श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ४ ] जन्मकाण्डम् ३२१
सर्गः ४ ] जन्मकाण्डम् ३२१
तिर्यग्योनी जन्मवत्या वानर्या बालकानहो । स्नेहात्सहैव नीयन्ते धिङ्मां मानवदेहजाम् ॥ ६५ ॥
एकं चापि निजं बालन्त्यक्त्वा गेहेऽथ गम्यते मया विमूढया स्नातुं शुभ्यत्र क्षणिकं सुखम् ॥ ६६ ॥
इति धिकृत्य चात्मानं परितृत्त्याश्रमं ययौ । एतस्मिन्नन्तरे गेहे वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवः ॥ ६७ ॥
गतः स ह्युद्यत्काष्ठं ह्यर्थार्थे बटवो गताः गृहीत्वा सा कुशं प्रेम्णापयौ सीता बहिः पुनः ॥ ६८ ॥
हारत्वा सह नदीं गत्वोपसि स्नानं चकार वै । महदाश्चर्यं मुनिपाल दार्षे निःशम्य वै मुहुः ॥ ६९ ॥
मात्राशापभयाच्चक्रे लवंवालं स पूर्ववत् तपोबलेन तं प्रोक्ष्य जीवयामास योगतः ॥ ७० ॥
ज्ञानदृष्ट्या तीव्रेण मुनिना नावलोकितम् । ततः सीताऽपि मुस्नाता दाभ्या गेहं शनैर्ययौ ॥ ७१ ॥
कटौ गृहीत्वा तं बाल रुदन्तं पुननिःस्वना । प्रेक्षेऽन्यं बालकं दृष्ट्वा मुनिं पप्रच्छ जानकी ॥ ७२ ॥
प्रेवे कस्याः शिशुश्चाय मोऽपिरुष्टामहाकुशम् । कटिप्रदेशे जानक्या विस्मयं परमं यतः ॥ ७३ ॥
नमस्कृत्य ततः सीतां सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् । अंके निधाय तं बाल सीताया द्रवरीन्मुनिः ॥ ७४ ॥
प्रसादान्मम वैदेहि द्वितीयोऽप्यं सुतस्तव । भवत्वद्य लवो नाम्ना सर्वयस्माद्विनिर्मितः ॥ ७५ ॥
वान्यांकैर्वचनन्साऽपि शिशुं जग्राह जानकी । मुनिस्तयोनाम चक्रे कुश्रो ज्येष्ठोऽनुजो लवः ॥ ७६ ॥
जातकर्मादिसंस्कारान् लवस्यापि चकार सः । तदा निनेदुर्वाद्वानि भुव्यां मेर्षविद्दिरीरुमाम् ॥ ७७ ॥
वर्षपुर्जानकीं क्त्वा वाल्मीकि कुसुमैः सुराः । चकार जनकश्चापि सुमेधा परमोत्सवान् ॥ ७८ ॥
क्रमेण विद्यामपन्नो श्रोत्रपुत्रौ विरेचतुः । धनुर्विद्यामस्त्रविद्यां शिक्षयामास तौ मुनिः ॥ ७९ ॥
कृत्स्नं रामायणं स्वीयं कृतं तौ शिक्षयन्मुदा यस्मिन्नानन्दगम्यं च चरित्रं राघवस्य हि ॥ ८० ॥
कुमारौ स्वरसम्पन्नौ सुन्दरश्चश्विनाविब । तन्त्रीलयममायुक्तौ गायन्तौ चेतुर्तने ॥ ८१ ॥
तत्र तत्र मुनीनां तु समानेषु महर्षिणौ । गायन्तावपि तौ दृष्ट्वा विस्मिता मुनयोऽभवन् ॥ ८२ ॥
देखकर उन्होंने अपने मनमे साचा कि तिर्यग्योनीका स्त्री होकर भी यह बानरी कितन प्रेमसे बच्चोको अपने साथ रखती है। मुझ मानवजातिकी भामिनीको धिक्कार है जो अपने एक लडकेको बाश्रमपर छोडकर तमसा स्नान करने जा रही हूँ ॥ ६५-६५ ॥ इस तरह अपनेको धिक्कारकर सीता वहाँसे फिर आश्रमकी ओर पवीं । इसी बीच बाल्मीकिजी समिदाहरणके लिये बाहर चले गये थे। विद्यार्थी भी अपने अपने कामत पहले ही बले जा चुके थे। इतनमे सीता पहुंची। उसोम कुशको उठा लिया और दानीके साथ तमसाकी और चन गयी ॥ ६६ । ६७ उधर वाल्मीकि लौटकर आये तो उनकी निगाह पालनेपर पडी । उसपर बच्चे-को नही देखा तोही अकस्मात मुनिराजने एक लच्छी घास ली और सीताके शापके भयसे अपने तपोबल द्वारा पहिले कुशके समान ही एक बालक और बना दिया । ६८-७०॥ पररभूटके कारण उन्होंने अपनी ज्ञानदृष्टिसे यह नही देखा कि सीता इसको अपने साथ ले गयी है। कुछ देर बाद स्नान करके साता भी दासके साथ धीरे धीरेसे कुटियाम आयी ॥ ७१ ॥ वहाँ उन्होंने देखा कि कुशके समान ही अलकारादिके विभूषित एक बालक पालनेपर पड़ा सो रहा है। यह देखकर सीताने ऋपिम पूछा कि यह किसका बच्चा है ? उधर ऋषिने देखा कि कुश तो सीताकी कमरपर है, तब उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ ॥७२॥७३॥ फिर उन्हें नमस्कार करके वाल्मीकिने वह वृत्तात बतलाया, जिसके कारण दूसरा बच्चा बनाना पडा था। उसके पश्चात मुनिन पुचकारकर लवको सीताकी गोदमे दे दिया और कहा- ॥ ७४ ॥ देवि ! इसे भी सम्हालो । तब सीताने उस बच्चेको भी अगीकार किया । मुनिने कहा-इन दोनोमें उष्ठकुश होगा और कनिष्ठ (छोटा) लव ॥७५॥ इसके अनन्तर उन्होंने लवका भी जातकर्म आदि संस्कार किया । उस समय विविध प्रकारके बाज वज। स्वर्गम देवताओने भी मगलवाद्य बजाकर बालका, शिशु तथा वाल्मीकिके ऊपर फूलोकी वर्षा की। सुमेधा तथा जनकने विविध उत्सव किये। क्रमशः दोनो पुत्र बड़े हुए उन्होंने अनेक विद्याओका अध्ययन किया और महपि वाल्मोकिने उनको धनुविद्या तथा अस्नविद्या भो सिखायी ॥ ७६-७९ ॥ फिर अपनी बनायो सम्पूर्ण रामायणको भी उन्ह शिक्षा दी । जिसमें रामचन्द्रजीका आनन्ददायक चरित्र वणित था ॥ ८० । अश्विनीकुमारकी भांति सुन्दर वे दोनों बालक मधुर स्वरसे
| ३१२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ५ |
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गन्धर्वेष्विह किन्नरेषु भुवि वा देवेषु देवालये
पातालेष्वथ वा चतुर्मुखगृहे लोकेषु सर्व्वेषु च ।
अस्माभिश्चिरजीविभिश्चिरतरं दृष्टा दिशः सर्व्वतो
न श्यायीदृशगीतवाद्यगरिमा नादर्शि नाश्श्रावि च ॥ ८३ ॥
एवं स्तुवद्भिरखिलैर्मुनिभिः प्रतिवासरम् । आसते सुखमेकांते वाल्मीकेराश्रमे चिरम् ॥ ८४ ॥
हेमकंकणमञ्जीरनूपुरैश्च विभूषितौ । केयूररशनाहारकुंडलैर्गतिशोभितौ ॥ ८५ ॥
निजक्रीडाकौतुकैश्च बालवाक्यैर्मनोहरैः । सीतां सुमेधां जनकं रञ्जयामासतुर्मुनिम् ॥ ८६ ॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विलासकाण्डे
कुशलवजन्मकथनं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
पञ्चमः सर्गः
( रामरक्षा-महामंत्र )
विष्णुदास उवाच
श्रीरामाश्रया प्रोक्तं कुशस्य चाभिमन्त्रणम् । कृतं तेनैव मुनिना पुरा तां मे प्रकाशय ॥ १ ॥
रामरक्षां वरां पुण्यां बालानां शान्तिकारिणीम् ।
इति शिष्यवचः श्रुत्वा रामदासोऽब्रवीद्वचः ॥ २ ॥
श्रीरामदास उवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य रामरक्षाऽधुनोच्यते । या प्रोक्ता शम्भुना पूर्व्वं स्कंदार्थे गिरिजां प्रति ॥ ३ ॥
श्रीशिव उवाच
देव्यद्य स्कंदपुत्राय रामरक्षामिमंत्रणम् । कुरु तारकघाताय समर्थोऽयं भविष्यति ॥ ४ ॥
इत्युक्त्वा कथयामास रामरक्षां शिवः प्रिये । नमस्कृत्य रामचन्द्रं शुचिर्भूत्वा जितेन्द्रियः ॥ ५ ॥
