श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ४ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४०९
सर्गः ४ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४०९
चतुर्थः सर्गः
( रामका कौवियोंको वरदान एवं मृतकासुरोपाख्यान )
श्रीरामदास उवाच
एकदा राघवः शिष्यै समाजस्थो जनैर्वृतः । ददर्श द्राक्षावल्लीनां मंडपे काकमुत्तमम् ॥ १ ॥
उभयोर्नेत्रयोरेकनेत्रवृत्तिममन्वितम् । अतिदीर्घं कृशं व्यग्रदृष्टिं दीर्घस्वरं चलन् ॥ २ ॥
मुहुर्मुहुः पश्यन्तमात्मानं शब्दपूर्वकम् । तं दृष्ट्वा बन्धुपार्थिवः स्मृत्वा कोपं पुरा कृतम् ॥ ३ ॥
उवाच काकं श्रीरामः सुखमागच्छ मेऽन्तिकम् । तद्रामवचनं श्रुत्वा द्राक्षावल्ल्यथ मंडपात् ॥ ४ ॥
शीघ्रमुड्डीय काकस्तु रामाग्रे सदसि स्थितः । रामं पश्यन्द्वीक्ष्यतं स चकार मुहुर्मुहुः ॥ ५ ॥
तदा तं राघवः प्राह दग्ध्वाऽपिक्षीयमानसः । नेत्रं विना चगस्त्यान्मु काक पाथश्च मां प्रति ॥ ६ ॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा काकः प्राहान्नृपतिम् कृपालोकन राम नद्यास्तु मव सर्वदा । ७
किं वरैरन्यैर्व्यर्थैरित्थ मुहुर्मुहुः । तच्छुत्वावचनं श्रुत्वा गमस्तं वाक्यमब्रवीत् ॥ ८ ॥
दीपांतरेषु यद्वृत्तं भविष्यं चोत्तरं च यत् । संजातं च भवेत्तन्तेऽक्षिपथेऽस्तु तत् ॥ ९ ॥
भाविकार्याणि सर्वाणि काक त्वं बोधयन्तः । जनाः पश्यंतु ते शष्पा शकुनाथं विनिर्णयम् ॥ १० ॥
स्थिरत्वे स्थिरकार्याणि गते गन्तव्यसिद्धिदम् । भविष्यन्ति हि कार्याणि नृणां शकुन निर्णयैः ॥ ११ ॥
पश्यंतु सकला भूमौ जनाः कार्यविदो । ग्रामे गृहप्रवेशे ते वामभागे न चेद्बहिः ॥ १२ ॥
गमनं दक्षिणं भागं पांथे गमनं तदा । लोकानामस्तु शकुनं महामंगलकारकम् ॥ १३ ॥
अतद्दशाहपिंडाय यदि स्पर्शो भवन्न ते माऽस्तु तद्दिनिर्लेपां प्रेतानां मम वाक्यतः ॥ १४ ॥
अन्तकाले मानरस्य वाञ्छितं नैव पूरितम् । प्रेतदशाहपिंडस्याप्यसंज्ञान्नरतु सन्नराः ॥ १५ ॥
प्रेतस्य वंशजः कश्चिद्यतोऽताथ वाञ्छाए । तन्ने स्पर्शाद्विनिर्दिश्य तु स पदा दूरपिष्यति ॥ १६ ॥
श्रीरामदास कहन...-हे शिष्य ! एक दिन बहुत मनुष्योंस घिरे हुए रामचन्द्रजी सभामे बैठे थे। तभी अंगूरका लताके मंडपपर कौवा देखा कि वह एक ही नेत्रसे दोनों नेत्रोंका काम ले रहा है। कौआ अपनी आकृतिसे अतिदीर्घ, शब्दपूर्वक मुहुर्मुहु देखता और चञ्चल दीखता है ॥ १ ॥ २ ॥ रामचन्द्रजीने देखा कि मुह बार बार मुड़ा और भाग रहा है और कौंव-कौंव करके बोलता भी जाता है। उसकी यह दशा देखकर रामके हृदयमें दया आयी और अपने पूर्व किये हुए कोपका स्मरण करके कौएसे बोले-हे काक ! तू हमारे पास आ जा। यह सुनकर कौवा उस लताके मंडपसे उड़ा और रामके आगे आकर बैठ गया। सभा में वह रामको देखता हुआ बार बार शब्द करने लगा ॥ ३-५ ॥ रामने कौएसे कहा-तू अपने नेत्रोंके सिवाय जो कुछ भी वर मांगना चाहे, मांग ले ॥ ६ ॥ इस प्रकारकी बातें सुनकर पूर्वोक्त रामसे कौआ कहने लगा-हे राम ! मेरे ऊपर इस तरह सदा आपकी कृपादृष्टि बनी रहे ॥ ७॥ केवल इस लोकमें सुख देनेवाले अन्य वरदानोंको लेकर मै क्या करूंगा ॥ ८ ॥ कौएका बात सुनकर रामचन्द्रजीने कहा-किसी द्वीपान्तरमें भी होनेवाला भूत, भविष्य और वर्तमानकी सब बातें तुम्हारे आँखोंके सामने रहेंगी ॥ ९ ॥ होनेवाले अच्छे। भविष्यके सब कार्योंका तुम मर वरदानसे जान लोगे। मनुष्य कहीं जाते समय सदा तुम्हारा शकुन देखा करेंगे ॥ १० ॥ जब तुम बैठ रहोगे, तब देखनेवाले पथिकका काम रुक जायगा और जब चलोगे,दोगे तो उसका कार्य सद्यः पूर्ण हो जायगा। इस प्रकार लोग तुम्हारा शकुन देखेंगे ॥ ११ ॥ ग्रामप्रवेश या गृहप्रवेशके समय तुम जिसकी दाहिनी ओरसे निकल जाओगे, वह परम मङ्गलकारक शकुन होगा ॥ १२ ॥ १३ ॥ प्रेतके दशाहपिण्डको जब तक तुम नहीं छू लोगे, तब तक उस प्रेतकी सद्गति कदापि नहीं होगी ॥ १४॥ यदि प्रेतके दशाहपिण्डको नहीं छुओगे तो उसके घरवाले लोग समझेंगे कि अभी प्रेतकी इच्छा पूरी नहीं हुई है। प्रेतका कोई वंशज, तुम जिन-जिन चीजोंको नहीं छुवोगे,
४०८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
तदा पिंडं स्पृशेन्मे न त्वेवैरन्त्या स्पृशेत् स्त्रिया । अन्यच्चैकं वरं दद्मि लिपिमात्रे तु पुस्तके ॥१७॥
यत् किञ्चिल्लेखकैश्च विस्मृतं तत्र मद्भयात् । कुर्वन्तु पदचिह्नं ते सर्वत्र जगतस्तले ॥१८॥
स्वपदं पुस्तकं दृष्ट्वा वरात् ज्ञास्यतु विस्मृतम् । लिखितं पार्श्वभागेषु लेखकैः पुस्तकस्य यत् । १९॥
इति दत्त्वा वरान् रामस्तूष्णीमासीन्निराकुलान् । काकोऽपि तुष्टः श्रीरामं नत्वा द्रोणं प्रनन्वदा ॥२०॥
एवं नानाचरित्राणि चकार रघुनन्दनः । एकदा शयने रात्रौ पारिजातसरोरुहः ॥२१॥
निद्रितो ह्यभवत्के जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तयः विना एतस्मिन्नन्तरे तस्यां रात्रौ ते गन्धर्वकाः ॥२२॥
दृष्ट्वाश्चापि दास्यश्च दास्यानः सकलास्तदा । ययुश्च संनहनं श्रोतुं कापि रामस्य भक्तितः ॥२३॥
एता न ममयं वेगात्कामाज्जगप्रपीडितः । पीवरा स्तनभारनता सर्वामलङ्कारभूषिताः ॥२४॥
तारुण्यमदमत्प्रौढाः दम्भकुम्भपयोधराः चन्द्राननाः शुकघ्राणाः कम्बुकण्ठ्यो मृगीदृशः ॥२५॥
पीतकौशेयवसना रुणन्नूपुरनिःस्वनाः ।
परस्परं ताः संमन्त्र्य प्रथमे वयसि स्थिताः । ययुः सरोः पृथक्ते श्रीराघव रहसि स्थितम् ॥२६॥
काचिन वीजयामास श्रीरामं व्यजनेन हि । कंचिद्धार रामार्थे स्वकरे पुष्पचारिकाम् । २७॥
काचिन्ताम्वूलपात्रं च काचिद्गन्धं हस्ते या । पात्रं निहितवन्त्यन्या या दधार विलासिनी ॥२८॥
दधार चन्दनं काचित्काञ्चिद्विज्ञानपूजनम् । काचित्फलानि नैवेद्यं काचिद्राक्षाफलादिकम् ॥२९॥
