श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः १३ ] उत्तरकाण्डम् १५१
सर्गः १३ ] उत्तरकाण्डम् १५१
इन्द्रजिन्नाम तस्याभून्नराधिप शृणुष्व तत् । रावणादपि यश्चासीद्वलिष्ठः समरप्रियः ॥८२॥
मेघनादादयश्चेति तस्मान्प्रोक्तं तवाग्रतः । एतन्मुनीश्वरैः पूर्वं तन्निमित्त मयेरितम् ॥८३॥
रावणो विजयी लोकान्सर्वान् जित्वा क्रमेण तु । जित्वा वह्निं निरृतिं च वायुमीशं ययौ मुदा ॥८४॥
कैलासं तोलयामास बाहुभिः परिघोपमैः । तदा भीता शिवं देवी दोर्भ्यां सा परिषस्वजे ॥८५॥
शिवोऽपि वामपादाङ्गुष्ठेन कैलासमुद्धर्नि । भारं दत्त्वा गिरिं त्वेवं चकाराधः शनैः शनैः ॥८६॥
तदा तद्गिरिमग्नप्रबलिसन्धिषु दोर्लताः । विंशत्यपि रावणस्य न ता अगमन्बहिः क्षणात् ॥८७॥
स तेनाक्रन्दयामास स्तम्भसम्बद्धचोरवत् । तदा नन्दीश्वरेणापि शप्तोऽयं राक्षसेश्वरः ॥८८॥
यच्चलं कर्म यस्यास्ते कपितुल्यमतोऽसुर । वानरैर्मानुषैश्चैव नाशं गच्छसि कोविदैः ॥८९॥
ततः कालान्तरेणाथ शम्भुनैव विमोचितः । शप्तोऽप्यगणयन्वाक्यं ययौ हैहयपत्तनम् ॥९०॥
बहिर्गतं नृपं श्रुत्वा सहस्रार्जुननामकम् । मध्याह्ने रावणश्चक्रे रेवायाँ शिवपूजनम् ॥९१॥
अधस्तस्मान्नर्मदायां भुजपार्यैश्च सेतुवत् । स्तम्भयामास नीरौघं जलक्रीडां गतोऽर्जुनः ॥९२॥
चेष्टितोऽयुतनारीभिस्तत्तोयं रावणं तदा । प्लावयामास ध्यानस्थं ज्ञातस्तत्कर्मचार्जुनः ॥९३॥
मुक्त्वा ध्यानादिकं सर्वं युद्धं चक्रेऽर्जुनेन सः । तेन बद्धो दशग्रीवः कण्ठे रन्तुं सुताय तम् ॥९४॥
ददौ दशाननं प्रीत्या काष्ठनिर्मितहस्तिवत् । कियत्कालान्तरेणैव पुलस्त्येन स मोचितः ॥९५॥
ततोऽतिबलमासाद्य जिघांसुर्हरिपुङ्गवम् । गतो ध्यानमपीनं पश्चाद्वां शनैर्ययौ ॥९६॥
धृतस्तेनैव कक्षेण वालिना दशकन्धरः । भ्रामयित्वा तु चतुरः समुद्रान् रावणं द्रुतं ॥९७॥
मेघनादसे छुड़ाया और राक्षसोंको वर देकर ब्रह्मा अपने भवनको चले गये ॥ ८१ ॥ हे रघूत्तम ! तबसे मेघनाद-का इन्द्रजित् नाम पड़ा । जोकि रावणसे भी अधिक बलवान् तथा युद्धन था ॥ ८२ ॥ इसलिये मैने आपके सामने मेघनादका पहिले नाम लिया । इस ऋषियोंने इसका कारण पहले ही बता दिया था ॥ ८३ ॥ विजयशील रावणने क्रमशः सब लोकोंको जीतकर वह्नि निर्ऋति, वायु तथा ईशानको जीत लिया और बादमें अपनी अर्गलाके समान भुजाओंसे कैलास पर्वतको उठाने लगा । उस समय डरकर पार्वती देवी शिवजी से लिपट गयी ॥ ८४ ॥ ८५ ॥ पश्चात् शिवने अपने बायें पांवके अङ्गूठेसे उस पर्वतको दबा दिया । जिससे कैलास धीरे धीरे नीचे धंसने लगा ॥ ८६ ॥ उस समय पर्वतके नीचे आ जानेसे रावणकी बीसों भुजायें दब गयीं और वह खम्भेसे बँधे हुए चोरकी तरह चिल्लाने लगा । उस समय नन्दीश्वरने भी रावणको शाप देते हुए कहा- ॥ ८७ । ८८ ॥ हे असुर ! तुम्हारेसे बानरके समान चंचलता होनेके कारण युद्धवानोंगे तथा मनुष्योंसे ही तुम्हारी मृत्यु होगी ॥ ८९ । बहुत कालके बाद शिवजीने उसे छुड़ा दिया । छूटनेके साथ ही वह शापको भूल गया और शिवजीके वचनका तिरस्कार करके युद्ध करनेके लिए हैहयराजके नगरको गया ॥ ९० । वहाँ जाकर पूछने तां ज्ञात हुआ कि सहस्रार्जुन नामवाला वहाँका राजा वहाँ उपस्थित नहीं है । तब रावण नर्मदा नदीके किनारे जाकर दसके बीचमें एक टापूपर बैठकर मध्याह्न समयम शिवजीका पूजन करने लगा । ९१ ॥ उससे नीचकी ओर राजा सहस्रार्जुन जलक्रीड़ा कर रहा था । उसने अपनी भुजारूपी सेतुसे खेल-खलम उस नदीके जलप्रवाहको रोक दिया । उस समय हजारों स्त्रियाँ उसे घेरकर जलक्रीड़ा कर रही थीं । परन्तु उस जलप्रवाहके रुक जानेसे शिवके ध्यानमे स्थित रावण जलमें बहने लगा । इस घटनाको देखकर उसने जान लिया कि यह काम सहस्रार्जुनका है । यह जानत ही वह तुरन्त ध्यान छोड़कर सहस्रार्जुनके पास गया और उनको युद्धके लिए ललकारने लगा । तब उसने रावणके गलेमें रस्सी डालकर बांध लिया और अपने पुत्रको खेलनेके लिए लकड़ीके बने हुए हाथीकी तरह दे दिया । कुछ दिनोंके बाद पुलस्त्य मुनिने जाकर उसको वहींस छुड़ाया ॥ ९२-९५ ॥ बादमें रावण बल संचय करके वानरश्रेष्ठ बालिको मारनेकी इच्छासे समुद्रके किनारे ध्यान धरकर बैठे हुए वानरराजके पास जाकर धीरेसे पीछे
१६२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२
किष्किन्धां स्वां ययौ वेगादग्रे दृष्ट्वांगदं शिशुम्। प्रीत्या तं चुंबनं दातुं दोर्भ्यां कण्ठे न्यवेशयत् ॥९८॥
तदा बाहोश्चलनात्काक्षाद्यः पतितो भुवि। तं दृष्ट्वा स्वजनान् स्वीय दर्शयामास वै मुदा ॥९९॥
प्रेङ्खस्योपरि पुत्रस्य बबन्धाधोमुखं चिरम्। आत्मानमाङ्कदमूत्रस्य धारामीशाननोऽसुरः। १००॥
स्वयमेव ततो बाली बहुकाले गते मयि। ददवाज्ञां दशान्याय तेन सख्यं चकार सः। १०१॥
रावणः स पुनः स्थित्वा पुष्पंके व्यचरत्सुखम्। पश्यन्नानाविधान्वीरान् ययौ पातालमुत्तमम्॥ १०२॥
तत्र दृष्ट्वा पुरं रम्यं बलेः कोटिरविप्रभम्। तत्तजसाहतेऽहस्तत्पुष्पकं न चचाल वै ॥१०३॥
ततः स्वयं ययौ तूर्णामक एव दशाननः। पुरं प्रविश्य तद्द्वारि त्वां ददर्श च वामनम् १०४॥
कोटिसूर्यप्रतीकाशं पीतकौशेयवासमम्। चतुर्भुजं सपतनीकं द्वाररक्षणतत्परम् ॥१०५॥
