श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ६१५
सर्गः १ ] मनोहरकाण्डम् ६१५
प्रत्यहं धर्मघटको वस्त्रसंवेष्टिताननः । ब्राह्मणस्य गृहे देयः शीतलामलजलः शुचिः ॥६१॥
ताम्बूलफलवान्द्रव्यैश्च दक्षिणाभिः समन्वितः । एष धर्मघटो दत्तो ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः ॥६२॥
अस्य प्रदानात्सफलाः सर्वे सन्तु मनोरथाः । अनेन विधिना यस्तु धर्मकुम्भं प्रयच्छति ॥६३॥
गयादानफलं सोऽपि प्राप्नोर्नाह न संशयः । तृतीयायां चैत्रशुक्ले सीतारामौ प्रपूजयेत् ॥६४॥
कुंकुमागुरुकर्पूरमणिवस्त्रसुगन्धकैः । स्रग्गंधैर्धूपदीपैश्च दमनेन विशेषतः ॥६५॥
आदोलयेत्ततः सीतारामौ च दोलकस्थितौ । वसन्तमभ्यासाद्य तृतीयायां द्विजोत्तम ॥६६॥
सौभाग्याय तथा स्त्रीभिः सौभाग्यशयनव्रतम् । कार्यं महोत्सवेनैव सुख पुत्रसुखेप्सुभिः ॥६७॥
विशेष चात्र वक्ष्यामि तृतीयायां द्विजोत्तम । तृतीयायां तु नारीभिः शुक्लपक्षे मधौ शुभे ॥६८॥
स्नात्वा मृण्मयदुर्गं हि कार्यं चित्रविचित्रितम् । तत्राष्टादश धान्यानि वापयेत्तदनन्तरम् ॥६९॥
पुष्पवृक्षांस्तृभांश्चैव वापयेत्सर्वतस्ततः । जयन्त्राणि ह्यपाराणि चित्राण्यपि विलेखयेत् । ७०॥
तूर्वद्द्वाराणि कार्याणि पूर्ववन्मण्डपादिकम् । यथा श्रागमपूजायामुक्तं तद्वत्प्रकारयेत् ॥७१॥
दुर्गोपरि घटं स्थाप्य सजलं पुष्पगन्धितम् । दोलकं च ततो न्यस्य घटपृष्ठे महच्छुभम् ।७२॥
कार्या राजती मूर्तिः सीतायाः परिकल्प्य च । रामस्यापि शुभां मूर्तिं कृत्वा तौ पूजयेत्ततः । ७३॥
दोलकोपरि संस्थाप्य मासमेकं प्रपूजयेत् । केचिच्छिवस्य पार्वत्या शिवेन च प्रपूजनम् ॥७४॥
वदन्ति ह्यत्रयस्तत्र निर्णयं शृणु वक्ष्यते । रामस्य हृदयं शंभुः श्रीरामो हृदयं स्मृतः ॥७५॥
शंकरस्य तथा गौरीहृदयं जानकी स्मृता । जानक्या हृदयं गौरी द्विधा नैवास्ति कर्हिचित् ।७६॥
रामस्य च शिवस्यापि सीतागिरिजयोस्तथा । ये मानयति वै भेदं तेषां वासस्तु रौरवे ॥७७॥
अतश्चैत्रतृतीयायां सीतारामौ प्रपूजयेत् । अशक्तौ ताम्रजे मूर्ती कार्ये वा काष्ठनिर्मिते । ७८॥
घड़ा बाँधकर जलधारा देनेका प्रबन्ध करे ॥ ६० ॥ उन दिनों प्रतिदिन एक घड़ेमे ठण्डा और निर्मल जल भरके उसका मुंह कपड़ेके बाँधकर ताम्बूल, फल, द्रव्य तथा दक्षिणा आदिके साथ किसी सुपात्र ब्राह्मणके घर दे आया करे। यह कहा। 'विष्णुशिवमयं घटदान करमम मेद सब मनोरथ सफल हो जायें। दान करते समय यह कहना नाय । जा प्राणी इस रीतिम धर्मकुम्भका दान करता है, उस गयादानका फल प्राप्त होता है। इसमे कुछ संशय नहीं है ॥ ६१-६४ ॥ चैत्र शुक्लपक्षकी तृतीयाको कुमकुम, अगरु, कर्पूर, मणि, वस्त्र तथा सुगन्धित मालाश्री विशेषकर दमनकक फूलसे सातरामका पूजन करे ॥ ६५.। इसके बाद झूलेपर बिठाल-कर झूला झुलावे। जिनका पुत्रसुख आदि पाना हो, व स्त्रियां वसन्तमासमे लेकर तृतीया तक एक महात् उत्सवके साथ सौभाग्यशयन व्रत करे ॥ ६६ ॥ तृतीयाम कुछ विशेषतायें है, सो तुम्हे बतलाता हूँ। उस चंतशुक्लकी तृतीयाको स्नान करक मिट्टीका एक चित्र-विचित्र दुर्ग बनावे । उसम अट्ठारह प्रकारके धान्य बोये। वहींपर अच्छे-अच्छे फूलोंके वृक्ष लगाय और उसम नाना प्रकारके उपयन्त्रोंकी रचना करे । ६७-७० ॥ उस दुर्गमें पहलेकी तरह मण्डप आदि बनाये। जैसा कि पहले श्रीरामपूजाके प्रकरणम बतला आये हैं ॥ ७१ । उस दुर्गके ऊपर जलसे पूर्ण और पुष्पसे गुम्फित घटका स्थापन करे। घटके पाछे झूला रखकर सुवर्ण या चांदो-की सीताजीको मूर्ति बनवाये और रामचन्द्रजीकी भी सुन्दर प्रतिमा बनवाकर दोनोंकी पूजा करे। इस प्रकार झूलेपर बिठालकर एक मास तक पूजन करे । हे शिष्य पार्वताजीके साथ शिवजीकी पूजा करे, कुछ लोग ऐसा कहते हैं। अब इस विषयका निर्णय मुझसे सुनता हूँ। रामचन्द्रजी शिवजीके हृदय है और शिवजी राम-के हृदय है ॥ ७२-७५ ॥ उसी तरह गौरी सीताजीका हृदय है और सीताजी गौरीका हृदय हैं। इन दोनोंमें कोई अन्तर नहीं है ॥ ७६ ॥ राम, शिव और सीता तथा गिरिजामे जो लोग किसी प्रकारका भेदभाव मानते हैं, वे रौरव नरकमें बास करते हैं ॥ ७७ ॥ इसीलिये चैत्रकी तृतीयाको सीतारामका पूजन करना चाहिए । यदि सामर्थ्य न हो तो सुवर्ण या चाँदीकी प्रतिमा न बनवाकर ताम्र अथवा काष्ठकी बनवाये ॥ ७८ ॥
| ३६६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ९ |
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पाषाणनिर्मिते चापि मूर्तौ कार्यं यथामुखम् । प्रत्यहं मङ्गलद्रव्यैः सर्वैस्त्रीभिः प्रपूजनम् ॥७९॥
मासमेकं तु नारीभिः स्नानं वै शीतलाभिधम् । अवश्यमेव कर्तव्यं सीतातीर्थे विशेषतः ॥८०॥
यत्र यत्र रामतीर्थं तस्य वामेऽवनिस्तले सीतातीर्थं तत्र तत्र ज्ञेयं सीताकृतं शुभम् ॥८१॥
चैत्रशुक्लतृतीयायामारभ्य सम्यगङ्गना । यावत्तृतीया वैशाखशुक्ला तावन्निरन्तरम् ॥८२॥
शीतलामन्त्रक स्नानं स्त्रीभिः सीताप्रेमचरेत् चैत्रशुक्लतृतीयायामक्षयायां तथापि च ।८३।
तृतीयायां तु नारीभिस्स्नानस्य प्रशस्तस्तत् अन्यत्र दिवसे स्त्रीभिस्स्नानौघं न शस्यते ।८४।
प्रत्यहं चोत्सवाः कार्याः सीतातार्थे पुनः शुभैः सुवासिनीपूजनं च कार्यं भक्त्या दिने दिने । ८५ ।
सुवासिनीनां देयानि वायनानि शुभानि च । निरन्तर पूजनाथै यदि शक्तिर्न विद्यते ८६
तदा कार्यं चैकदिने सुभगार्ना प्रपूजनम् । सुवासिनीनां देयं हि प्रत्यहं भोजनं परम् ॥८७
नानापक्वान्नसंयुक्तं घृतपायससंयुतम् अलङ्कारश्च वस्त्राणि रुच्यर्थादि च यत्सुखम् ॥८८
भर्तुरायुरभिवृद्ध्यर्थं नारीभिर्देयमुत्तमम् । एवं मासन्तु यान्यास्ते शीतलास्नानमुत्तमम् ॥८९
अक्षयायां तृतीयायां पूजयित्वा विशेषतः त्रिंशत्सुवासिनीभ्यश्च दद्याद्भोजनादिकम् ९०॥
