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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६९९

सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६९९

प्रासादोऽयं लवस्यात्र बहुरत्नविराजितः । यत्र चित्राण्यनेकानि मोहयन्ति मृगीदृशाम् ॥ २४८॥
चक्षूंषि जातरूपाणि योगिनामपि मानसम् । विन्यस्तरत्नविन्यासः शातकुम्भमयी बहिः ॥ २४९॥
हेमपंक्तिव सततं रत्नभानुमहाप्रभाम् । रत्नप्रासादसंयुक्तामयोध्यां पश्य सुप्रभाम् ॥ २५०॥
यदंगणं क्षालयती मदांधं स्वोर्म्यजलैः सोऽयमगर्व्यन्नः ।
अभ्रंकषैर्हेममयैः स्वकुंभैर्विराजितोऽय खलु चित्रकेतोः । २५१ ।
दिव्यप्रवालघटिते कपाटे यत्र चञ्चले । प्रासादोऽयमंगदस्य रुक्मभित्तिर्विनिर्मितः ॥ २५२।
गरुडोद्गारघटितप्रतोलीपरिशोभितः । प्रासादः पुष्कगस्यायं नयनानंदतो नृणाम् ॥ २५३॥
विशुद्धजांबूनददिव्यभूर्मेर्लसत्पताकश्चिदशामिवद्यः ।
प्रासाद एषः परमो मनोज्ञस्तक्षकस्य वीरस्य महान् विभाति ॥ २५४॥
यस्याधिभूमि नवरत्नसिंहास्मिंश्च यदैव विजिताखयोऽपि ।
लोकश्चतुर्थो न हि दृश्यतेऽतः पद ममुद्यम्य किमाविरास्ते ॥ २५५॥
अघोवमनकरिणां घटा टापयितुं किमु । उद्धस्तहस्तो यस्य रत्नसिंहो विराजते । २५६॥
सोऽयं हेमभित्तिमयः प्रासादः प्रलन्तः शुभः । सुवाहो पश्य भो भित्त्रुरत्नमानुविराजितः । २५७॥
रत्नप्रवालस्फटिकनीलकाश्मर्वनिर्मितः । प्रासादोऽयं पुण्ड्रकेतोर्महान् दोपिमरः शुभः । २५८॥
कल्हाररुत्पलैः शोणैररविन्दैः शतपत्रकै । विराजित पराङ्गह रमनीयं प्रदृश्यते ॥ २५९॥
इन्दुर्यलं रवितलेनिविद्धा यम्य भूमरः । हरंति ग्रीष्ममनापं निश्चिदर्माकरोत्करः । २६०॥
अमंदकुरुविंदानां रिन्तामैर्यत्र बाहभिः । मद्यन्ति शुकयेनापि मृदृष्टाडिमशंकया । २६१॥
एवं पश्य शुभां रम्यां पताकाभिर्विराजिताम् । विहायोध्यां मुक्तिपुरीं द्वितीयाममरावतीम् ॥ २६२॥


