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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ३ ]

सर्गः ३ ]
सारकाण्डम्
२७

संसर्गात्सितेता यस्यासीत्तेनैषा प्रगीयते । पद्माभूत्स्वैः कन्या तस्मान्पद्मेति सा स्मृता ॥२७३॥
एवं नामान्यनेकानि सीतायाः संति भो नृप । आकाशनीलवर्णाभवपुषाऽनेन जानकी ॥२७४॥
लब्धा रामेण पद्माक्षप्रतिज्ञा सफलीकृता । एवं मया यथा दृष्टं तथा स्वां विनिवेदितम् ॥२७५।
अतस्त्वं स्नुषास्त्वत्र कर्तुमर्हसि भो नृप ।
श्रीशिव उवाच
एतस्मिन्नंतरे तत्र पूर्वं दशरथेन च ॥ २७७ ॥
महासुहृद् ययुः पैत्र्यैः स्त्रीपुत्रैः ससुताश्च ते । कोशलो मगधेशश्च कैकयश्च युधाजितः ॥२७८॥
मानयामास तान् राजा जनकोऽपि मुदान्वितः । ततो दशरथं पूज्य श्रीरामं लक्ष्मणं तथा ॥२७९॥
भरतं चापि शत्रुघ्नं संपूज्याभरणादिभिः । निनाय जनकस्तुष्टः स्वपुरीं परमोत्सवः ।२८०॥
तदा रामो नृपं नत्वा राज्ञा चालिङ्गितो मुहुः । वसिष्ठं गाधिनं नत्वा कौसल्यादि प्रणम्य च ।२८१॥
राज्ञो दशरथस्याग्रे संस्त्रीभिर्बन्धुभिः सह । गजारूढौ ययावग्रे तेऽप्यभूवन् गजस्थिताः ।२८२॥
नदत्सु वाद्यसंघेषु नृत्यत्सु मागधादिषु स्तौत्सु नागरस्त्रीषु विवेश नगरीं प्रभुः ॥२८३॥
तदाऽऽत्तासंभ्रमः पौरस्त्रीणां श्रीरामदर्शने । विसृज्य स्वायकृत्यानि ददृशुर्द्वारादिषु ॥२८४॥
कट्यां निधाय बालांश्च ददृशु रघुनंदनम् । राजमार्गतं रामं ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ।२८५॥
एवं महोत्सवं गत्वाऽस्थात् दशरथः सुतः । यथा वस्त्रान्नतोयाद्यैः परिपूर्ण मनोरमम् ॥२८६।
कृत्वा ज्योतिर्विदां लग्नाद्दिनमस्य विनिश्चयम् । मंडपैश्च तोरणानि पताकाश्च ध्वजांस्तथा ।२८७।
रोपयमासु सर्वत्र मातृगो मिथिलां पुरीम् । भागाश्चंदनलिप्ताश्च पुष्पैरच्छादिता आप ॥२८८।
गलाभिभारणः भूपैर्घोषाद्यस्त चकारयत् । ततो मुहूर्त्तसमये शुभांऽछां निर्गता शुभास् ॥२८९।

के कारण ... जानक कहा। पालित होनेसे जानकी सीता (फाल) के अग्रभागसे प्रकट होनेके कारण सीता और राजा पद्माक्षकी कन्या होनेसे वह पद्मा कहलायी ॥ २७३ ॥ २७४ । हे महाराज दशरथ इस प्रकार सीताके अनेक नाम हैं। आकाशके समान नीलवर्णरूपवाले रामने सीताको प्राप्त करके राजा पद्माक्षकी प्रतिज्ञा पूर्ण कर दी। इस प्रकार जो आपने पूछा सो मैंने निवेदन कर दिया। अब आपका उस सीताको स्नुषावधूं स्वीकार करना चाहिये। शिवजी बोले—इतनेमें पहिलेसे राजा दशरथके द्वारा बुलाये गये उनके बन्धुवर कोशलराज तथा मगधराज युधाजित् नामक कैकयराज अपनी स्त्री और प्रजाके साथ लश्कर वहाँ आ पहुँचे । राजा जनकने भी उनका प्रेमपूर्वक स्वागत किया । पश्चात् राजा दशरथका वस्त्र भूषण आदिसे और राम लक्ष्मण भरत तथा शत्रुघ्नकी पूजा करके राजा जनक महान् उत्सवके साथ अपने नगरमें ले गये ॥ २७५-२८० ॥ तदनन्तर रामने राजा दशरथको प्रणाम किया । राजाने उन्हें हृदयसे लगाया । फिर रामने गुरु वसिष्ठजी तथा गाधिसुत आदि माताओंको प्रणाम करके राजा दशरथके आगे उन स्त्रियोंका तथा बन्धुओंसहित हाथियोंपर चढ़कर आगे-आगे चले। उनके पीछे और सब लोग गजारूढ़ होकर चल पड़े। इस प्रकार वाद्यसमूहके शब्दका सुनते, चारणोंकी स्तुतियोंका श्रवण करते तथा वेश्याओंके नाचको देखते हुए प्रभु रामने नगरमें प्रवेश किया । उस समय रामके दर्शनके लिये नगरकी स्त्रियें व्याकुल हो उठीं। अपन-अपन गृहकार्योंको छोड़ सबके सब बालकोंको गोदमें लिये नगरके दरवाजे आदिपर आकर रघुनन्दन रामका दर्शन करने लगीं। राम जब सड़कपर आ गये, तब उन्होंने उनपर पुष्पवृष्टि की ॥ २८१-२८५ ॥ इस तरह महोत्सवके साथ राजा दशरथ राम आदिको लेकर अन्न (भोजनका सामान), वस्त्र (ओढ़ने-बिछानेका सामान) तथा जल (नहाने-धोने तथा पीने का पानी) आदिसे परिपूर्ण मनोहर वासस्थानपर (बरके ठहरनेके स्थानपर) गये ॥ २८६ ॥ मन्त्रियोंने ज्योतिषीके द्वारा लग्नका दिन निश्चय कराकर समस्त मिथिलापुरीको मण्डपोंसे, तोरणोंसे, पताकाओंसे तथा रंग-बिरङ्गी ध्वजाओंसे सजवा दिया। बड़े-बड़े रास्तोंको चन्दनसे सिपवाया गया। उनपर भाँति-

