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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः २ ] यागकाण्डम् २१५

सर्गः २ ] यागकाण्डम् २१५

ऊर्ध्वपादश्चोर्ध्वनेत्र और्ध्वस्यस्त्रिशिखास्तथा । वृद्धगौतममान्धाव्य पर्णादश्चन्द्रसंज्ञकः ॥३०॥
ऋष्यशृङ्गो मतङ्गश्च जाबालिः कुम्भसंभवः । दधीचिः शौनकः सूतः सुमन्तुश्च लोमशस्तथा ॥ ३१ ॥
वाल्मीकिश्चापि दुर्वासा मुनिर्वेदनिधिर्महान् । एते चान्ये च मुनयः स्वाशिष्यतनयादिभिः ॥३२॥
केचित्पर्णाशनाः केचिद्वायुभक्षास्तथाऽपरे । कुशाग्रजलपानाश्च केचित्त्यक्ताशनास्तथा ॥ ३४ ॥
भिक्षाशनास्तथा केचित् पादसाधनाः परे । अयाञ्चाव्रतिनः केचिन्नोक्तसंभाषणाः परे ॥३५॥
केचिद्वल्कलसंवीताः केचित्काषायवासिणः मृगचर्मधराः केचित् केचिदाकाशावासिणः ॥३६॥
वृक्षपत्रवस्त्राश्च केचित्पञ्चाग्निसाधकाः । धूमपानव्रताः केचित् केचित्त्यक्तेषणाः परे ॥३७॥
एवं नानावनागमंगिग्दिग्देशान्तरादिषु । रामिनस्ते समायाताः सदारश्च सबालकाः ॥३८॥
सशिष्या रामचन्द्रस्य द्रष्टु यज्ञोत्सवं वरम् दशदिग्भ्यो मुनिश्रेष्ठाः कोटिशश्च दिने दिने । ३९.
तान्सर्वान् रामचन्द्रोपि प्रत्युत्थानासनादिभिः । मधुपर्कादिपूजाभिरतोषयाम्यम् सादरम् ॥४०॥
यज्ञवाटे महारम्ये कामधेनुं शुचन्तः पूजयामास विधिवत्सर्वसम्पन्नपि ॥४१॥
सुवर्णशृंगभूषाभिः किंकिणीनूपुरादिभिः । एव ता शोभयित्वाऽथ प्रार्थयामास राघवः ॥४२॥
धेनो सागरसम्भुते त्वमन्नानि द्विजादिकान् दानमहैंस्त्वमध्वरे मे प्रसीद जगदम्बिके ॥४३॥
एवं संप्राथ्यं तां कामधेनु रामः प्रणम्य च बबन्ध पाकशालायां पट्टकूलामनोपरि ।४४॥
अथ सा सुरभिस्तुष्टा षड्रसाश्नानि सादरम् ददौ जनकनन्दिन्यै सा देवान्पद्मकर्मणि ॥४५॥
नाग्निकार्यं च तत्रासीत् पाकशालासु चैकता । इच्छाशनेः सदा पुष्टा बभूवुर्मुनिपुंगवाः ॥४६॥


