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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १२ ] सारकाण्डम् १४५

सर्गः १२ ] सारकाण्डम् १४५

शिखाबंधनमोक्षार्थं शबरी भवबंधनात् । कृता मुक्ता तु रामेण जलस्पर्शनहेतवे ॥१८८॥
नेत्रयोर्निहतो वाली दत्तं तद्रुधिरं तदा । काथिलंकार्युरी दग्धा कुंभकर्णस्तथौदनः । १८९॥
पक्वान्नमिंद्रजिज् ज्ञेयः शाकार्थं राक्षसा हताः । वरान्नं सारणो ज्ञेयः प्रहस्तो वटकः स्मृतः ॥१९०॥
निकुंभः पर्पटो ज्ञेयः कुंभस्तु लवणं स्मृतः । पायसार्थं कालनेमिस्त्वतिकायः स शर्करः ॥१९१॥
क्षीरमैरावणो ज्ञेयो घृतं मैरावणः स्मृतः । दध्योदनः समाम्नौ तु आहवे च स रावणः ॥१९२॥
हत्वा निवेदितः पात्रे तस्य कालानलस्य च । उच्छिष्टवलिमत्यागः केशत्वक्थिक्षसादिनाम् ॥१९३॥
संत्यागोऽत्र रणे ज्ञेयस्तदा तृप्तो बभूव सः । ततो रणाध्वरस्यात्र राघवेण विसर्जनम् ॥१९४॥
अयोध्यायां प्रवेशो हि कृतस्तन्मे वदाम्यहम् । अध्वरावभृथस्नानं ज्ञेयं राज्याभिषेचनम् ॥१९५॥
मंगलानि समस्तानि यज्ञांगविहितानि हि । ज्ञातव्यानीति रामेण रणयागो विसर्जितः ॥१९६॥
एवं प्रोक्तो मया देवि रणयागः सविस्तरः । रामोऽथ परमारमापि कार्याध्यक्षोऽतिनिर्मलः॥१९७॥
कर्तृत्वदिविहीनोऽपि निर्विकारोऽपि सर्वदा । स्वाऽनन्देनापि संतुष्टो लोकानामुपदेशकत् । १९८॥
चकार विविधान् धर्मान् गार्हस्थ्यमनुलंघ्य च । न पर्यदेवन् विधवा न च व्यालकृतं भयम् ॥१९९॥
न व्याधिजं भय चासीद्रामे राज्यं प्रशासति । औरसानिव रामोऽपि जुगोप पितृवत् प्रजाः ॥२००॥
सीतया बन्धुभिः सार्द्धं साकेते सुखमाप सः । इदं युद्धचरित्रं ते प्रोक्तं देवि मया तव ॥२०१॥

इति शतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानंदरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे
युद्धचरिते रामराज्याभिषेकवर्णनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥


तृप्तियं दी ॥ १८७॥ जिसकी गाँठ खोलनेके जगह रामने शबरीको संसारबन्धनसे छुड़ाकर मुक्त कर दिया । रामने बालीको मारकर उसके रुधिररूपी जलसे नेत्रोंमें स्पर्श किया । लंकाको जलाकर कालानलके लिये दाल तथा कढ़ी बनायी । अर्थात् लंका दाल-कढ़ीके स्थानमे गिनी गयी । कुम्भकर्णरूपी भात, मेघनादरूपो पक्वान और सब राक्षसोंका शाक बना । अन्य उत्तम पदार्थोंके स्थानपर सारण मारा गया । प्रहस्त बड़ा, निकुम्भ पापड़, कुम्भ नमक, कालनेमि खीर, अतिकाय शक्कर, ऐरावणरूपी दूधमे मैरावणरूपी घी तथा दधिभक्तके स्थानपर रावणको मारकर रामने कालानलके पात्रमें परोस दिया । कालानलने इन सबका भोजन करके केश, चर्म तथा अस्थियोंका जूठन रणमे छोड़ दिया । तब वह तृप्त हुआ । उसके पश्चात् रामका अयोध्यामें प्रवेश करना ही रणरूपी यज्ञकी समाप्ति अर्थात् रणयज्ञका विसर्जन हुआ । यहाँ रामका राज्याभिषेक ही यज्ञके अन्तका अवभृथस्नान था ॥ १८८–१९५ ॥ अन्यान्य मांगलिक कार्य उस यज्ञके अंग थे । इस प्रकार रामने सांगोपांग रणयज्ञ पूरा किया ॥ १९६ ॥ हे देवि ! मैने तुमको उपर्युक्त प्रकारसे समस्त रणयाग कह सुनाया । तदनंतर साक्षात् परमात्मा, कार्यसमुदायके अधिष्ठाता, कर्तृत्वादि अभिमानसे रहित, सदा निर्विकार स्वरूप, निज आनन्दसे ही संतुष्ट तथा सब प्राणियोंको सदुपदेश देनेवाले राम भी गृहस्थधर्मका पालन करते हुए अनेक धर्मोका आचरण करने लगे । उनके राज्यकालमें कोई भी स्त्री विधवा होकर रोती नहीं थी । किसोको साँप तथा व्याघ्र आदिका भय नहीं था और न किसीको रोगका ही भय था। रामने भी समस्त प्रजाको, पिता जिस प्रकार अपने सगे लड़कोंका पालन करता है, उसी प्रकार पालन किया । हे देवि ! यह मैंने तुमको रामका युद्धचरित्र कह सुनाया ॥ १९७–२०१ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकांडे युद्धचरित्रे रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां रामराज्याभिषेकवर्णनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥

१४६
आनन्दरामायणे
[ सर्गः १३

त्रयोदशः सर्गः
( अगस्त्य-रामसंवाद )

श्रीशिव उवाच

एकदा राघवं द्रष्टुं मुनिभिः कुम्भसम्भवः। ययौ रामेण सन्मानमानितः स उपाविशत् ॥ १ ॥
उपविष्टाः प्रहृष्टाश्च मुनयो रामपूजिताः। संसृष्टकुशलाः सर्वे रामं कुशलमब्रुवन् ॥ २ ॥
कुशलं ते महाबाहो सर्वत्र रघुनंदन। दिष्ट्येदानीं प्रपश्यामो हतशत्रुमरिंदम ॥ ३ ॥
दिष्ट्या त्वया हताः सर्वे मेघनादादयोऽसुराः। हन्वा रक्षोगणान्सर्वान् कृतकृत्योऽद्य जीवसि ॥ ४ ॥
इति तेषां वचः श्रुत्वा रामस्तानाह सुस्मितः। किमर्थमादौ युष्माभिर्मेघनादोऽद्य कीर्तितः ॥ ५ ॥
इति रामवचः श्रुत्वाऽगस्तिस्तैस्त्ववलोकितः। कुंभयोनिस्तदा रामं प्रीत्या वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥
शृणु राम यथा वृत्तं मेघनादस्य चेष्टितम्। जन्मकर्मवरप्राप्तिं संक्षेपादद्वदतो मम ॥ ७ ॥
पुरा कृतयुगे राम पुलस्त्यो ब्रह्मणः सुतः। तृणबिंदुसुतायां स पुत्रं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ ८ ॥
निर्ममे विश्रवा नामधेयं वेदनिधिं शुभम्। भरद्वाजसुतायां च विश्रवा निर्ममे सुतम् ॥ ९ ॥
श्रेष्ठं वैश्रवणं तस्मै प्रमन्नोऽभूद्विधिश्विरात्। विधिर्वैश्रवणायोध तुष्टस्तन्पमसा ददौ ॥१०॥
मनोज्ञमभिलषितं यानं धनेशत्वमखंडितम्। पुष्पकं चाप्येकदाऽसौ द्रष्टुं विश्रवसं ययौ ॥११॥
पुष्पकेण धनाध्यक्षो ब्रह्मदत्तेन भास्वता। नत्वा तातं तदा प्राह न स्थानं ब्रह्मणा मम ॥१२॥
दत्तं स्थेयं मया कुत्र तद्विचार्य वदस्व माम्। विश्रवा अपि तं प्राह विश्वकर्मविनिर्मिता ॥१३॥
लंकानाम्नी पुरी श्रेष्ठा सागरेऽस्ति सुमंडिता। त्यक्त्वा विष्णुभयाद्दैत्या विविशुस्तं रसातलम् ॥१४॥
सुयं त्वं वस तस्यां हि तथेत्युक्त्वा धनेश्वरः। गत्वा तस्यां चिरं कालमुवास पितृसम्मतः ॥१५॥