९८ आनन्दरामायणे [सर्गः ३

सुमङ्गल्याः स्त्रियः सर्वाः कौसल्याद्यास्तु मातरः । रामादीन् पांगुलम्पादी नीराजनपुरःसरम् ॥२९०॥
कम्भुंभांस्तोयपूर्णान्वितुदिक्षु महीपरन् । सम्वत्स्य स्नापयामासुर्महावाद्यपुरःसरम् ॥२९१॥
तटाभ्यंगं स्वयं वापि कृत्वा मन्तुश्च मातरः । रामादीन् पूज्तः कृत्वा वस्त्रालंकारभूषिताः ॥२९२॥
अभ्यङ्गपूर्वकं पत्नी राजा दशरथोऽपि सः । समाहूय नृपस्त्रीश्च समाज्ञा म्वालिके गुरुः ॥२९३॥
मुक्ताविनिर्मिते राज्ञः पार्श्वे वामे न्यवेशयत् । अग्रे गर्भादिकांश्च ताः स्त्रियोऽवन्सननाः ॥२९४॥
हरिद्राकुंकुमालिप्तचरणा रेजिरेऽद्रुते । वसिष्ठो ब्राह्मणैर्युक्तो राजा गर्भादिभिर्मुदा ॥२९५॥
कृत्वा गणपतेः पूजां पुण्याह्यादितयं क्रमात् । कारयामास विधिवत्प्रतिष्ठां देवतस्य च ॥२९६॥
ग्रामाचारं कुलाचारं वृद्धाचारं तथा पुनः । देशाचारं च प्रमदाचारादीनकरोन्नृपः ॥२९७॥
तोयकुम्भं मंडपादिकानां पूजनमाचरत् । कौसल्याद्याः स्त्रियः सर्वा हरिपीतारुणैर्वरैः ॥२९८॥
हेमन्तन्तुर्वितैर्वस्त्रैर्दिशेजर्मंडपांगण । जनकश्च नृपैर्युक्तो महावाद्यपुरःसरम् ॥२९९॥
रामादीन् निजं गेहं नेतुकामः समाययौ । मंडपे पूजयामास रामादीन् जनकस्तदा ॥३००॥
हेम्नतन्तुद्रवैर्र्दव्यैर्वस्त्रैराभरणादिभिः । तदा विरेजुस्ते बालः सर्वे प्रमुदिताननाः ॥३०१॥
तानग्रे वारणेंद्रस्था दिव्यचामरवीजिताः । शृण्वन्तो वाद्यघोषांश्च दंपतः पुष्पवृष्टिभिः ॥३०२॥
हरिद्रांकितधान्यैश्च माङ्गल्यैर्मौक्तिकादिभिः । मातृभिश्चारुणेक्षांषु वर्षिताभिश्चहुर्मुहुः । ३०३॥
एव ते राघवाश्चाश्च पुरस्त्रीभिनिरीक्षिताः । प्रासादोपरि संस्थाभिलाजाभिर्वर्षिता मुहुः ॥३०४॥
ददृशुर्नर्तनान्यग्रे वारस्त्रीणां स्मिताननाः । वाटिकाः पुष्पवृक्षाणां वरमुक्ताप्रनिर्मिताः ॥३०५॥

