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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १४ ] मनोहरकाण्डम् ७२३

सर्गः १४ ] मनोहरकाण्डम् ७२३

गन्धपुष्पधूपदीपनैवेद्यवसनादिकम् । सर्वं पृथगष्टविधं जानक्यै तु निवेदयेत् ॥७६॥
ततः स्त्रीभ्यो वायनानि वस्त्रालंकारसंयुभिः । कुंकुमादिपूरितानि देयानि विविधानि च । ७७॥
देयानि कांस्यपात्राणि पक्वान्नपूरितानि च । त्रयस्त्रिंशत्तथा ऽष्टाविंशतिर्देयानि शक्तितः । ७८॥
त्रयस्त्रिंशच्च युग्मानि भोजयेच्च प्रयत्नतः । अथवा ऽष्टौ यथाशक्त्या भोजनीयानि पट्टशैः । ७९॥
रात्रौ जागरणं कार्यं गीतवाद्यादिमङ्गलैः । प्रातःकाले तृतीयायां स्नात्वा सम्पूज्य जानकीम् ८०।
होमश्चापि प्रकर्तव्यः सीतामन्त्रेण यत्नतः । तिलाज्यैः पायसैश्चापि सहस्राण्यष्टभूसुरैः । ८१॥
मुद्गहीनं नवान्नं च ज्ञेयमशानमुत्तमम् । तन्मीतातोपदं ज्ञेयं तेन वा जुहुयात्सुखम् ॥८२॥
ततः स्वयं सुहन्मित्रैर्भुक्त्वा च यथासुखम् । एवमुद्यापनविधिस्तत्राग्रे विनिवेदितः ॥८३॥

श्रीरामदास उवाच

अगस्तिना सुनीथाय यदिदं कथितं पुरा । तत्सर्वं च त्वया पृष्टं मया तेऽद्य निवेदितम् ॥८४॥

विष्णुदास उवाच

कथं रमारामभद्रं कार्यं स्त्रीभिः प्रपूजने । तत्सर्वं विस्तरेणाद्य कथयस्व महाप्रभो । ८५॥

श्रीरामदास उवाच

यथा प्रोक्तं मया शिष्य रामतोभद्रमुत्तमम् । कार्यं रमारामभद्रं तथैव सकलं शुभम् ॥८६॥
किंचिद्विशेषस्तत्रास्ति नवभ्यः षट्पदाष्टकम् । लिंगस्थलेषु कर्तव्या वापिकाश्चैव पूर्ववत् ॥८७॥
मुद्रायामेव किंचिच्च विशेषोऽस्ति शृणुष्व तम् । नकारश्च मकारश्च पर्यटन्नूर्ध्वमेवचः ॥८८॥
ऊर्ध्वं रमेश्वक्षरे द्वे रचनीये तु पूर्ववत् एवं कृत्वा रमानाम् क्षेत्रवर्णं निरीक्षयेत् ॥८९॥
एतद्रमारामभद्रं देवानां पूजनादिषु । नानाकर्मसु सर्वेषु कर्तव्यं च प्रयत्नतः ॥९०॥
विना रमारामभद्राद्यानि देव्याः कृतानि हि । पूजनादीनि कर्माणि तानि ज्ञेयानि मानवैः ॥९१।


और रामकी दो मूर्ति रख और पाद्यप्रचारसे उनका पूजा करे ॥ ७४ ॥ मूर्तियोंमे नौ मासे सुवर्णसे रामकी और आठ मासे सुवर्णसे सीताकी मूर्ति बनवावे । यदि ऐसा न हो सके तो अपनी शक्ति अनुसार चाँदी-की दो प्रतिमाएं बनवा ले ॥ ७५ ॥ इसके अनन्तर गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य तथा आठ प्रकारके वस्त्र आदि सीताको अर्पण करे ॥ ७६॥ इसके बाद वस्त्र-अलंकार आदि वस्तुय तथा कुमकुम आदिके साथ विविध प्रकारके बायन दे ॥ ७७॥ तदनन्तर तरह-तरहके पक्वान्नसे भरकर तेतीस, आठ अथवा तीन कांस्यपात्र अपण करे ॥ ७८ ॥ इसके बाद तेतीस बाह्मणदम्पती, आठ ब्राह्मण अथवा जैसी अपनी सामर्थ्य हो, उसके अनुसार ब्राह्मणदम्पतियोंको भोजन कराये । ७९ ॥ रात्रिभर गीत-वाद्य आदि मङ्गलमय कार्य करता हुआ जागरण करे । तृतीयाको प्रातःकाल स्नान करके जानकीजीका पूजन करे और तिल, घो तथा खीरसे आठ ब्राह्मणोंके साथ सीतामन्त्रसे होम करे ॥ ८० ॥ ८१ ॥ मूंगको छोड़कर अन्य नौ प्रकारके अन्न सीताजीको बहुत प्रिय हैं यदि हो सके तो उन्होंसे हवन करे ॥ ८२ । इसके बाद अपने हित मित्रोदिके साथ सुखपूर्वक भोजन करे । इस तरह उद्यापनविधि मैने तुमसे कही ॥ ८३ । श्रीरामदासने कहा-तुम्हारे प्रश्नके अनुसार मैने यह सब बातें कह दीं, जो सुनीथजीको अगस्त्यजीने बतलायी थीं ॥ ८४ । विष्णुदासने कहा कि जब स्त्रियां पूजन करने लगें तो रमारामक भद्रकी रचना किस प्रकार करें । वह आप हमें विस्तारपूर्वक बतलाइए ॥ ८५ ॥ श्रीरामदासने कहा-पहले मैने जो रामतोभद्र रचनाकी विधि बतायी है, ठीक उसी तरह रमारामतोभद्रकी भी रचना होगी ॥ ८६ ॥ ८७॥ इसकी मुद्रामें थोड़ासो विशेषता है । सो मैं तुमको बताये देता हूँ, सुनो । वकार और मकार ये दोनों पहलेकी ही तरह निचले भागमें बनावे ॥ ८८ ॥ ऊपर रना इन दो अक्षरोंको भी पहले ही की तरह रचना करे। ऐसा कर लेनेके बाद रमा इस नामका भद्रके इर्दत भागम उथड़ा देखे । ८६ ॥ देवी आदिकी पूजाके अवसरपर अथवा और-और प्रकारके शुभ कर्ममे प्रयत्न करके इस रमानामनो भद्र-

