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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १५ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४८५

सर्गः १५ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४८५

पञ्चदशः सर्गः

( राम और रामराज्यकी विशेषतायें )

श्रीरामदास उवाच

रामराज्ये महानन्दः सर्वाननामपि जन्तुषु । नवीभत्सं क्वापि कस्यद्धैर्ये निदामयं तथा ॥ १ ।
राज्यमासीदमापन्नं समृद्धबलवाहनम् अशेषैर्भिक्षुभिस्तूर्णं रूप्य हाटकभूषणैः ॥ २ ।
संस्फुटमिष्टापूर्तानां धर्माणाम् नित्यकर्मभिः सदा संपन्नासस्य च सुचिरं क्षेत्रमण्डलम् ॥ ३ ।
सुदेशं सुप्रजं सुपथ्यं सुशुभं बहुगोधनम् । देशं वनानां च गजिभिः परिगर्जितम् ॥ ४
सुगुप्ता यत्र वै ग्रामाः सुनिविष्टाङ्गनाजनाः । गुप्तैर्भूरिनिवेशयैः मुमुदाः फलपादपाः ॥ ५ ।
सुपद्मार्कप्रकाशाभा राजन्ते यत्र भूमयः । मद्या निमज्जगागेऽपि मन्ति न मानवाः । ६ ।
कुलान्येव कुलीनानि न चान्यापधनानि च । विभ्रमो यत्र नारीणां न सिद्धान्तेषु च कर्हिचित् ॥ ७ ।
नद्यः कुटिलगामिन्यो न यत्र विषये प्रजाः । तमोयुक्ताः क्षपा यत्र वह्नितेजो न मानवाः । ८ ॥
रजोयुजः स्त्रियो यत्र न धर्मबहुला नराः । धर्मसम्बन्धो यत्रासिन्नना नेम च भोजनात् ॥ ९ ॥
अनपत्यास्पदं यत्र न च वै राजपुरुषाः । दण्डः परशुदण्डानामुद्धवेनागजिषु । १० ॥
आतपत्रेषु नान्यत्र कश्चिन क्रोधोऽप्रमाद्यतः । अन्यत्रातोद्वेगदेशेषु च, वैरं पाण्डित्यनम् । ११ ।
अक्षिका एव दृश्यन्ते यत्र पाणिषपाणयः न, अन्यत्रातः । उल्लेखाः सामधना एव दृश्याः । १२ ।

श्रीरामदास बोले—हे शिष्य ! रामचन्द्रजीके राज्यके समयके सब जीवोंको सदा अधिक ही आनन्द रहता था। उस समय न कहीं आग होता, न भय-झगड़ा होता, न कोई किसकी निन्दा करता और न कोई किसीसे डरता था ॥ १ ॥ राज्य था उस समय शत्रुओंसे रहित और विविध प्रकारके वाहन तथा सेनासे परिपूर्ण था। रामराज्यमें ब्राह्मण सुखी थे और राज्यके रहनेवाले लोग सान-चाँदीके गहनोंसे लदे रहते थे। इष्ट-आपूर्त आदि धार्मिक कृत्य होते रहते थे और सारे खेत धान्यसे परिपूर्ण रहा करते थे ॥ २ । ३ ॥ भाव यह है कि उस समय समस्त प्रजा सुखी थी, प्रजा प्रसन्न थी और रहन-सहन उत्तम था। गौओक चरनेको सुन्दर घास उपजता था। धनोंक अधिकता थी सारा देश दयालुओंसे भरा पड़ा था ॥ ४ । उस राज्यके सब गाँवामे योजक सुन्दर कूप गड़े हुए थे। प्रजाके सब लोग धन धान्यसे परिपूर्ण रहत थे और अच्छे-अच्छे फूलों तथा सदा फल देनेवाल बृक्षोंसे बगीचासे सारा राज्य भरा रहता था ॥ ५ ॥ सदा बहुमूल्यवाले कितन ही मणियों राज्यकी भूमिवर बह रहा थे। ऐसे ही कुछ स्थान बचे थे जहाँ कि मनुष्योंका निवास नहीं था। बाकी सारा पृथ्वी मनुष्यमय भरा थी ॥ ६ ॥ उस समयके सभी मनुष्य कुलीन थे। अन्याय नहीं होता था और धनकी कमी नहीं रहती थी। उस समय स्त्रियोंम विभ्रम (लज्जा) दीखता था, किन्तु पण्डितोंमें विभ्रम (बड़ी भूल) नहीं रहता था ॥ ७ ॥ उस समय देशमें कुटिल (टेढ़ी बेंगी) बहनेवाली नदियाँ थीं, किन्तु प्रजा कुटिलता (दुष्टता) से सर्वथा बची हुई थी कृष्णपक्षकी रात्रिमें केवल तम (अन्धकार) था, मनुष्योंमें तम (तामस गुण) नहीं दीखता था माना सारे मनुष्य उस समय सात्त्विक थे ॥ ८ ॥ स्त्रियाँ रजोगुण (रजस्वला) होती थीं, पुरुष रजोगुण (राजस गुणयुक्त) नहीं थे। उस समय राज्यके लोग पैसोंसे अन्ध; अन्धे नहीं थे, किन्तु अन्य (अन्न) से कोई अनन्य नहीं था। अर्थात् सब लोग खाने-पीनेमें सुखी दीखते थे। उस समय राजपुरुषों (अधिकारियों) में अन्याय नहीं दीखता था। दण्ड केवल कुल्हाड़ी, मुशल तथा पाँसों ही में दीखता था। प्रजापर प्रजाको दण्डप्रयोगकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी ॥ ९ ॥ १० ॥ सन्ताप (घाम) केवल छतरियोंपर रहता था। रामराज्यका प्रजामें सन्ताप मानसिक दुःख कहीं नहीं रहता था। केवल रथ हाँकनेवाले सारथियोंके हाथमें प्राश (घोड़े या बैलकी रास) रहता था, किन्तु प्रजाके किसी मनुष्यको पाश (फाँसीका दण्ड) मिलता नहीं देखा गया। जड़ता (ठंडक) की बात केवल जलमें रहती थी।

