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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः २४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) [ ५४९

सर्गः २४ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) [ ५४९


यतयो वन्दनीयाश्चभोजनीया गृहे गृहे । यतये कमण्डलवः कौपीनं पादुकां तथा ॥१२०६॥
वंशदण्डाः सदा देयाः सदा तोष्याः सुकाषवैः ।
न खेदयेच्च स्त्रीयां दिन निद्रां न कारयेत् ॥१२०७॥
हविदिन्यां न भोक्तव्यमुपोष्या च चतुर्दशी ।
कृष्णपक्षस्य तस्यां रात्रौ कार्यं शिवान्नम् ॥१२०८॥
नानामहोत्सवाद्यैश्चयथाविधिपुरःसरम् । अष्टमी कृष्णपक्षस्य यशोदाप्या शुभा तिथिः ॥१२०९॥
देवालयेषु कर्तव्याबलयो भक्तिपूर्वकः । नानप्रकारान्नवेद्यान्देवेभ्यश्च समर्पयेत् ॥१२१०॥
धेनुदानं वाजिदानंगजदानं प्रकारयेत् । भूसुरेभ्यः प्रदेयानि गृहदानानि सादरम् ॥१२११॥
गेहे गेहे सदा कार्यं धेनुविप्रप्रपूजनम् ।
वसन्ते चन्दनं देयं छत्राणि व्यजनानि च ॥१२१२॥
पानकं जलकुंभांश्चकार्यं पादावनेजनम् । दधि तक्रं हि जंबीरं देयं विप्रेभ्य आदरात् ॥१२१३॥
कार्त्तिके दीपदानानिरात्रौ जागरणांनि च । तुलसीसेवनं धात्रीच्छायामाश्रित्य भोजनम् ॥१२१४॥
गीतनृत्यादिकरणं विष्णोग्रे निरन्तरम् ।
त्रिपुरारेः समीपे हि पौर्णिमायां हि कार्त्तिके ॥१२१५॥
करणायो महादाहोघृताक्तवर्त्तिकादिभिः । माघ देवानि काष्ठानि कम्बलांश्च त्रिजास्तथा ॥१२१६॥
चैत्रे तांबूलदानं चतथा रंभाफलानि च । उशीरकानि दयानि चन्दनं रवितक्रकम् ॥१२१७॥
आदर्शदानं कस्तूरीदानंजातीफलस्य च । एलाकर्पूरदानानि वपुषामपि प्रकारयेत् ॥१२१८॥
पदाऽग्रजं न स्पृशेच्चन पादं क्षेपयेत्परा । द्वाभ्यां कराभ्यां कूर्द्दान्तमस्तकस्य न कारयेत् ॥१२१९॥
दातव्यः करभारो हि विना विप्रेन्द्रपाय हि ।
नोपेक्ष्योयो राज्ञश्च अर्थदण्डः कदाचन ॥१२२०॥
माननीयाश्च श्वशुराःपोष्याः पाल्याः सदैव हि । सुहृदम्तोपर्णायश्च मित्रे कोपं न कारयेत् ॥१२२१॥

महात्माओंकी वन्दना की जाय और घर-घर भोजन कराया जाय । उन्हें कमण्डलु, कौपीन, चरणपादुका आदि दान दिया जाय ॥ १०६ ॥ उन्हें बाँसकी छड़ी भी दे और भठा मज्जा दातारू प्रसन्न करे । कभी कई अपनी स्त्रीको दुःखित न करे और दिनमें शयन न करे। एकादशका अन्नका आहार न करे और कृष्णपक्षकी चतुर्दशीका भी व्रत किया करे । उस रात्रिमें सांग उत्साहसे शिवजीका पूजन करे ॥ १२०७ ॥ १२०८ ॥ कृष्णपक्षकी अष्टमीका भी व्रत सब लोग किया करें। क्योंकि यह बड़ा शुभ तिथि है ॥ १२०९ ॥ देवालयोंमें भक्तिपूर्वक पूजन करके विविध प्रकारके नैवेद्य देवताम को समर्पित किये जायें ॥ १२१० ॥ लोग समय-समयपर धेनुदान, वाजिदान, गजदान आदि दान आदरपूर्वक ब्राह्मणोंको दिया करें ॥ १२११ ॥ घर-घरमें सदा गौओं तथा विप्रोंका पूजन होता रहना चाहिए । वसन्त ऋतुमें चन्दन, छत्र तथा पंखेका दान करें ॥ १२१२ ॥ पानी पीनेके लिये लोटा, जल भरनेके लिए घड़ा, पैर धोनेके लिए झारी, दही, मट्ठा और नींबूका दान ब्राह्मणोंको दे ॥ १२१३ ॥ कार्त्तिक मासमें दीपदान, रात्रिको जागरण, तुलसीका सेवा और आंवलेकी छायामें भोजन करे ॥ ११४ ॥ निरन्तर विष्णुभगवान्के सामने नाच-गायें। कार्त्तिकका पूर्णिमाको शिवजीके सामने घीमें भीगी बत्ती आदिका महादान करे । माघ मासमें लक्कड़ियों तथा वस्त्र, विरजै कम्बलोंका दान करे ॥ १२१५ ॥ १२१६ ॥ चैत्रमें ताम्बूल तथा केलेके फल दान करके अगर, चन्दन, दही और मट्ठा आदि दे ॥ १२१७ ॥ वैशाखके महीनेमें शीशा, कस्तूरी, जायफल, इलायची तथा कपूरका दान करे ॥ १२१८॥ पैरसे बड़े भाईको न छुए पैरसे पैर न रगडे, दोनों हाथोसे सिर न सुहलाये ॥ १२१९ ॥ ब्राह्मणके अतिरिक्त सब लोग राजाको राजकर देते रहें । राजाके दिये दण्डकी उपेक्षा न करे ॥ १२२० ॥ अपने-अपने श्वशुरकी इज्जत करे