त्वां प्राह स दशग्रीवः कोऽत्र राजाऽस्ति मां वद। तूष्णीं स्थितो वामनस्त्वमपि नोत्तरं रिपोः। १०६॥
तदा त्वां बधिरं मन्वा स विवेश बलेर्गृहम्। तत्र दृष्ट्वा बलिं पत्न्या सार्धं क्रीडनकण्डुकम् ॥१०७॥
तस्थौ तत्र भृशं तूष्णीं बलेर्लक्ष्मीं व्यलोकयत्। तावद्दूरे बलेर्हस्तात्क्रीडापासोऽपतद्भुवि ॥१०८॥
तमानेतुं रावणाय बलिराज्ञापयत्तदा। रावणोऽपि तमानेतुं ययौ पासांतिकं जवात्। १०९॥
प्रोच्चचाल भुवः पासं करेण न चचाल सः। विंशदोर्भिः क्रमेणायं यावत्पास प्रचालयत् ॥११०॥
तावदंगुलयः सर्वाः पासभारेण पीडिताः। न निष्क्रमुः पासतलाच्चूर्णिता रुधिराप्लुताः ॥१११॥
सदा चुक्रोश दीनं स विह्वल दशाननः। ततो विहस्य दास्या तं पायमानीय वै बलिः ॥११२॥
धिग्धिक्कृत्या रावणं तं गृहान्निष्क्रामयद्बहिः। ततो धृतो राजहंसस्तदुच्छिष्टैस्तु पोषितः ॥११३॥
की ओर जा खड़ा हुआ ॥९६॥ तब वालीने उसको कांखत उलटा दबाकर चारों समुद्रोंके भीतरफि घुमाया ॥९७॥ पश्चात् अपनी किष्किन्धा पुरीमें ले गया। वहां जाकर उसने अपने पुत्र अङ्गदको देखा। ज्यों ही वह अङ्गदके प्रेममें चूमनेके लिए अपनी भुजाओंमें उसे कण्ठपर बैठाने लगा ॥ ९८ । त्यां ही हाथोंके हिलनेसे रावण कांखमे से निकलकर गिर पड़ा। तबो उसको अपने प्राणप्रतापूर्वक स्वजनोंको दिखलाने लगे ॥९९॥ उसके ऊपर पुत्र अङ्गदका पालना बांधकर नीचे रावणका मुख करके उन्होंने बहुत दिनोंतक बांधकर रक्खा। जिससे रावणका मुख अङ्गदका मूत्रधरामं डूबता रहा। १००॥ तदनन्तर स्वयं बलीने ही रावणको जानेकी आज्ञा दे दी और उससे मित्रता कर ली ॥ १०१॥ रावण पुनः पुष्पक विमानपर सवार होकर आनंदके साथ विचरने लगा। अनेक वीरोंको देखता हुआ वह पातालम जा पहुँचा॥ १०२॥ वहाँ कोटिसूर्यके सदृश प्रकाशमयो उस नगरीके तेजसे प्रतिहत होकर पुष्पय विमानकी गति रुक गया ॥ १०३ । तब उससे उतरकर दशानन चुपचाप अकेला ही पुरीकी ओर चल पड़ा। उसने पुरॉमें प्रवेश करने-के बाद वामनरूपधारी आपका देखा ।१०४॥ करारों सूर्यके समान तेजस्वी आपने पीताम्बर धारण कर रक्खा था। आप चतुर्भुज होकर लक्ष्मीके साथ वहीं रहते हुए राजा बलिके द्वारकी रक्षा कर रह थे ॥ १०५ ॥ उस दशग्रीवन आपसे पूछा कि इस नगरका राज कौन है, बताओ। रावण कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा, पर आपने उसे अपना शत्रु समझकर कुछ उत्तर नहीं दिया ॥ १०६ ॥ तब आपको बधिर समझकर वह बलिक भवनमें घुसा। वहाँ उसने राजा बलिकी अपनी स्त्रीके साथ चौसर खेलत देखा। १०७। वहां चुपकेसे खड़ा होकर वह बलिकी राज्यलक्ष्मीको क्षणभर देखता रहा। इतनेमें राजा बलिके हाथसे छूटककर पाँसा दूर जा गिरा ॥ १०८। उसी समय बलिने रावणको उस पांसेको उठा लानेके लिए कहा रावण भी उसे उठानेके लिये शीघ्र ही उसके पास जा पहुँचा ॥ १०९॥ वह उसे एक हाथसे उठाने लगा। पर वह पाँसा हिल्ल तक नहीं। तब रावणने दो, तीन, चार करके बीसों हाथोंमें उस पाँसेको उठानेकी चेष्टा की, परन्तु तौ भी वह नहीं हिला ॥ ११० ॥ प्रत्युत उसके सब हाथोंकी अंगुलियाँ पाँसेके वाससे दब गयीं और कुचल जानेसे खून निकलने लगा परन्तु वे निकलीं नहीं । १११ । अतएव दशानन बहुत जोरसे चिल्लाने लगा। तब
सर्गः ११ ]
सारकाण्डम्
१५४
अश्वानां शकृतं नीत्वा क्षिपत्प्रत्यहं बहिः । एकदा द्वारे गत्वा प्रार्थयामास त्वां मुहुः ॥ ११४ ॥
त्वया स्वपादलग्नः स्वपदांगुष्ठेन खेडितः । तदाऽतिमुदितो लंकां चिरकालेन रावणः ॥ ११५ ॥
ययौ मेने निजं जन्म द्वितीयं जातमद्य वै । रावणः परमप्रीत एव लोकान्मनावशन् ॥ ११६ ॥
कर्तुं वांस्त्वनवशाञ्जिग्ये व्यभ्राम पुष्पकस्थितः ।
दृष्ट्वैकदाऽत्र साकेते पूर्वजं तव दीक्षितम् ॥ ११७ ॥
अनरण्यं संगरेण चकार पतितं रणे ।
तदा शप्तोऽनरन्येन मद्वंशे रघुनन्दनः ॥ ११८ ॥
भूत्वा त्वां सगरेणैव सकुटुम्बं बधिष्यति इत्युक्त्वा स गतो नाकं रावणोऽपि पुरीं ययौ ॥ ११९ ॥
सनत्कुमारमेकांते स राक्षसोंऽथैकदासुरः । नत्वा पप्रच्छ देवेषु को वा श्रेष्ठेति सादरम् ॥ १२० ॥
मुनिः प्राह महाविष्णुं तच्छ्रुत्वा प्राह तं पुनः ।
विष्णुना ये हता युद्धे राक्षसाद्या लभंति काम् ॥ १२१ ॥
गतिं चेति मुनिः प्राह ते मुक्तिं यांति दुर्लभाम् ।
पुनः पप्रच्छ तं नत्वा केनोपायेन वै हरेः ॥ १२२ ॥
भविष्यत्यत्र मे मृत्युस्तदा तं मुनिरब्रवीत् । त्रेतायां नररूपेण रामो विष्णुर्भविष्यति ॥ १२३ ॥
अयोध्यायां तदा तेन कृत्वा वैरं सुदारुणम् । तस्माद्वधं कुरुष्व स्वमात्मनः परमात्मनः ॥ १२४ ॥
तेन गच्छसि मुक्तिं त्वं तच्छ्रुत्वा स दशाननः ।
विरोधार्थं जनकजामहरद्गौतमीनटात् १२५ ॥
अशोके रक्षिता तेन मातृवत्स्ववधेच्छया ।
राजा बलिकी एक दासीने शीघ्र बलिको उठाकर राजाको दे दिया ॥ ११२ ॥ बलिने उसी समय रावणको धिक्कार-कर अपने महलसे निकाल दिया। बाहर राजा बलिके दूतोंने उसको फिर पकड़ लिया और अपने जूठनसे उसका पोषण करने लगे ॥ ११३ ॥ रावणको गोदामेली लींड उठा-उठाकर बाहर फेंक आनेका काम सौंपा गया। कुछ दिनों बाद एक दिन रावण द्वारपर स्थित आप विष्णुके पास आकर नगरके बाहर जाने देनेकी प्रार्थना करन लगा और आपके चरणोंपर गिर पड़ा। तब आपने अपने पाँवके अङ्गूठेसे उसको आकाशकी ओर उछाल दिया। जिससे रावण बहुत कालके बाद प्रसन्नतापूर्वक अपनी लङ्कामे जा पहुँचा ॥ ११४ ॥ ११५ । वह आज मेरा दूसरा जन्म हुआ है, ऐसा मानने लगा। तब वही रावण पुनः प्रसन्न होकर पूर्ववत् सब लोकोंको अपने वशमे करनेकी इच्छासे पुष्पकपर चढ़कर नित्यप्रति इधर उधर भ्रमण करन लगा। उसने एक दिन अयोध्यामे आपके पूर्वज दीक्षित ( सोमयागकी दीक्षा लिये हुए ) राजा अनरण्यको देखा। उनके साथ युद्ध करके रावणने रणमे उन्हे हरा दिया। तब अनरण्यने उसको शाप दिया कि मेरे वंशमे जन्म लेकर रघुनन्दन राम सकुटुम्ब तुमको मारेंगे ॥ ११६ । ११८ । इतना कहकर वे स्वर्ग सिधार गये तथा रावण अपने नगरको चला गया ॥ ११९ ॥ उस राक्षसने एक दिन सनत्कुमारको नमस्कार करके एकान्तमें पूछा-हे मुने ! कृपा करके मुझे यह बताइए कि देवताओंमे सबसे श्रेष्ठ देवता कौन है ? ॥ १२० ॥ मुनिने विष्णुको श्रेष्ठ बताया। यह सुनकर वह असुर रावण फिर बोला कि विष्णुने आजतक जिन राक्षसोको मारा है, वे किस गतिको प्राप्त हुए हैं ? । १२१ ॥ मुनिने कहा-वे सब उत्तम तथा दुर्लभ मुक्तिको प्राप्त हुए हैं। उस राक्षसन फिर प्रश्न किया कि किस उपायसे मेरी मृत्यु श्रीहरिके हाथो हो सकती है ? मुनिने उसके प्रश्नका उत्तर देते हुए कहा कि त्रेतायुगमे विष्णु अयोध्यामें मनुष्यका रूप धारण करेंगे । १२२ ॥ १२३ । उस समय उनसे घोर वैर करके उन परमात्मा रामके हाथों तुम अपना वध करवा लेना ॥ १२४ ॥ उससे तुम मुक्तिपदको प्राप्त हो जाओगे यह बात मनमें रखकर रावणने रामके साथ विरोध करनेके लिए ही गौतमी नदीके तटसे जनकनन्दिनी सीताका
१५४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १३
एकदा नारदं दृष्ट्वा नत्वा पप्रच्छ रावणः ।१२६॥
भगवन् ब्रूहि मे योद्धुं कुत्र सन्ति महाबलाः ।
योद्धुमिच्छामि बलिभिस्त्वं जानासि जगत्त्रयम्॥१२७॥
मुनिर्ध्यात्वा चिरञ्चाह श्वेतद्वीपनिवासिनः । महाबला महाकायास्तत्र याहि महामते ॥१२८॥
विष्णुपूजारता ये वै विष्णुना निहताश्च ये । त एव तत्र सजाता अजेयाश्च सुरासुरैः ॥१२९॥
तच्छ्रुत्वा रावणो वेगात्सन्त्रिभिः पुष्पकेण तैः ।
योद्धुकामो ययौ गर्वाच्छ्वेतद्वीपान्तिकं मुदा ॥१३०॥
तत्प्रभाहतनेत्रार्कं पुष्पकं नाचलत्पुरः ।
त्यक्त्वा विमानं प्रययौ स्वयमेव दशाननः ॥१३१ ।
प्रविशन्नेव तद्द्दीपं धृतो हस्तेन योषिता ।
गच्छन्त्या कस्यचिद्दास्या पुष्पाण्यानयितुं वनम् ॥१३२ ।
तया पृष्टः कुतः कोऽसि प्रेषितः केन वा वद । इत्युक्त्वा लीलया स्त्रीभिर्हसतीभिर्मुहुर्मुहुः ॥१३३ ।