४८६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १५

कठोरहृदया यत्र योषितोऽपि न मानवाः । औषधेष्वेव यत्रास्ति कुशाग्रो न मानवे ॥१३॥
वेधोऽभ्यन्तरम् रत्नेषु शूलं मूर्ति... वै । कंपः सात्त्विकभावोत्थो न भयात्क्व पिकस्यचित् ॥१४॥
मत्ताः करिण एव यत्र दारिद्र्यं कुतुरेव न । दुर्लभत्वं पातकस्य सुलभं न च वस्तुनः ॥१५॥
इभा एव प्रमत्ता वै युद्धं चाप्याजितामये । दानहानिर्मदेष्वेव द्रुमष्वेव हि कण्टकाः ॥१६॥
जनेष्वेव दृढांग वै न कस्याप्युदरव्यथा । वनेषु गुणविश्लेषो बन्धोक्तिः पुस्तके दृढा ॥१७॥
दण्डत्यागं महेशास्ति यत्र दण्डधरे जने । दण्डवार्ता सदा यत्र कृताभ्यासकर्मणाम् ॥१८॥
मृगवास्तारकेष्वेव भिक्षुका ब्रह्मचारिणः । यत्र क्षपणका एव दृश्यन्ते मलधारिणः ॥१९॥
प्राणा मन्त्रधरा एव यत्र चञ्चलवृत्तयः । इत्यादि विविधै रामा राज्यं शशास सः ॥२०॥
धर्मराजो धर्मज्ञः श्रीरामः प्रतापवान् । ... दण्डमशोष्यायौ मुनिश्चलम् ॥२१॥
निश्चाय राज्यनीतिं विविधां पञ्चतामियात् । उपारूप महाबुद्धे प्रजा धर्मेण पालयन् ॥२२॥
तताप सूर्ये इव स दुहृदो हृदि नेत्रयोः । ... हृदयेऽप्यानन्दमानसेषु स्वकेष्वपि ॥२३॥
अवधूतमासण्डलान् कोदण्डं कलयन्मले । फलदानार्तगलोऽसि शत्रुसैन्यबलाहकैः ॥२४॥
स धर्मराजोऽभूद् धर्माधर्मविवेचकः । अदुष्टान्दण्डयन्नार्त्तो दण्ड्यांश्च परिदण्डयन् ॥२५॥
पाशेन पाशयाञ्चक्रे वैरिवर्गं द्विषद्गणम् । सेतुः पुण्यजनानाञ्चो रिपुराक्षसमर्द्दनः ॥२६॥
जगत्प्राणसमानश्च अगत्प्राणतनयस्य । राजराजः स एवाभूत्सर्वेषां धनदः सताम् ॥२७॥