वीणाकी झनकारके साथ उत्तम रामचरित्र गाया करते थे ॥ ८१ ॥ जहाँ-तहाँ मुनियोंकी मण्डलीमें जब ये दोनों सुकुमार बालक रामचरित्रका गान करते थे तो सबके मुँहसे सहसा यह वाक्य निकल पड़ता था कि हम लोगोंने अपनी लम्बी आयुमें गंधर्वों, किन्नरों, मनुष्यों, देवताओं, पाताललोकवासियों, ब्रह्मलोकवासियों एवं सारे ब्रह्माण्डवासियोंके अनेक गायकोंके गायन सुने हैं लेकिन उनमें कहीं न तो मैंने इस प्रकार वाद्यकलाकी निपुणता देखी और न गायनमें ऐसी मिठास ही पायी । ८२ ॥ ८३ ॥ इस तरह सब ऋषियोंसे प्रशंसित होकर वे दोनों एकान्तमे वाल्मीकिके आश्रमपर रहा करते थे । सुवर्णके कङ्कण, नूपुर, केयूर, करधनी, हार तथा कुण्डल पहननेसे वे और भी सुन्दर दीखते थे । ८४ ॥ ८५ ॥ प्रतिदिन उनकी मनोहर बाललीला देख देखकर मुनि, सीता, सुमेधा और जनकजी मारे खुशीके फूले नही समाते थे । ८६ । इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृतभाषाटीकासमन्विते जन्मकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
विष्णुदासने कहा है गुरुदेव ! जिस रामरक्षा-मंत्रसे वाल्मीकिने कुशका अभिमंत्रण किया था, उसे हमको बताइए ॥ १ ॥ क्योंकि मैने सुना है कि वह रामरक्षामंत्र बड़ा पवित्र सुन्दर और बालकोंको शान्ति प्रदान करनेवाला है । शिवजीने कहा-इस प्रकार शिष्यकी प्रार्थना सुनकर श्रीरामदास कहने लगे-हे प्रिय शिष्य ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है मैं तुम्हें वह रामरक्षामन्त्र बतलाता हूँ, जिसे एक बार शिवजीने पार्वतीको स्वामिकार्तिकेयकी रक्षाके लिए बतलाया था ॥ २ ॥ ३ ॥ श्रीशिवजी बोले—हे देवि ! आज षडानन्दके
सर्गः ५ ] जन्मकाण्डम् ३१३
अथ ध्यानम्
वामे कोदण्डदण्डं निजकरकमले दक्षिणे बाणमेकं
पश्चाद्भागे च निश्चं ध्वजतमभिमितं सासितूणीरभारम् ।
पार्श्वेनाग्रेण सव्यं मह मिलिततनु जानकीलक्ष्मणाभ्यां
श्यामं रामं भजेऽहं प्रणतजनमनःखेदविच्छेददक्षम् ॥ ६ ॥
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिकऋषिः श्रीरामचंद्रो देवता राम इति बीजम्
अनुष्टुप् छंदः श्रीरामप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥ ७ ॥
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् । जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥ ८ ॥
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम् । स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥ ९ ॥
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् । शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥ १० ॥
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती । घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥ ११॥
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कंठं भरतवंदितः । स्कंधौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥ १२॥
करौ सीतापत्तिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित् । पार्श्वे रघुवरः पातु कुक्षी इक्ष्वाकुनंदनः ॥ १३ ॥
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जांबवदाश्रयः । सुग्रीवेशः कटिं पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ॥ १४॥
