम्पती मुदा । कः समर्थस्तयोः क्रीडामविस्तारं निवेदिंतुम् ॥५६॥
एतस्मिन्नन्तरे रामं भोजनार्थं तु सूचकः । कर्तुं ययौ स सौमित्रिः समाहूय सुहृज्जनान् ॥५७॥
निषेधितः स दासीभिर्नावकाशोऽहिः स्थितः । नावबुद्धः समयो नायं रामं गन्तुं च न क्षणम् ॥५८॥
स्थिरो भवार्थ सौमित्रे रामो ऽहसि सीतया । करोति जलरन्ध्रेषु जलक्रीडां यथामुखम् ॥५९॥
पुनस्ताः प्राह सौमित्रियुष्माभिर्वचनेन मे । निवेद्यतांयं रामार्थ भोजनार्थं हि लक्ष्मणः ॥६०॥
समागतश्चाग्रतःस्थितो यास्याम्यहं गृहम् । ततस्तासु तदा त्वेका दासी गत्वा रघूत्तमम् ॥६१॥
वस्त्रमितैर्बहिः स्थित्वा भर्त्राज्ञानेनविज्ञिता । छद्मवाक्यैः सौमित्रिर्हि द्वारमत्र मुनेः ॥६२॥
तद्दामीवचनं श्रुत्वा जनयन्मत् जनकीम् । वहिःकृत्वा निर्गत्य मयमुद्धन्तः स्वयम् ॥६३॥
जलैरुष्णैः प्रभुः स्नात्वा देहमुद्वर्तनादिभिः । सुगन्धद्रव्यगन्धादीन् कृत्वा दूर विपाडितः ॥६४॥
पीतकौशेयवासांसि परिधायाथ दम्पती । ददुश्चाग्रेऽपरान् वस्त्रान् हेमन्तव्यतितानि च ॥६५॥
दासीभ्यश्चाथ दासेभ्यो गगार्दैश्चित्रितानि हि । तौ जग्मतुः सुपर्णग्रमगाणाञ्चाशनगृहम् ॥६६॥
तत्र शूर्पोत्तरस्रैर्नानावणैकरैः । उर्मिलादामसर्वे पञ्चामृतैदुग्धसुद्रवम् ॥६७॥
देवीभिः स्वर्णकम्बिषे षड्रेषु परिवेषितम् । मुनीश्वराथ गुरुणा सहनिग्रयमन्वितः ॥६८॥
मन्त्रिभिर्मित्रेणोभ्यादि रामोऽशन्स्तोषदाप यः । तत्पात्रे वीजयन्त्याम आनक्षी चामरेण सा ॥६९॥
प्रविनोदैर्शाद्रुकदेवी शुश्रूषादाम राघवम् । एवं कृत्वा भोजनं तु कृत्वा तांबूलचर्वणम् ॥७०॥