श्रीशिवजी बोले- हे प्रिये ! एकदिन बहुतसे मुनियोंके साथ अगस्त्यमुनि श्रीरामका दर्शन करने आये । रामसे सम्मानित होकर वे सब बैठे ॥ १ ॥ अन्यान्य मुनि भी रामसे पूजित होकर प्रसन्नतापूर्वक बैठ गये । रामके पूछनेपर सबने अपना कुशल क्षेम सुनाया ॥ २ ॥ और कहा- हे रघुनन्दन ! बड़े हर्षकी बात है कि शत्रुको मारकर सकुशल आपको हम लोग राज्यसिंहासनपर विराजमान देख रहे हैं। हे अरिन्दम (शत्रुओं-को संता दिखलानेवाले)! आपने बड़े भाग्यसे मेघनाद आदि सब असुरोंको मार गिराया है। उन्हें मार तथा कृतकार्य होकर आप विराजमान हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥ उनका ऐसा वचन सुनकर राम कुछ मुसकराते हुए बोले-आपलोगोंने सब राक्षसोंमसे मेघनादका नाम पहले क्यों लिया ? रामका यह प्रश्न सुनकर वे सब मुनि अगस्त्य मुनिका मुख देखने लगे। यह देखकर अगस्त्य बहुत प्रेमपूर्वक रामसे बोले - ॥ ५ ॥ ६ ॥ हे राम ! मैं आपसे मेघनादका चरित्र, जन्म, कर्म तथा वरप्राप्तिका वृत्तान्त संक्षेपमें कहता हूँ, आप सुनें ॥ ७ ॥ हे राम ! सत्ययुगमें पुलस्त्य नामके ब्रह्मपुत्रने तृणबिन्दुकि पुत्रीस तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध वेदवेत्ता विश्रवा नामका पुत्र उत्पन्न किया। विश्रवाने भारद्वाजकी पुत्रीसे वैश्रवण नामक श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न किया कुछ दिनोंके बाद वैश्रवणकी तपस्यासे प्रसन्न होकर ब्रह्माने उसको उसका मनोवांछित पुष्पक विमान, अखण्ड धनेशत्व तथा कुबेरकी पदवी प्रदान की। एक दिन ब्रह्माके दिये हुए उस सुन्दर पुष्पक विमानपर सवार होकर धनाधिप कुबर अपने पिता विश्रवाका दर्शन करने गये। वहाँ जाकर कुबेरने पिताको नमस्कार करके कहा- हे पिताजी ! ब्रह्माने मुझे निवासके लिये कोई स्थान नहीं दिया है। अतः आप विचार करके कोई मेरे रहने योग्य स्थान बताइए। विश्रवाने कहा-विश्वकर्माकी बनायी हुई एक सुन्दर और श्रेष्ठ लंका नामकी नगरी समुद्रके बीचमें विद्यमान है। विष्णुके डरसे दैत्य लोग उसे छोड़कर पातालमें चले गये हैं ॥ ८-१४ ॥ तुम जाकर उसमें सुखपूर्वक निवास करो। 'तथास्तु' कहकर कुबर पिताके कथनानुसार जाकर बहुत काल