किसी मनुष्यमें जड़ता (मूर्खता) नहीं थी। केवल स्त्रियोंकी कटिमें दुर्बलता रहती थी, मनुष्योंके हृदयमें नहीं ॥११॥१२॥ कल्पका विचार केवल रत्नमें रहता था, ... और औष्ण्यंभाव केवल (कूट औषधिविशेष) का नाम दाखता था, किसी मनुष्यमें कुष्ठरोग नहीं था ॥१३॥ वेध (छिद्र) केवल रत्नोंमें रहता था। शूल (छीनी) केवल मूर्ति बनानेवाले कारीगरोंके हाथमें रहता था, केवल सात्त्विक भावके उदय होनेपर लोगोंको कम्प होता था—भयसे नहीं। दुर्बलता पातकोंका था, और... इनमें कोई वस्तु अलभ्य नहीं थी ॥१४॥१५॥ मत्तवाले हाथी होते थे, मनुष्य नहीं। युद्ध जनक लवण ... में देखा जाता था। दानहानि (मदके प्रवाहका रुक जाना) केवल हाथियोंमें थी। वृक्षोंमें ही कटक (कांटे) रहते थे ॥१६॥ मनुष्योंमें विराग होता था, किन्तु किसीकी उदरव्यथा (खांसी) ऐसा नहीं देखा गया, जो कि वनोंमें गुणविश्लेष (प्रत्यञ्चाका वियोग) था, दृढ़बन्धाक्ति (कठिन बन्धन) केवल ग्रन्थों/पुस्तकोंके लिए थी ॥१७॥ शिवभक्तोंके लिए केवल दण्डत्याग किया जाता था। राजा दमन करता था प्रजाजनका, केवल सन्यासियोंमें दण्डवार्त्ता। दण्डग्रहण-सम्बन्धी रातदिन रहते थे। इसके सिवाय चारों वर्णके ऊपर प्रजा में कोई मागन (भिखारी) नहीं था। केवल ब्रह्मचारी भिक्षुक था। केवल क्षपणक (जैनधर्मके) लोग मल (कीचड़ वस्त्र) धारी थे ॥१९॥ प्राय श्रीराम चंचलता राखता था। इस प्रकारके गुणोंसे युक्त रामचन्द्रजी राज्य करते थे ॥२०॥ धर्मका तत्त्व जाननेवाले प्रतापशाली रामने इतने काल पर्यन्त तक निष्कंटक राज्य किया, उन्होंने अनेक प्रकारकी साङ्गोपाङ्ग सूर्याङ्गित करके अष्टाक्षर का अपना राज्यधानी यत्न से और धर्मपूर्वक प्रजापालन करते हुए प्रजाको भलीभांति उन्नत किया ॥२१॥२२॥ वे शत्रुओंके हृदयमें सदा सूर्यकी भांति तपते थे और मित्रोंके हृदयमें चन्द्रमाकी तरह हर्षके पहुंचाने वाले। इन्द्रके समान समराङ्गणमें अपना धनुष चमकाते हुए शत्रुसेनारूपी मेघोंका भङ्ग हेतु थे। ऐसा बराबर देखा गया है, महाराज रामचन्द्रजी धर्मराजकी तरह भलीभांति धर्म अधर्मकी विवेचना करके काम करते थे। जो दण्डके योग्य नहीं होते थे, उन्हें दण्ड नहीं देते थे और जो दण्डके योग्य होता, उसे अवश्य दण्ड देते थे शत्रुओंको समुद्रकी तरह रज्जुकी तरह उन्होंने बाँध रक्खा था। रिपुरूपी राक्षसोंका भी उपकार करके रामचन्द्रजी संसारमें सब महात्माओं में उच्च पदपर पहुँच चुके थे ॥२३-२६॥ जगत्की रक्षाके लिए रामचन्द्रजी जानके प्राण समान थे। अच्छे मनुष्योंको धनकी सहायता देकर वे स्वयं राजराज (कुबेर) हो रहे थे। शत्रुओंको भय दिखाकर रुद्र बन गये थे। यही कारण था कि जिससे