एतस्मिन्नन्तरं कश्चित् तत्रागत्य शनैः । रामस्य कर्तुमुद्युक्ता तत्पदं पाणिनाऽस्पृशत् । ३०॥
नेत्ररामः प्रबुद्धोऽभूत्दृष्ट्वाऽदृश्यतः विदेहजान् । केन मे स्वपितः पदस्पर्शश्चेत्यमुद्यविशत् ॥३१॥
नावदर्श श्रीरामः स्वकक्षं शु० स्थिताः । पीवरा प्रमदाः सर्वा मन्द्वालङ्कारमण्डिताः । ३२॥
राम मभ्युत्थितं दृष्ट्वा प्रणेपुस्तास्तदा भुवि । स्वशिरांसि निधायाथ तुष्टुवुर्विविधोक्तिभिः । ३३॥
उसकी अधूरी समझकर जब तक न करे, तब तक उस अन्त्य स्त्रीद्वारा उसकी सद्गति प्राप्त होगी। तुमको उसके दशाङ्गुपिण्डको तभी छूना, जब उसका मृतक कर्म पूर्ण हो जाय। तुमको इमण वरदान यह भी देता हूँ कि जो संसार लिग्वत समय पद भूल जाय, वे संसार तुम्हारे पैरका चिह्न बना दिया करेंगे ॥ १७-१८॥ पुस्तकोंके पार्श्वभागमें पुस्तक देखकर ऐसा विचार आप समझ जायें कि यहाँपर श्लोक छूट गया है ॥ १९ ॥ इस प्रकार दृढ सोचकर वरदान देकर सत्वकर्मयुक्तों द्वारा पूजे गये श्रीरामजी भरत भ्राताको प्रणाम करके वहाँसे उठ गया ॥ २० ॥ इस प्रकार रघुनन्दन विविध प्रकारका नाटक किया करते थे । एक दिन रात्रिके समय पारिजात सुधार नाम शयनस्थान के बीच शय्यापर अकेले शयनकर सो रहे थे। उसी रात्रिमे जिनने भी दास्यवर्ग या, वे सब भक्तिपूर्वक श्री रामके तंबगान के लिए चले गये थे । २१-२३ । उसी समय मौका पाकर वे नारियां विविध प्रकारके शृंगारभूषण धारण किये कामके बाणसे पीडित होकर रामचन्द्रजीके पास जा पहुँचीं। २४। वे सब तरुणाईके मदसे भरी थीं, मदोन्मत्तके समान उनके स्तन थे, चन्द्रमाकी भाँति उनका मुख था, तोतेकी तरह समान उनकी नासिका थी, कम्बुकी तरह उनके पाँव थे और मृगियोंके समान उनके नेत्र थे॥ २५ ॥ वे सब पीले वस्त्र धारण किये थीं। छनक-छनक रुनझुन करके बोल रहे थे। उनकी उमर भी बहुत थोड़ी थी। वे सब परस्पर सम्भाष एकान्तमें सोये हुए रामचन्द्रजीके पास जा पहुँचीं । २६ ॥ कोई पंखा लेकर कोई पंखा करने लगी और कोई अपने हाथमें फूलोंकी माला लेकर उनके उठनेकी प्रतीक्षा करने लगी। किसीने पानदान लिया और किसीने जलका भरा झारी थी, किसीने पाण्डान उठाया, किसी दूसरी विलासिनाने चन्दन लिया, किसाने दिया एकपात्र और कोई नाना प्रकारके फल लेकर रामचन्द्रजीके जागनेकी प्रतीक्षा करने लगी ॥ २७ २९ ॥ इसी बीचमें एक स्त्रीने रामचन्द्रजीका पैर दबानेकी इच्छासे धीरे-धीरे उनका पैर उठाया ॥ ३० ॥ इससे वे चौंक पड़े और सोचने लगे कि सीता तो इस समय अनुध्याय है, तब यह कौन पैर उठा रहा है। यह विचार करते-करते चकित भावसे वे उठ बैठे ॥ ३१ ॥ सब अपने सामने उपस्थित उन सौ नारियोंपर इनकी दृष्टि पड़ी। तब रामने
सर्गः ४ ] गन्धर्वकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ४०९