सुरुपन्नि निजां पूज्य दत्त्वे वस्त्रं विमर्जनम् एष मासो वरः प्रोक्तः प्रशस्तश्च द्विजोत्तम । ९१।
अन्वीदृक्षं च तत्सर्वं मयाग्रे शृणु चेतसम् । अथातः कुल कामिस्तु चैत्रशुक्लष्टमीदिने ९२।
सीतारामा प्रजार्यन्त्वा महासंतपतारकम् अशोककलिकाश्चाष्टौ ये पिबंति पुनर्वभौ ॥९३।
चैत्रे मासि सिताष्टम्यां न ते शोकमवाप्नुयुः । त्वामशोककराभीष्टं मधुमाससमुद्भवम् ९४।
पिबामि शोकमंदमो मामशोकं सदा कुरु। पुनर्वसुयुधोपेता चैत्र मासि मिताष्टमीम् ॥९५॥
आवश्यकता पड़नेपर पत्थरकी प्रतिमा बनवाया जा सकता है । उस तरह मूर्ति बनाकर गुप्तपूर्वक विचित्र मङ्गलमय द्रव्योंसे स्त्रियोंके साथ पूजन करे ॥७९॥ एक महीना स्त्रियोंके साथ शीतला नामक स्नान करे । और माहात्म्यीय जानकर स्नान करे तो विशेष अच्छा है ॥८०॥ जहाँ जहाँ रामतीर्थ है वहाँ-वहाँके रामके वामभागमें सीताका स्थान सनातन से ही विद्यमान रहता है ॥८१॥ चैत्र शुक्लपक्षकी तृतीया-से लेकर जबतक वैशाखका अक्षय तृतीया न आये, तबतक निरन्तर सीतातीर्थमें जाकर शीतलास्नान करे ॥८२॥ स्त्रियोंको चाहिये कि सीताजीको प्रसन्न करनेके लिए स्नान करे । चैत्र शुक्लपक्षकी तृतीया तथा अक्षय तृतीयाको स्त्रियोंको नाके स्नानका नेमधारण करना चाहिए । इसके सिवाय और किसी रोज स्त्रियोंके साथ बैठके स्नानका विधान नहीं है ॥८३ ॥८४॥ प्रतिदिन स्नानके साथ-साथ सीताके स्तुति तरह-तरहके उत्सव करना चाहिए । नित्य भक्तिपूर्वक स्त्रियोंका पूजन करना भी श्रेयस्कर है ॥८५॥ सुहागिन स्त्रियोंको इन दिनोंमें वायना देना भी उचित है । यदि निरन्तर पूजन करनेकी सामर्थ्य न हो तो केवल एक ही दिन सोहागिन स्त्रियोंका पूजन करे और बहु विविध पक्वान्न युक्त अच्छा-अच्छा भोजन कराये ॥८६॥८७॥ नाना प्रकारके वस्त्र आभूषण आदि भी वे स्त्रियाँ अवश्य दिना करें, जो अपने पतिकी आयुवृद्धि करना चाहती हों । इस तरह एक महीना शीतलास्नान करनेके बाद अक्षय तृतीयाको विशेष रीतिसे पूजन करके तीस सुहागिन स्त्रियोंको नाना प्रकारके भोजन अन्य आदि दे ॥८८-९०॥ इसके बाद अपने गुरुकी पत्नीका पूजन करके उसे भी वस्त्र-आभूषण आदि प्रदान करे । हे द्विजोत्तम ! इस तरह मैंने तुम्ह स्त्रियोंके लिए एक मासका व्रत बतलाया । ९१॥ अब मैं कुछ विशेष बातें बतलाता हूँ, सो सुनो। चैत्रशुक्ल अष्टमीको अशोककी कलियोंसे सीता और रामका पूजन करके जो लोग आठ अशोककी कली पीसकर पुनर्वसु नामक नक्षत्रमें पीते हैं, उन्हें कभी किसी प्रकारका शोक नहीं करना पड़ता । उस कलीका पान करते समय "त्वामशोककराभीष्ट" इस मन्त्रका पाठ करते रहना चाहिए । मन्त्रका अर्थ इस प्रकार है- हे अशोक ! तुम्हारा जैसा नाम है, उसी प्रकार तुम लोगोंको शोकरहित भी करते हो । इसी कारण चैत्रमासमें उत्पन्न तुम्हारी कलिकाका मैं पी रहा हूँ। तुम मुझे सदा शोकरहित किये रहना । जो लोग पुनर्वसु नक्षत्र तथा