ऊरू रघूत्तमः पातु गुह्यं रक्षःकुलान्तकृत् । जानुनी सेतुकृत्पातु जंघे दशमुखांतकः । १५॥
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ।
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् । स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥ १६॥
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः । न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥ १७॥
रामेति रामभद्रेति रामचंद्रति वा स्मरन् । नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विंदति ॥ १८॥
[हिन्दी टीका]
स्नाय तुम्हें रामरक्षामन्त्र बतला रहा हूँ। अथ ध्यानम् । जिन रामचन्द्रजीके बाय हाथमें धनुष, दक्षिणे हाथमें एक बाण और पीठपर बाणोंसे भरा हुआ तरकस है। जिनकी बायीं तथा दाहिनी ओर लक्ष्मण और सीता हैं। भक्तोंके मनकी पीडा नष्ट करनेमें निपुण श्रीरामचन्द्रजीका मैं भजन करता हूँ ॥ ४-६ ॥ विनियोगाक अनन्तर—सौ करोड़ श्लोकोंमें विस्तारसे वर्णित भगवान् रामके चरित्रका एक एक अक्षर महान् पापोंका भी नाश करता है। नीलकमलकी नाई श्याम तथा राजीवलोचन, जिनके आसपास लक्ष्मण तथा जानकीजी विराज रही हैं। जिनका मस्तक जटामुकुटसे अलंकृत है। तलवार, तरकस, धनुष और बाणोंके लिये जो राक्षसोंका यमराज सदृश भीषण दीखते हैं। जो जगत्की रक्षाके निमित्त अपने इच्छानुसार जगतोलपर अवतीर्ण हुए हैं, ऐसे रामका ध्यान करके सब कामनाओंको पूर्ण करने तथा पापोंका नाश करनेवाला रामरक्षा-मन्त्रका पाठ करे । राघव यह रामचन्द्रजीका नाम मेरे शिरकी रक्षा करे ॥ ७-१० ॥ दशरथात्मज ललाटकी रक्षा करे । कौसल्या नक्षत्री, विश्वामित्रप्रिय कानोंकी, मखत्राता नाककी और सौमित्रवत्सल मुखकी रक्षा करे ॥ ११ ॥ विद्यानिधि जिह्वाकी, भरतवंदित कण्ठकी, दिव्यायुध दोनों कन्धोंकी, भग्नेशकार्मुक भुजाओंकी, सीतापत्ति हाथोंकी, बामदग्न्यजित् हृदयकी, रघुवर पार्श्वभागकी, इक्ष्वाकुनन्दन पेटकी, खरध्वंसी शरीरके मध्यभागकी, जांबवदाश्रय नाभिकी, सुग्रीवेश कमरकी, हनुमत्प्रभु हड्डियोंकी, रघूत्तम दोनों घुटनोंकी, रक्षःकुलन्तकृत् गुदाकी और दशमुखातक मेरी जंघोंकी रक्षा करे ॥ १२-१५ ॥ विभीषणको राज देनेवाले पैरोंकी और राम सारे शरीरकी रक्षा करे । जो मनुष्य रामके बलसे परिपूर्ण इस रामरक्षामन्त्रका पाठ करता है वह चिरायु, सुखी, पुत्रवान्, विजयी और विनयी होता है ॥ १६ ॥ पातालचारी, भूमिचारी, व्योमचारी और छद्मचारी कोई भी भूत प्रेतादि बाधा रामरक्षा-मंत्रसे अभिमंत्रित जनपर दृष्टिपात नहीं कर सकती। जो मनुष्य राम, रामभद्र अथवा रामचन्द्र इस नामका स्मरण करता है, वह पापसे
| ३१४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ५ |
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जगज्जैत्रैकमंत्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् । यः कंठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥१९॥