जिसमें म तियोश्री जाल लगे हैं, सुदर्शन चक्र एवं गरुडके चिह्न मिश्रित पताकायें फहरा रही हैं, बालसूर्यकी तरह सुन्दर यह भवन कुशलका है ॥ २४८ बहुरत्न रत्नोंसे विराजित यह लवका दिव्य भवन है, जिसमें बने हुए चित्र स्त्रियोंका मन मोह लेते हैं ॥ २४८ ॥ जहाँ कि याचियोंकी बात कौन अहङ्कार शान्तभी बन जाती है, जिस नगरीके भवनोंमें विविध प्रकारके रत्नोंकी पच्चाकारी की हुई है, जिसके बाहरकी भूमि सुवर्णमयी है, जिसकी अटारियों सूर्यमुकुटकी तरह देदीप्यमान हो रही है, उस अयोध्यापुरीको देखो । जिसके प्रांगणको धोता हुई यह सरयू नदी विराजमान है। आकाशको छूनेवाले बावण रत्नदीप कलशोंसे सुशोभित यह पूरी साक्षात् चित्रकेतु गन्धर्वकी पुरीके समान सुन्दर दीख रही है ॥ २४९-२५१ ॥ दिव्य प्रवाल मणिसे बने हुए कपाट जिसमें लगे हैं और सुवर्णकी दीवारें बनी हैं यह अङ्गदका भवन है। गरुड़मणिकी जिसमें प्रतोलीयाँ बनी हैं, नयनोंका आनन्द देनवाला वह भवन पुष्करका है। जिसके फर्श विशुद्ध सुवर्णकी बनी है और सुन्दर पताकायें जिसमें फहरा रही हैं, यह परम मनोज्ञ प्रासाद वीर तक्षकका है। २५२-२५४॥ इधर देखो, नवरत्नमय सिंह विद्यमान है। इस नवरत्नमय सिंहकी बड़ी महिमा है। इसके प्रभावसे वामन भगवान्ने तीन पैरसे तीनों लोकोंको नाप लिया था। चौथा कोई लोक ही नहीं बना था, जिसे नापते ॥ २५५॥ जिसके घरमें ऊपरकी पेंड उठाये नवरत्नका सिंह विराजमान हो तो अघ (पाप) रूपी मतवाले हाथियोंका उसे कुछ भी भय नहीं रह जाता ॥ २५६ ॥ हेमभित्तिमय रत्नके शिखरम विराजित यह प्रासाद सुबाहुका है ॥ २५७ ॥ रत्न प्रवाल, स्फटिक और नीलम काश्मीरसे निर्मित यह प्रासाद पुण्ड्रकेतुका है ॥ २५८ ॥ कल्हार उत्पल, कोक, अरविन्द तथा शतपत्रसे विराजित समस्त पापोंको हरनेवाला यह रमणीय दिखलाई पड़ रहा है ॥ २५९ ॥ जिसकी भूमि चन्द्रकान्त मणिसे बनी है। अर्थात् टपकते हुए ठंढे जलोंकी बूंदोंके गिरनेसे ग्रीष्म-ऋतुका सन्ताप दूर हो जाता है। दमकते हुए कुरुविन्द मणिके लगे रहनेसे यहां शुकोंने मूंग और अनारके फलका भ्रम हो जाता है। २६० ॥ २६१ ॥ इस प्रकारकी सुन्दर, रम्य और पताकाओंसे विराजित दूसरी

७०८ आनन्दरामायणे [सर्गः ११

यत्र कार्त्तस्वरघटाः प्रतोलीशिरसि स्थिताः। रामं द्रष्टुमनस्तान प्राप्ताः सूर्या इवांबभूः ॥ २६३॥

नृसिंह उवाच

एवमुक्त्वा कर्कशेन पत्न्या कार्पटिकेन च । सहितश्च तदा शंभुस्सो पुरीं संविवेश सः ॥ २६४॥
रामतीर्थं ततो गत्वा कृत्वा क्षौरादिकं विधिम् उपोष्य दिनमेकं हि तीर्थश्राद्धं चकार सः ॥ २६५॥
अमावास्यां शुभां चैत्रे प्राप्तां ज्ञात्वा द्विजोत्तमः। मुक्त्यर्थं स्वपितुश्चक्रे अन्नदानं यथाविधि ॥ २६६॥
तच्चैत्रमासे रजनीशमक्षये दत्तं पितुर्मुक्तिमदं मनोहरम् ।
विप्रेण चान्नं पथिकस्य वाक्यतस्तस्मात्पिशाचः सुरमञ्च निर्ययौ ॥ २६७॥
अयोध्यायां ततः शंभुः कृत्वा चैत्रेऽवगाहनम् । उद्यापनविधिं चापि यथोक्तं च चकार सः ॥ २६८॥
कर्कशोऽपिमधौ स्नात्वा मुक्त्वा पापीयमुत्तरम् अयोध्यानगरीमध्ये साधुवृत्त्याऽवसद्चिरम् ॥ २६९ ।
श्रीरामचिंतनं कुर्वन्निनायायुष्यमक्षयम् । ततः प्राप हरेर्लोक मयोध्यामरणेन सः ॥ २७०॥
शंभुर्रापि मधौ स्नानं कृत्वा कांचीपुरीं पुनः गंतुं प्रतस्थे श्रीरामं नत्वाऽयोध्यां पुनः पुनः॥२७१
भार्यया सहितः शंभुस्तेन कार्पटिकेन च ययौ पूर्वेश्च मार्गेण यत्र तौ करिकाहरी ॥ २७२॥
स्थापितौ शपथैः कृत्वा ह्युनेस्तत्र मखागमत् । दत्त्वा दिनद्वय पुण्यमुभाभ्यां मधुमासजम् ॥ २७३॥
दत्त्वा स्वीयांजलौ तोयं तयोर्मुक्ति चकार सः । ततस्तौ करिमिहौ च दिव्यमाल्यनुलेपितौ । २७४॥
दिव्यं विमानमारुह्य विष्णुलोकं गतावभौ ततोऽग्रे द्विजवर्य्यः सः ययौ मार्गेण भार्यया ॥ २७५॥
स यत्र राक्षमुः पूर्वं स्थापितः शपथैर्वने । तं दृष्ट्व राक्षसश्रेष्ठं भार्या प्राह द्विजोत्तमः ॥ २७६॥
अपि काण्डाष्ट्ये रम्ये शृणु मे वचनं शुभम् । या त्वया शीतला गौरी स्नाता वै सरयूजले । २७७।
तस्यैकदिवसस्याथ देहि पुण्यं शुभावहम् । राक्षसाय हि मद्वाक्याद्गृहीत्वा जलमञ्जलो ॥ २७८॥

