श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १३ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७१
सर्गः १३ ] राज्यकाण्डम् ( उत्तरार्द्धम् ) ४७१
भागाद्राङ्कतवर्णान्स्तद्वाग्रथाथाणान् प्रभो । सारं सारं प्रगृह्याथ यद्यद्रम्यं मनोरमम् ॥ ९४ ॥
कथानकं तेन तेन व्यासेन मुनिनाऽत्र हि । अष्टादश पुराणानि तथोपपुराणानि च ॥ ९५ ॥
कृतान्यन्येऽपि मुनयः षट्शास्त्रादीन्यनेकशः । अग्रे सर्वं करिष्यन्ति सारं रम्यं प्रगृह्य च ॥ ९६ ॥
ततोऽत्र श्लोकरूपं च यन्मया हरके वने । चतुर्दशवत्सरैश्च कैकेयीदुष्टभावतः ॥ ९७ ॥
कृतं चरित्रं सीताया विरहादि च गद्यत । तत्र किञ्चित्क्षेपभूतं हि चतुर्विंशत्सहस्रकम् ॥ ९८ ॥
तावन्मात्रं वदिष्यन्ति यद्वाल्मीकेः कृतं स्थिति । तन्मत्रं सकलं ज्ञात्वा भावि वृत्तं रघूत्तम ॥ ९९ ॥
श्लोकसङ्ख्यायोगश्च पूर्वमेव मयेरितः । युद्ध प्रयाने भातस्य श्लोकश्चैवोपरागके ॥ १०० ॥
रतिनिशायां श्रोतव्याऽऽनन्दरामायणं सदा । युद्धं ज्ञेयं भारतं हि रतिर्भागवतं स्मृतम् ॥ १०१ ॥
शेषभूतं चतुर्विंशत्सहस्रं शोक उच्यते । तव भाविबरेणैतदानन्दचरितं तव ॥ १०२ ॥
शतकोटिमितं पूर्वं यन्मयैव विनिर्मितम् । नवकाण्डमितं रम्यं षयुद्रादशसहस्रकम् ॥ १०३ ॥
नवोत्ताशतं सर्वं क्वचिन् स्थास्यति भूतले । तव भाविदरान्नाय न कोऽप्येनां मनोरमाम् ॥ १०४ ॥
अष्टोत्तरशतैः सर्गैर्निर्मितां मेरुणाऽन्विताम् । तव कीर्तनमालां नो खण्डयिष्यति भूतले ॥ १०५ ॥
नवकाण्डयुतं रम्यं दृष्टा स्तरणहेतवे । एतद्धि स्थापयिष्यति यावच्चन्द्रदिवाकरौ ॥ १०६ ॥
यदा तत् खण्डितं पूर्वं व्यासेन मुनिना तत्र । शतकोटिमितं रामचरितं यन्मया कृतम् ॥ १०७ ॥
तदा किञ्चिद्धितं दृष्ट्वाहं तूष्णीमेव संस्थितः । भविष्यति कलौ मन्दमतयोऽल्पायुषो नराः ॥ १०८ ॥
न समर्था मम ग्रन्थं विमलं श्रोतुं कदापि हि । अतो व्यासेन मुनिना मत्कार्यं यत्पृथक् कृतम् १०९
सन्तस्याभिन्यहं मत्वा परां तृप्ति गतः प्रभो । अनस्त्वं प्रार्थयाम्यद्य नवकाण्डमितं त्विदम् ॥ ११० ॥
जानन्दरामचरितं न विरूपय राघव । वर्जयिष्यामि खेट्ठाख्यं तदा दुःखमय प्रभो ॥ १११ ॥
है। मैंने जो सौ करोड़ श्लोकोंमें आपके चरित्रका वर्णन किया है, उसे हे रघुनन्दन ! आप कुछ समय पहले कई भागोंम बाँट चुके हैं। ८२-६३ ॥ उनमेंसे जो भाग भारतवर्षके लिये चुना था, उसके सार अंशको लेकर जो कथानक अच्छे थे, सुननेमात्रसे समझमें आ जाते वा कानोंको प्रिय लगते थे, उन्हींके आधारपर व्यासदेवने अष्टादश पुराणों तथा उपपुराणोंको बना दिया है। इनके अतिरिक्त भी बहुतसे ऋषि उन्हींकी सहायतासे षट्शास्त्र आदि कितने ही शास्त्र बनायेंगे ॥ ९४-९६ ॥ कुछ ही समय बीतनेके बाद कैकेयीकी दुष्टतासे आपको चौदह वर्ष पर्यन्त जो दुःख झेलने पड़े थे, सीताके विरह आदिका दुःख जो चौबीस हजार श्लोकोंसे कुछ कम है, उतने ही चरित्रकी नींव मुझ वाल्मीकिका बनाया हुआ मानेंगे। इस भावी स्थितिको समझकर ही मैने आपके उतने श्लोकमय चरित्रको विशेष उत्साहके साथ लिखा है। सब लोगोंको चाहिये कि सबेरे युद्ध-चरित्र तथा दोपहरके बाद शोक-चरित्रका श्रवण करें युद्धचरित्रका मतलब महाभारत, रति-चरित्रका श्रीमद्भागवत तथा बाकी चौबीस हजार श्लोकोंका मतलब शोकचरित्र माना गया है। आपके भावी वरदानके प्रभावसे आपका यह आनन्दरामायण, सौ करोड़ श्लोकोंवाला मेरा बनाया रामचरित्र, नौ काण्डोंवाला द्वादश सहस्रात्मक रामचरित्र एवं एक सौ नौ श्लोकोंवाली रामायण ये सब पृथ्वीतलमें कही न कही रहेंगे ही। आपके भावी वरदानसे एक सुन्दर कीर्तनमाला, जिसमें १०८ सर्ग हैं, सुमेरुकी मनकासदृश अग्यसे लगी है, इसका कोई भी खण्डन नहीं कर सकेगा। इस नौ काण्डोंवाले चरित्रको लोग आपकी प्रसन्नताके लिए तबतक सम्हालेंगे, जब तक कि संसारमें सूर्य-चन्द्र विद्यमान रहेंगे ॥ ९७-१०६ ॥ मेरे बनाये सौ करोड़ श्लोकोंवाले रामचरित्रका खण्डन करके जब व्यासजीने १८ पुराण बनाये थे, तब उससे किसी प्रकारका कल्याण देखकर ही मैं चुप रह गया था। उस समय मेरे विचारमे आया कि आगे चलकर कलियुगमें लोग मन्दबुद्धि तथा अल्पायु होंगे। इस कारण वे मेरे इतने बड़े ग्रन्थको कभी नहीं सुन सकेंगे। व्यासजीने मेरे काव्यसे कथायें अलग करके जो पुराणोंको बनाया, सो बहुत अच्छा किया। इससे
४७२ आनन्दरामायणे [सर्गः १३
भविष्यति सुखवृद्धि र्चेतसाऽपि प्रमोदनम् । अभाने कथयन्त्येव येन ते शिक्षितं भुवि ॥११२॥
भविष्यति मृषा नैव येन दृष्टास्तु देवताः । भविष्यंति जनाश्चापि मम्यन्मत्कविता भवेत् ॥११३॥
जना हसंतु सर्वत्र दृष्टानां दशनं विना । आत्मवान्कश्चाद्य वस्त्रेण रुद्धा कौतुकदर्शनात् ॥११४॥
हास्यं लक्ष्मीसूचकं हि हसितं मंगलप्रदायकम् । धावन्यं हसितं चैतद्धस्यात्कृष्टं न किंचन ॥११५॥
नारी स्मितवदना यस्मिन्गेहे तन्मन्दिरं स्मृतम् । लक्ष्मीरूपाऽवस्थिताऽने तत्र निश्चय रघुनन्दन ॥११६॥
स एव पुरुषो धन्यो यस्य स्यान्न स्मिताननम् । स एव पुरुषो निन्द्यो यस्यास्यं क्रोधसंयुतम् । ११७॥
प्रमदा निन्दिता सापि यस्याः क्रोधयुतं मुखम् । गर्हयन्त्यत्रहास्यं हि सर्वदा ते मुनीश्वराः ॥११८॥
अतस्त्वां प्रार्थयाम्येतन्मानय त्वं वचो मम । न करोमि विधिर्गर्वं त्वां तातं वेद्मि राघव । ११९॥
जानयिष्यामि शरणं त्वाहं चतुराननम् । एवं वाल्मीकिरचनमंगीकृत्य रघूत्तमः ॥१२०॥
एवमस्त्विति तं प्राह मुनिं तष्ठ हसन्निव । तद्रामवचनं श्रुत्वा वाल्मीकिस्तुष्टमानसः ॥१२१॥
शिष्यं संप्रेष्य ब्रह्माद्यमानायामास पिप्पलात् । अश्वाः सर्वे समुत्तस्थुर्ययुस्ते नगरीं प्रति ॥१२२.।
ययौ सैन्येन शत्रुघ्नो रामपार्श्वे स्थितोऽभवत् । रामपुत्रौ ययायातौ पितुरग्रे निषेद्तुः ॥१२३॥
