श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १६ ] मनोहरकाण्डम् ७३५
सर्गः १६ ] मनोहरकाण्डम् ७३५
एतैश्चैव समायुक्तं किंकिणीनादनादितम् । संपादितेश्च सम्यग्वै धेनुं दद्यात्पयस्विनीम् ॥ ४ ॥
ब्राह्मणान् भोजयेत्पश्चात् शतमष्टोत्तरं सुधीः । एवं कृते विधाने तन्महाकाव्यं फलप्रदम् ॥ ५ ॥
रामायणं भवेन्नूनं नात्र कार्या विचारणा । यस्मिन् रामस्य संस्थानं रामायणमथोच्यते ॥ ६ ॥
एवं त्वया यथा पृष्टं मया सर्वं निवेदितम् ।
विष्णुदास उवाच
किञ्चिद्व्रतं हनुमतस्त्वं मां वक्तुमिहार्हसि ॥ ७ ॥
श्रीरामदास उवाच
यदा रामस्त्रिकूटाद्रौ नागपाशैस्तु पीडितः । नारदस्य वचः श्रुत्वा सस्मार विनतासुतम् ॥ ८ ॥
तदाऽसौ काश्यपो वीरः समागम्य रणांगणे । प्रणाममकरोत्स्मै रामायामिततेजसे । ९ ॥
निवार्य यक्षणास्त्रं तन्मेघनादसमीरितम् । तुष्टाव रघुवीरं तं ससैन्यं च सलक्ष्मणम् ॥ १० ॥
उवाच प्रणिपत्याथ रामभद्रं खगेश्वरः ।
गरुड़ उवाच
आश्चर्यमिदमत्यन्तं यद्भवान्स्मरद्धि माम् । ११॥
सति वीरे महारुद्रे सगगे श्रीहनूमति सुग्रीवे च नले नीले सुषेणे जाम्बवत्यपि । १२।
अङ्गदे दधिवक्त्रे च तारे च साले तथा । मैंदे मनि महावीर्ये किं मेऽत्रास्ति प्रयोजनम् ॥ १३।
श्रीराम उवाच
भवद्भीतिमुपागम्य विद्रुताश्च भुजङ्गमाः एतेषु सत्सु वीरेषु किमु सैन्यमपीडयन् ॥ १४॥
गरुड़ उवाच
रामदेव महाबाहो कपीनां चरितं शृणु । आत्मनोऽपि समाविष्टान्मा कुरुध्वात्र गर्हणम् ॥ १५।
साक्षात्त्वं भगवान्विष्णुर्लक्ष्मीस्तु जनकात्मजा । सौमित्रिः फणिराजोऽयं रुद्राश्च कपयः स्मृताः ॥ १६।
बुद्धिमान् मनुष्यको उचित है कि वह ४ । धोड़ो जुते और रेशमी पताकासे सुशोभित रथ कथावाचक के हाथको दान दे । विविध प्रकारसे अलंकृत गौका दान करे । इसके बाद एक सौ आठ ब्राह्मणोंको भोजन करावे । जो प्राणी आनन्दरामायण सुनकर ऐसा करता है, उसे इस महाकाव्यके श्रवण करनेका फल प्राप्त होता है । इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिए । जिसमें श्री रामचन्द्रजीका निवास हो, वही रामायण है अथवा जिसमें राम विद्यमान रहें, वह रामायण है । ३-६ । इस तरह तुमने मुझसे जैसा प्रश्न किया, मैंने उसका उत्तर दे दिया । विष्णुदासने कहा—हे गुरो! अब मुझे हनुमत्पुत्रका भी कुछ वृत्त बतला दीजिए ॥ ७ । श्रीरामदासने कहा—जिस समय राम त्रिकूट पर्वतपर नागपाशमें बँध गये थे, उस समय उन्होंने नारदके कथनानुसार गरुडका स्मरण किया । उसी समय गरुडजी वहाँ जा पहुंचे और उन्होंने संग्रामभूमिम भगवान्को प्रणाम किया ॥ ८ । ९ । तदनन्तर मेघनाद द्वारा प्रेरित नागपाशका निवारण करके समस्त सेना और लक्ष्मण सहित रामकी स्तुति की । फिर प्रणाम करके गरुडजी भगवान् रामचन्द्रजीसे कहने लगे—हे प्रभो ! यह सोचकर मुझे आश्चर्य होता है कि श्रीहनुमान्जीके रहते हुए भी मुझ दासको आपने स्मरण किया ॥ १० ॥ ११॥ हनुमान्जीके अतिरिक्त सुग्रीव, नल, नील, सुषेण, जाम्बवान्, अङ्गद, दधिवक्त्र, तार, तरल, मैंद आदि वीर थे। इन वीरोंके रहते हुए श्रीमान्को मुझे स्मरण करनेकी आवश्यकता क्यों पड़ी ? । १२ ॥ १३ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने कहा—आपके भयसे सब सर्प भाग गये, किन्तु ये लोग यहाँ रहकर भी स्वयं उनके पाशम बँध गये थे ॥ १४ ॥ गरुडजी बोले—मैं आपको वानरोंका चरित्र सुनाता हूं, सुनिए। यद्यपि यहाँ बहुतसे आत्मीय बानर बैठे हैं फिर भी मैं कहूँगा। इन लोगोंको चाहिए कि मेरी बातको अपनी निन्दाके रूपमें न मानें ॥ १५ ॥ आप साक्षात् विष्णु भगवान्
७४० आनन्दरामायणे [ सर्गः १६
सुग्रीवो वीरभद्रोऽयं शम्भुरेव स्मृतो नलः । विद्धि दाशरथे नूनं गिरिशो नील एव च ॥१७॥
महाद्यशाः सुषेणोऽयं जांबवांश्चाप्यजैकपात् । अहिर्बुध्न्यश्चगवदोऽप्यदधिवक्त्रः पिनाकधृक् ॥१८॥
अयुताजिद्वयं तारः स्थाणुश्च तरलो यमः । मैंदो भर्गस्तनुः साक्षान् हनुमान् भगवान् स्मृतः॥१९॥
अवतीर्णा महारुद्रास्त्वदर्थे रघुनन्दन अग्रतस् सर्वदेशेषु नानापर्वतसङ्घतः ॥२०॥
धृत्वा च कपिरूपाणि अवतेरुर्महातले । सर्वेऽपि कपितां प्राप्ताः कारणं तद्व्रवीमि ते ॥२१॥
पुरा देवासुरैः क्षिप्तोर्मथिता द्याधयोऽभवन् । नानापीडाकराः मर्त्या लूताविस्फोटकादयः ॥२२॥
तैरेव व्याधिभिः सर्वं पीडितं जगतीतलेम् । ऋषयोऽपि नृपालाश्च ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥२३॥
ऊचुश्च जगतां नाथ ब्रह्माणं कमलासनम् । त्राहि त्राहि जगन्नाथ व्याधिभ्यो जगतीमिमाम् ॥२४॥
पीडितां दारुणैर्दोषैर्ज्वररोगैश्च महोल्बणैः । त्रिदोषैर्जर्जरोभूतां विभ्रमैर्व्याकुलाकृताम् ॥२५॥
औषधानि न सिद्ध्यन्ति मंत्रयंत्राणि चैव हि । पीडयन्ति महारोगा मन्वानांनाशकारिणः ॥२६॥
एतत्ते कथितं सर्वं ब्रह्मन्त्वत्पुरतः सुधीः ॥२७॥
तत्तेषां वचनं श्रुत्वा रुद्रान्संप्रार्थयद्विधिः । तेऽपि श्रुत्वा ब्रह्मवाक्यं रुद्रा एकादशामलाः ॥२८॥
समाश्वास्य विरिंचि ते वीरभद्रादयः कपिः । बभूवु वानरस्तत्र सूर्य्यपुत्राद्या इमे । २९।