अमरावतीपुरके समान ददीप्यमान इस अयोध्यापुरीको देखो ॥ २६२ ॥ जहाँ कि प्रतोलीके मस्तकपर विराज-
मान सुवर्णके भवन ऐसे दीख रहे हैं, जैसे अनन्त सूर्य एक साथ रामचन्द्रजीका दर्शन करने आ गये हों ॥ २६३ ॥
नृसिंहने कहा- इस तरह कहकर अपनी पत्नी, कार्पटिक तथा कर्कशके साथ-साथ शम्भु अयोध्या पुरीमें
प्रविष्ट हुआ ॥ २६४ ॥ पहल रामतीर्थपर पहुंचकर उसने क्षौर बादि कराया और एक दिनका उपवास करके
तीर्थश्राद्ध किया ॥ २६५ ॥ जब चैत्रकृष्ण अमावास्या तिथि आयी ता उसने अपने पिताकी मुक्तिके लिए
विधिवत् अन्नदान किया ॥ २६६ ॥ उस चैत्रमासमें अमावास्या को शम्भुने कार्पटिकके कथनानुसार जो
अन्नदान किया, उसके पुण्यसे तत्काल उसका पिता पिशाचयोनिसे मुक्त होकर स्वर्गको चला गया
॥ २६७ ॥ तदनन्तर शम्भुने अयोध्यामें चैत्रस्नान और शास्त्रोक्त विधिसे उसका उद्यापन किया। कर्कश भी
चैत्रस्नान करके सब पापोंसे मुक्त हो गया और साधुवृत्तिसे उसी अयोध्यामें ही बहुत दिन बिताये
॥ २६८ व २६९ ॥ अन्तमें रामका स्मरण करते-करते उसने शरीर त्याग दिया । अयोध्यामें मरनेसे
उसे विष्णुलोककी प्राप्ति हुई ॥ २७० ॥ शम्भुने भी स्नान करनेके बाद श्रीरामचन्द्रजीको बारम्बार
प्रणाम करके काञ्चीपुरीको जानेकी तैयारी की ॥ २७१ ॥ अपनी स्त्री और उस कार्पटिकको साथ लेकर
शम्भु उसी मार्गसे लौटकर उधर चला, जहाँ कि अयोध्या आने समय सिंह और हाथीको छोड़ आया
था । २७२ ॥ वहाँ पहुंचकर उसने हाथमें जल लिया और चैत्रस्नानके पुण्यमेंसे दो दिनका पुण्य देकर उन
दोनोंकी उस योनिसे मुक्ति कर दी। इसके अनन्तर वे दोनों हाथी और सिंह दिव्यमाल्यसे अलंकृत हो और
दिव्य विमानपर बारूढ़ होकर विष्णुलोकको चल गये। इसके बाद शम्भु अपनी स्त्रीके साथ आगे बढ़ा
॥ २७३-२७५ ॥ जात जात वह उस स्थानपर पहुंचा, जहाँ कि जाते समय शपथ करके उस राक्षसको वनमें
छोड़ आया था । वहाँ राक्षसको सामने देखकर शम्भुने अपनी स्त्रीसे कहा- हे काणिके ! जो तुमने शीतला
गौरीको व्रत किया है। हाथमें जल लेकर उसके एक दिनका पुण्य इस राक्षसको दे दो ॥ २७६-२७८ ॥

सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ७०१


इति शंखुवचः श्रुत्वा पद्मनेत्रा कृशोदरी । काशीनाम्नी द्विजपत्नी ददौ पुण्यं निजं तदा ॥२७९॥
दत्तः स राक्षसंभ्रंशस्त्यक्त्वा देहं मलीममम् । दिव्यं विमानमारुह्य गन्वा भार्यायुतं द्विजम् ॥२८०॥
दिव्यमाल्यांबरधरो हरिलोकं जगाम सः । शम्भुरपि प्रियायुक्तो मधुमामं विवर्णयन् ॥२८१॥
ययौ कांचीपुरीं श्रेष्ठां जनान् वृत्तं निवेदयन् । भो पिशाचा यथा वृत्तं भवद्भिश्श्च कथानकम् ॥२८२॥
तन्ममं च मयाऽऽख्यातं राक्षमोद्धारणादिकम् ।

श्रीरामदास उवाच

इत्युक्त्वा नृहरिर्विप्रो गृहीत्वा स्नांजले जलम् ॥२८३॥

ददौ दिनद्वयस्यास्य पुण्यं चैत्रकृतं निजम्ततः प्रोवाच भार्यां तु रम्ये चन्द्रसमे प्रिये ॥२८४॥
या त्वया शीतलागौरी स्नाता सीताकृते वरेतीर्थे वरस्य दिनैकस्य देहि पुण्यं शुभानने ॥२८५॥
पिशाचिन्यै समुद्धर्तुं मा विचारोऽस्तु ते हृदिइति भर्तुर्वचः श्रुत्वा रम्भा पद्मवलोचना ।२८६॥
रूपीनाम्नी मम माता ददौ पुण्यं निजं तदाततः पिशाचास्ते सर्वे मुक्ताः शीघ्रं शुभावहाः ॥२८७॥
निजरूपाणि वै प्रापु प्रणेमुर्नृहरिं जवान् ।नत्वा स्तुत्वा पुनर्नत्वा नृसिंहं तं प्रियायुतम् ॥२८८॥
आपृच्छय जग्मिरे सर्वं स्वगुरोग्रहमं प्रतिगुरुश्चापि सुतां स्वीयां तां ददावतिहर्षितः ॥२८९॥
तपोन्वेष्ठाय शिष्याय कनिष्ठ यापरां सुताम् ।स्त्रीयोदमगुणोपेतां ददावप्रतिमां वराम् ॥२९०॥
सतस्त्री मखियो विप्रौ जग्मतुर्ना मुदान्वितौस्वस्वपितुराश्रमं हि तथास्तां पितरावपि ॥२९१॥
दृष्ट्वा पुत्रौ समायातौ सस्त्रियौ तोषमापतुनृहरिश्च पिशाचुक्तोऽब्जक प्रति समाययौ ॥२९२॥
चैत्रस्नानेन तत्पुत्रो रामदासाभिधस्त्वहम् ।जातस्ततस्तौ देहान्ते जग्मतुर्विष्णवं पदम् ॥२९३॥
एवं शिष्य मधुस्नानमहिमा बहुभिर्नरैः ।दैवैः सिद्धैश्च गंधर्वैः सदाऽनुभवितोऽस्ति हि ॥२९४॥
तस्मान्मापावश्यस्य हि स्नात्वार्थं मानवोत्तमैःरामतीर्थेषु सर्वत्र रामचन्द्रं प्रपूजयेत् ॥२९५॥