मुखेषु ताडितो हस्तैर्भ्रामितोऽथोत्प्लुतं चिरम् । अन्यैकं तत्पदं ताभिः क्षिप्तः कंदुकवन्मुहुः ॥१३४॥
परस्परं हि क्रीडद्भिः कया त्यक्तस्तु लीलया । पपात परलंकायां क्रौंचायाः शौचकूपके ॥१३५।
कृच्छ्राद्धस्ताद्विनिर्मुक्तस्तासां स्त्रीणां दशाननः ।
आश्चर्यमतुलं लब्ध्वा चिन्तयामास दुर्मतिः ॥१३६।
विष्णुना ये हता युद्धे तेषामेतादृशं बलम् । तन्नैव निहतस्तेन श्वेतद्वीप व्रजाम्यहम् ॥१३७।
मयि विष्णूर्यथा कुप्येत्तथा कार्यं करोम्यहम् ।
इति निश्चित्य वैदेहीं जहार रावणो वनात् ॥१३८॥
हरण कर लिया था ॥ १२५ । अपने बच्चोंकी इच्छासे ही उसने सीताको अशोकवनमें रखकर माताके समान रक्षा की थी। एक बार रावणने नारद मुनिको देखकर नमस्कार किया और पूछा -॥ १२६ ॥ हे भगवन् ! आप कृपा करके यह बताइये कि मुझसे लड़नेवाले बलवान् लोग कहाँ हैं ? मै बलवानोंसे युद्ध करना चाहता हूँ आप तीनों लोकके लोगोंको जानते हैं ॥ १२७ । मुनिने स्तिक देर ध्यान करके कहा कि श्वेतद्वीपके लोग बड़े भारी शरीरवाले होते हैं और वे नित्य भगवान्की पूजामे लगे रहते हैं, जो लोग विष्णुके हाथों मारे जाते हैं, वे ही सुरों तथा असुरोंसे अजय होकर वहाँ जन्म लेते हैं ॥ १२८ ॥ १२९ । यह सुनकर प्रसन्न रावण अपने मन्त्रियोंके साथ पुष्पक विमानपर सवार होकर गर्व तथा दंभके साथ उन लोगोंसे युद्ध करनेकी इच्छासे श्वेतद्वीपकी ओर चल पड़ा । १३० । परन्तु उस द्वीपकी कान्तिसे चौंधियाकर उसका विमान रुक गया । तब रावण विमान छोड़कर पैदल चलने लगा । १३१ ॥ द्वीपमें घुसते ही एक स्त्रीने उसको एक हाथसे पकड़ लिया। वह किसीकी दासी थी और वनमें पुष्प लेने जा रही थी ॥ १३२ । उस स्त्रीने रावणसे पूछा कि तू कौन है और तुझे यहाँ किसने भेजा है ? बता। इतना कहकर कुछ स्त्रियां बारम्बार हँसकर लीलापूर्वक उसके मुखपर तमाचे लगाने लगीं। बादमें उसका पाँव पकड़ तथा उसको औंधे सिर घुमाकर गेंदकी भाँति दूर फेंक दिया । १३३ ॥ १३४ ॥ आपसमें एक दूसरेके साथ खेलती हुई किसी एक स्त्रीने ही यह काम किया था। इस प्रकार फेंकनेपर रावण परलंकामें क्रौंच के शौचालयमें जा गिरा। १३५ ।। इस प्रकार रावण उन स्त्रियोंके हाथोंसे बड़ी कठिनईसे छूटा और आश्चर्यचकित होकर यह दुष्ट विचारने लगा -॥ १३६ ॥ ओहो ! विष्णु जिनको मारते हैं, वे लोग इतने बलवान् हो जाते हैं। इसलिए मैं भी उनसे मारा जाकर श्वेतद्वीपमें जाऊँगा ॥ १३७ । अब मैं वही काम करूँगा कि जिससे विष्णु मेरे ऊपर क्रुद्ध हों यही सोचकर वनमें रावणने