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं पठेत् । अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमंगलम् ॥२०॥
आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः । तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥ २१॥
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली । काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्यानंदवर्धनः ॥२२॥
वेदांतवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः । जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥२३॥
इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः । अश्वमेधायुतं पुण्यं संप्राप्नोति न संशयः ॥२४॥
सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा । गच्छन् मनोरथोऽस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः ॥२५॥
तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ । पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनांबरौ ॥२६॥
फलमूलाशनौ दांतौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ । पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥२७॥
धन्विनौ दंडनिखिंशौ काकपक्षकधरो श्रुतौ । वीरौ मां पथि रक्षेतां तावुभौ रामलक्ष्मणौ ॥२८॥
शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् । रक्षःकुलनिहंतारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥ २९॥
आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषंगसंगिनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम् ॥३०॥
आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् । अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान्स नः प्रभुः ॥३१॥
रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥३२॥
श्रीराम राम रघुनंदन राम राम श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥३३॥
लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् । कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा । पुरतो मारुतिर्यस्य तं वंदे रघुनंदनम् ॥३५॥
विमुक्त होकर मुक्ति और भुक्तिका भागी होता है ॥ १७ ॥ १८ ॥ समस्त जगतको जीतनेवाले इस रामरक्षा-मन्त्रको जो मनुष्य कण्ठस्थ कर लेता है तो संसारकी सारी सिद्धियां उसके हाथमें आ जाती हैं ॥ १९ ॥ जो प्राणी इस वज्रपंजर रामकवचका पाठ करता है, उसकी आज्ञा कहीं भी नहीं टलती और सर्वत्र उसकी विजय होती है ॥ २० ॥ स्वप्नमें यह रामरक्षामंत्र शिवजीने जैसा बतलाया था, सवेरे सोकर उठते ही विश्वामित्रने उसी तरह लिख दिया ॥ २१ ॥ राम, दाशरथि शूर, लक्ष्मणानुचर, बली काकुत्स्थ, पुरुष, कौसल्यानन्दवर्धन, वेदान्तवेद्य यज्ञेश, पुराणपुरुषोत्तम जानकीवल्लभ, श्रीमान् तथा अप्रमेय पराक्रम इन नामोंका श्रद्धापूर्वक जप करनेवाला भक्त दस हजार अश्वमेध यज्ञ करनेका फल पाता है। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ २२-२४ ॥ सन्नद्धकवची, खड्गी, चापबाणधर, युवा और लक्ष्मणके साथ जाते हुए श्रीरामचंद्र हमारे मनोरथोंकी रक्षा करें ॥