७२४आनन्दरामायणे[ सर्गः १४

अकृतान्यत्र तस्माद्धि कर्तव्यं यत्नतस्त्विदम् । कृत्वा रमानामतभद्रं या पूजा मानवर्भुवि ॥९२॥
सा देव्यै तोषदा ज्ञेया तस्मान्कार्या प्रयत्नतः । पूर्वोक्तानि दैवतानि तान्येवात्र विचिन्तयेत् ॥९३॥
आवाहयेच्च मुद्रार्यां जानकीं रघुनन्दनम् । अन्यच्चशृणुष्व भो शिष्य सीतारामप्रपूजने ॥९४॥
रमानामतौभद्रं च कार्यं वा मानवर्भुवि । तच्चापि पूर्ववत्सर्वं कर्तव्यं मानवैर्धिया ॥९५॥
इदं सीतारामयोश्च पूजनाथं प्रकल्पयेत् रामनाम्ना रमानाम्ना इदं भद्रं महच्छुभम् ।९६॥
यत्र द्वयोर्नामनी च रमा रामेति चोभभे । रमागभतो भद्रं च तस्माच्छ्रेष्ठं प्रकल्पयेत् । ९७ ।
रामभद्रोक्तान्त्येव दैवतान्यत्र विनितेयेत् एवं शिष्य त्वया पृष्ट यद्यत्तसन्मयोदितम् । ९८॥
का तेऽन्यास्ति स्पृहा श्रोतुं वद तां तद्वदाम्यहम् ।

विष्णुदास उवाच
कवचं लक्ष्मणस्यापि पठनीयमिति स्मृतम् ॥९९ ।
पुरा गुरो त्वया तच्च मां वदश्व मविस्तरात् । भरतस्यापि कवचं शत्रुघ्नस्य तथा वद ॥१००॥

श्रीरामदास उवाच
एवमेव सुतीक्ष्णेन पृष्टं च कुंभजन्मना । पुरा तद्विस्तरेणाद्य तवाग्रे कथयाम्यहम् ॥१०१॥

सुतीक्ष्ण उवाच
गुरो त्वया पुरा प्रोक्तं कवचं लक्ष्मणस्य च । पठनीयं जनैश्चेति तन्मामद्य प्रकाशय ॥१०२।
भरतस्यापि कवचं शत्रुघ्नस्य तथा वद ।

अगस्तिरुवाच
सम्यक् पृष्टं त्वया वत्स सावधानमनाः शृणु । आदौ सौमित्रिकवचं कथ्यतेऽद्य मया शुभम् ॥१०३।

इति श्रीशतकोटिकामचरितांतर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकांडे
सीतारामकवचादिनिरूपणं नाम चतुर्दश सर्गः ॥ १४ ॥


की रचना करें ॥ ९०॥ बिना रमानामतभद्रक दैवपूजन आदि जितना भी कृत्य किया जाता है, वह सब व्यर्थ हो जाया करता है। अतएव रमानामतभद्रकी स्थापना अवश्य करनी चाहिये। रमानामताभद्रमें लग जो पूजन आदि करते हैं, वह सफल होता है ॥९१॥९२। इससे देवी प्रसन्न होती हैं। इस कारण यत्नपूर्वक ऐसा करना चाहिए। पूर्वम जितने देवता कह आये हैं, वे सब इस भद्रमे भी रहेंगे ॥९३॥ हाँ, यह बात अवश्य है कि इस भद्रमे राम और सीताका आवाहन करे। हे शिष्य ! सीतारामके पूजनके विषयम और भी कुछ विशेष बातें हैं। उन्ह कहता हूँ सुनो ॥ ९४ । कोई भी पूजन करते समय रमानामतभद्रकी स्थापना अवश्य करे। उस भद्रमे पूर्वोक्त रीति के अनुसार ही सब बातें रहेंगी ॥९५॥ सीता और रामकी पूजाके निमित्त इसको स्थापना की जाती है और केवल रामतातोभद्र अथवा केवल रामतोभद्रसे यह भद्र श्रेष्ठ है ॥ ९६॥ इस भद्रमें रमा और राम इन दोनोंके नाम आ जाते हैं इसीलिए यह भद्र सर्वश्रेष्ठ माना गया है ॥ ९७ ॥ रामतोभद्रमें कहे हुए ही देवता इस भद्रमें रहेंगे इस तरह हे शिष्य ! तुमने हमसे जो पूछा, वह मैने तुमसे कहा ॥ ९८ । अब क्या सुननेका इच्छा है सो बताओ, मै कहूँ। विष्णुदास बोले-आपने कहा था कि लक्ष्मणके कवचका भी पाठ करना चाहिए। सो उसे भी बताइए ॥९६.११००' श्रीरामदासने कहा कि इस तरह सुतीक्ष्णने भी अगस्त्यजीसे प्रश्न किया था तो उन्होंने सुतीक्ष्णसे जो कुछ कहा था, यहा मै तुमसे कह रहा हूँ ॥ १०१ ॥ सुतीक्ष्णने कहा हे गुरो ! आपने एक बार हमसे कहा था कि लोगोंको लक्ष्मणकवचका भी पाठ करना चाहिए सो कृपा करके आप हमें लक्ष्मणकवच बताइए। उसके साथ साथ भरत तथा शत्रुघ्नकवच भी बतला दीजिए। अगस्त्यने कहा-हे वत्स ! तुमने बहुत उत्तम प्रश्न किया है। सावधान होकर सुनो। पहले मै लक्ष्मणकवचका ही वर्णन कर रहा हूँ ॥ १०२ ॥ १०३ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते मनोहरकांडे चतुर्दशः सर्गः । १४ ॥

सर्गः १५ ] मनोहरकाण्डम् ७२५


पञ्चदशः सर्गः

(लक्ष्मण-भरत तथा शत्रुघ्नकवच)

सौमित्रिं रघुनायकस्य चरणद्वन्द्वेक्षणं श्यामलं बिभ्रन्तं स्वकरेण रामशिरसि छत्रं विचित्रं वरम् ।
बिभ्रतं रघुनायकस्य सुमहत्कोदण्डवामे करे वन्दे रत्नसलक्षणं जनकजावाक्ये सदा तत्परम् ॥ १ ॥