भांति के पुष्प विखर दिये और साफ खास स्थानोंमें गलत्था तथा तारा बनवा दिये, पुष्पलताओ और
मार्जारिक पाषा द्वारा उस समय वह नगरी गोद की दिव्य मा ३स गहन लगो । तदनन्तर शुभ मुहूर्तमे
जिस रामका माताके शरीरम स्त्रियाके द्वारा तेल हुल्दा आदि मन, गया । उस समय कौमल्या
आदि माताओने आंगन लेप तथा रामका पानी छिड़ककर जम्पूर्ण हंसक सहित चार सुन्दर घड़ोको
चारो दिशाअम स्थापित करके राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्नको वाद्यत्कृतिक मध्य मङ्गलमय स्नान कराया
॥२९०-२९१॥ फिर तेल आदि मलकर अपन आप भी सब माताओन स्नान किया। पहिल नया
आदिको वस्त्र तथा भूषणोसे भूषित करके तदनन्तर आरिका शरीरम अभ्यङ्ग करक मन्दकर) राजा
दशरथने भी स्नान किया। पश्चात् गुरु वशिष्ठत नजाक सब नियोको समाद्रूपरम बुलाकर राजाके
बामभागम मुक्तानिर्मित स्तम्भिक महित ( वरी या आसन, पर बैठाया। उस समय मबके आसनमे स्थिति राम
आदि बालकोक समान बैठाकर भिन्न चुन किया तथा रूपी और तेल चरणाम लगाये अत्यन्त सुशो-
भित होत हथी । बाह्मणके महित धषिष्ठजीन राग दशरथ साथ गभादिके द्वारा गणपतिपूजन तथा
पुण्याहवाचन ये दोनों कर्म प्रमुख करवाये और तीसरा कर्म विधिनत् दस्ताकी प्रतिष्ठा करवायी ।
राजा दशरयन भा बादमे प्रसन्नतापूर्व ग्रामाचार कुलाचार, वृद्धाचार देशाचार तथा प्रमदाचार
आदि किया ॥२९२-२९६ ॥ तदनन्तर अहपूर्ण कुम्भ तथा मण्डप आदिकी पूजा का। मण्डपके आँगनम
हरी लाल, पीली तथा जरादार साड़ियोको पहनकर कौसल्या आदि स्त्रिय बड़ी सुन्दर दीसन लगा।
बड़े बड़े बाजोनको बजवान हुए अन्य राजाओक सहित राजा जनक श्री राम आदिको अपने भवनमें
लिवा ले जानके लिये वहाँ आये। मण्डपम जाकर राजा जनकन राम आदिका पूजन किया ॥ ३०० ॥
उस समय प्रसन्न मुखवाले वे सब बालक जर्रोदार दिव्य वस्त्रो तथा आभरणोका पहने हुए बड़े मुन्दर
लगते लगे । ३०१॥ बादम वे सब जं कि उत्तम हाथियोपर बैठे हुए थे, जिनपर सुन्दर चैवर दुल
रहे थे । हाथियोपर बैठा हुई माताएं चारो तरफम बारम्बार जिनपर मोतियो, माङ्गलक हरदामिश्रित
चानलो तथा पुष्पोकी बौछार कर रही थीं । जिनके आ नगरकी स्त्रिय बड़े चावसे देख रही थी तथा
भवनोंपरसे बालका लावा बरसा रहा थी । अनिन्तर मुझासे वहाँके रास्तेमे वेश्याओके नृत्य

मर्गः ३ ] बालकाण्डम् २९

तथा कृत्रिमवृक्षांश्च पताकाश्च प्रजांस्तथा । वह्निप्रद्योतदीर्घाणां पुष्पवृक्षविनिर्मिताम् ॥३०६॥
तडिन्प्रभोषमांश्चापि गगनान्तर्विगर्जिनन् । वह्निप्रद्योतधाम्न्याः प्राकारान् विविधान् वरान् ॥३०७॥
चंद्रज्योत्स्नाकृत्रिमांश्च दीपवृक्षांन् सहस्रशः । हारमालाश्च व्याघ्रादीन्कृत्रिमान् रशमींस्तथान् ॥३०८॥
औषधीभिः पूरितांश्च केकोचकोपमादिकान् । ददृशुस्तंगणेंद्रव्या एवं ते राघवादयः ॥३०९॥
तदा देवा विमानस्था ददृशुः कौतुकं मुदा । एव नानोत्सवैरैतान् पपुर्जनकमंदिरम् ॥३१०॥
अवरुह्य गजेन्द्रेभ्यस्तस्थुस्ते मंडपांगणे । मधुपर्कविधानानि विष्टरादीन् च क्रमात् ॥३११॥
तयोर्गुरू चक्रतुस्तां वसिष्ठगौतमत्मजौ । वाल्मीक्यादिमुनिगणैर्वेष्टितौ तुष्टमानसौ ॥३१२॥
ततः पूजां वधूनां च पुत्रा दशरथो नृपः । चकार गुरुणा युक्तस्तदा स मंडपाङ्गणे ॥३१३॥
ततो लग्नमुहूर्ते तान् वशंमिश्र पुरस्कृतन् । वेदिकासु स्थितान् कृत्वा दम्पत्योरंतरे पटान् ॥३१४॥
कृत्वा मंगलघोषांश्च मुनिभिश्चकृतुर्गुरुः । तदा तूष्णीं सभायां ते शुश्रुवुःसकला जनाः ॥
दूर्वाद्यैः क्षीरधान्यैश्च वधूपुत्रन्वतीन् स्त्रियः ॥ ३१५ ॥
ओंडैवातपयो शिवः सुखकरो मित्रः शशा रूपनः सर्वं ते मुनयश्चना दद्यु दिशः सर्वा मृगेंद्राः खगाः ।
नद्यःपुण्यसरोवरोर्गण दितिजास्तीर्थानि कंजामनश्चेंद्रा वह्नमरा नटी जलधयः कुर्वंतु वो मंगलम् ३१६॥
तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चंद्रबलं तदेव । विद्याबलं दैवबलं तदेव कार्यः पतैर्यत्स्मरणं विधेयम् ३१७
एवं मंगलाशब्दैश्च महावाद्यपुरःसरम् । तेषांमतःपटान्मुक्त्वा ॐपुण्योऽस्त्वन्वतूर्गुरू ॥३१८॥
तासां ते पाणिग्रहणविधानं विधिपूर्वकम् । लाजाहोमादिकं सर्वं चक्रुर्मंगलपूर्वकम् ॥३१९॥
तदा महावाद्यघोषा निनेदुर्मंडपांगजे । ननृतुर्वारनार्यश्च जगुर्मागधवन्दिनः ॥३२०॥