सर्गः १५ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४८७


स एव रुद्रमूर्तिश्च प्रैक्षिष्ट रिपुभीषणे । विश्वेदेवास्तमर्चन्तं तु स्तुवन्ति च भजन्ति च ॥ २८ ॥
अशक्यः स हि साध्यानां वसुभ्यो वसुनाधिकः । त्रयाणां विग्रहधरो दस्रोऽजस्ररूपधृक् ॥ २९ ॥
महद्गुणगणगण्यंस्तुतिनास्तोष्यन् गुणाः । यस्याध्वगो यस्तु नवाद्यधरोऽपि । ३० ॥
आक्रान्तेव गन्धर्वाभ्यश्शकं निवर्गान्तिः । रघुवक्षश्चामि तद्दुर्गं स्वर्गमोददम् ॥ ३१ ॥
नागा नागास्तिरश्चक्रुस्तस्य राज्ये बलाधमः । दनुज मनुजाकारं कृत्वा तं तु सिषेविरे ॥ ३२ ॥
आता गुप्तचरा यस्य गुप्तकाः पक्षिणो नृषु । मसेविष्यामहे राजन् मुग्ध्वां स्वस्ववैभवैः ॥ ३३ ॥
वयं ततस्त्वद्विषये सुरावामोऽपि दुर्लभः । इत्युक्त्वा गणचक्रं तं मघवायाः सिषेविरे ॥ ३४ ॥
अशिक्षयत्क्षितिपतेरिह यस्य तुरङ्गमान् । अभूगश्चाशत्रुचित् पक्ष्याने रथि स्थितः ॥ ३५ ॥
अशत्रान्यस्य तु मज्ञाश्चरणेषु वर्षणः । अमन्दिनो दृष्टामरुन्त्येऽपि दानिनः ॥ ३६ ॥
सदोऽजिरं च योद्धागे योद्वाश्च म्नाजिरे । न शास्त्रैर्जन कांधा शस्त्रैः केनचित्क्वचित् ॥ ३७ ॥
न नेत्रविषये जाता विषरे यस्य भूभृतः । सदा नृपवद्वा ऽप्यासतथा महावदः प्रजाः ॥ ३८ ॥
कलवानेक एवास्ति त्रिदिवेऽपि दिवौकसाम् । तस्य क्षोणीभृतः क्षोण्यां जनाः सर्वे कलाधराः ॥ ३९ ॥
एक एव हि कामोऽस्ति स्वर्गं सोऽप्यङ्गज केवलः । माहेता ह्यथ भूपाल सर्व कामा हि तद्भुवि ॥ ४० ॥
तम्योपवर्तनेऽप्येको न भूतो गोत्रभिन्क्वचित् । मद्य स्वर्गमहार्याजो गोत्रभिन्मार्गकीर्तितः ॥ ४१ ॥
क्षयी च तस्य रिपवे कोऽप्यक्षीण न केनचित् । त्रि विष्टपे अपानाथः पूर्व पक्षे क्षयिष्यते ॥ ४२ ॥
नाके नवग्रहाः भान्ति दृशास्तस्यानवग्रहाः । हिरण्यगर्भः स्वर्लोके चैक एव प्रकाशते ॥ ४३ ॥
हिरण्यगर्भाः सर्वेऽपि तन्मीषायामहालयाः । ममाश्र एकः स्वर्लोके निमलं भास्यशुमान् ॥ ४४ ॥