ॐ अस्य श्रीलक्ष्मणकवचमन्त्रस्य। अगस्त्यऋषिः। अनुष्टुप्छन्दः। श्रीलक्ष्मणो देवता। शेष इति बीजम्। सुमित्रानन्दन इति शक्तिः। रामानुज इति कीलकम्। रामदास इत्यस्त्रम्। रघुवंशज इति कवचम्। सौमित्रिरिति मन्त्रः। श्रीलक्ष्मणप्रीत्यर्थं सकलमनोऽभिलषितसिद्धयर्थं जपे विनियोगः। अथाङ्गुलिन्यासः। ॐ लक्ष्मणाय अङ्गुष्ठाभ्यां नमः। ॐ शेषाय तर्जनीभ्यां नमः। ॐ सुमित्रानन्दनाय मध्यमाभ्यां नमः। ॐ रामानुजाय अनामिकाभ्यां नमः। ॐ रामदासाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ रघुवंशजाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः। एवं हृदयाद्यङ्गन्यासः। ॐ लक्ष्मणाय हृदयाय नमः। ॐ शेषाय शिरसे स्वाहा। ॐ सौमित्राय शिखायै वषट्। रामानुजाय कवचाय हुम्। रामदासाय नेत्रत्रयाय वौषट्। रघुवंशजाय अस्त्राय फट्। ॐ सौमित्रये इति दिग्बन्धः।

अथ सध्यानं लक्ष्मणकवचम्

रामपृष्ठस्थितं रम्यं रत्नकुण्डलधारिणम्। नीलोत्पलदलश्यामं रत्नकङ्कणमण्डितम् ॥ २ ॥
रामस्य मस्तके दिव्यं बिभ्रतं छत्रमुत्तमम्। वीरं पीताम्बरधरं मुकुटेनातिशोभितम् ॥ ३ ॥
तूणीरे कार्मुके चापि बिभ्रन्तं च स्मितवाननम्। रत्नमालाधरं दिव्यं पुष्पमालाविराजितम् ॥ ४ ॥
एवं ध्यात्वा लक्ष्मणं च रामचन्द्रनलोचनम्। कवचं जपनीयं हि ततो भक्त्याऽथ मानवः ॥ ५ ॥
लक्ष्मणः पातु मे पूर्वं दक्षिणं राघवानुजः। प्रतीच्यां पातु सौमित्रिः पातूदीच्यां रघूत्तमः ॥ ६ ॥
अधः पातु महारथीश्चोर्ध्वं पातु नृपात्मजः। मध्ये पातु रामदासः सर्वतः सत्यपालकः ॥ ७ ॥
स्मिताननः शिरः पातु भालं पातुर्मितात्मजः। भ्रुवोर्मध्ये धनुर्धारी सुमित्रानन्दनोऽक्षिणी ॥ ८ ॥
कपोले राममन्त्री च सर्वदा पातु वै मम। कर्णमूले सदा पातु कवचप्रज्वलत्तनः ॥ ९ ॥


अगस्त्यजीने कहा—मैं उन लक्ष्मणजीकी वन्दना करता हूँ, जो सदा रघुनाथजीके दोनों चरणकमल देखा करते हैं, जो अपने हाथसे रामचन्द्रजीके शिरपर छत्रकी छाया किये रहते हैं। जो कन्धेपर रामचन्द्रजीका धनुष धारण किये रहते हैं। जो सर्वदा जानकीजीकी आज्ञाका पालन करनेमें तत्पर रहते हैं और कमलके समान जिनकी आँखें हैं ॥ १ ॥ "अस्य श्री" से लेकर "ॐ सौमित्रये इति दिग्बन्धः" यहां तक विनियोग और अङ्गन्यासकी विधि बतलायी गयी है। उसके आगे लक्ष्मणजीका ध्यान है—जो रामचन्द्रजीके पीछे बैठे हैं, जिनका मनोहर स्वरूप है, रत्नजड़ित कुण्डल जिनके कानोंमें झलक रहे हैं, नील कमलके समान जिनके मुखकी आभा है और जिनके हाथमें रत्नजड़ित कङ्कण पड़े हैं ॥ २ ॥ वीर लक्ष्मण रामके ऊपर दिव्य छत्र लगाये हुए हैं, सुन्दर पीताम्बर पहने हैं और मुकुटसे जो अतिशय शोभायमान दीख रहे हैं ॥ ३ ॥ जो तूणीर तथा धनुष धारण किये हैं, मुसकाता हुआ जिनका मुखारविन्द है, रत्नोंकी माला जिनके गलेमें पड़ी है, जिनका दिव्य वेष है और जो फूलोंकी मालाओंसे और भी सुन्दर दीख रहे हैं ॥ ४ ॥ इस प्रकार रामचन्द्रजीपर दृष्टि लगाये लक्ष्मणजीका ध्यान करके लोगोंको चाहिए कि भक्तिपूर्वक लक्ष्मणकवचका पाठ करें ॥ ५ ॥ लक्ष्मणजी मेरे पूर्वभागकी रक्षा करें और दक्षिणभागमें राघवानुज पश्चिम ओर सौमित्रि तथा उत्तर भागकी रघूत्तम रक्षा करें ॥ ६ ॥ निचले भागमें रघुवीर, ऊपर नृपात्मज मध्यमें रामदास और चारों ओर सत्यपालक रक्षा करें ॥ ७ ॥ जिसकी स्मिता-