मनोहर गिट्टी आदिके बने हुए गमलों, वृक्षों तथा फूल पत्तियोंसे बनी हुई वाटिकाओंको, कृत्रिम वृक्षोंको, पताकाओंको, ध्वजाओंको, बधिक समान जलवान, तडितके समान शभानबल और आकाशमें गरजनेवाले नाना प्रकारके आतिशवाजात सब पुष्पवृक्षतया वाटिका, हजारों चन्द्रमाओकी चान्दनीके कृत्रिम दीपवृक्षोंका, रश्मीमात्राओंका, रशामेरख हुए बनावटी व्याघ्रादिमृग वाटिका, ओषधिसं भरे हुए मोर तथा पक्षी आदिको देखने लगे ॥३०६-३०९॥ सब देवता भी आनन्दसे उस कौतुकको देख रहे थे। इस प्रकार विविध उत्सवों सहित वे राम आदि बालक राजा जनकके भवनको गये । ३१०॥ वहाँ जा तथा हाथियोंस उतरकर वे मण्डपके आँगनम खड हा गय। वाल्मीकि आदि मुनियांस घिर हुए दोनो वधक गुरु वशिष्ठ तथा श्रीमद्गुरु शतानन्दने प्रसन्नतास मधुपर्क (मधुमिश्रित दधि) का विधान और आसन आदिका विधान सम्पन्न करवाया । ३११॥३१२॥ पश्चात् राजा दशरथने गुरु वशिष्ठका साथ लेकर महर्षि बांधी पुत्रवधुओंकी पूजा की। फिर शुभ मुहूर्त तथा शुभलग्न मुनियो तथा गुरुतन उन-उन वधुओं ओर उन उन चार बालकोंको पृथक् पृथक् वेदियोपर बैठाकर उन दम्पत्याक बाचम बन्धक बहकर गङ्गलमय श्लोकोंका उच्चारण किया। सभाके सभ मनुष्य चुप होकर उसे सुनत लगे। दुवाय कलशम् गङ्गोपान चावल तथा फूल वरवधूके ऊपर बरसने लगे ॥ ३१३-३१५॥ तरुदाता दयालय गणपति, सुखकारक शिव, सूर्य, ग्रह राहु, सब मुनि, चल-अचल जीव, दशा दिशाय, सर्प, मृगन्द्र, खग, नदी, पवित्र सरोवर, दत्य, तीथ, ब्रह्मा, इन्द्र, अग्निसहिता तथा नदी-समुद्र आदि तुम लोगांका कल्याण करें ॥ ३१६॥ कोटिपाति आदिनाथका सत्यतल्या स्मरण ही तुम्हार लिए सुन्दर लग्न, शुभ दिन, ग्रहबल, विद्यावल तथा दैवबल बन जाय ॥ ३१७॥ इस मांगलिक शब्दो और मांगलिक बाजाके ध्यान हान लगा। उसके बाद बीचमें धरे हुए बस्त्रोंको हटा दिया गया और दानों बारके गुरुओने "ॐपुण्योऽस्तु" ऐसा कहा ॥ ३१८ ॥ इस प्रकार उन लोगोंने मिलकर विधिपूर्वक उनका विवाहकार्य तथा लाजाका हवन आदि सभी कृत्य मङ्गलपूर्वक संपादित कर दिया ॥ ३१९॥ तब मण्डपकी डंगराडम बडे-बडे बाजोका विनाद होने लगा, वेश्यायें नाचने लगी, भांट और बन्दीजन यशगान करने लगे ॥ ३२० ॥