इस प्रकार शंखुकी बाता सुनकर उस काशी नाम्ना द्विजपत्नी ने अपना पुण्य उसका दे दिया ॥ २७९ ॥ इसके प्रभावस उस राक्षसने अपनो वह अधम देह छोड़ दा और दिव्य विमानपर चढ़कर ब्राह्मण तथा ब्राह्मण-पत्नीको प्रणाम करता हुआ विष्णुलोकको चला गया । शम्भु भा चैत्रमासक माहात्म्यका वर्णन करता हुआ कांचीपुरीका चल पड़ा। हे पिशाचगण ! आठ ताषोन जो कथा पूछी, सा राक्षसके उद्धारस सम्बन्ध रखनेवाली सब बात कह सुनायी। रामदासने कहा-ऐसा कहकर सोमहूत बजनाम जल लिया और अपने चैत्रस्नानके पुण्यमसं दो दिनका पुण्य उस न दिया। फिर अपनी स्त्रीस कहा कि तुमन असमे जो शीतला गौरीका स्नाव किया है। उसमसे एक दिनका पुण्य इस पिशाचिनीका द दो ॥ २८०-२८५ ॥ इससे इसका उद्धार हो जायगा । इसपर कुछ विचार मत करो। इस प्रकार स्वामीकी आज्ञा सुनकर उस कमलनयनाने अपना पुण्य दे दिया। तब शीघ्र ही वे सब पिशाचयोनिसे मुक्त होकर ॥ २८६ ॥ २८७ ॥ अपने-अपने रूपको प्राप्त हा गये। इसके अनन्तर उन्होंने नृसिंहको प्रणाम किया, बारम्बार उनका स्तुति की और उनसे पूछकर अपने गुरुके आश्रमको चल गये। गुरुन भी अतिशय हर्षित होकर अपन कन्या उन्हे दे दा। उनमें ज्येष्ठ भ्राताको ज्येष्ठ कन्या तथा कनिष्ठको एक दूसरी सर्वो कन्या समर्पित की ॥ २८८-२९० ॥ इसके अनन्तर वे दोनों अपनी-अपनी स्त्रींको साथ लेकर पिताके आश्रमपर गये ॥ २९१ ॥ उनके माता-पिता भी स्त्र के साथ अपने बेटको आते देखकर प्रसन्न हुए। नृसिह भी अपनी भार्याक साथ अब्जक नगरको चल गये ॥ २९२ ॥ चैत्रस्नानके पुण्यसे उनके एक पुत्र हुआ, जिसका नाम रामदास है और वह मैं हूँ। कुछ दिनों बाद मेरे माता-पिताका देहांत हो गया और वे विष्णुलोकको प्राप्त हुए ॥ २९३॥ हे शिष्य ! इस प्रकार चैत्रस्नानकी महिमाका कितने ही मनुष्य, देवता, सिद्ध तथा गन्धर्वाने अनुभव किया है ॥ २९४ ॥ इस कारण अच्छे मनुष्योको चाहिए कि चैत्रमासमें अवश्य

७०२आनन्दरामायणे[ सर्गः १२

एवं त्वया यथा पृष्टं तथा सर्वं निवेदितम् । मया काऽन्या स्पृहा तेऽस्ति श्रोतुं तद्वद वच्म्यहम् ॥ २९६॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये मनोहरकाण्डे चैत्रस्नानमाहात्म्ये एकादशः सर्गः ॥ ११ ॥


द्वादशः सर्गः

( श्रीरामचन्द्र द्वारा अद्वैतभावका प्रदर्शन )

विष्णुदास उवाच

गुरोऽन्यद्रामचन्द्रस्य चरित्रं वद मां प्रति । शृण्वतो मे मुहूर्नास्ति तृप्तिः श्रोतुं स्पृहैधते ॥ १ ॥

श्रीरामदास उवाच

सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य सावधानमनाः शृणु । एकदा हयमारूढो पुत्रबन्धुबलैः सह ॥ २ ॥
वनं ययौ विहारार्थं रामचन्द्रो मुदान्वितः । तत्र दृष्ट्वा मृगं श्रेष्ठं तं हन्तुं रघुनन्दनः ॥ ३ ॥
बाणमाकृष्य तत्पृष्ठे ययौ वेगेन सादरम् । वनाद्वनान्तरं रामा मृगस्य च पदानुगः ॥ ४ ॥
एकाकी हयमारूढो विवेश गहनं वनम् । पश्चाद्दूरस्थिताः सर्वे लक्ष्मणाद्या बलैः सह ॥ ५ ॥
रामोऽपि निजबाणेन मृगं हत्वा वनेऽचरत् । निर्जलेऽतितृषाक्रान्तः क्षुधाव्याप्तोऽप्यभूत्तदा ॥ ६ ॥
ततो रामो वृक्षतले क्षण तस्थौ श्रमान्वितः । तावत्तं शबरी काचिद् दृष्ट्वा रामं मुदान्विता ॥ ७ ॥
नृपं ज्ञात्वा राजचिह्नैस्तं प्रणम्य पुरःस्थिता । तां दृष्ट्वा राघवोऽप्याह वाक्यं शबरि मे शृणु ॥ ८ ॥
लक्ष्मणाद्याः स्थिता दूरं क्षुत्तृड्भ्यां पीडितोऽस्म्यहम् ।
किंचिद्यत्नं कुरुष्वात्र येन मेऽद्य सुखं भवेत् ॥ ९ ॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा शबरी वाक्यमब्रवीत् । इतोऽविदूरे आगच्छ दुग्धाब्धि सरसस्तटे ॥ १०॥
भीमवारेऽद्य नार्यश्च बहवोऽत्र समागताः । तत्र त्वं च मया राम यदि यास्यसि सांप्रतम् ॥ ११॥