एव विश्वेदेव उनकी स्तुति और भजन करते थे । वे साध्य ( द्वादश गण विशेष ) के लिए भी अशक्य थे । वसु ( धन ) की अधिकतासे वे अष्टवसुओ से भी श्रेष्ठ थे । कामदेवके साक्षात स्वरूप थे और अश्विनीकुमारके समान सदा सुन्दर रूप धारण किये रहते थे ॥ २८-२९ ॥ वे अपने समाधारण पराक्रमसे गन्धर्वोसे भी श्रेष्ठ थे । कितने ही सद्गुणोंसे वे छतीस नृविद्याओं प्रमथ कर रहे थे । समस्त विद्याधर विद्या शिरोमणि थे और अपने गीतोके माधुर्यसे उन्होंने गन्धर्वोका भी मद क्षय कर दिया था । संसारभरक यशआवास स्वर्गके समान कमनीय रामके किल को रक्षा करते थे ॥ ३० ॥ ३१ ॥ दिग्गज तक हाथी रामके हस्तिसमूहसे पराजित हो गये थे । सारी दुनियाके दानव मनुजका रूप बना बनाकर रामका सेवा कर रहे थे ॥ ३२ ॥ उनके गुप्तचर राज्यके मनुष्योंम घुसकर अपना प्रभाव सिद्ध करनेके लिए गुप्तगो ( पक्षिभट दूतों ) से भी बाजी मार चुके थे । इन्द्रादि देवता रामके समीप आकर कहा कि हे महाराज ! हमारे पास जो कुछ वैभव है, वह सब लगाकर हम आपकी सेवा-शुश्रूषा करनेको प्रस्तुत हैं ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ इस युगमें जिसमें कोई वायु देवतासे भी जत्थ चलना सिखाते थे, जिसके पर्वतके समान ऊंचे बड़े-बड़े हाथियोंका अजस्रदानिहा (मस्त मदप्रवाह अथवा दानशीलता) देखकर संसारके कृपण मनुष्य भी दानी बन गये थे । जिसका राजसभाके बुद्धिमान पण्डित और सेनाके बड़े-बड़े योद्धा शास्त्र तथा शस्त्रसे कभी पराजित नहीं हुए थे ॥ ३५ ३७ ॥ उन रामके राज्यमें जैसे रुग्ण कहीं नहीं दीखता था, वैसे ही प्रजा में कभी किसी प्रकारकी विपत्ति भी नहीं दिखायी देती थी ॥ ३८ ॥ देवताओंके स्वर्ग जैसे राज्यमें केवल एक कलावान् चन्द्रमा था, किन्तु रामके राज्यमें सब मनुष्य कलाके भण्डार थे । स्वर्गमें केवल एक कामदेव था, सो भी अनङ्ग ( अर्थात् बिना शरीरका ) । किन्तु रामराज्यके सारे मनुष्य गुणवान् कामदेव (जैसे सुन्दर ) थे । रामके राज्यक्षेत्रमें खीझनेवाला भी कोई गोत्रभित् (जातिसे बहिष्कृत) मनुष्य नहीं मिल सकता था, किन्तु स्वर्गमे देवताओंके राजा स्वयं गोत्रभित् (इन्द्र थे ॥ ३९-४१ ॥ राम-राज्यमें कोई क्षयी (अपरेगी) नहीं सुना गया, किन्तु स्वर्गमें चन्द्रमा एक पक्षमें क्षय होत रहते हैं ॥ ४२ ॥ स्वर्गमें सर्वदा नौ ग्रह रहते हैं, किन्तु रामका राज्य अनवग्रह ( यानी आपको

४८८आनन्दरामायणे[ सर्गः १६

मदंशुकाः प्रतिगृहं बहुधाऽऽसन्पुरेश्वराः । मदप्सरा यथा स्वर्गस्त्वेक एव मदप्सराः ॥४५॥
एकैव पद्मा वैकुण्ठे गीयते विष्णुवल्लभा । नारीगणां गृहेष्वासंस्तत्पद्माः पृथक् पृथक् ॥ ४६॥
अनशन्यश्चलद्दामा न राजपुरुषाः क्वचित् । गृहे गृहेऽत्र धनदा नाक एकोऽल्पकापतिः ॥४७।
एवं रामो महान् श्रेष्ठः शौर्याद्यैर्गुणशोभनः । सौभाग्यशोभा रूपालयः शौर्योदार्यगुणान्वितः ॥४८॥
विजितानेकसमरः श्रियमप्यपवर्गदाम् । दत्वाऽरिजनवर्गेभ्य उग्रः परपुरंजयः ॥४९॥
अनेकगुणसंपूर्णः पूर्णचन्द्रनिभद्युतिः । मन्त्रावभृथक्लिन्नमूर्द्धजः क्षितिपर्षभः ॥५०॥
प्रजापालनतत्परः कोशपूर्त्यार्णभृद्गुरुः । सर्वदाऽक्षरनक्षत्रयुगलध्यानतत्परः ॥५१॥
विशेषककथालापपारिश्रित्यदिनक्षप । सीताप्रक्षालितपदम्भःक्रीडापरितोषितः ॥५२।
शशास राज्यं धर्मेण बन्धुपुत्रसमन्वित । रामे शासति साकेतपुर्यां राज्यं सुखेन वै ॥५३॥
हृष्टाः पुष्टा प्रजाः सर्वाः फलवन्तोऽभवन्द्नगाः । आमन्मदा सुकुसुमैर्विनम्राः सौरभोदा नृणाम् । ५४॥
एकपत्नीव्रताः सर्वे पुमांसस्तस्य मण्डले । नारीषु काचिन्नेवासीत्पवित्रव्रतधर्मिणी ॥५५॥
अनधीतो न विप्रोऽभून्न शूरो नैव बाहुजः । वंश्योऽनभिज्ञो नैवासीदथोपार्जनकर्मसु ॥५६॥
अनन्यवृत्तयः शूद्रा द्विजशुश्रूषणं प्रति । तस्य राष्ट्रे समभवन्सीतारामास्य भूपतेः ॥५७॥
अविप्लुतब्रह्मचर्य्यास्तद्राष्ट्रे ब्रह्मचारिणः । नित्यं गुरुकुलाधीना वेदग्रहणतत्पराः ॥५८॥