२५॥ तरुण, रूपसंपन्न, सुकुमार महाबली, कमलकी नाईं बड़ी-बड़ी आँखोंवाले, पीतांबरधारी, फल-मूल खानेवाले, उदारप्रवृत्ति तपस्वी, ब्रह्मचारी, धन्वी, निस्त्रिंशधारी तथा काकपक्षकौ धारण किये दशरथके दोनों पुत्र राम और लक्ष्मण रास्तेमें जाते समय हमारी रक्षा करें । संसारी जीवोंके आधार, धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ, राक्षसकुलके विनाशक राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करें ॥ २६-२९ ॥ विल्कुल तैयार धनुष जिसपर बाण चढ़ा है, उसे लिये और अक्षय बाणवाले तूर्णीरको कसे राम-लक्ष्मण सदा रास्तेमें हमारे आगे-आगे चलें ॥ ३० ॥ जो कल्पवृक्षके आराम (बगीचा) समस्त विपत्तियोंके विराम (समाप्ति) और तीनों लोकोंमें अभिराम (सुन्दर) हैं, वे श्रीमान् रामचन्द्रजी हमारे प्रभु हैं ॥३१॥ राम, रामभद्र, सर्वस्रष्टा, रामचन्द्र, रघुनाथ, तथा सीताके पति रामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३२ । हे श्रीराम, हे रघुनन्दन राम, हे भरताग्रज राम, हे रणकर्कश श्रीराम, हे राम, हमको शरण हूजिए ॥ ३३ ॥ संसार भरमें अतिशय सुंदर, संग्राममें निपुण, कमल सरीखे नेत्रोंवाले, रघुवंशके स्वामी करुणाकी मूर्ति और दयाके भण्डार श्रीरामचन्द्रकी मैं शरणमें हूँ ॥३४॥ जिनकी दाहिनी ओर लक्ष्मण, बाईं ओर सीता और सामने हनुमान्जी उपस्थित हैं, ऐसे रघुनन्दव रामको मैं
सर्गः ५ ] अरण्यकाण्डम् ११५
गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम् रामायणमहामालारत्नं वन्देऽनिलात्मजम् ॥३६॥
अशेष तिष्ठ दूरे त्वं रोगास्तिष्ठतु दूरतः । शरीरात् मदाऽस्माकं हृदि रामो धनुर्धरः ॥३७॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३८॥
राम राम तव पादपङ्कजं चिंतयामि भवबन्धमुक्तये ।
वंदितं सुरनरैर्मौलिभिर्ध्यापितं मनसि योगिभिः सदा ॥३९॥
रामं लक्ष्मणपूर्वं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।
राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तिमूर्ति वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ।
एतानि रामनामानि प्रातःरुत्थाय यः पठेत् , अपुत्रो लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम् ॥४१॥
माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुनान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥४२॥
श्रीरामनामामृतमन्त्रराजसंजीवनी चेन्मनसि प्रविष्टा ।
हालाहलं वा प्रलयानल वा मृत्योर्मुखं वा विशतां प्रविष्टा ॥४३॥
श्रीशब्दपूर्वं जयशब्दमध्यं जयद्वयेनापि पुनः प्रयुक्तम् ।
त्रिःसप्तकृत्वो रघुनाथनाम जपंस्त्रिहन्त्याद्द्विजकोटिहत्या ॥४४॥
एतद्गिरीजै प्रोक्ता रामरक्षा मया तव । मयोपदिष्टा या स्वाप्न्येविश्वामित्राय वै पुरा ॥४५॥
श्रीरामदास उवाच
इति शिवेनोपदिष्टां श्रुत्वा देवीं गिरीन्द्रजा । रामरक्षां पठित्वा सा स्कन्द समभिमन्त्रयत् ॥४६॥