स्नान करके रामतीर्थमें जाकर रामचन्द्रजीका पूजन करें ॥२९५॥ तुमने जो पूछा, मैंने सब कुछ कह सुनाया । अब क्या सुननेकी इच्छा है, सो कहो । मैं सुनाऊं । २९६ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृत ज्योत्स्ना भाषाटीकासहित मनोहरकाण्डे एकादशः सर्गः ॥ ११ ॥

विष्णुदास बोले—हे गुरो ! अब रामचन्द्रजीका कोई और चरित्र सुनाइए । क्योंकि रामचरित्र सुनते-सुनते मुझे तृप्ति नहीं होती । जितना ही सुनता हूँ, सुननेकी इच्छा बढ़ती जाती है । १ ॥ श्रीरामदासने कहा—हे शिष्य ! तुमने बहुत ही अच्छी बात कही है, अब सावधान मनसे मेरी बात सुनो । एक बार घोड़ेपर सवार होकर रामचन्द्रजी अपने भाइयों, पुत्रों तथा सेनाके साथ मृगयाविहार करनेके लिए वनमें गये । वहाँ एक अच्छा-सा मृग देखा और उसे मारनेके लिए धनुषपर बाण चढ़ाकर उसके पीछे-पीछे दौड़ चले । जाते-जाते वे गहन वनमें पहुँच गये । फिर भी राम एक वनसे दूसरे और दूसरेसे तीसरे वनमें मृगके पीछे-पीछे दौड़ते चले जा रहे थे । लक्ष्मण आदि साथी सेनाके साथ-साथ बहुत पीछे छूट गये २-५ ॥ अन्तमें बड़ी दूर जाकर रामने उस मृगको मारा । वह स्थान निर्जल था और उन्हें भूख-प्यास जोरोंसे लगी थी ॥ ६ ॥ वहाँ ही वे एक वृक्षके नीचे बैठ गये । उसी समय किसी शबरीने रामको देखा और उनको वेश-भूषासे पहचान लिया कि ये कोई राजा हैं । वह रामके पास जा तथा प्रणाम करके सामने बैठ गयी । उसे देखकर रामने कहा हे शबरी ! तू मेरी बात सुन ॥ ७ ॥ ८ ॥ मेरे लक्ष्मण आदि साथी पीछे छूट गये हैं। मैं भूख-प्याससे बहुत दुखी हूँ। तू कोई ऐसा उपाय कर कि जिससे मेरा दुःख दूर हो जाय ॥ ९ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर शबरीने कहा—हे राम ! यहाँसे थोड़ी दूरपर तालाबके