भृगु भार्गव बृहस्पति, पौष्य, कण्व एकाद, त्रिपाद, ऊर्ध्वपाद ऊर्ध्वनेत्र ऊर्ध्वस्य, त्रिशिखा वृद्धगौतम, पर्णाद, चन्द्रसंज्ञक, । ३० । ३१ ॥ ऋष्यशृंग, मतङ्ग, जाबालि, अगस्त्य, दधीचि, शौनक, सूत सुमन्तु, लोमश, वाल्मीकि दुर्वासा ये एकसे एक विद्वान मुनिगण तथा और भी कितने ही ऋषि अपनी स्त्री-पुत्रों तथा शिष्योंके साथ आज आ रहे थे ॥ ३२ । ३३ ॥ उनमें बहुतसे ऐसे थे, जो केवल पत्ते खाकर रहते थे। कोई वायु पीकर रहते थे। कोई कुशक अग्रभागमें जल लेकर पीते और उसस काल यापन कर रहे थे । कुछ ऐसे थे जो जिन्होंने भोजनको त्याग ही दिया था ॥ ३४ ॥ कुछ ऋषि भिक्षान्न खाते थे, कोई दूसरेके हाथसे भोजनको करते थे (अपने हाथसे आग नहीं छूते थे) और कितने ही ऐसे थे जो किसीसे माँगना पसन्द नहीं करते थे। कोई कोई तो किसीसे सम्भाषण ही नहीं करते थे ॥ ३५ ॥ कुछ मुनि वल्कल वस्त्र पहनते हुए थे कोई गेरुआ कपड़ा धारण किये थे, कोई मृगचर्म पहने थे और कोई दिगम्बर (नंगे) थे ॥ ३६ ॥ कुछ महर्षि वृक्षके पत्तोंसे शरीर ढके हुए थे, कोई पंचाग्नि तापनेवाले थे, कोई धूम्रपान (गाँजेऔर चरस) का यत्न किये थे और कोई-काई ऐसे थे, जिनकी सब प्रकारकी इच्छाएं समाप्त हो गयी थीं ॥ ३७॥ इसी प्रकार कितने ही अङ्गों वनोंको पर्वतों, किन्हीं और आश्रमोंके निवासी ऋषि अपनी स्त्री तथा बच्चोंके साथ वहाँ आ पहुंचे थे । ३८ ॥ रामचन्द्रके उस अश्वमेध यज्ञको देखनेके लिए दशों दिशाओंसे करोड़ों ऋषि इसी तरह अपने शिष्यादिकोंके साथ वहाँ प्रतिदिन आ रहे थे। रामचन्द्र भी उनका प्रत्युत्थान आसन, मधुपर्कादिसे पूजन तथा आदर करते थे ॥ ३९ ॥ ४० ॥ उसी यज्ञभूमिमें रामचन्द्रजी विधिवूवर्क अनेक वस्त्रों और आभूषणोंसे कामधेनुका पूजन किया। उसकी सींगे सोनेसे मढ़ाईं तथा किंकिणी और नूपुर आदि पहनाये। इसी तरह उसको अलंकृत करके रामचन्द्रजीने प्रार्थना की—॥४१ ॥ ४२ । हे क्षीरसागरसे उत्पन्न होनेवाली कामधेने तुम हमारे अतिथिरूपमें आये हुए ब्राह्मणों को अन्नादिक दानसे तृप्त रखना। हे जगदम्बिके ! तुम मेरेपर प्रसन्न होओ ॥ ४३। इस प्रकार विनती करके एक गलीचा बिछाकर भोजनशाला (रसोईघर) में ले आकर कामधेनुको बाँध दिया । ४४ । इसके पश्चात् उस सुरभीने प्रसन्न होकर आदरपूर्वक छहों रसके अन्न सीताको दिये । उससे पाकशालामें न तो कोई भट्ठी जलती थी और न कोई पदार्थ बनाया जाता था। लेकिन

२१६ आनन्दरामायणे [ सर्ग २

यन्त्यान्कामान् रामचन्द्रश्चिन्तयामास चेतसि । तांस्तानुभौ मणी शीघ्रं कल्पयामासतुर्द्रुतम् ॥४७॥
यथार्थान्ताऽपि यान् कामांश्चिन्तयामास चेतसि। कामधेनुर्ददौ तांस्ताञ्छीघ्रं त्रैलोक्यदुर्लभान् ॥४८॥
सर्वत्र यज्ञवाटे हि द्विजार्यैश्च समन्ततः। पङ्क्तिषु भूमिजादीनां परिवेषणकर्मणि ॥४९॥
स्त्रीणां कङ्कणनादश्च शुश्रुवे नूपुरध्वनिः। अथ रामश्च सौमित्रिं समाहूयेदमब्रवीत् ॥५०॥
सीमाचारान्समाहूय मम वाक्यञ्च सादरम् । आज्ञापयस्व शीघ्रं त्वं शासनं यन्मरोच्यते ॥५१॥
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थोऽश्रमी यतिः। यःकश्चिद्याममायाति पथिकः स समाज्ञया। ५२॥
निवारणीयो युष्माभिर्न कदाप्यध्वरे मम। ममाज्ञां न प्रतीक्षध्वं कोपः कार्यो न कस्यचित्। ५३॥
इति रामवचः श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स लक्ष्मणः। सीमाचारान समाहूय राघवोक्तं न्यवेदयत् ।५४॥
ततो रामः पुनः प्राहः समाहूयाथ लक्ष्मणम्। ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थाश्रमी यतिः। ५५॥
मुनीनां दायिनां दाराः शिष्याः सम्बन्धिनास्तथा। पौरा जानपदाश्चास्तु तेषां संबधिनः स्त्रियः ॥५६॥
दासीदासजनाः सर्वे यद्यद्वाञ्छन्ति लक्ष्मण। मामपृष्ट्वा तु सर्वेषां दातव्यं ह्यविचारितम् । ५७॥
अन्त्यजावधि सर्वान्हि तोषयस्व निरन्तरम् । न केषामभिलाषा च विफला हि विधीयताम् ॥५८॥
अयोध्यां कामधेनुं च जानकीं कौस्तुभं मणिम् । चिन्तामणिं पुष्पकं च राज्यं कोशादिकं च मे ॥५९॥
एतेष्वपि च यो यद्वै याचयिष्यति तन्नया। न दत्तं चेति वै श्रुत्वा ममानोषो भविष्यति ॥६०॥
अतो ज्ञात्वा भयं मत्तो दत्तस्व ह्यविचारत। याञ्चाभङ्गः कृतश्चेद्धि मन्छिरोद्रोहो भविष्यति ॥६१॥
सदा स्मर शिरं मे त्वमिमां लक्ष्मण सादरम्। इति रामकृतां शिक्षाङ्गीकृत्य स लक्ष्मणः ॥६२॥
तथा चकार तत्सर्वं यथा रामेण शिक्षितम् ॥६३॥
इति श्रीमन्महीपतिरामचरितान्तर्गतश्रीमदानन्दरामायणे यागकाण्डे
लक्ष्मणाज्ञाकरणं नाम द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥

वहाँपर आये हुए सब ऋषि इच्छ भोजन कर करके प्रसन्न हो रहे थे । ४५ । ४६ ॥ जिन जिन वस्तुओंको राम-
चन्द्रजीने अपने मनमें चाहा उन सबको उनके दो मणियों (कौस्तुभमणि तथा चिन्तामणि) ने बातकी बातमें
पूर्ण कर दिया ॥ ४७॥ इसी तरह सीताजीने जो कुछ चाहा, सो कामधेनुने त्रैलोक्यकी दुर्लभ वस्तुओंको भी
देकर उनकी इच्छा पूरी की । यज्ञभूमिके चारों ओर जब ब्राह्मणोंक मण्डली भोजन करनेके लिए बैठती थी
और स्त्रियाँ उनका भोजन परोसनेके लिए आती थीं तब उनके भूषणोंकी मधुर ध्वनि सुनायी देती थी। इसके
तदनन्तर रामचन्द्रजीने लक्ष्मणको बुलाकर इस प्रकार समझाया - । ४८। ४९॥ ५०॥ हमारे यज्ञभूमिके आस-
पास रहनेवाले निवासियोंको सादर बुलाकर हमारी तरफसे यह समझा दो कि आश्रम लेकर जो कोई
ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ सन्यासी मुनियोंके पण्डितों, उनके वस्त्र, शिष्य सम्बन्धी, पुरवासी, देशनिवासी और
उनके सम्बन्धी, जो कोई यहाँ आ जाय, उसे कोई न रोके । उसका सत्कार करनेके लिए मेरी आज्ञाकी प्रतीक्षा
करनेकी कोई आवश्यकता नहीं है ॥ ५१-५३ ॥ रामचन्द्रजीके आज्ञानुसार लक्ष्मणजीने सब आस-पासके
निवासियोंको जाकर समझा दिया। कुछ देर बाद रामचन्द्रजीने फिर लक्ष्मणको बुलाकर कहा कि मुनियोंकी
स्त्रियों तथा बच्चों आदिको अथवा दास दासियोंको जिस किसी वस्तुकी आवश्यकता हो, वह बिना मुझसे पूछे
उनके इच्छानुसार देते जाओ ॥ ५४-५७॥ चाण्डालसे लेकर विप्रतक प्रत्येक प्राणीको सन्तुष्ट करो। किसी को
किसी प्रकारका कष्ट न होने पाये। किसीकी कोई अभिलाषा विफल न हो। अयोध्या, कामधेनु, सीता,
कौस्तुभमणि पुष्पक विमान, राज्य तथा कोशादिक इन सब वस्तुओंको भी देनेसे यदि तुमने इनकार किया
तो मैं तुम्हारे ऊपर बहुत नाराज होऊँगा। इसलिए मेरे क्रोधसे डरते हुए बिना किसी प्रकारका विचार
किये सब अभ्यागतोंको उनकी अभिलषित वस्तुएँ देते जाओ। तुम किसीकी माँग खाली करोगे
तो तुम्हें मेरा सिर काटनेका पातक लगेगा ॥५८-६१॥ हे लक्ष्मण ! सदा मेरी इन बातोंका ख्याल