७२६ आनन्दरामायण [सर्ग १६


नासाग्रं मे सदा पातु सुमित्रानन्दवर्धनः । रामवक्त्रेक्षणः पातु सदा नेत्रे भुवि ममैव ॥१०॥
सीतावाक्यकरः पातु मम वाणीं सदाऽत्र हि । सौम्यरूपः पातु जिह्वामाननं पातु मे द्विजान् ॥११॥
चिबुकं पातु रक्षोघ्नः कण्ठं पात्वसुरान्तकः । स्कन्धौ पातु जितारिर्भुजौ पङ्कजलोचनः ॥१२॥
करौ कङ्कणधारी च नखान् रक्तनखोऽवतु । कुक्षिं पातु जितेन्द्रारिर्मे वक्षः पातु जितेन्द्रियः ॥१३॥
पार्श्वं गरुडपृष्ठस्थः पृष्ठदेशं मनोज्ञपः । नाभिं गम्भीरनाभिस्तु कटिं च रूपवान्सदा ॥१४॥
गुह्यं पातु महासक्तः पातु लिंगं हरिप्रियः । ऊरू पातु विष्णुभक्तः समुद्गाढान्तु जानुनी ॥१५॥
नागेन्द्रः पातु मे जङ्घे गुल्फौ तूर्णार्चनक्षमः । पादपद्मद्वयोऽप्यत्र पादाङ्गानि सुलोचनः ॥१६॥
चित्रकेतुपिता पातु मम पादाङ्गुलीः सदा । शेषांगि मे सदा पातु मूर्धानं शम्भुसुद्रवः ॥१७॥
दशरथसुतः पातु निशायां मम सादरम् । सुगोलोऽव्यान्मां पातु दिवसे दिवसे सदा ॥१८॥
सर्वकालेषु सौमित्रिजित्वाऽवतु सर्वदा । एवं सौमित्रिकवचं सुतीक्ष्ण कथितं मया ॥१९॥
इदं प्रातः समुत्थाय यः पठेन्मन्त्र मानवः । न जन्माश्रमतो लोके तस्यैव सफलो भवः ॥२०॥
सौमित्रेः कवचस्यास्य पठनान्निःसंदेहं हि । पुत्रार्थी लभते पुत्रान धनार्थी धनमाप्नुयात् ॥२१॥
पत्नीकामो लभेत्पत्नीं गोधनाथी तु गोधनम् । धान्यार्थी प्राप्नुयाद्धान्यं राज्यार्थी राज्यमाप्नुयात् ॥२२॥
पठित्वा रामकवचं सौमित्रिकवचं विना । घृतं दुग्धे नोपेन तद्वत्स्यात् निष्फलं न तत्फलम् ॥२३॥
केवलं रामकवच पाठेन मानवैर्दि त्वपाठ्यः । सुसन्तुष्टा न स्याद्रघुनन्दनः ॥२४॥
अतः प्रयत्नतश्चेदं सौमित्रिकवचं नृभिः । पठनीयं प्रयत्नेन सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥२५॥


तन, रक्षाकरा उर्मिलानाथ दोनों बाणस धनुधारी और औघाड सुमित्रानन्दन रक्षा करें ॥ ९॥ कमलकी
शभामय्या सदा रक्षा करत हैं जो कभी वा उस पदमका सुगंधी पाइन करनेवाले लक्ष्मणजी रक्षा
करते रहें ॥ २ । सुमित्र जी आनन्द बढ़ानेवाले नग पातक अपने प्राणों को सावर । रामका अग निहारते
हुए लक्ष्मण सर्वदा मेरे मुखकी रक्षा करैं ॥ १०॥ सदा आशाका पालन करनेवाले लक्ष्मणजी सर्वदा मेरी
वाणीकी रक्षा करें । सौम्यरूपवाले जि... की तथा प्रसन्नतावाली मेरी आनन दाँत की रक्षा करें ॥ ११ ।
राक्षसोंके संधकारी मेरे चिबुककी रक्षा करें असुरोंका नाश करनेवाले कण्ठका रक्षा करें, शत्रुओं जीतने
वाले मेरे स्कन्धोंकी रक्षा करें और कमल सदृश नेत्रवाले दोनों भुजायोंकी रक्षा करें ॥ १२ । कङ्कणको
धारण करनेवाले हाथकी रक्षा करें, लाल नखवाले नखोंकी रक्षा करें, शत्रुको जीतनेवाले लक्ष्मणजी मेरी
कोखकी रक्षा करें और जितेन्द्रिय लक्ष्मणजी मेरे वक्षस्थल की रक्षा करें ॥ १३॥ रामचन्द्रजीके पीछे बैठनेवाले
लक्ष्मणजी मेरे पृष्ठभागकी रक्षा करें, गम्भीर नाभिवाले नाभिस्थूल सुगन्धमय मरुत्त्वाद् मेरे मेरी
कमरकी रक्षा करें ॥ १४ ॥ कृपालुपाल लक्ष्मण गुह्येन्द्रिय रक्षा करें, लक्ष्मण भगलिंगकी रक्षा करें
विष्णुके सदृश रूपवाले लक्ष्मणजी पुट्ठों की तथा सुन्दर रूपवाले मेरे जानुभागकी रक्षा करें ॥ १५ ॥ सर्पोंके
राजा मेरी जंघाओंकी घुंघुरवाले पैर घुटनोंकी, अङ्गुष्ठवान मेरे पैरोंकी तथा सुन्दर आँखोंवाले लक्ष्मणजी
मेरे समस्त अङ्गोंकी रक्षा करें ॥ १६ ॥ चित्रकेतुके पिता मेरे पैरकी उँगलियों तथा मूर्धाभाग उत्पन्न इत्यादिक
लक्ष्मण मेरे गात्रकी रक्षा करें ॥ १७ ॥ रात्रि के समय दशरथके पुत्र भली करें और दिनके समय भूपाल-
धारी लक्ष्मणजी मेरी रक्षा करते रहें ॥ १८ ॥ इन्द्रजित् मेघनाद का मारनेवाले सबदा मेरी रक्षा करत
रहें। हे सुतीक्ष्ण, इस तरह मैंने तुम्हें लक्ष्मणकवच कह सुनाया ॥ १९ ॥ जो लोग सवेरे उठकर इस कवचका
पाठ करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं और उनका जन्म सफल है ॥ २० ॥ लक्ष्मणजीके इस कवचका पाठ करनेसे
पुत्रार्थी पुत्र तथा धनार्थी धन पाता है। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ २१ ॥ पत्नीका कामनावाला प्राणों प्यारी,
गोधन चाहनेवाला गोधन, धान्यका इच्छुक धान्य और राज्यकी इच्छा रखनेवाला राज्य पाता है ॥ २२ ।
बिना लक्ष्मणकवचका पठितव्य रामकवचका पाठ उसतरह व्यर्थ जाता है, जिस तरह घारु विना नेवेद्य
लगाया जाय ॥ २३ । केवल रामकवचका पाठ करनेसे रामचन्द्रजी विशेष प्रसन्न नहीं होते। २४ ॥ इसलिए

सर्गः १५ ] मनोहरकाण्डम् ७२७

अतः परं भरतस्य कवचं ते वदाम्यहम् । सर्वपापहरं पुण्यं सदा श्रीरामभक्तिदम् ॥ २६॥
कैकेयीतनयं सदा रघुपतेर्नेत्रेक्षणं श्यामलं सप्तद्वीपपतेर्विदेहतनयाकान्तस्य वक्ये रतम्
श्रीसीताधवलातपत्ननिकटे स्थित्वा वरं चामरं धृत्वा दक्षिण करेण भरतं संवीजयन्तं भजे ॥२७॥