५६० आनन्दरामायणे [ सर्गः २४

न कर्तव्यो रिपूणां च विश्वासश्च कदाचन ।
कार्पण्यं नैव कर्तव्यं दानकर्मसु सर्वदा ॥१२२॥
न द्यूतेन क्वचित् कार्यो क्रीडा दारिद्र्यसूचिनी ।
न श्रोतव्या कदा वार्त्ता मद्यानां च नरोत्तमैः । १२३
तीर्थयात्रा सदा कार्या कृच्छ्रकृच्छ्रादि ममाचरेत् । कार्यं लिंगार्चनं नित्यं कोटिलिङ्गानि श्रावणे ॥१२४॥
कर्त्तव्यानि नरोत्कन्या मठेष्वाप च कारयेत् । लघुरुद्रान्महारुद्रानतिरुद्रान्ममादरेत् ॥१२५॥
दानानि पुस्तकनां च कर्तव्यानि निरन्तरम् ।
कीर्तनानि च कार्याणि देवगारेषु वा गृहे ॥१२६
साधूनां पूजनं कार्यं नमस्कार्यः सदा रविः । ग्रामे ग्रामे वायुपुत्रप्रतिमाः सर्वदा पृथक् ॥१२७॥
सिन्दूराक्ताश्च तैलाक्ताः पूजनीया निरन्तरम् । चतुर्थ्यां गणराजस्य पूजनानि प्रकारयेत् ॥१२८।
अपयेद्गणराजाय मोदकान्पूलपूरितान् ।
पञ्च खाद्यानि सिंदूरदूर्वादिन्यर्पयेन्मदा ॥१२९॥
सदाऽऽत्मचर्चा कर्त्तव्या स्तोत्रपाठान्प्रकारयेत् ।
गीतायाः पठनं वेदानध्यापयेन्मदा । १३०।
सदैव शान्तिसूक्तानि पुण्यसूक्तान्यनेकशः । पुण्यं पुरुषसूक्तं च श्रीसूक्तादीनि वै पठेत् ॥१३१॥
सदा धर्मे मतिः कार्या कार्यों धर्मस्य संग्रहः । दुष्टबुद्धिः सदा त्याज्या पातकं परिमार्जयेत् । १३२।
ज्ञातव्यं चपलं चायुः क्रूरो ज्ञेयो यमो महान् ।
दारुणा नारकी पीडा स्मर्त्तव्या हृदि सर्वदा ॥१३३॥
गतस्तातो मृता माता गतश्च प्रपितामहः । पितामहो गतश्चेति गमनं स्वं निरीक्षयेत् ॥१३४।
गतं यथाऽत्र बालित्वं तारुण्यं च गतं यथा ।
यथा गच्छति वार्द्धक्यं स्मरेच्चै यमशासनम् ॥१३५।

और नौकरोंका सदा पालन करता रहे । अपने कलत्राणको प्रसन्न रक्खे । मित्रपर कोप न करे । १२१ ॥ कभी भी शत्रुपर विश्वास न करे और दानादि कर्मोंमें कभा कृपणता न करे । कभा जुआन खेले । क्योंकि यह दरिद्रता-को पास बुलानेवाला रोग है । अच्छे लोग कभी भांगकी बात भी न सुनें ॥ १२२ ॥ १२३ ॥ सदा तीर्थों की यात्रा करे और कभी कभी कृच्छ्रचान्द्रायण आदि व्रत भा किया करे । प्रतिदिन शिवलिंगका पूजन करे और श्रावणम, सम एक करोड़ शिवलिंग बनाकर उनकी पूजा करे ॥ १२४ ॥ बन पड़े तो सदा ऐसा करे । लघुरुद्र, महारुद्र एवं अतिरुद्र इन तीनों यज्ञोंको बराबर करता जाय ॥ १२५ ॥ निरन्तर पुस्तकदान करे । घरमें अथवा देवालयमें जाकर प्रतिदिन कीर्तन करे ॥१२६॥ सब काल साधुओंका पूजन और प्रतिदिन सूर्यको नमस्कार करे । गाँव-गाँवमें हनुमान्जीकी मूर्तियाँ रक्खा जायें । १२७ ॥ तेलमें मिला सिन्दूर लगाकर नित्य उनकी पूजा की जाय । प्रत्येक चतुर्थी तिथिको गणेशजी का पूजन किया जाय । १२८ ॥ मोदक तथा पूरनपूरी आदि पकवान बनाकर गणेशजीको अर्पण करे और सिन्दूर-दूर्वा आदि भी चढ़ाये । १२९ ॥ प्रतिदिन आत्मज्ञान-सम्बन्धी चर्चा, स्तोत्रपाठ, गीताका अध्ययन तथा वेदोंका अध्ययन-अध्यापन करता रहे ॥ १३० ॥ नित्य शान्तिसूक्त तथा श्रीसूक्त आदिका पाठ किया करे ॥ १३१ ॥ सदा अपनी बुद्धि धर्ममें स्थित रक्खे और धर्मका संग्रह करता चले । दुष्ट बुद्धिका परित्याग करे और किये हुए पापोंसे छूटनेका उपाय करता रहे ॥ १३२ ॥ आयुको चंचल तथा यमराजको महाक्रूर समझे । नरककी दारुण पीड़ाओंका सदा स्मरण करता रहे ॥ १३३ ॥ यह सोचता रहे कि पिताजी चल गये, माता मर गयी, पितामह और प्रपितामह भी चल बसे, अब हमारी बारी है । जिस तरह बाल्यकाल गुजर गया, तरुणाई बीत गयी, उसी तरह यह बुढ़ा-