सर्गः १३] सारकाण्डम् १४७


कस्मिश्चिच्च काले हि सुमालीनाम राक्षसः । दुहित्रा व्यचरद्भूमा पुण्यकेतुं ददर्श सः ॥१६॥
हिताय चिन्तयामास राक्षसानां महामनाः । कैकसीं तनयामाह गच्छ विश्रवसं मुनिम् ॥१७॥
वरयस्व मुनेस्तेजःप्रतापात्ते सुताः शुभाः । भविष्यन्ति धनाध्यक्षतुल्या नो हितकारिणः ॥१८॥
सा संध्यायां ययौ शीघ्रं मुनेरग्रे व्यवस्थिता । लिखन्ती भुवि पादाङ्गुष्ठेन चाधोमुखी स्थिता ॥१९॥
तामपृच्छन्मुनिः का त्वं साऽऽह त्वं वेत्तुमर्हसि । ततो ध्यात्वा मुनिः सर्वं ज्ञात्वा तां प्रत्यभाषत ॥२०॥
ज्ञातं तवाभिलषितं मत्तः पुत्रानभीप्ससि । दारुणायां तु वेलायामागताऽसि सुमध्यमे ॥२१॥
अतस्ते दारुणौ पुत्रौ राक्षसौ संभविष्यतः । साऽब्रवीन्मुनिशार्दूलं त्वत्तोऽप्येवंविधौ सुतौ ॥२२॥
तामाहान्तिमजो यस्ते भविष्यति महामतिः । ततः सा सुषुवे पुत्रान् यथाकाले सुमध्यमा ॥२३॥
रावणं कुम्भकर्णं च क्रौंचीं शूर्पणखां शुभाम् । कुंभीनसीं कनीयांसं तृतीयं न विभीषणम् ॥२४॥
रावणः कुम्भकर्णश्च त्रयो दुहितरस्तथा । दुर्वृत्ताः प्राणिघ्नाश्चैव बभूवुर्मुनिहिंसकाः ॥२५॥
एकदा रावणो मात्रा लिङ्गार्थे प्रेषितः शिवम् । कर्तुं प्रसन्नमगमत् कैलासं कर्म दुष्करम् ॥२६॥
किञ्चित्स्वीयं शिरश्छित्त्वा वीणां षड्जस्वरैर्मुहुः । कृत्वा पीठं हि देहस्य तन्मूलं शिरसस्तथा ॥२७॥
तदग्रं पादयोः कृत्वा शंकूनांगुलिमस्तथा । तन्त्रीः कृत्वाऽन्त्रमालाभिः क्षतशोध्य सहस्रशः ॥२८॥
एवं कृत्वा स्वदेहस्य वीणां षड्जस्वरैर्मुहुः । चकार स्वमुखेनैव गांधर्वं गायन शुभम् ॥२९॥
तदा नंदीश्वरं प्राह शङ्करो लोकशङ्करः । शिरः संधाय हस्तेन त्वया वाच्योऽयं रावणः ॥३०॥
आत्मलिंगं राक्षसं त्वां शङ्करो न प्रदास्यति । हृद्गतं हि मया ज्ञातं शंभोस्त्वं याहि स्वस्थलम् ॥३१॥
इत्युक्त्वा प्रेषणीयोऽयं स रावणः स्वस्थलं यथा । इति शंभोर्वचः श्रुत्वा ययौ नंदी स रावणम् ॥३२॥


तक वहाँ रहे ॥ १५॥ पश्चात् किसी समय सुमाली राक्षसने अपनी पुत्रीको साथ लेकर पृथ्वीपर भ्रमण करते समय पुण्यकेतुको देखा । १६ । तब महात्मा सुमालीने राक्षसोंका हित सोचकर अपनी लड़की कैकसीसे कहा कि तुम विश्रवा मुनिके पास जाकर मुनिके तेज-प्रतापसे सुन्दर पुत्रोंकी प्राप्तिके लिये वर माँगो । वे पुत्र कुबेरके समान प्रतापी तथा हमलोगोंके हितकारी होंगे । १७॥ १८॥ तदनुसार सायंकालके समय मुनिके पास जाकर पाँवके अङ्गुठेसे धरतीको कुरेदती हुई वह नीचा मुख करके खड़ी हो गयी ॥ १९ ॥ मुनिने उससे पूछा—तुम कौन हो ? उसने कहा कि आप स्वयं इस बातको समझ सकते हैं। तब मुनिने ध्यान करके सब कुछ जान लिया और उससे बोले— ॥ २० ॥ मुझे मालूम हो गया कि मुझसे तू पुत्र पाना चाहती है, परन्तु हे सुमध्यमे ! तू इस भयानक समयमें यहाँ आयी है। इसलिये तुझसे दो भयानक राक्षस पुत्र उत्पन्न होंगे। तब वह मुनिशार्दूलसे बोली—हे महाराज ! क्या आपसे भी मुझे ऐसे ही पुत्र प्राप्त होंगे ? ॥ २१ ॥ २२ ॥ तब मुनि बोले—अच्छा जा, तेरा आखिरी पुत्र बड़ा बुद्धिमान होगा। पश्चात् उस सुन्दर कमरवाली कैकसीने यथासमय तीन पुत्र उत्पन्न किये ॥ २३ ॥ रावण कुम्भकर्ण, क्रौंची, शूर्पणखा, कुम्भीनसी और सबसे छोटा तीसरा पुत्र विभीषण उससे उत्पन्न हुआ ॥ २४ ॥ उनमेंसे रावण, कुम्भकर्ण और तीन लड़कियें बड़ी दुराचारिणी, जीवघातिनी तथा मुनिहिंसक हुई । २५ ॥ एक दिन रावणको माता कैकसीने रावणको शिवजीके पास लिङ्ग लेने भेजा । कैलासपर जाकर रावणने शिवजीको प्रसन्न करनेके लिये बड़ा दुष्कर काम किया । २६ । उसने अपने सिरका कुछ भाग काटकर वीणा बनायी । सिरसे वीणाका मूलभाग बनाकर अपनी देहसे उसका पृष्ठभाग तैयार किया पाँवोंसे उस वीणाका अग्रभाग बनाया और अँगुलियोंसे वीणाकी खूँटियें तैयार कीं। अपने पेटके भीतरकी आँतोंसे सैकड़ों एवं हजारों तार बनाकर अपने शरीरसे ही वीणा रची । पश्चात् षड्ज आदि स्वरोंसे रावणने अपने मुखसे ही गंधर्वके समान सुन्दर गायन आरम्भ किया ॥ २७-२९॥ तब लोगोंका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकर नन्दीश्वरसे बोले कि तुम अपने हाथसे रावणका सिर संधान करके उससे कहो कि शंकरजी तुम जैसे राक्षसको आत्मलिङ्ग कभी न देंगे । मैं शिवजीके हृदयकी बात जानता हूँ।