वन्दना करता हूँ ॥ ३५ ॥ जिन्होने समुद्रको गोके खुरभर जलवाला बनाया, राक्षसोंको मच्छड़ोंके समान नष्ट किया और जो रामायणरूप महामालाके पुखरत्न हैं, ऐसे पवनकुमार हनुमान्जीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥३६॥ हे पापोंके समूह ! तुम हमसे दूर रहो और हे रोगाण ! तुम हमारे पासस भाग जाओ क्योंकि हमारे हृदयमें धनुर्धारी रामचन्द्रजी बैठे हुए हैं ॥ ३७ ॥ मनके सदृश जिनकी गति है, वायुके सदृश जिनका वेग है, जिन्होने इन्द्रियोंको वशमें कर लिया है जा बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ है ऐसे वायुके पुत्र, वानरी सेनाके सेनापति और श्रीरामचन्द्रजीके दूत हनुमान्की मै शरणमें हूँ ॥३८॥ हे राम ! हे राम ! सांसारिक बन्धनोंसे मुक्त होनेके लिए सुर-नर इत्यादि सकल मस्तक से पूजित आपके चरणोंका मैं सदा ध्यान करता हूँ। क्योंकि योगी लोग भी सदा सर्वदा उन चरणोंके चित्तरूप ध्यान रखते हैं ॥ ३९ ॥ लक्ष्मणके ज्येष्ठ भ्राता, रघुकुलमे श्रेष्ठ, सीताके पति, परमरूपवान्, ककुत्स्थके वंशज, करुणाके वारिनिधि, गुण के निधि, ब्राह्मणोंके प्रिय, धर्मके तत्त्वज्ञ, राजाओंके राजा, सत्यप्रतिज्ञ दशरथके पुत्र श्यामरूप, शांतिके मूर्त्तिस्वरूप, संहारक आनन्ददाता, रघुकंशके तिलक-स्वरूप, रघुकुलश्रेष्ठ एवं रावणके शत्रु रामचन्द्रजीको मै प्रणाम करता हूँ ॥ ४० ॥ जो प्राणी सबेरे उठकर इन नामोंका पाठ करता है, वह यदि अपुत्र हो तो उसे पुत्र मिलता है और धनकी इच्छा रखनेवाला हो तो धन मिलता है ॥ ४१ ॥ राम ही मेरे पिता हैं, राम ही माता हैं, वे ही मेरे स्वामी और सखा हैं। दयालु श्रीराम-चन्द्रजी ही मेरे सर्वस्व हैं। उन्हें छोड़कर मै और किसीको नहीं जानता — किसीको नहीं जानता ॥ ४२ ॥ जिसके हृदयमें रामनामामृतमन्त्ररूपी संजीवनी विद्यमान रहत है, वह हलाहल, प्रलयानन्द अथवा मृत्युके मुखमें भी क्यों न कूद जाय, उसको कहीं भी भय नहीं है ॥ ४३ ॥ पहले श्रीशब्द, बादमे रामनाम फिर जय शब्द, फिर रामनाम, फिर दो बार जयशब्द जोड़कर, अर्थात् श्रीराम जय राम जय जय राम ) इक्कीस बार जप करनेवाला प्राणी करोड़ों ब्रह्महत्याओं जैसे महान् पातकोंको भी नष्ट कर देता है ॥ ४४ ॥ हे पार्वती ! मैंने तुम्हें यह रामरक्षामन्त्र बतलाया है, जिसे एक बार स्वप्नमे मैंने महर्षि विश्वामित्रको बतलाया था । श्रीराम-दासने कहा— इस प्रकार शिवजीके बतलाये हुए रामरक्षामन्त्रको सुनकर पार्वतीजीने स्वामिकार्तिकेयका उन्हीं
३१६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
सम्यास्तेजोबलेनैव जघान तारकासुरम् । षडाननः शृणादेव कृतकृत्योऽभवत्पुरा ॥४७॥
सैषेयं रामरक्षा ते मयाऽऽख्याताऽतिपुण्यदा । यस्याः श्रवणमात्रेण कस्यापि न भयं भवेत् ॥४८॥
वाल्मीकिनाऽनया पूर्वं कुशाय ह्यभिषेचनम् । कृतं बालग्रहाणां च शांत्यर्थे मा मयोदिता ॥४९॥
बालानां ग्रहशांत्यर्थे जपनीया निरन्तरम् । रामरक्षा महाश्रेष्ठा महौघौघविदारिणी ॥५०॥
नास्याः परतरं स्तोत्रं नास्याः परंतरो जपः । नास्याः परतरं किंचिन्मन्त्यं मन्य वदाम्यहम् ॥५१॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये जन्मकाण्डे
रामरक्षाकथनं नाम पंचमः सर्गः ॥ ५ ॥