३० आनन्दरामायणे [ सर्गः ३

नटा मङ्गलगीतानि तुष्टुवुस्ते महारथैः। तदा दानान्यनेकानि चक्रतुस्तौ नृपोत्तमौ ॥३२१॥
अथ ते बालकाः सर्वे वधूः स्थाप्य करीन्द्रषु । राघवेण दिवानिद्राभिषेकेऽभून्मे भोजनमुत्सवात् ॥३२२॥
भद्रास्त्रांसिंचनं चक्रुः संपूज्य शर्व स स्मर । ते रामादिकाः सर्वे स्वस्वपत्न्या पृथक्सुखाः ॥३२३॥
चक्रुस्ते भोजनं हृष्टाः स्त्रीभिः सर्वत्र वांञ्छिता । गजा दत्त्वाभ्रश्वांश्च सुहृद्भिश्च नृपोत्तमैः ॥३२४॥
पौरैर्जानपदैस्तृष्टैर्मुनिभिः परिवेष्टितैः। जनकस्य गृहं गत्वा चकार भोजनं मुदा ॥३२५॥
कौसल्य द्य, स्त्रियः प्रीतिश्चक्रुर्भोजनमुत्तमम् सुमेधया प्रार्थितास्ता वदित्यथ मुहुर्मुहुः ॥३२६॥
एव मुत्सवेऽभून्मासत्रयं जनको मुदा। अथ ते बालकाः सर्वं स्वैर्वाक्यान्यामन्त्रयद्विधौ ॥३२७॥
स्वस्वपत्न्याः पादयोः स्वारोग्यभिनन्दन मुहुः। चक्रुःप्रष्ट्वेदमस्ते तस्मा नेमुः पृथक् पृथक् ।
कुङ्कुमालिम्पदाथ तैरुमकेषु ता ददुः । ३२८॥
श्रीरामः समवाप्य भूमिसन तन्मात्रा जगज्जानकी महाभागा वराङ्गेन्दुवदनः कारुण्यपूर्णेक्षणः ॥
विद्युद्वर्णरजोमनोहरतरश्चामीकराङ्गोत्तरो जामाताऽभवदावेड्यतनुपेमा मुक्ताविराजद्रलः ॥३२९॥
चतुर्थे दिवसे रात्री वस्त्रपात्रादिराजितेः । दीपैर्नैर्गजिनाः सर्वे विरेजू राघवादयः ॥३३०॥
रामादीनां परिवर्हान् ददौ स जनकस्तदा । नियुतान् वारणेंद्रांश्च शिविकाश्चापि तन्मिताः । ३३१।
तुरगान् दशलक्षांश्च नियुतान् स्यन्दनान ददौ नानालंकारवासांसि गोदासीसेवकदिकान् ॥३३२।
ददौ स राघवादिभ्यो येषां संख्या न विद्यते । एवं सम्मानितास्तेन ते बाला जनकेन हि ॥३३३।
पूर्वेवद्रुमथ श्रेष्ठ स्वस्वपत्न्या समन्विताः । गजारूढ़ा सुसङ्गीतैर्नात्वायैः स्वमंडप ययुः । ३३४
ततो राजा मासमेकं निनाय नृपनायकतः । ततः सैन्येन स्वपुरीं गन्तुं पुराद्वहिर्ययौ ॥३३५॥
साताद्या निर्ययुर्मुग्धाः साश्रुनेत्राः सुविह्वलाः । सुमेधाभ्या समाश्लिप्य सांत्वयित्वा न्यसर्जयत् ॥३३६।

नट आदि ने अनेक मङ्गलगीतोंका गान किया और दोनों भूपने अनेक दान दिये । ३२१ ॥ तदनन्तर वे सब बालक अपनी अपनी बहुओं को हाथीपर चढ़ाकर चले । वे दिनमें जाके साथ भोजनालयमें गये । ३२२ ॥ हे पार्वती ! वहाँ आचमन करके सुहृद्गण तथा गौरीशंकर (शिव-पार्वतीकी) पूजा करनेके बाद सब अपने अपने परिजनोंके साथ आदरपूर्वक भोजन किया और सब स्त्रियाँ उन्हें देखकर संतुष्ट हो गयीं। राजा दशरथ भी अपने राजाओंके, बन्धुओंके, नगर तथा देशके लोगोंकी और मुनियोंकी साथ में तथा जनकके घरपर जाकर महोत्सव में भोजन किया ॥ ३२३-३२५॥ सुमेधासे बार-बार प्रार्थित तथा वन्दित कौशल्या आदि स्त्रियोंने भी जाकर प्रेमपूर्वक भोजन किया तथा राजा जनकको बड़ा आनन्द प्राप्त हुआ । फिर उन बालकोने प्रसन्न होके स्त्रियोंके कहनेसे माताओंके सम्मुख अपने अपनी स्त्रियोंके पैरोंपर अपना अपना सिर रखकर नमस्कार किया। पश्चात् उन स्त्रियोंने भी उनको अलग-अलग नमस्कार करके उनका गालोंपर कुङ्कुमसे तिलक किया ॥ ३२६॥ ३२७॥ ३२८॥ समस्त संसारके जनक सुन्दर चन्द्रके समान मुखवाले तथा करुणापूर्ण नेत्रोंवाले, विद्युत्के समान वर्णवाले, पीत वस्त्रोंको धारण किये हुए, विलक्षण वेशवाले, अनुपमेय कान्तिवाले, अनुपम शोभाको प्राप्त हुए जानकी आदि आदि स्त्रियॉं, और भूमिसतया शोभाको प्राप्त कर लिया ऐसा जान पड़ता था ॥ ३२९॥ चौथे दिन रात्रिमें वस्त्रोंसे सुसज्जित होकर दीपकोंसे शोभित तथा पूजित राम आदि चारों भाई बड़े ही शोभायमान होने लगे ॥ ३३० ॥ राजा जनकने राम आदिको जो दहेज़ दिया दस लाख हाथी, दस लाख पालकियाँ दस लाख घोड़े तथा दस लाख रथ अगणित अलंकार, पोशाक, गौएँ तथा दास-दासिएँ दीं। इस प्रकार राजा जनकके द्वारा सम्मानित वे बालक ॥ ३३१-३३३॥ अपनी अपनी स्त्रियोंको साथ लेके तथा हाथियोंपर सवार होकर नृत्यगान तथा बाजेके साथ अपने मण्डपको लौट आये । ३३४॥ पश्चात् राजा दशरथ राजा जनकके साथ एक महीना वहाँ व्यतीत करके अपने पुरको जानेके लिये सेनाके साथ उस पुरोस बाहर आये । ३३५ । सीता आदि अश्रुपूर्ण नेत्रोंमें बहुत विह्वल होकर चलीं। सुमेधाने उनको