१६८आनन्दरामायणे[ सर्गः १३

शिरः संयोज्य हस्तेन शिवोक्तं तं न्यवेदयत् । तच्छ्रुत्वा रावणश्चापि समतिक्रम्य तां निशाम् ॥३३॥
चकार पूर्ववद्गानं द्वितीयदिवसे पुनः । नन्दिना शंकरश्चापि पूर्ववत्तं न्यवेदयत् ॥३४॥
इत्थं दश दिनान्येव गतानि रावणस्य च । अथ तत्कर्मणा तुष्टः शङ्करो गायनेन च ॥३५॥
भूत्वा प्रसन्नस्तं प्राह वरं वरय चेति वै । दृष्ट्वा शंभुं रावणोऽपि शिरासा तेन संधितः ॥३६॥
वरयामास मन्मात्रे ह्यात्मलिंगं तथा मम । पत्न्यर्थं पार्वतीं देहि तथेत्युक्त्वा ददौ शिवः ॥३७॥
गृहीत्वा गंतुकामं तं पुनः प्राह हरस्तदा । मतोपार्थं त्वया वीर दशवारं निजं शिरः ॥३८॥
खङ्गेन छेदितं यस्मात्तस्मात्तेऽद्य शिरांसि हि । दश विंशद्भुजाश्चापि भविष्यन्ति गिरो मम ॥३९॥
ततः स रावणस्तुष्टो गिरिर्जालिंगमभ्युतः । विंशद्भुजो दशग्रीवः सम्प्रत्थ गन्तुमुद्यतः ॥४०॥
कल्पभेदाच्छतशिराः शतवारं प्रमादितैः । स प्रोक्तः स्वशिरोभिर्हि शतद्वयभुजः कचित् ॥४१॥
तस्माद्धि हृतवान् विष्णुस्त्वं तं मार्ग प्रतार्य च । तयोश्चाधस्तटे लिंगं गोकर्णं रावणात्तथा ॥४२॥
गृहीत्वा स्थापितं पूर्वं रावणोऽपि गृहं ययौ । मंदोदरीं हरैर्वोक्त्यल्लभ्वा मयसुतां शुभाम् ॥४३॥
मातुः कार्यमसंपाद्य तूष्णीमेवातिलज्जितः । मन्दोदर्याऽभवन्स्वीयं विवाहं चोपपूरितः ॥४४॥
दृष्ट्वोदा धनाध्यक्षं पुष्पकस्थं तु कैकसी । पुत्रान् धिक्कारयामास यूयं पढा मृतोपमाः ॥४५॥
मापत्न्याश्चैषु ये दृष्ट्वा जायते नात्र लज्जिताः । ते मातृवचनं श्रुत्वा ययुर्गोकर्णमुत्तमम् ॥४६॥
दशवर्षसहस्राणि कुम्भकर्णोऽकरोत्तपः । विभीषणोऽपि धर्मात्मा सत्यधर्मपरायणः ॥४७॥