ॐ अस्य श्रीभरतकवचमंत्रस्य अगस्त्यऋषिः । श्री भरतो देवता अनुष्टुप्छन्दः । शंख इति बीजम् । कैकेयीनन्दन इति शक्तिः । भरतखण्‍डेश्वर इति कीलकम् । रामानुज इत्यस्त्रम् । सप्तद्वीपेश्वराज्ञाम इति कवचम् रामांशज इति मन्त्रः श्रीभरतप्रीत्यर्थे सकलमनोरथसिद्धयर्थे जपे विनियोगः । अथाङ्गन्यासः ॐ भरताय अंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ कैकेयीनन्दनाय मध्यमाभ्यां नमः । ॐ भरतखण्‍डेश्वराय अनामिकाभ्यां नमः । ॐ रामानुजाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः ॐ शंखाय शिरसे स्वाहा ॐ कैकेयीनन्दनाय शिखायै वषट् । ॐ भरतखण्‍डेश्वराय कवचाय हुम् । ॐ रामानुजाय नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ सप्तद्वीपेश्वराज्ञाय अस्त्राय फट् । रामांशजाय चेति दिग्बन्धः ।

अथ सध्यानं भरतकवचम्

रामचन्द्रसव्यपार्श्वे स्थितं कैकेयीसमुद्भवम् । रामाय चामरेणैव वीजयन्तं मनोहरम् ॥ २८॥
रत्नकुण्डलकेयूरकंकणादिविभूषितम् । पीताम्बरपरीधानं वनमालाविराजितम् ॥ २९॥
मांडवीशौतचरणं रशनानूपुरान्वितम् । नीलोत्पलदलश्यामं द्विजराजसमाननम् ॥३०॥
आजानुबाहुं भरतखंडस्य प्रतिपालकम् । रामानुजं स्मितास्यं च शत्रुघ्नपरिवन्दितम् ॥३१॥
रामम्यस्तेक्षणं सौम्यं विद्युत्पुञ्जसमप्रभम् । रामभक्तं महावीरं वन्दे तं भरतं शुभम् ॥३२॥
एवं ध्यात्वा तु भरतं रामपादेश्वण हृदि । कवचं पठनीयं हि भरतस्येदमुत्तमम् ॥३३॥
पूर्वतः भरतः पातु दक्षिणे कैकयीसुतः । नृपात्मजः प्रतीच्यां हि पातूदीच्यां रघूत्तमः ॥३४॥
अधः पातु श्यामलांगश्चोर्ध्वं दशरथात्मजः । मध्ये भारतवर्षेशः सर्वतः सूर्यवंशजः ॥३५॥


लोगोंको चाहिए कि प्रयत्न करके सब प्रकारकी कामना पूर्ण करनेवाले इस लक्ष्मणकवचका पाठ अवश्य करें ॥ २५ ॥ हे सुतीक्ष्ण ! अब मैं तुम्हें श्रीभरतजीका कवच बताऊंगा, जो पापोंको हरनेवाला, पवित्र एवं श्रीरामचन्द्रके प्रति देनेवाला है ॥ २६ .. मैं उन भरतजीकी बन्दना करता हूँ, जो श्रीरामचन्द्रजीकी ओर निहार रहे हैं। जिनका श्याम स्वरूप है। जो सातों द्वीपोंके अधिपति रामचन्द्रजीकी आज्ञामें तत्पर रहते हैं। जो रामकी दाहिनी ओर बैठकर दाहिने हाथसे सुन्दर चमर हाँक रहे हैं। उन भरतजीका मैं ध्यान करता हूँ । २७ ॥ "अस्यश्री" से लेकर "रामांशजाय चेति दिग्बन्ध" तक अंगन्यास आदिकी विधि बतलायी गयी है। इसके बाद ध्यान है-श्रीरामचन्द्रजीकी दाहिनी ओर बैठकर रामपर चमर चलाते हुए सुन्दर रत्नजडित कुण्डल, केयूर तथा कंकण आदिसे विभूषित, पीताम्बर धारण किये, वनमालासे अलंकृत, जिनके चरण मांडवी धोती हैं, रशना और नूपुरसे विराजित, नील कमलके समान श्यामस्वरूप एवं चन्द्रमाके समान मुखवाले ॥ २८-३० ॥ जानुपर्यन्त भुजाओवाले, भरतखण्डके प्रतिपालक, रामके छोटे भ्राता, शत्रुघ्नसे परिवन्दित, मुस्कुराहटयुक्त मुखवाले, रामकी ओर दृष्टि लगाये हुए, सौम्यस्वरूप, विद्युत्पुंजके समान प्रभावशाली, रामभक्त एवं महापराक्रमी भरतजीका ध्यान करके थोड़ी देरतक रामचन्द्रजीके चरणोंका स्मरण करें उसके बाद इस भरतकवचका पाठ करे । ३१ ३२ । पूर्वकी ओर भरत मेरी रक्षा करें, दक्षिणकी तरफ कैकेयीसुत ओर पश्चिमकी ओर नृपात्मज मेरी रक्षा करें। उत्तरकी ओर रघूत्तम मेरी रक्षा करें ॥ ३४ ॥ नीचे श्यामल अङ्गोंवाले, ऊपर दशरथात्मज, मध्यमें भारतवर्षके प्रभु चारों ओर सूर्यवंशमें उत्पन्न होनेवाले