ताः सर्वा राघवः प्राह किमर्थमिह कृत्स्नके । सर्वाभरणसन्नाद्धा मत्समीपं मां कथ्यतां स्त्रियः ॥ ३४॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा विलज्जन्यः पुरस्त्रियः । अवाङ्मुखाः सस्मिताश्च तूष्णीमेव समन्ततः ॥ ३५॥
तासु दाक्षिण्यदा रामं लज्जायाऽवाङ्मुदोऽवदत् । वयं प्रजासि प्रभभो यदर्थमागता वयम् ॥ ३६॥
उपेक्षणीया नो राम वयं सर्वाः स्त्रियस्त्वया । इति तद्भावविज्ञाता ज्ञात्वा स रघुनन्दनः ॥ ३७॥
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं शृणुध्वं प्रमदोत्तमाः । एकपत्नीव्रतं चेदस्ति मातृवन्त्याः स्त्रियो मम ॥ ३८॥
इतराः सकलाः सीताविरहिताश्चेह जन्मनि । गच्छध्वं निजगेहानि मां माऽभ्यर्थयन्तु मयि नृपे ॥ ३९॥
राज्यं क्षमसि नो नार्यः क्षमितं वोऽपराधितम् । इति ता रामवाक्येभ्यः कामबाणप्रपीडिताः ॥ ४०॥
ताडिताश्च त्रिदोषेव निपेतुर्मूच्छिता भुवि । पतितास्ता निरीक्ष्याथ स्री रामोऽतिविह्वलः ॥ ४१॥
ता उवाच पुनः शीघ्रं मधुरारुष्यैः कृपान्वितः । शृणुध्वं मे वचो नार्यः शृङ्गारस्त्वां मया सह । ४२।
युष्माकं न भवेत्तद्विद्रतभङ्गोऽपि मे भवेत् । अतः शृणुत मे वाक्यं यागे पूर्वं मयाऽर्पिताः । ४३।
गुरवे रुक्मजाश्चैव सीतायाः शतपूर्तयः । तासां फलेन युष्माभिर्विहारे ऽहं जनं द्विम् ॥ ४४॥
करिष्यामि न संदेहः कृष्णरूपेण वै सुतम् । वाणनृपाणां युष्माभिर्जनितव्यं राजिवंशजा ॥४५॥
भौमासुरश्च युष्माकं संहरिष्यति वै यदा । तदा ममो मोच्यामि हत्वा तं अवनीसुतम् ॥४६॥
करिष्यामि विवाहांच रुक्मवर्णाङ्ककाञ्चिभिः । सापाडशसहस्राण्यार्द्धमेतोभ्याः शतं महत् ॥४७॥
इति रामवचः श्रुत्वा दृष्टास्ता वृत्तयोषितः । नम्र्वा रामं ययुः सर्वास्तूर्णी स्वं स्वं गृहं प्रति ॥४८॥
तः श्रोस्ता विसर्ज्ज्यायीरामो दानीः समाहयतान् । दृष्ट्वा कामपि नो दत्त्वांगमो दामास्तदाह्वयत् ॥४९॥
तेषामेकं न दृष्ट्वास दूतपालात्समाह्वयत् । तानप्यदृष्ट्वा रामस्तु रक्षकांश्च समाह्वयत् ॥५०॥
देखा कि वे सब पुरवासिनी स्त्रियाँ सुवर्णके अलङ्कार पहिने हैं। भगवान् रामको उठा हुआ देखकर उन्होंने प्रणाम किया और अपना मस्तक पृथ्वीपर रखकर विविध प्रकारसे भगवान्की स्तुति करने लगीं ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ उनसे रामने पूछा कि तुम सब यहाँ इतना रुचिर किस लिए आयी हो ? मुझ सब-सब बतला दो ॥ ३४ ॥ रामको बात सुनकर वे पुरवासिनी स्त्रियाँ लज्जित हुई हुई माथा नाव करके चुपचाप खड़ी रह गयीं ॥ ३५ ॥ किन्तु उनमेंसे एक लज्जित होकर कहा—हे प्रभो ! आप सब जानते हुए भी हमसे आनेका कारण पूछ रहे हैं ? हम जिस लिए आयी हैं, आप वह सब जानन ही हैं ॥ ३६ ॥ हे राम ! अब आप हमारी उपेक्षा न कीजिये । इस प्रकारकी बातींस राम उनका अभिप्राय समझ गये और मीठी वाणीमें समझाते हुए कहने लगे- हे मन्दिरोंगी ! मैं एकपत्नीव्रतधारी हूँ। मेरे लिए इस जन्ममें सीताके सिवाय संसारकी सब नारियाँ माताके समान हैं ॥ ३७ ॥ ३८ ॥ तुम सब अपने-अपने घरोंको चली जाओ । मैं राजा हूँ। भरे ऊपर तुम सब याचना मतदो ॥ ३९ ॥ जब तक में प्रजाका शासक हूँ तबतक ऐसा अनर्थ नहीं हो सकता । जाओ, मैंने तुम्हारा अपराध क्षम किया। यह सुना तो कामवाणसे पीडित वे स्त्रियाँ राघवं वाक्यरूपी बाणमें विड और मूच्छित होकर पृथ्वोपर गिर पड़ीं। उनका इस प्रकार गिरी देखकर रामचन्द्रजी बहुत विह्वल हो गये ॥ ४० ॥ ४१ ॥ वे कृपापूर्वक उनसे कहने लगे—हे राष्ट्रियो ! मैं तुम्हारा मनोभाव जानता हूँ, किन्तु केवल एक बारकी पतित तुम लोगोंकी इच्छा रही भगेगी और मेरा व्रत का भंग हो जावेगा। इसलिए मेरी बात सुनो--अभ यत् नहुत किया पग्ले यज्ञमें मैंने सीताको सौ सुवर्णकी मूर्तियाँ दान दी हैं। उन्हींके फलसे द्वापरमें में कृष्ण होकर बहुत विलासक तुम सब के साथ क्रीडा करूँगा ॥ ४२-४३ ॥ तुम सब उस समय अनेक राजाओंकी पुत्नी होकर जन्म लोगी । जब भौमासुर तुम सबको चुरा ले जायगा तब मैं वहाँ पहुंचकर उस मारूँगा और तुम्हें उससे छुड़ाऊँगा। तुम सबका विवाह द्वारका-पुरीमें होगा । उस समय तुम्हारी संख्या सोलह हजारसे भी ऊपर रहेगी और में भी दो रहूँगा ॥ ४४-४७ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने भगवान्को प्रणाम किया और चुपचाप अपने-अपने घरोंको लौट गयी उस स्त्रियोंको विदा करके रामचन्द्रजीने दासियोंको बुलाया, किन्तु
४१० आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
वैष्णव्येकं न दृष्ट्वा स गत्वाऽसीन्निशिस्मितः । विमानाट्टालमारुह्य सौमित्रिं वै समाह्वयत् ॥५१॥
ऊर्मिला रामवाक्यं तच्छ्रुत्वा तु चालयत्पतिम् । ऊर्मिलाचालनाच्चाऽथ प्रबुद्धोऽभूत्स लक्ष्मणः ॥५२॥
रामशब्दं सोऽपि श्रुत्वा रतिशालाद्बहिर्ययौ । दत्त्वा प्रत्युत्तरं रामं ययौ वेगेन लक्ष्मणः ॥५३॥
एतस्मिन्नन्तरे रामो रोदनं नगराद्बहिः । शुश्राव स्त्राकृतं घोरं किमिदं चेति विस्मितः ॥५४॥
ततो दृष्ट्वा स सौमित्रं सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् । लक्ष्मणा रामवाक्यं तच्छ्रुत्वा दत्तास्तिजस्तदा ॥५५॥
प्रेष्य दूतान्कीर्तनस्थानादाहूयामास वेगतः । रामदूतास्तदाऽऽयान् कथं श्रीरामकीर्तनम् ॥५६ ।
असमाप्य विहायाद्य गच्छेम स्वामिनं प्रति नैवेद्य केचिदूचुस्ते पालनीया तु सेवकैः ॥५७॥
प्रभोराज्ञाऽद्य चास्माभिर्नो चेन्नः पातकं स्पृशेत् । केचिदूचुर्निदं तस्य कीर्तनं मङ्गलप्रदम् ॥५८॥
स्वाप्याज्ञाभङ्गादोषघ्नं कथं त्यक्त्वा प्रगच्छताम् । केचिदूचुः कीर्तनस्मान् श्रुत्वाऽस्मान् सुखी भवेत् ५९
इति संदिग्धचित्तास्ते न तदा राघव ययुः । ततो लक्ष्मणदूतास्ते रामं वृत्तं न्यवेदयन् ॥६०॥
ततः किंचित्क्रोधयुक्तः सौमित्रिं प्राह राघवः । मत्कीर्तनसमाग्रान्नाहं दण्डयितुं क्षमः ॥६१॥