[सर्गः ३] सारकाण्डम् ३१

अथ राजा दशरथो जनकं विन्यवर्तयत् । तदा दशरथं प्राह जनकः साश्रुलोचनः ॥३२७॥
समालिङ्ग्याथ ताः कन्या विरहाद्गद्गदाक्षरः । एतावत्कालपर्यन्तं सीताद्याः पालिता मया ॥३२८॥
अधुना त्वन्मयाप्यग्रे लाल्याश्च कृतेक्षणैः । इत्युक्त्वा नृपतिं नत्वा मिथिलां जनको ययौ ॥३२९॥
ततो दशरथोऽपि स्नुषासंनयनादिभिः । भूपैः सैन्येन स्वपुरीं ययौ मार्गे शनैः शनैः ॥३३०॥
अथ गच्छति श्रीरामे मैथिलाद्योजनत्रयम् । निमित्तान्यतिघोराणि ददर्श नृपसत्तमः ॥३३१॥
नत्वा वसिष्ठं पप्रच्छ किमिदं मुनिपुङ्गव । निमित्तानीह दृश्यन्ते विषमाणि समन्ततः ॥३३२॥
वानप्रस्थमथो प्राह भयमात्राणि सूच्यते । पुनरेषां प्रभावेऽद्य शीघ्रमेव भविष्यति ॥३३३॥
मृगाः प्रदक्षिणीयान्ति त्वां पश्य शुभसूचकाः । एवं वै वदतस्तस्य ववौ घोरतरोऽनिलः ॥३३४॥
मुष्णंश्चक्षूंषि सर्वेषां पांसुवृष्टिभिरर्हयन् । ततो ददर्श परमं जामदग्न्यं महाप्रभम् ॥३३५॥
नीलमेघनिभं प्रांशुं जटामण्डलखण्डितम् । धनुः शृङ्गरस्तं च साक्षात्कालमिव स्थितम् ॥३३६॥
कार्त्तवीर्यान्तकं रामं दृप्तक्षत्रियमर्द्दनम् । प्राप्तं दशरथस्याग्रे रक्तास्यं रक्तलोचनम् ॥३३७॥
तं दृष्ट्वा भयसंत्रस्तो राजा दशरथस्तदा । पर्णादिपूजां विस्मृत्य त्राहि त्राहीति चाब्रवीत् ॥३३८॥
दण्डवत्प्रणिपत्याह पुत्रप्राणान्प्रयच्छ मे । इति ब्रुवन्तं राजानमनादृत्य रघूत्तमम् ॥३३९॥
उवाच निष्ठुरं वाक्यं क्रोधात्प्रज्वलितेन्द्रियः । त्वं राम इति नाम्नाऽत्र चरसि क्षत्रियाधम ॥३४०॥
द्वन्द्वयुद्धं प्रयच्छाशु यदि त्वं क्षत्रियोऽसि मे । पुराणं जर्जरं चापं भङ्क्त्वा त्वं कत्थसे मुधा ॥३४१॥
इदं तु वैष्णवं चापमारोपयसि चेद्गुणम् । तर्हि युद्धं त्वया सार्द्धं न करोमि नृपात्मज ॥३४२॥
नो चेत्सर्वान्हनिष्यामि क्षत्रियान्तकरस्त्वहम् । इति तद्वचनं श्रुत्वा राघवो वाक्यमब्रवीत् ॥३४३॥