७२८ आनन्दरामायणे [सर्ग १६


शिरश्मत्पिता पातु भालं पातु हरिप्रियः। भ्रुवोर्मध्यं जनकजादत्तकंकणपत्यवतु ॥३६॥
पातु जनकजामाता मम नेत्रे मदाऽव हि। कपोले मण्डलीकान्तः कर्णमूले स्मिताननः ॥३७॥
नासाग्रं मे सदा पातु कैकेयीतोषवर्धनः। ओष्ठौ च सुमुखे पातु पातु प्राज्ञां जटाधरः ॥३८॥
पातु पुष्करनानेत्रो मे जिह्वां दन्तान् प्रथामयः। चिबुकं रत्नसद्भूषः कंठे पातु वराननः ॥३९॥
स्कन्धौ पातु जिताशनिसुतो शत्रुघ्नवंदितः। करौ कवचधारी च नखान खड्गगोऽवतु ॥४०॥
कुक्षौ रामानुजः पातु वक्षः श्रीरामवल्लभः। पार्श्वे सधनुषाम्रेड्यः पातु पृष्ठं शुभाषणः ॥४१॥
जठरं च धनुर्द्धारी नाभिं शङ्खगोवदतु। कटिं पट्टाम्बरः पातु गुह्यं रमैकमानसः ॥४२॥
राममित्रः पातु लिंगमूहं श्रीरामसेवकः। नादग्रामस्थितः पातु जानुनी मम सर्वदा ॥४३॥
श्रीरामपादुकाधारी पातु जंघे सदा मम। गुल्फौ श्रीरामचरणमुखः पादौ पातु सुगर्वितः ॥४४॥
रामाज्ञापालकः पातु सर्वाङ्गान्यान सर्वदा। मम पादांगुलीः पातु रघूत्तंसांशभूषणः ॥४५॥
रोमाणि पातु मे राम्यः पातु रात्रीं सुधार्य्यम। तूणीरधृग दिवसे दिक्षतु मम सर्वदा ॥४६॥
सर्वकालेषु मां पातु पाञ्चजन्यः सदा भुवि। एवं श्रीभरतस्येदं सुतीक्ष्ण कवचं शुभम् ॥४७॥
मया प्रोक्तं तवाग्रे हि मदार्थगरुकामदम्। स्तोत्राणामुत्तमं स्तोत्रमिदं ज्ञेयं सपुण्यदम् ॥४८॥
पठनीयं सदा भक्त्या रामचन्द्रस्य हर्षदम्। पठित्वा भरतस्येदं कवचं रघुनन्दनः ॥४९॥
यथा याति परं तोषं तथा स्वकवचेन न। तस्मादेतत्सदा जप्यं कवचानमनुत्तमम् ॥५०॥
अभ्यासं पठनान्मर्त्यः सर्वान्कामानवाप्नुयात्। विद्याकामो लभेद्विद्यां पुत्रकामो लभेत्सुतम् ॥५१॥
पत्नीकामो लभेत्पत्नीं धनार्थी धनमाप्नुयात्। यद्यन्मनोऽभिलषितं तत्तत्कवचपाठकः ॥५२॥

भरत मेरा रक्षा कर ॥ ३५ ॥ तक्षक पिता मर मस्तकका रक्षा करे हरप्रिय मस्तकका रक्षा करे जानकीको आज्ञाप्रनार रहनेवाले भरतजी थोड़के मध्यभागकी रक्षा करें । ३६॥ साताको माताके समान माननेवाले भरतजी मेरा आँखोंकी रक्षा करें। मण्डलीक निसतम मेर कपालोंकी रक्षा करें मुसकान मुख-मण्डलवाले भरतजी म० कर्णमुलक रक्षा कर ॥ ३७ ॥ कैकेयीके आनन्दको वढानेवाले मेर नासाग्रको, उग्र अङ्गुष्ठाने मुखकी और अगाध धी भरत मेरी वाणोका रक्षा कर ॥ ३८ ॥ तक्षकके पिता जिह्वाकी, अशामय दाँतोंकी, वल्कलधारी चिबुककी और सुन्दर मुखवाले कन्ठे र कण्ठक रक्षा कर ॥३९॥ शत्रुको जीतनेवाले मेर कन्धोंकी, शत्रुघ्नवन्दित भुजाओंकी, कवचधारी हाथोंकी ओर खड्गधारी नखोकी रक्षा करें ॥ ४० । रामके छोटे भाता उदरकी, श्रीरामवल्लभ वक्षस्थलकी, शरासनधारी पीठकी और सुन्दर भाषण करनेवाले पृष्ठभागकी रक्षा करें ॥ ४१ ॥ धनुर्धारी जठरकी ङ्खकर न भिकी, कमठके समान नेत्रोंवाले कमरकी और एकमात्र रामनामका स्मरण करनेवाले मेरे गुह्यभागकी रक्षा करें ॥ ४२ । रामके मित्र लिंगकी रक्षा करें, श्रीरामके सेवक ऊरुभागकी और नन्दिग्राममें रहनेवाले भरत सर्वदा मेर जानुभागकी रक्षा करें ॥४३॥ श्रीरामकी पादुकाको धारणकरनेवाले मेरी जंघाओंकी, श्रीरामकथ दानी गुल्फभागका तथा सुगर्वित भरतजी मेरे पगकी रक्षा करें ॥ ४४ ॥ रामकी आज्ञा पालन करनेवाले सर्वदा मेर सत्र अंगोंकी और रघुवंशके उत्तम भूषण मेरे पैरकी उँगलियोंकी रक्षा कर ॥ ४५ ॥ रम्य नगुधारी भरतजी मेर चित्र रोमांकी, रात्रि के समय सुन्दर बुद्धिवाले और तूणीरधारी भरत दिनके समय सब दिशाओंकी रक्षा करें । ४६॥ पाञ्चजन्य सब समय मेर रक्षा करते रहैं। हे सुतीक्ष्ण ! इस प्रकार मैने तुम्हें श्रीभरतजीका कवच कह सुनाया । यह बड़ा मङ्गलकारी, सब स्तोत्रोंमें उत्तम और भली भाँति पुण्यदाता है । ४७ । ४८ ॥ लोगोंको चाहिए कि वे रामचन्द्रजीको आनन्द देनेवाले इस भरत-कवचका पाठ करके ही रामकवचका पाठ किया करें। इस कवचके पढ़नेसे रामचन्द्र जितने प्रसन्न होते हैं, उतने अपने कवच अर्थात् रामकवचका पाठ सुनकर बहो प्रसन्न होते; इस कारण लोगोंको चाहिये कि सब कवचोंमें श्रेष्ठ इस कवचका पाठ अवश्य करें ॥ ४६ ॥ ५० ॥ इस कवचका पाठ करनेसे प्राणी सब कामनाओंको प्राप्त कर लेता है। विद्याकी कामनावाला विद्या, पुत्रकी इच्छा रखनेवाला पुत्र, पत्नी चाहनेवाला पत्नी और

सर्गः १६ ] मनोहरकाण्डम् ७२९

लभन्ते मानवैरत्र सत्यं सत्यं वदाम्यहम् । तस्मात्सदा जपेनीयं रामोपासकमानवैः ॥५३॥

अथ शत्रुघ्नकवचम्

अथ शत्रुघ्नकवचं सुतीक्ष्ण शृणु सादरम् । सर्वकामप्रदं व्यर्थं रामभक्तिविवर्द्धनम् ॥५४॥
शत्रुघ्नं धृतकार्मुकं धृतमहातूणीरबाणोत्तमं प श्चे श्रीरामचन्द्रनस्य विनयाद्वामे स्थितं सुन्दरम् ।
रामं स्वीयकरेण तालदलजं धुन्वन्निमित्रं वरं सूर्य्यभ व्यजनं सभास्थितमहं तं वीजयन्तं भजे ॥५५॥