षष्ठः सर्गः
( लवका अयोध्यासे कमलपुष्प लाकर माता सीताको देना )
श्रीरामदास उवाच
एकदा जानकी प्राह वाल्मीकिं मुनिपुंगवम् । कथयस्व व्रत येन रामयोगो भवेन्मम ॥ १ ॥
तत्सीतावचनं श्रुत्वा वाल्मीकिस्तां वचोऽब्रवीत् । प्रतिपद्दिनमारभ्य यावन्मा नवमी सिता ॥ २ ॥
तावन्नवदिने मांते व्रत कुरु मयोच्यते । प्रतिपदि रामचन्द्रपादुके धातुनिर्मिते ॥ ३ ॥
कृत्वाऽर्च्य नवकमलैर्देहि मंत्रांजलिं शुभाम् । ततः पुत्राननाभ्यां त्वं जन्मकाण्डं शुभं शृणु ॥ ४ ॥
अष्टादशकमलैश्च द्वितीयायां शुभांजलिम् । मंत्रैर्देहि पूजनान्ते पतिपादुकयोर्मुदा ॥ ५ ॥
पतिं विना स्त्रिया नान्यत्पूजनीयं हि दैवतम् । जन्मकांडं द्विवारं तु शृणु भक्त्या शुचिव्रते ॥ ६ ॥
एवं वृद्धिनवार्ब्जैश्च कार्या मांते दिने दिने । नवषण्णमेकाशीत्यब्जैः पूजयस्व भर्तृपादुके ॥ ७ ॥
नववारं जन्मकांडं पुत्रास्याभ्यां सुखं शृणु । ततो दशम्यां सुस्नातैर्कार्याति द्विजदंपतीन् ॥ ८ ॥
संपूज्य वस्त्राभरणैर्भोजयित्वाथ मैथिलि । दत्त्वा तेभ्यो दक्षिणांस्त्वं विसर्ज्य प्रणम्य तान् ॥ ९ ॥
मंत्रोंसे अभिमन्त्रण किया ॥ ४५-४६ ॥ उसी मन्त्रके तेज और बलसे षडाननने तारकासुर जैसे महान् शत्रुको मारकर अपना काम पूरा कर लिया था ॥ ४७ ॥ वही रामरक्षामंत्र मैने तुम्हे बतलाया है। जिसके एक बार श्रवण कर लेनेसे संसारमें किसीका भय नहीं रह जाता ॥ ४८ । इसी रामरक्षा मंत्रसे वाल्मीकिने कुशका अभिषेक किया था बालकोंका दुःख दूर करनेके लिए इसे मैने तुम्हें बतलाया है । ४९ ॥ बालकोंका ग्रह शान्त करनेके लिए सदा इसका जप करना चाहिये । यह महान् मंत्र है । यह बड़े बड़े पापोंके समूहको नष्ट कर देता है । इससे बढ़कर कोई स्तोत्र है ही नहीं । मैं तुमसे सच सच कहता हूँ कि इससे श्रेष्ठ और कोई मंत्र नहीं है ॥ ५० ॥ ५१ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामजन्मकाण्डेय-विरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकाससन्विते जन्मकाण्डे पञ्चमः सर्गः ॥ ५ '
श्रीरामदासने कहा -एक दिन सीताजी मुनियों में श्रेष्ठ वाल्मीकिसे कहने लगीं कि हमें कोई ऐसा व्रत बतलाइए, जिससे मैं फिर अपने पतिदेव ( राम ) को प्राप्त कर लूँ । १ । सीताकी उस प्रार्थनाको सुनकर वाल्मीकिने कहा कि प्रतिपदा तिथिसे लेकर नवमी पर्यन्त अर्थात् नौ दिनका मै जो व्रत बतला रहा हूँ, उसे करो । प्रतिपदाको धातुसे बनी रामकी चरणपादुकाका पूजन करके नौ कमलके फूलोंसे मंत्राञ्जलि दो । इसके अनन्तर अपने पुत्रोंके मुखसे आनन्दरामायणके जन्मकाण्डकी कथा सुनो । २-४ ॥ फिर द्वितीयाको पादुकाकी पूजा करके अठारह कमलोंकी पुष्पाञ्जलि दो । स्त्रीके लिए पतिके अतिरिक्त दूसरा कोई पूज्य देवता नहीं है । साध्वी द्वितीयाको दो बार जन्मकांडकी कथा सुनो ॥ ५ । ६ । इस तरह प्रतिदिन कमलके फूलोंकी संख्या बढ़ाती हुई नवमीको ८१ फूलोंसे पतिकी चरणपादुकाको मंत्राञ्जलि दो और कथाकी भी सख्या बढाती हुई नवमीको अपने पुत्रोंके मुखसे नौ बार जन्मकांडकी कथा सुनो । दशमीको स्नानादि नित्यकर्म करनेके