तब राम भी हँसते हुए फुत्कार समान शब्द मुखसे सीताको मार देते थे ॥५२॥ सीता के विम्बसदृश लाल ओठोंको रघुनन्दन ने कई बार चूमा, और मुखका फेर दिया और बाँहोंका बन्द खोलकर अपनी छातीसे निपटाया ॥५३॥ रामने सीताकी चोली को अपने हाथोंसे हटा दिया जिससे कन्दुकके सम्मुख समान उनकी काञ्चन कान्ति दिखाई पड़ने लगी ॥५४॥ तब सीताजी लज्जावश रामका छातीपर हाथ डाल दी। इस तरह राम और सीताजी विविध प्रकारका जलकेलि कर रहे थे। सीता और रामकी क्रीड़ाके सविस्तार वर्णन करनेको सामर्थ्य भला किसमें है ? द्विज ... बृहत् संकलनमें ऐसा वर्णन किया गया है ॥५५॥ ५६ ॥ इसके अनन्तर भोजन के लिए हाथकी सूचना देनेके लिए तब लक्ष्मणजी रामचन्द्र के लिए ऋषियोंको बुलवा लिया ॥५७॥ लक्ष्मण रामको बुलानेके लिए केंचुलीके मण्डल के निकट पहुंचे, तैसे ही सखियोंने उन्हें रोका और कहा कि अभी रामचन्द्रजीके पास जानेका आज्ञा नहीं है। क्योंकि वे इस समय जलक्रीडा कर रहे हैं ॥५८॥५९॥ उनसे लक्ष्मणने कहा-अच्छा, तुम्हीं जाकर उनसे कहो कि द्वारपर लक्ष्मण भोजनकी सूचना देनेके लिए खड़े हैं ॥६०॥ तुम्हारे ऐसा कह देनेपर मैं अन्दर चला जाऊँगा, उससबके वाक्यानुसार उनमें से एक दासी रामके समीप गयी और लजाती हुई परदेकी ओटमें धीरे-धीरे उनसे लक्ष्मणके आनेकी खबर सुनायी ॥६१॥६२॥ दासीकी बात सुनकर राघव प्रसङ्गवश सीताको जलयन्त्रके बाहर निकाला और स्वयं भी निकल आये ॥६३॥ तब गरम जलसे सीता और रामने शरीरमें लगे हुए सुगन्धित उबटन आदिको धोया ॥६४॥ उसके बाद रेशमके पीले कपड़े पहने। उस बहुमूल्य वस्त्र कपड़ोंको दास-दासियोंको दे दिया। फिर पुष्पोंसे सुशोभित मार्गसे चलकर दोनों भोजनगृहमें जा पहुंचे ॥६५॥६६॥ वहाँ पूर्वोक्त भोजन-सामग्रीके व्यञ्जन कामधेनुके दुग्ध तथा ऊर्मिला आदिके द्वारा सुवर्ण-पात्रोंमें सुरुचिसे ही सबपरोसे परोसते हुए वसिष्ठजीके अनेक मुनियों, मित्रों, मन्त्रियों एवं बन्धु-बान्धवोंके साथ खाते हुए रामचन्द्रजी बहुत प्रसन्न हुए। भोजन करते समय सीताजी पंखा झलती हुई द्रौपदीजल बिन प्रसन्न करनेवाली कितनी

२७६आनन्दरामायणे[ सर्गः ६

दीनानामर्पयत् पश्चात्सख्या शृण्वन् कथाः सुखम् । मन्त्रिभिर्बन्धुभिर्मित्रैर्गोष्ठ्या सदसि प्रभुः ॥ ७१॥
सीताऽपि भोजनं कृत्वा दिव्यलङ्कारमण्डिता । निद्राशालां समासीना सखीभिः परिवेष्टिता ॥७२॥
चकार सारिभिः क्रीडां दासीभिर्वीजिता मुदा । कुर्वन्ती रघुनाथस्य प्रतीक्षां द्वाग्लोचना ॥७३॥
इति श्रीमत्कविकलितरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये यागकाण्डे बलकीर्तिवर्णनं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥


षष्ठः सर्गः

( राम तथा सीताकी दिनचर्या )
श्रीरामदास उवाच

अथ रामो बंधुमित्रैर्निद्राशालां ययौ मुदा । स्तुतो बंदिजनाद्यैश्च विवेशैकांतमन्दिरम् ॥ १ ॥
विसृज्य लक्ष्मणादींश्च दासीभिः परिवेष्टितः । ददर्श जानकीं निद्राशालायां रघुनंदनः ॥ २ ॥
साऽपि ज्ञात्वाऽऽगतं रामं सारिक्रीडां विहाय च । प्रत्युज्जगाम गम्भीरं सखीभिर्दू रमुत्सृजन् ॥ ३ ॥
नत्वा रामं करे धृत्वा मञ्चके सन्न्यवेशयत् । दत्त्वा पातुं जलं तस्मै ददौ तांबूलमुत्तमम् ॥ ४ ॥
ततश्चक्रे श्रीरामो निद्रां सीतासमन्वितः दासीभिर्वीजितश्चापि पर्यङ्के रत्नभूषिते ॥ ५ ॥
मुहूर्तमात्रादुत्थाय घूर्णार्थात्कम्पवर्हणा । तस्थौ सीता मंचकादधस्ताद्रामोऽप्यबुध्यत ॥ ६ ॥
दृष्ट्वा समुत्थितं रामं दत्त्वा पातुं जलं पुनः । ददौ सीताऽथ तांबूलं राघवायातिहर्षिता ॥ ७ ॥
रामदास्यस्तथा रामं वीजयामासुरादरात् । केकिपक्षसमुद्भूतैश्चामरै रुक्मभूषितैः ॥ ८ ॥
सीतादास्यस्तथा सीतां वीजयामासुरादरात् । धेनुपुच्छोद्भवैर्दिव्यैश्चामरैर्हेममंडितैः ॥ ९ ॥
ततः सीताकरं धृत्वा द्राक्षावल्या सुमण्डपम् । ययौ रामोऽङ्कणोद्भूतं तस्थौ तदध आसने ॥१०॥


ही बातें भी करते जाते थे। इस प्रकार भोजन करके रामने सीताके हाथोंको दिया हुआ दान खाया ॥ ६७-७०॥ तदनन्तर मन्त्रियों बन्धुओं तथा नित्यमित्रोंके साथ विविध प्रकारकी बातें कहते-सुनते हुए सभाभवनमें पधारे ॥ ७१ ॥ तदनन्तर सीताने भी भोजन किया कपड़े बदले और नाना प्रकारके अलंकारोंको पहनकर अपने शयनागारमें जा बैठीं। वहाँ सीताकी सखियाँ भी उन्हें चारों ओरसे घेरकर बैठ गयीं ॥ ७२ ॥ सीता वहाँ बैठी हुई सारिका (मैना) के साथ खेलतीं तथा इधर-उधरकी बातें करती हुई रामचन्द्रजीके आगमनकी प्रतीक्षा कर रही थीं। यह सब करते हुए भी सीताकी आँखें रामको देखनेके लिए द्वारपर ही लगी हुई थीं ॥ ७३ ॥ इति श्रीमत्कविराजचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये 'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां विकासकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ ॥

श्रीरामदासने कहा—सभाभवनमें कुछ देर बैठनेके अनन्तर राम अपने बन्धुओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक शयनगारकी ओर चले। बंदीजन भगवान्‌की स्तुति करने लगे। निद्राशालाके पास जाकर रामने लक्ष्मण आदिको बिदा कर दिया। दासियोंके साथ वे भीतर गये और वहाँ बैठी हुई सीताको देखा ॥ १ ॥ २ ॥ सीताने भी जब देखा कि रामजी आ गये हैं, तब अपनी मैनाके साथका खेल बन्द करके धीरे-धीरे उनकी ओर बढ़ीं। उन्हें प्रणाम किया और हाथ पकड़कर पलंगपर बैठा लिया। फिर पीनेके लिए जल दिया और उत्तम ताम्बूल खिलाया ॥ ३ ॥ ४ ॥ इसके बाद रामचन्द्रजी रत्नभूषित पलंगपर सो गये और दासियाँ पंखा झलने लगीं ॥ ५ ॥ क्षण भरके बाद सीता पलंगसे नीचे उतरीं, तब रामजी भी जाग गये ॥ ६ ॥ सीताने जब देखा कि वे भी उठ हैं, तब फिर पीनेके लिए जल और खानेको पान दिया ॥ ७ ॥ रामकी दासियाँ रामको और सीताकी दासियाँ सीताको पंखा झल रही थीं। उन दासियोंके हाथमें मोरके पंखोंका बना हुआ पंखा था और उसमें सुवर्णकी मूठ लगी हुई थी ॥ ८ ॥ कुछ देर बाद रामचन्द्रजी सीताका हाथ अपने हाथमें पकड़े हुए एक अंगूरी लताओंके बने सुन्दर मण्डपमें पहुंचे और उसके आंगनमें एक आसनपर बैठे