'भलिए तुम अपने स्थानको वापस चले जाओ' ॥ ३०, ३१ ॥ ऐसा कहकर उसको उनके स्थानपर भेज
दा, नन्दीश्वर शिवका यह बचन सुनकर रावणके पास गये । ३२ ॥ उन्होंने अपने हाथसे उसका सिर
धड़से जोड़कर शिवका वचन उसको कह सुनाया। रावण यह सुनकर भी उस रातको वहीं रहा और दूसरे दिन
फिर उसी विधिसे शिवजीका गुणगान करने लगा । शिवजीने उस दिन भी अपना संदेश नन्दीके द्वारा रावण
का कहल भेजा । परन्तु रावणने फिर भी अपना गायन उसी प्रकार दस दिनतक जारी रक्खा । तब शंकरजी
उस उम्र भयानक कर्म तथा मनोहर गायनसे प्रसन्न हो गये और उससे कहा-वर मांगो । ऐसा कहकर
शिवजी ने उसका वह सिर भी धड़से जोड दिया, तब उसने शंभुसे वर माँगा कि आप मेरा माताके लिए आत्म-
लिंग तथा पत्नी बनानेके लिए मुझे पार्वती जीको दे दें जिये । 'तथाऽस्तु' कहकर शिवजीने उसको वे दोनों चीजें
दे दीं । ३३-३७ ॥ जब उनकों लेकर रावण चलने लगा, उस समय शिवजी कहने लगे-हे वीर ! तुमने
मुझको प्रसन्न करनेके लिये अपना सिर दस बार तलवारसे काटा है। इसलिए मेरे कथनानुसार तुम्हारे दस
मिर तथा बीस भुजायें हो जायेंगी ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ तब रावण प्रसन्नतापूर्वक दस सिर और बीस हाथवाला
बनकर पार्वती तथा शिवलिंग लेकर अपने स्थानकी ओर चला ॥ ४० ॥ कहीं-कहीं कल्पभेदसे रावण सौ बार
मस्तक काटनेसे सौ सिर तथा दो सौ हाथोंवाला भी कहा गया है । ४१ ॥ बादमें रास्तेसे ही विष्णुभगवान्
रावणके हाथसे तुमको (पार्वतीको) छीन ले गये । तब तुम (पार्वती) भी श्रीहरिको धोखा देकर उनसे
अदृश्य हो गयीं । विष्णुकी तरह तुमने रावणके हाथसे शिवलिंग भी छीन लिया और उस लिंगको समुद्रके
किनारेपर ही गोकर्ण नामसे स्थापित कर दिया। तब रावण खाली हाथ लौट गया और विष्णुके कथनानुसार मय
राक्षसकी सुन्दरी पुत्री मन्दोदरी उसको प्राप्त हुई ॥४२॥४३॥ माताके कार्यका सम्पादन न कर सकनेके कारण
वह बहुत लज्जित हुआ और कुछ भी नहीं कह सका । पश्चात् मन्दोदरीके साथ विवाह करके वह सन्तुष्ट हुआ
॥ ४४ ॥ एक समय उसकी माता कैकसी धनपति कुबेरको पुष्पक विमानपर बैठा देखकर अपने पुत्रोको धिक्कार-
कर कहने लगी कि तुम लोग नपुंसक तथा मृतक सदृश हो ॥ ४५ ॥ अपने सोतेले भाईका उत्कर्ष देखकर
तुम लोगोंको लज्जा नहीं आती' माताके इस कटु वचनको सुनकर वे तीनो भाई पूजनीय गोकर्ण महादेवके पास
गये ॥ ४६ ॥ वहाँ कुम्भकर्णने दस हजार वर्ष तपस्या की। धर्मात्मा विभीषणने भी सत्यधर्मपरायण होकर