श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १३ ] | सारकाण्डम् | १५७
| सर्गः १३ ] | सारकाण्डम् | १५७ |
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योजनानां पंचशतं वायुवेगेन मारुतिः । राहुस्तस्मिन्दिने दर्शे ययौ सूर्यं रघूत्तम ॥१६५॥
तावद्दृष्ट्वा भर्तुकामं रखेरग्रे कपिं स्थितम् । तदा राहुर्भयादेव रविं मुक्त्त्वेंद्रमाययौ ॥१६६॥
राहुः प्राह शचीनाथ सत्र पीडां करोम्यहम् ।
दत्तः पूर्वं त्वया सूर्यः पीडां कर्तुं सुरेश्वर ॥१६७॥
अत्र विघ्नं समुत्पन्नं तन्मे शीघ्रं निवारय । तद्राहुवचनादिंद्रः समारुह्य गजोपरि ॥१६८॥
देवैर्वृतो ययौ वेगाद्ददर्श प्लवगं पुरः तदा मुमोच तं वज्रं मघवा मारुतिं प्रति ॥१६९॥
वज्रपातान्मारुतिः खात् पपात गिरिकन्दरे ।
तदा भग्ना हनुस्तस्य हनुमानिति वै यतः ॥१७०॥
ख्यातिं गतोऽयं सर्वत्र सदा वायुश्चुकोप ह ।
सांत्वयित्वा हनूमंतं स्वयं स्तब्धोऽभवत्तदा ॥१७१॥
वायुस्तम्भाज्जनाः सर्वे निपेतुर्धरणीतले त्रैलोक्यं शववज्जातं हाहाकारोऽभवद्दिवि । १७२॥
तदा धिक्कृत्य देवेंद्रं वेधा वायुं ययौ जवात् ।
प्रार्थयामास तं नत्वा पुनर्वायुं वचोऽब्रवीत् ॥१७३॥
देवेन्द्रस्यापराधं त्वं क्षन्तुमर्हसि कंपना। तव पुत्राय दास्यामि वरानद्य हनूमते ।१७४॥
तदा तुष्टोऽभवद्वायुरुचाल पूर्ववत्पुनः । अभूत्सजीवितं सर्वं त्रैलोक्यं क्षणमात्रतः । १७५॥
तदा ददौ वरान् ब्रह्मा मारुतिं पुरतः स्थितम् ।
भविष्यसि स्वयममरो वज्रदेहो वरान्मम ॥१७६॥
ते कुंठिता गतिर्माऽस्तु कुत्राप्यंजनिसंभव । भविष्यति हरौ भक्तिस्तव नित्यमनुत्तमा ॥१७७॥
त्वं विष्णोरपि साहाय्यं करिष्यसि वरान्मम ।
इत्युक्त्वाऽन्तर्दधे वेधा राहुः सूर्यं ययौ पुनः ॥१७८॥
इच्छासे लीलापूर्वक ऊपरको उछले ॥ १६४ ॥ उस समय मारुति वायुवेगसे पांच सौ योजन ऊपर उठ गये थे । हे रघूत्तम ! उसी दर्श ( अमावस्या ) के दिन राहु भी ग्रसनेके लिए सूर्यके पास गया, किन्तु उन्हें पकड़नेकी इच्छासे खड़े हनुमान्को देखा । तब राहु डरा और सूर्यको छोड़कर इन्द्रके पास जा पहुँचा ॥१६५॥१६६॥ शचीपति इन्द्रसे राहु बोला—अब मैं आपको ही सताऊँगा । क्योंकि पूर्वकालमे आपने मुझे सतानेके लिये सूर्यको दिया था । १६७ ॥ परन्तु उसमें इस समय विघ्न उपस्थित हो गया है। अतः उसका आप निवारण करें, नहीं तो मैं आपहीको दुःख दूँगा । इस प्रकार राहुके कथनानुसार इन्द्र गजपर सवार होकर देवताओंके साथ सूर्यके पास गये तो वहाँ उनके सामने हनुमान्को खड़ा देखा । तत्काल इन्द्रने उनके ऊपर वज्रप्रहार किया ॥ १६८ ॥ १६९ ॥ वज्रके आघातसे हनुमान् नीचे गिरिकन्दरामें जा गिरे और उनकी ठुड्डी टेढी हो गयी । जिससे कि उनका हनुमान् नाम पड़ा ॥ १७० ॥ उनका यह नाम सर्वत्र प्रसिद्ध हो गया । यह देखकर उनके पिता वायुदेवने कुपित होकर अपनी गति बन्द कर दी ॥ १७१ ॥ वायुके बन्द हो जानेसे सब लोग मर-मरकर धरणीपर गिरने लगे । तीनों लोक मृतक जैसे हो गये और देवलोकमें भी हाहाकार मच गया ॥ १७२ । तब ब्रह्मा इन्द्रको धिक्कारकर शीघ्र वायुके पास गये और नमस्कार करके प्रार्थनापूर्वक कहा—॥ १७३ ॥ हे कंपन ! तुम देवेन्द्रके अपराधको क्षमा कर दो । मैं तुम्हारे पुत्र हनुमान्को वर देता हूँ ॥ १७४ ॥ तब प्रसन्न होकर वायु पुनः पूर्ववत् बहने लगा । अतः क्षणमात्रमे तीनों लोक फिर जीवित हो गये ॥ १७५ । पश्चात् ब्रह्माने सामने खड़े मारुतिको वर दिया कि तुम मेरे वचनसे वज्रदेह होकर अमर हो जाओगे । १७६ ॥ हे अंजनीपुत्र ! तुम्हारी गति कहीं भी प्रतिहत न होगी और नित्य श्रीहरिमें तुम्हारी उत्तम भक्ति बनी रहेगी ॥१७७॥ मेरे वरदानसे तुम विष्णुकी सहायता करनेमें भी समर्थ होओगे। इतना कहकर ब्रह्मा अन्तर्धान हो गये और राहु पुनः
| १५८ | आनन्दरामायणे | सर्गः १२ |
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श्रीराम उवाच
देवेन्द्रेण कथं दत्तो रविस्तस्मै स राहवे । तत्सर्वं विस्तरेणैव कथयस्व ममाग्रतः ॥१७९॥
अगस्तिरुवाच
सुधापानादयं राहुर्देत्योऽभूदमरः स्वयम् । ग्रहोऽष्टमोऽभवन्सोऽपि यदाऽवांछद्दूषं सुरान् ॥१८०॥
पीडां कर्तुं तदा देवाः सूर्य सोमं ददुस्तु तं । ज्ञात्वा धर्मैर्जनाः सर्वे निजकर्मादिहेतवे ॥१८१॥
मोचयिष्यन्ति राहोश्च शशिनं भास्करं प्रति । यदा यदा भविष्यत्यापरागों जगतीतले ॥१८२॥
तदा तदा जना धर्मैर्निजप्रत्यर्थमादरात् ।
तोषयित्वा सदा राहुं तौ तस्मान्मोचयन्ति हि । १८३।।
एतत्सर्वं मया प्रोक्तमुपरागस्य कारणम् । जन्म कर्म चराज्ञाने मारुतेश्चापि विस्तरात् । १८४॥
अनन्तद्वलमाहात्म्यं को वा शक्नोति वर्णितुम् । स एकदा मुनीनां हि चाश्रमेषु कुशादिकान् ॥१८५॥
चकारंतस्ततः सर्वान्नर्षयन्मुनिलालकान् । तस्य तत्कर्म मुनिभिर्दृष्ट्वा शप्तोऽञ्जनिसुतः ॥१८६॥
अद्यप्रभृत्य कपिश्रेष्ठ न ज्ञास्यसि स्वपौरुषम् ।
यदाऽन्यस्य मुखात्स्वीयं बलं श्रोष्यसि विस्तरात् ॥१८७॥
भविष्यति तदा पूर्वस्मृतिस्ते पौरुषं पुनः । अतः सुग्रीवसख्ये विस्मृतः स्वपराक्रमः ।१८८॥