ॐ अस्य श्रीशत्रुघ्नकवचमंत्रस्य अगस्त्यऋषिः श्रीशत्रुघ्नो देवता । अनुष्टुप्छन्दः । सुदर्शन इति बीजम् । कैकेयीनन्दन इति शक्तिः । श्रीभरतानुज इति कीलकम् । भरतमंत्रीत्यस्त्रम् । श्रीरामदास इति कवचम् । लक्ष्मणांशज इति मंत्रः । श्रीशत्रुघ्नप्रीत्यर्थे सकलमनःकामनासिद्धयर्थे जपे विनियोगः । अथांगुलिन्यासः । ॐ शत्रुघ्नाय अंगुष्ठाभ्यां नमः । ॐ सुदर्शनाय तर्जनीभ्यां नमः । ॐ कैकेंयीनदनाय मध्यमाभ्यां नमः । ॐ भरतानुजाय अनामिकाभ्यां नमः । ॐ भरतमंत्रिणे कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ॐ श्रीरामदासाय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । एवं हृदयादिन्यासः । लक्ष्मणांशजेति दिग्बंधः ।

अथ ध्यानम्

रामस्य संस्थितं वामे पार्श्वे विनयपूर्वकम् । कैकेयीनन्दनं सौम्यं मुकुटेनाविरजितम् ॥५६॥
रत्नकंकणकेयूरवनमालाविराजितम् । रशनाकुंडलधरं रत्नहारमनू पुरम् ॥५७॥
व्यजनेन वीजयतं जानकीकांतमादरात् । रामन्पश्नेक्षणं वीर कैकेयीतोषवर्द्धनम् ॥५८॥
द्विभुजं कंजनयनं दिव्यपीतांबरान्वितम् । सुभुजं सुंदरं मेघश्यामलं सुन्दराननम् ॥५९॥
रामवाक्ये दत्तकर्णं रक्षोघ्नं खङ्गधारिणम् । धनुर्वाणधरं श्रेष्ठं धृततूणीरमुत्तमम् ॥६०॥
सभायां संस्थितं रम्यं कस्तूरीतिलकांकितम् । मुकुटस्थावतंसेन शोभितं च स्मिताननम् ॥६१॥
रविवंशोद्भवं दिव्यरूपं दशरथात्मजम् । मथुरावासिनं देवं लवणासुरमर्दनम् ॥६२॥
एवं ध्यात्वा तु शत्रुघ्नं रामपादेक्षणं हृदि । पठनीयं वरं चेदं कवचं तस्य पावनम् ॥६३॥
पूर्वे स्ववतु शत्रुघ्नः पातु वायव्ये सुदर्शनः । कैकेयीनन्दनः पातु प्रतीच्यां सर्वदा मम ॥६४॥

धनार्थी धन प्राप्त करता है । इस तरह उसे जिस किसी वस्तुकी इच्छा होती है, वे सब इस कवचके पाठसे प्राप्त हो जाते हैं । ५१ ।। ५२ । यह बात मैं बिल्कुल सच कह रहा हूँ—झूठ कुछ भी नहीं । रामकी उपासना करनेवालोंको चाहिए कि सदा इस कवचका पाठ किया करें । ५३ ॥ हे सुतीक्ष्ण ! अब मैं तुम्हें शत्रुघ्नकवच बताऊँगा, तुम आदरपूर्वक सुनो । यह शत्रुघ्नकवच भी सब कामनायें पूर्ण करने और रामकी सद्भाक्त बढ़ानेवाला है ॥ ५४ ॥ धनुष धारण करनेवाले बड़ा-सा तरकस धारण किये, श्रीरामचन्द्रजीके पास वामभागमें खड़े, अपने हाथसे ताड़का पंखा झलते हुए, सूर्यके समान अतिशय विचित्र उस पंखेकी दीप्ति है, ऐसे शत्रुघ्नजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ५५ ॥ 'अस्य श्री०' से लेकर "लक्ष्मणांशजेति दिग्बन्धः" तक अङ्ग-न्यास आदिकी विधि बतलायी गयी है इसके आगे ध्यान है - रामके पास वामभागमें विनयपूर्वक खड़े कैकेयीके आनन्ददाता, सौम्यस्वरूप, मुकुटसे अतिशोभित, रत्नजटित कंकण, केयूर तथा वनमालासे अलंकृत सिकड़ी और कुण्डल धारण किये रत्नहार तथा सुन्दर नूपुर पहने, आदरपूर्वक रामचन्द्रजीको पंखा झलते और रामकी ओर निहारत हुए कैकेयीका आनन्द बढ़ानेवाले वीर, जिनके दो भुजायें हैं, कमल जैसे नेत्र हैं, दिव्य पीताम्बर पहने, सुन्दर भुजावाले, मेघके सदृश श्यामल तथा सुन्दर मुखवाले, रामकी बातोंमें कान लगाये, राक्षसोंको मारनेवाले, खड्ग धारण किये, धनुष और बाणसे सुसज्जित बड़ा सा तूणीर धारण किये, सभामें स्थित, रम्य, कस्तूरीका तिलक लगाये, मुकुट और कुण्डलोंसे सुशोभित, मुसकराते मुखवाले, सूर्यवंशमें जायमान, दिव्यरूपधारी, दशरथके पुत्र, मथुरा निवासी लवणासुरका मर्दन करनेवाले और श्रीरामके चरणोंमें