छातीसे लगाया तथा आश्वासन देकर विदा किया ॥ ३२६ ॥ तब राजा दशरथने राजा जनकको लौटनेके लिये कहा । राजा जनक आँखोंमें आँसू भरकर कन्याओंको छातीसे लगाये हुए पुत्रियोंके वियोगसे गद्गदस्वर होकर राजा दशरथसे कहने लगे कि आज तक मैंने सीता आदिका लालन-पालन किया और अब आजसे आप अपनी कृपादृष्टिसे इनका पालन-पोषण करें। ऐसा कह और राजाको नमस्कार करके राजा जनक मिथिलाको लौट गये ॥ ३२७-३२९ ॥ राजा दशरथ भी पुत्रों, स्नुषाओं (बहू), राजाओं तथा सेनाके साथ लेकर धीरे-धीरे अपनी नगरीको चले ॥ ३३० ॥ जब श्रीरघुवीर मिथिला देशसे केवल चार कोस आगे बढ़े। तब राजा दशरथको अतिघोर अशकुन दिखाई दिये ॥ ३३१ । तब वे नमस्कार करके वसिष्ठजीसे कहने लगे—हे मुनिपुंगव ! यह क्या कारण है कि चारो तरफ ये अशकुन दिखाई दे रहे हैं ? ॥ ३३२ । वसिष्ठजीने कहा कि ये भयके मात्र सूचक हैं। परन्तु शीघ्र ही आपका भय निवृत्त हो जायगा ॥ ३३३ ॥ देखिये, शुभसूचक हिरण दाहिनी ओर जा रहे हैं। इतना कहना ही था कि घोरतर वायु बहने लगी ॥ ३३४ ॥ पवनसे सबकी आँख भर गई। दारुण बड़े तेजस्वी, नीले मेघके समान लंबे-तगड़े ऊंची जटाओंके मंडलवाले, कंधेपर धनुष बाण धारण किये, साक्षात् कालके समान लाल मुँह किये हुए कार्त्तवीर्यार्जुनके महाशत्रु तथा उद्धत मदोन्मत्त घमण्डी क्षत्रियोंका नाश करनेवाले परशुरामजी दशरथके आगे खड़े हो गये ॥ ३३५-३३७ । राजा दशरथ उनको देखकर भयसे विह्वल हो सत्कार पूजा भूलकर त्राहि-त्राहि करने लगे ॥ ३३८ ॥ उन्होंने दण्डवत् प्रणाम करके कहा कि आप मेरे पुत्र रामके प्राण बचायें । परन्तु परशुरामजीने क्रोधातुर होकर राजाका अनादर करके रघूत्तम रामसे इस प्रकार निष्ठुर वचन कहा—अरे क्षत्रियाधम राम ! तू मेरे नामके समान इस मण्डलमें प्रसिद्ध हुआ फिरता है ? ॥ ३३९ ॥ ३४० ॥ यदि तू सच्चा क्षत्रिय हो तो मेरे साथ युद्ध कर । पुराना सड़ा हुआ धनुष तोड़कर क्या अपनी बड़ाईकी झूठी डींग हाँक रहा है ? ॥ ३४१ ॥ ओ नृपपुंगवज ! यदि तू इस विष्णुके धनुषपर डोरी चढ़ा दे तो मैं तेरे साथ युद्ध न करूँगा ॥ ३४२ ॥ नहीं तो मैं तुम सबको मार डालूँगा । क्योंकि क्षत्रियोंका नाश करना ही मेरा काम है । परशुरामका यह वचन सुनकर रामने कहा—॥ ३४३ ॥

३२आनन्दरामायणे[ सर्गः ३

वयमेकगुणाः स्वामिंस्त्वं चैव गुणाधिकः। गोविप्रदेवतादींषु शस्त्रा नामन्त्रयास्ततः ॥३५५॥
मयैतच्च जीवितानि तव पादार्पितानि हि। यथेच्छं यात्तथास्माकं विधेर्युद्धं करोमि न ॥३५६॥
इति ब्रुवति रामे वै चचाल वसुधा भृशम् । क्रुद्धं दृष्ट्वा जामदग्न्यं क्षत्रियौघसमुद्यतम् ॥३५७॥
अन्धकारो बभूवाथ क्षुभितः सप्त सागराः । रामो दाशरथिर्वीरो वीक्ष्य तं भार्गवं रुषा ॥३५८॥
धनुर्गच्छंस्तद्धस्ताद्रोप्य शुनमजयत्। तूणीगद्वाणमादाय संधायाकृष्य वीर्यवान् ॥३५८॥
उवाच भार्गवं रामः शृणु ब्रह्मन् वचो मम। लक्ष्यं दर्शय बाणस्य ह्यमोघो गमनायकः ॥३५९॥
लोकान् पादयुगं वापि वद शीघ्रं समाज्ञया। एतन्वदति श्रीरामे भार्गवो विगताननः ॥३६०॥
संस्मरन् पूर्ववृत्तान्तमिदं वचनमब्रवीत्। राम राम महाबाहो जाने त्वां परमेश्वरम् ॥३६१॥
पुराणपुरुषं विष्णुं जगन्मङ्गलमोद्धवम् । बाल्येऽहं तपसा विष्णुमाराधयितुमंजसा ॥३६२॥
गत्वा हि तीर्थे गोमन्दारूपस्य सोप्य शार्ङ्गिणः। अहर्निशं महात्मानं नारायणमकल्पयीः ॥३६३॥
यस्यांशेन मया भूम्यामवतारो गृहीतोऽस्ति हि भूभारहरणार्थाय कार्त्तवीर्यवधैप्सया ॥३६४॥
ततः प्रसन्नो देवेशः शंखचक्रगदाधरः उवाच मां नृगुश्रेष्ठं प्रसन्नमुखपंकजः ॥३६५॥