तथाप्येतन्न योग्यं हि किंचिच्छिक्षां करोम्यहम् । इत्युक्त्वा तां तु रुदतीं पुनः श्रुत्वा बहिः प्रभुः ॥६२॥
विमानं प्राह गच्छाद्य बहिः पुर्याः स्त्रियं प्रति । तथेति गत्वाऽग्येन ययौ तन्नगराद्बहिः ॥६३॥
यत्र साऽतिविलापं स्त्री करोति सरयूतटे । तामञ्जनाभां रागे रुदतीं राघवोऽब्रवीत् ॥६४॥
राम उवाच
किं ते दुःखं वरस्त्राय का त्वं रोदिषि वै कथम् इति रामावचः श्रुत्वा सा रामं राक्षसमब्रवीत् ॥६५॥
चिरकालं करोम्यत्र रोदनं रघुनन्दन अद्य श्रुतं त्वया राम किंचिच्छ्रुयन्नयाम्बुनेः ॥६६॥
यहाँ कोई दासी नहीं दिखायी दी। सब सेवकोंको बुलाया। उनमेंसे भी कोई नहीं बोला। तब पहरेदारोंको पुकारा, किंतु उनमेंसे भी कोई नहीं बोला। जिससे रामचन्द्रजीको बड़ा विस्मय हुआ और विमानके ऊपरवाली अँटारीसे लक्ष्मणको पुकारा। रामचन्द्रकी आवाज उर्मिलाको सुनायी दी और उसने तुरन्त लक्ष्मणको जगाया। जागनेपर लक्ष्मणने भी रामकी आवाज सुनी और तत्काल उनकी बातका प्रत्युत्तर देकर तुरन्त रतिशालाके बाहर आकर वेगसे रामचन्द्रजीकी ओर चले ॥ ५१-५३ ॥ इधर रामचन्द्रजीने नगरके बाहर किसी स्त्रीका रोदन सुना : "है, यह क्या है !" यह कहकर वे बड़े विस्मित हुए ॥ ५४॥ तब तक लक्ष्मण भी आ पहुँचे और रामने उन्हें सब वृत्तान्त सुनाया। लक्ष्मणने तुरन्त अपने दूतोंको उस स्थानपर जानेकी आज्ञा दी, जहाँपर कीर्तन हो रहा था। लक्ष्मणके दूतोंने वहाँ पहुंचकर रामके दूतांत कहा—चलो, रामचन्द्रजी कबसे तुम सबको बुला रहे हैं। उन सबने जवाब दिया कि बिना रामकीर्तन समाप्त हुए मधूरा छोड़कर हम सब कैसे आयें। उनमेंसे किसीने कहा कि सेवकोंका धर्म है, स्वामीकी आज्ञाका पालन करना। ५५-५७ ॥ यदि उनकी आज्ञा न मानगे तो हमको पातक लगेगा। उनमेंसे कोई बोल उठा कि यह रामकीर्तन तो विविध प्रकारके पातकोंको नष्ट करनेवाला है। अब इसको छोड़कर कहाँ जायेंगे ॥ ५८ ॥ कुछ लोगोंने कहा कि जब वे हमको कीर्तनमें आया सुनेंगे तो प्रसन्न होयेंगे ॥ ५९ ॥ इस प्रकार असमञ्जसमें पडकर वे लोग रामके पास नहीं आये। इधर लक्ष्मणके दूतोंने रामके पास आकर उनका हाल सुनाया। ६०॥ तब किंचित् क्रोधयुक्त रामने लक्ष्मणसे कहा कि यद्यपि मैं कीर्तन सुननेमें मग्न सेवकोंको दण्ड नहीं दे सकता ॥ ६१ ॥ किन्तु यह भी उचित नहीं है कि मै उन सबको कुछ शिक्षा भी न दूँ। इतना कहकर रामने फिर वह नगरके बाहरवाला रोदन सुना ॥६२॥ तब उन्होने विमानको आज्ञा दी कि नगरके बाहर कोई स्त्री रो रही है, तुम उसके पास चलो। 'बहुत अच्छा' कहकर विमान चल पडा और सरयूके तटपर जा पहुँचा, जहाँपर वह स्त्री विलाप कर रही थी। अञ्जनके समान उस काली-कलूट्टी स्त्रीको देखकर रामने पूछा—॥ ६३ । ६४ ॥ तुम्हे क्या कष्ट है ? तुम कौन हो और क्यों इस प्रकार रो रही हो ? रामकी बात सुनकर उस नारीने कहा—॥ ६५ ॥