७३०आनन्दरामायणे[ सर्गः १०

शार्दूलोग्र्यो रामबन्धुः पश्चिमे भरतानुजः । रविवंशोद्भवश्चोर्ध्वं मध्ये दशरथात्मजः ॥६५॥
सर्वतः पातु मामत्र कैकेयीतोषवर्धनः । श्यामलांगः शिरः पातु भालं श्रीलक्ष्मणाग्रजः ॥६६॥
भ्रुवोर्मध्ये सदा पातु सुमुखोऽश्विनीसुते । श्रुतकीर्तिपतिर्नेत्रे कपोले पातु राघवः ॥६७॥
कर्णौ कुण्डलकर्णोऽव्यान्नासाग्रं नृपवंशजः । मुखं मम युधा पातु वाणीं पातु स्फुटस्वरः ॥६८॥
जिह्वां सुबाहुतातोऽव्याद्यूपकेतुपिता द्विजान् । चिबुकं रम्यचिबुकः कण्ठं पातु सुभाषणः ॥६९॥
स्कन्धौ पातु महातेजा भुजौ गन्धर्ववाक्यकृत् । करे मे कङ्कणधरः पातु खड्गं नखं मम ॥७०॥
कुक्षिं रामप्रियः पातु पातु वक्षो रघूत्तमः । पार्श्वे सुरार्चितः पातु पातु पृष्ठं वराननः ॥७१॥
जठरं पातु रक्षोघ्नः पातु नाभिं सुलोचनः । कटिं भरतमन्त्री च गुह्यं श्रीरामसेवकः ॥७२॥
समर्पितमनाः पातु लिङ्गमूरू द्विषान्तकः । कोदण्डपाणिः पात्वत्र जानुनी मम सर्वदा ॥७३॥
राममित्रः पातु जंघे गुल्फौ पातु सुनूपुरः । पादौ नृपतिपूज्योऽव्यान्श्रीमान्पादाङ्गुलीर्मम ॥७४॥
धान्यङ्गानि समस्तानि ह्युदारांगः सदा मम । रोमाणि रमणीयेऽङ्गस्याद्रामौ पातु सुधार्मिकः ॥७५॥
दिवसे सत्यसंधोऽव्यादा भोजने शरमत्करः । गमने कनकङ्केतोऽव्यान्र्सर्वदा लवणान्तकः ॥७६॥
एवं शत्रुघ्नकवचं मया ते समुदीरितम् । यः पठति नरः सम्यग् नरः सौख्यभागिनः ॥७७॥
शत्रुघ्नस्य वरं चेदं कवचं मङ्गलप्रदम् । पठनं यं नरेणैन्त्या पुत्रपौत्रप्रवर्धनम् ॥७८॥
अस्य स्तोत्रस्य पाठेन यं यं कामं नरोऽर्थयेत् । तं तं लभेन्निश्चयेन सत्यमेतद्वचो मम ॥७९॥
पुत्रार्थी प्राप्नुयात्पुत्रं धनार्थी धनमाप्नुयात् । इच्छत्कामं तु कामार्थी प्राप्नुयात्पठनादिना ॥८०॥
कवचस्यास्य भूम्यां हि शत्रुघ्नस्य विनिश्चयात् । तस्मादेतत्सदा भक्त्या पठनीयं नरैः शुभम् ॥८१॥


नेत्र लगाये हुए शत्रुघ्नजीका ध्यान करके इस उत्तम शत्रुघ्नकवचका पाठ करना चाहिए ॥५६-६३॥ पूर्वकी ओर शत्रुघ्न, दक्षिण तरफ सुदर्शन और पश्चिम ओर कैकेयीनन्दन हमारी रक्षा करें । ६४ । उत्तरमें रामबन्धु, नीचे भरतके छोटे भ्राता, ऊपर सूर्यराज और मध्यमें दशरथात्मज मेरी रक्षा करें ॥ ६५ ॥ कैकेयीको आनन्द देने-वाले मेरी चारो ओर रक्षा करें । श्यामल अङ्गवाले शत्रुघ्न मस्तकका और लक्ष्मणके अग्रज मेरे ललाटकी रक्षा करें ॥ ६६ ॥ सुन्दर मुखवाले सदा मेरे भौंहोंके मध्यभागकी, श्रुतकीर्तिके पति नेत्रोंका तथा राघव दोनों कपोलोंकी रक्षा करें ॥ ६७ ॥ कानोंमें कुण्डल धारण करनेवाले मेरे कानोंका, नृपवंशज नासिकाके अग्रभागकी, युद्धापहारी शत्रुघ्न मेरे मुखकी एवं स्फुट अक्षर बोलनेवाले मेरी वाणी की रक्षा करें । ६८ । सुबाहुके पिता कण्ठोंकी, यूपकेतुके पिता दाँतोंकी, सुन्दर चिबुकवाले मेरे चिबुकका और सुन्दर बातें करनेवाले मेरे कण्ठकी रक्षा करें ॥ ६९ ॥ महातेजस्वी कन्धाकी रामका आज्ञा पालन करनेवाले भुज का, कङ्कणधारी मेरे हाथोंकी और खड्गको धारण करनेवाले शत्रुघ्न नखोंकी रक्षा करें ॥ ७० । रामके प्रिय मेरे उदरकी, रघूत्तम वक्षस्थलकी, सुरार्चित पार्श्वभागकी और वरानन पृष्ठभागकी रक्षा करें ॥ ७१ ॥ रक्षोघ्न जठरको, सुलोचन नाभिको, भरतके मंत्री कटिभागकी और श्रीरामसेवक गुह्यप्रदेशकी रक्षा करें ॥ ७२ । जिन्होंने अपना मन रामको अर्पित कर दिया है वे शत्रुघ्न लिङ्गकी मुखवाले द्विषान्तकका और हाथोंपे धनुष धारण करनेवाले सर्वदा मेरे जानुओंकी रक्षा करें ॥ ७३ ॥ राममित्र जाँघोंकी, सुन्दर नूपुर पहननेवाले गुल्फकी, नृपतिपूज्य पैरोंकी और श्रीमान् मेरी उँगलियोंकी रक्षा करें ॥ ७४ ॥ उदार अङ्गवाले शत्रुघ्न सदा मेरे समस्त अङ्गोंकी रक्षा करें । रमणीय आकृतिवाले मेरे रोमोंकी, रात्रिके समय सुधारमिक, दिवसके समय सत्यसंध, भोजनके समय सुन्दर बाण धारण करनेवाले, गमनके समय सुन्दर बाणोंके चलानेवाले और सब समय लवणामुरको मारनेवाले शत्रुघ्न मेरी रक्षा करें ॥ ७५॥ ७६ ॥ इस तरह मैंने तुम्हे शत्रुघ्नकवच कह सुनाया । जो लोग भक्तिपूर्वक इसका पाठ करते हैं, वे सुखभागी होते हैं ॥ ७७ । यह कवच बड़ा सुन्दर, मङ्गलप्रद तथा पुत्र-पौत्र बढ़ानेवाला है ॥ ७८ ॥ इस स्तोत्रका पाठ करनेवाला प्राणी जो-जो वस्तुयें चाहता है, उन्हें अवश्य पाता है । मेरी बात सत्य मानो । इसमें कोई संशय नहीं है ॥ ७९ ॥ पुत्र चाहनेवाला पुत्र, धन चाहनेवाला धन तथा जो प्राणी जो