लड़ाई-झगड़ेसे रहित था । स्वर्गमें केवल एक हिरण्यगर्भ (विष्णुभगवान्) रहते हैं, किन्तु रामराज्यके प्रत्येक घर हिरण्यगर्भ थे अर्थात् उनमें सुवर्ण भरे हुए थे स्वर्गमें केवल एक मन्मथ अंशुमान् (सूर्य) हैं, किन्तु रामके राज्यमें प्रत्येक व्यक्ति अंशुमान् (वस्त्र कपड़े पहननेवाले) और बातको कौन कहे, जिनमे ही धोड़ बाँधनेवाले लोग विद्यमान थे। जिस तरह हृदयमे अच्छी-अच्छी अप्सराएं हैं, उसी तरह रामके राज्यमें भी बहुत-सी अच्छी-अच्छी अप्सराएं रहती थीं । ४३-४५ । ऐसा कहा जाता है कि स्वर्गमें केवल एक विष्णुकी प्रिया पद्मा (लक्ष्मी) हैं किन्तु रामके राज्यमं स्त्रियोंसे भी अधिक पद्मापति (पद्मसंख्यक रुपये रखनेवाले) लोग थे । रामके राज्यमे कभी किसी प्रकारका अकाल नहीं पड़ा और ऐसे राजपुरुष नहीं थे, जो कान्तिविहीन रहे हों । स्वर्गमें केवल कुबेर धनद (लेस दसके व्यवहारी) हैं किन्तु रामके राज्यमं असंख्य धनद थे ॥ ४६ । ४७ । इस तरह रामचन्द्र अनेक मद्गुणोंसे युक्त और सर्वश्रेष्ठ थे । रामचन्द्र सौभाग्य, रूप शौर्य और औदार्य आदि गुणोंसे युक्त थे। अनेक युद्धामं उन्होंने विजय पायी थी और संसारकी दरिद्रताको उन्होंने लक्ष्मोंके हाथ सौंप दिया था। उनके वामभागमें सीताजी बैठो रहती थीं । इस कारण उनकी शोभा और भी बढ़ गयी थी। वे सबसे उग्र तथा शत्रुओंके नगरको विजय करनेमें सिद्धहस्त थे। अनेक गुणोंके एकत्रित होनेसे वे पूर्ण हो चुके थे और पूर्ण चन्द्रमाके समान उनकी कान्ति थी। सर्वदा अवभृथ (दक्षान्त) स्नान करनेसे उनके केश भीगे रहते थे और सब राजाओमे श्रेष्ठ माने जा चुके थे ॥४८-५०॥ प्रजाका पालन करनेम वे पूर्णतया दत्तचित्त रहते थ और खजानक धनस ब्राह्मणोंको प्रसन्न रखते थे। वे सदा शिवके ध्यानम तत्पर रहते थे। वे सर्वदा शिवजीक। कथाएँ कहन मनते दिन रात बिताने थे । सीता उनके पैर धोया करती थीं । उनके साथ विविध प्रकारकी क्रीड़ायें करनेमे राम प्रसन्न रहत थे ॥ ५१ । ५२ । उन्होंने भाइयो और पुत्रोके साथ रहकर अच्छी तरह राज किया । रामके शासनकालमे प्रजा मुखी तथा हृष्ट-पुष्ट रहती थी और वृक्ष फल-फूलसे लदे रहकर कारण झुक रहने और मनुष्योंको मुखी रखते थे ॥ ५३ । ५४ ॥ उनके राज्यमें सब पुरुष एकपत्नीव्रती थे और स्त्रियोंमें भी कोई ऐसी नहीं थीं, जो अपने पातिव्रतधर्मका पालन न करती हो ॥ ५५ ॥ उस समय कोई ऐसा ब्राह्मण नहीं था, जो बिना पढ़ा हो और कोई क्षत्रिय भी ऐसा नहीं था, जो योद्धा न रहा हो। कोई ऐसा वैश्य नहीं था, जो धन कमानेकी कला-से अनभिज्ञ हो। राजा रामके शासनकालमें राज्य भरके शूद्र और किसी प्रकारकी वृत्ति न करके एकमात्र द्विजों (ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्यों) की सेवामें लगे रहते थे। उनके राज्यमें ब्रह्मचर्य्यकी रक्षा करते हुए