श्रीभगवानुवाच

उत्तिष्ठ तपसो ब्रह्मन् विदितं ते तपो महत् मद्विचद्रेन युक्तस्त्व जहि हैहयपुंगवम् ॥३६६॥
कार्त्तवीर्यं पितृऋणं एदर्थं तपसा श्रमः। ततस्त्रिःसप्तकृत्वस्त्वं हन्ता क्षत्रियमण्डलम् ॥३६७॥
कृत्स्नां भूमिं कश्यपाय दत्त्वाऽशान्तिमवाप्स्यह। त्रेतायुगे दाशरथिर्भूत्वा रामोऽहमव्ययः ॥३६८॥
वन्दत्स्ये परया भक्त्या तदा द्रक्ष्यसि मां पुनः। मनेजः पुनरादास्ये मयि दत्तं मया कृतम् ॥३६९॥
तदा तपश्चरँल्लोके तिष्ठ त्वं ब्रह्मणो दिनम्। इत्युक्त्वाऽन्तर्दधे देवस्तथा सर्वं मया कृतम् ॥३७०॥
स एव विष्णुरूपस्त्वं राम जातोऽसि ब्रह्मणाऽर्थितः। मयि स्थितं तु त्वत्तेजस्त्वयैव पुनर्गृह्यताम् ॥३७१॥

हे स्वामिन् ! हम एक गुणवाले तथा आप अनेक गुणवाले हैं रघुवंशियों, ब्राह्मण, देवता तथा स्त्रीपर बास्त्र नहीं उठता ॥ ३५४॥ मैंने और इन सबने आपके चरणोंमें आत्म अर्पण कर दिया है। आप जैसा चाहें वैसा करें। यदि चाहें तो मार डालें परन्तु मैं ब्राह्मणके साथ युद्ध कदापि नहीं करूंगा ॥ ३५५॥ रामके ऐसा कहनेपर क्षत्रियोंके नाशका उद्योग जामदग्न्य (परशुराम) को देख डरकर पृथ्वी कांपने लगी। चारों ओर अन्धकार छा गया तथा सातों समुद्र क्षुभित हो उठे। तब दशरथपुत्र वीर रामने श्री परशुरामको प्रत्यक्ष देखकर उनके हाथसे धनुष लाग लिया और दोनों चढ़ा तथा भाथेमेंसे बाण निकाल और उसपर चढ़ा तथा बलपूर्वक खींचकर भार्गव परशुरामसे कहने लगे हे ब्रह्मन् ! मेरी बात सुनिए और मुझे लक्ष्य बताइए। मेरा बाण खाली नहीं जा सकता ॥ ३५६-३५६ ॥ शीघ्र ही मुझ वा सो लोकोंको बिद्ध करनेकी आज्ञा दीजिए अथवा अपने दी चरणोंको। रामके इस वचनको सुनकर विकृतमुख होते हुए परशुरामन पूर्व वृत्तान्तको स्मरण करते हुए कहा-हे राम हे राम ! हे महाबाहो! मैं आपको जगत्की उत्पत्ति, स्थिति तथा प्रलयके कारणस्वरूप पुराणपुरुष साक्षात् परमेश्वर विष्णु समझता हूँ। बचपनमें मैन गोमतीतीर्थमें जाकर शार्ङ्गधनुर्धारी विष्णुभगवान्‌को जिनके एक अंशसे मैन संसारका भूभार हरण करने तथा कार्तवीर्यको मारनेके लिए अवतार लिया है, उन्हें अपने रूपसे प्रसन्न किया। तब प्रसन्नमुख होकर शंखचक्रगदापद्मधारी उन देवाने मुझसे कहा ॥ ३६०-३६५ ॥ श्री भगवान् बोले- हे ब्रह्मन् ! तप करना छोड़कर तू उठ खड़ा हो। मैंने तेरे तपोबलको जान लिया है। मेरे चिदंशस युक्त होकर तू हैहयश्रेष्ठ तथा अपने पिताको मारनेवाले कार्तवीर्यको मार। जिसके लिए तूने तपका परिश्रम किया है। बादमें इक्कीस बार क्षत्रियसमुदायका नाश करके समस्त पृथिवी कश्यपको दान देकर शान्त हो। पश्चात् त्रेतायुगमें मैं अविनाशी दाशरथी राम होकर उत्पन्न होऊँगा। तब तू परम भक्तिसे मुझे देखेगा। उस समय मैं तुझे दिया हुआ अपना तेज लौटा लूँगा ॥ ३६६-३६६ ॥ तदनन्तर ब्रह्माने एक दिन तक तू तप करता हुआ संसारमें