यद स्तुतो जांबवता पुरा प्रायोपवेशने तदा स्मृतिस्तस्य जाता स्वबलस्य हनूमतः ।।१८९॥
एतत्ते सर्वमाख्यातं त्वया पृष्टं मया तत्र । यथा तथा सविस्तार कपिरावणचेष्टितम् ।।१९०।।
राम त्वं परमेशोऽसि सकलं जानासि विज्ञानदृक्
भूतं भव्यमिदं त्रिकालकलनासाक्षी विकल्पोज्झितः ।
भक्तानामनुदर्शनाय सकलां कुर्वन् क्रियासंहति
चाशृण्वन् मनुजाकृतिर्मम वचो भासीह लोकचितः ॥१९१॥
सूर्यके पास गया ।। १७८ ।। श्रीरामजीने पूछा कि देवेन्द्रने सूर्य राहुको क्यों दे दिया था ? हे मुनीन्द्र ! यह कथा आप विस्तारसे कहें ॥ १७९॥ अगस्त्य ऋषि बोले- हे राम, दैत्य राहु सूर्यकालमें सुधापान करके अमरत्वको प्राप्त हो गया था। बादमें जब वह अष्टम ग्रह हो गया, तब उसने देवताओंका दुख देना चाहा। यह देखकर देवताओने सूर्य तथा चन्द्रमा राहुको दे दिया और यह सोचा कि संसारके लोग अपने कामके लिए धर्मके द्वारा राहुसे सूर्य तथा चन्द्रमाको छुड़ा लेंगे। उसीके अनुसार सूर्य-चन्द्रको जब-जब ग्रहण लगता है, तब-तब मनुष्य अपने कार्यसाधनके लिये आदरपूर्वक दान-धर्मसे राहुको सन्तुष्ट करके उससे सूर्य-चन्द्रको छुड़ा लेते हैं ॥ १८०-१८३ ।। इस प्रकार मैंने ग्रहणका कारण तथा मारुतिका जन्म-कर्म आदि वृत्तान्त सविस्तार आपको कह सुनाया ।। १८४ ।। पूरी तरह हनुमान्के बल-प्रतापका वर्णन कौन कर सकता है। उन्होंने एक दिन मुनियोंके आश्रममें जाकर उनके बालकोंको डराया-धमकाया और कुशा आदि सब सामग्री इधर-उधर बिखेर दी। उनके इस कामको देखकर मुनियोंने अञ्जनीसुत हनुमान्को शाप देते हुए कहा-॥ १८५ ।' हे कपिश्रेष्ठ ! आजसे तुम अपने पुरुषार्थको भूल जाओगे और जब कभी दूसरेके मुखसे अपना बल विस्तारसे सुनोगे ।। १८६ । १८७ ।। तब स्मरण होगा। * सुग्रीवके पास रहते समय इसी कारण अपना पुरुषार्थ भूल गये थे। बादमें समुद्रतटपर उपवासके समय जब जाम्बवान्ने उनकी स्तुति करके उनके बलका स्मरण दिलाया, तब हनुमान्को तुरन्त अपना बल याद आ गया था । १८८ ॥ १८९ ।। यह सब मैंने आपके पूछनेके अनुसार सविस्तार कपि-हनुमान् तथा रावणका कार्यकलाप कह सुनाया ।। १९० ।। हे राम ! आप परमेश्वर हैं, ज्ञानदृष्टिसे सब कुछ देखते हैं, विकल्परहित आप भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों कालकी क्रियाके विज्ञ और सबके साक्षी हैं। भक्तोंके अनुरोधसे आप समस्त क्रियाकलाप करते हुए मनुष्य बनकर मेरे बचनको