पर्यटन् पर्वताग्राणि मण्डलानि च सर्वतः । नदन्तो जगतीं सु सुकौः सुदारुणैः । ३०॥
स्वेदितैः क्रीडनैस्तेषां व्याधयो नाशमान्नुयुः तन्तु सकलां दृष्ट्वा वानरैर्व्याप्तां भुवम् । ३१॥
तुतोष भगवान्ब्रह्मा ददौ तेभ्यो वरान् बहून् ।
ब्रह्मोवाच
युष्मास्वपि च मुद्राऽस्तु मृतसंजीवनी कला ॥३२।
आज्ञाऽस्तु सर्वजगति वेगोऽस्त्व तु मनः समः । युष्मत्प्रम्मान्ति ये मर्त्याः पूजयन्ति ममत्तनुम्॥३३॥
हैं, श्रीसीताजी लक्ष्मी, लक्ष्मण शेष भगवान्, ये सब वानर महारुद्रांश सम्भव व रघुनन्दन और नल साक्षात् शिव-जीके अंशज शंभु हैं । हे दाशरथे ये नील भी साक्षात् शिव हैं । इत्यादि महायशस्वी सुषेण महायशा, जाम्बवान् अजैकपात, अहिर्बुध्न्य गवद, दधिवक्त्र पिनाकधृक्, तार, अयुताजित्, तरल स्थाणु, मैंद भर्गस्तनु और हनुमानजी साक्षात् शिव हैं ॥ १६-१९ । ये ११ ग्यारह रुद्र आपके लिए एकत्र होकर सब देशोंमें अनेक पर्वतोंपर रहते थे । २० । किन्तु अब वानरका रूप धारण करके इस भूमण्डलपर आये हैं । ये सब वानर क्यों हुए, इसका कारण भी मैं आपकी बतला रहा हूँ ॥ २१ ॥ एक समय देवताओ तथा दैत्योंने मिलकर समुद्रका मन्थन किया, उससे अनेक दुःख देनेवाले तथा और विस्फोट आदि बहुतसे रोग उत्पन्न हुए ॥ २२ । उन रोगोंसे तीनों लोक संकटमें पड़ गये । ऐसी अवस्थामें बहुतसे ऋषि और देवता एकत्र होकर ब्रह्माजीकी शरणमें गये और कहने लगे- हे जगन्नाथ ! इन दारुण व्याधियोंसे इस विश्वकी रक्षा करिए ॥ २३ ॥ २४ ॥ संसारके प्राणियोको ज्वर आदि महाघोर रोगों और वात, पित्त तथा कफ इन तीन दोषोंने घेर लिया है। इनकी शान्तिके लिए जिस किसी औषध तथा यंत्र मंत्र आदिका प्रयोग किया जाता है, वह भी सफल नहीं हो पाता । मनुष्योंका नाश करनेवाले रोग सदैव उन्हें सताते रहते हैं ॥ २५ ॥ २६ ॥ हे ब्रह्मन् ! इस तरह मैंने लोगोने कष्ट आपके सन्मुख सुनाया ॥ २७ ॥ उनकी ऐसी बात सुनकर ब्रह्माजीने रुद्रोंसे प्रार्थना की । ब्रह्मवाक्य सुनकर व वीरभद्र आदि एकादश रुद्रगण ब्रह्माको सान्त्वना देकर सुग्रीव प्रभृति वानर होकर बड़े बड़े पर्वतों तथा भूमण्डलोमे मण्डल बाँधकर घूमते हुए अपने दारुण शब्द तथा क्रीड़ासे उन व्याधियोको नष्ट करने लगे ॥ २८-३० । इसके बाद समस्त पृथ्वीको वानरोसे वेष्टित देखकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए और बहुतसे वरदान दिये । ब्रह्माजीने कहा कि तुम लोगोंकी मुद्राओंमें अमृत संजीवनी नामकी कला विद्यमान रहेगी । १३१ ॥ १३२ ॥ तुम्हारा वेग मनके समान होगा । जो लोग तुम्हारे