रामाज्ञया मारवाहन्तो दन्त्यैर्मज्जनः । कुवेरेण सुधावृष्टिः सुमन्त्राद्याः सुजीविताः ॥१२४ ।
सुमन्त्राद्या राज्ञाऽऽत्मरक्षणं राघव ययुः । नत्वा रामं सुमंत्रः स रामपार्श्वे स्थितोऽभवत् । १२५॥
दृष्टः सुरैर्यावदिंद्रः प्राप्तं प्रणम्य स, गर्वं गत्वाऽब्रवीद्ब्रह्मा मया त्वदपराधितम् १२६॥
तत्क्षमस्व रघुश्रेष्ठ स्वस्वाभ्याः सर्वदा वयम् । पुराऽस्माकं हितार्थे हि त्वया रामावतीर्णते ॥१२७॥
मुझे बड़ी प्रसन्नता है, अर्थात् आज आप से प्रार्थना करता हूँ कि इस मेरे करवाएने आनन्दरामायणकी शोभा न बिगाड़िए, यदि आप इसके लिए न हँसा सजा तक तब तो बड़ा अनर्थ होगा। मेरी रामायण किसी कामकी नहीं रह जायगी इसीलिए मैं आपस कहता हूँ कि कोई ऐसा उपाय कीजिए, जिससे आपके आदेशकी विगा प्रज्ञाका कन्तर न घट और हनता तथा मनुषा की प्रसन्न रहे और मेरी कवित्व भी सन्द हो जाय १०७-११३ । लोग हँस सहा किन्तु उनके दाँतन दिखायी द। किसी कौतुकको देखकर यदि लोगोंको हँसा आ जाय तो कपडस मुंह रोक्कर हंसें ॥ ११४ ॥ क्योंकि हंसी लक्ष्मीमूलक है, हँसी सबको मुख देनेवाली वस्तु है और हंसी मंगलमयी मानी गयी है। कहनेका भाव यह कि हँसीसे बढ़कर कोई बात ही हीं नहीं ।। ११५ ।। जिस घरमे मुस्काती हुई नारी रहना है, वह घर देवालयके समान पवित्र होता है और लक्ष्मी वहाँपर ही निवास करती है। हे रघुनन्दन ! इसमें किसी प्रकारका संशय नहीं है ॥ ११६ ॥ वही पुरुष धन्य है, जिसका मुखमण्डल सदा हसता हुआ दीखे और बही पुरुष अधम है, जिसका मुख सदा कोषमे युत्त रहे ॥ ११७॥ वह स्त्री भी निन्द्य है, जो सदा क्रोधयुक्त मुँह बनाये रहती है। बडे-बड़े मुनिगण आदि हास्यको सदासे निन्दा करते आय हैं ११८ ॥ बसअत मैं बापस प्रार्थना करता हूँ कि मेरी यह बात मान लीजिए बह्म किसी तरह अभिमान न करके आपको अपने पिताके समान मानते हैं । ११९ ॥ मैं स्वय जाकर ब्रह्माको आपका लज्जाब करूंगा वे आपसे क्षमा मांगेंगे । रामने वाल्मीकिके वाक्यगौरवको समझकर उनकी बात मान ली और कहा कि जैसा आप कहते हैं, वैसा ही होगा। रामकी स्वीकृति सुनकर वाल्मीकि परम प्रसन्न हुए और अपना एक शिष्य भेजकर उस पीपलपरसे ब्रह्माजीको बुलवाया । यह हो जानेपर शत्रुघ्न तथा लव-कुशके जो घोडे अबतक रास्तेमें बँधे थे, वे उठ खड़े हुए और अयोध्याको वापस चल दिये । शत्रुघ्न और लव-कुश भी अपनी सेना लिये हुए आये और रामके पास आकर बैठ गये ॥ १२०-१२३॥ रामकी आज्ञासे उन्होंने अस्त्रहारोंको छोड़ दिया । इन्द्रने आकर अमृतकी वर्षा की, जिससे सुमन्त्रादि जो योद्धा मूर्च्छित पड़े थे, वे सचेत हो गये ।। १२४ ।। इसके अनन्तर युद्धको छांटनेके लिए गद्दे हुए लोग रामके पास आये। सुमन्त्र रायके पास आकर बैठ गये। थोडी देर बाद देवताओंके साथ-साथ इन्द्र और ब्रह्मा भी रामकी सभामें आये और बैठ गये । रामको प्रणाम