सर्गः १२] मनोहरकाण्डम् ७०३


तर्हि तत्र विचित्रान्नैरैस्तृप्तिं प्राप्स्यसि वै क्षणात् । तत्तस्या वचनं श्रुत्वा शबरीं प्राह राघवः ॥१२॥
अहमत्रैव तिष्ठामि प्रतीक्षार्थं कुशस्य च । तापस्य स्तरणादीनां संत्वरस्व वनवासिनि ॥१३॥
गच्छ त्वमेव तां दुर्गां स्त्रीभ्यं वृत्तं निवेदय । तद्रामवचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा त्वरान्विता ॥१४॥
स्त्रीर्गत्वा शबरी प्राह शृणुध्वं वचनं मम । गता गजोपपन्नाश्चे शूशूर्णं कर्तुमागतः ॥१५॥
अविदूरे पद्वनेऽके सुखासीनः स्थितोऽस्ति हि । तैनाहं प्रेषिताऽम्यद्य शुश्रावार्थे जगन्मनः ॥१६॥
युष्माकं कथितं वृत्तं तस्य गच्छाम्यहं पुनः । शबर्यास्तद्वचः श्रुत्वा ताश्चार्यैः प्रश्वयान्विताः ॥१७॥
अभिनन्द्य निजैर्वाक्यैः शबरीं तां मुहुर्मुहुः । परस्परं तदा प्रोचुस्ता वार्योः साऽग्रो मुदा ॥१८॥
धन्योऽद्य दिवसोऽस्माकं यस्मिन् राघवदर्शनम् । भविष्वति वरान्नैश्च तोषयामो रघूत्तमम् ॥१९॥
आदौ दुर्गां पूजयित्वा नैवेद्यं तां निवेद्य च । ततः समर्च्य रामाय माशयामञ्च वयं ततः ॥२०॥
इति संमन्त्र्य तां नार्यो रूपसालङ्कारशोभिताः । पीनकीर्णश्रोणिबिम्बो वराङ्ख्या मृगलोचनाः ॥२१॥
विप्रक्षत्रियवैश्यानां शूद्राणां चापि वेगतः । नैवेद्यपात्रैस्तां दुर्गां ययुर्नूपुरनिःस्वनाः ॥२२॥
एतस्मिन्नन्तरे देवी स्वालयस्य समन्ततः । कपाटानि दृढं बद्ध्वा तूष्णीमामाद्रिरीऽद्रजा ॥२३॥
ततस्ता द्वारमासाद्य द्वागं बद्धं निरीक्ष्य च । बभ्रमुः सर्वद्वाराणि न मार्गं लेभिरे स्त्रियः ॥२४॥
तदाऽऽश्चर्यमनाः सर्वा द्वारदेशे स्थिताः क्षणम् । तावदेवालयच्छिद्रो निर्गतः शुश्रुवुः स्त्रियः ॥२५॥
अहमेषात्र श्रीराद्धम्नि गतः साक्षात्महेश्वरः । ये भिन्ने मानयन्त्यत्र मां सीतां राघव हरम् ॥२६॥
ते कोटिकल्पपर्यन्तं पच्यन्ते रौरवेषु हि । अतो गृहद्विमो नार्यो मन्नाथं च जगत्प्रभुम् ॥२७॥
दोषयन्नं वरान्नैश्च तत्तेषेण त्वहं गतः । तुष्टा भवामि गच्छध्वं तृषितं तं रघूत्तमम् ॥२८॥
इति वार्यो वचः श्रुत्वा हैम्वत्या विस्मयान्विताः । दुद्रुवुर्जगदामिन्यः शबरीचर णानुगाः ॥२९॥


किनारे एक दुर्गा मन्दिर है ॥ १० ॥ आज मङ्गलवार है, इसलिए वहाँ बहुत-सी स्त्रियें आयी होंगी। यदि मेरे साथ यहाँ चलें तो आपका नाना प्रकारके विचित्र अन्न खानेको मिलेगा, जिससे आप क्षणभरमें तृप्त हो जायेंगे । शबरीकी सलाह सुनकर रामने उत्तर दिया कि मैं यहाँ कुश आदिकी प्रतीक्षा करता हुआ बैठता हूँ। हे वनवासिनि ! तू ही जाकर उन स्त्रियोंको मेरा हाल सुना दे। रामके आज्ञानुसार शबरी तुरन्त चल पड़ी ॥ ११-१४ ॥ उनने वहाँ पहुँचकर उन स्त्रियोंसे कहा-कमलके समान नेत्रोंवाले भगवान् रामचन्द्र यहाँ विश्राम कर रहे हैं। पास ही पद्मकल्पमें धूप/छायामें बैठे हैं। उन्होंने आप लोगोंको यह सन्देश सुनानेके लिये मुझे भेजा है ॥ १५ ॥ १६ ॥ अब आप लोग जाकर कुछ करें, यह कहकर मैं रामचन्द्रजीको सुना दूँ । शबरीकी बात सुनी तो विस्मित भावसे उन्होंने शबरीका धन्यवाद दिया और कहा- ॥ १७ ॥ १८ ॥ हमारे लिए आजका दिन धन्य है, जिससे श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन प्राप्त होगा और हम मनचाहे व्यंजनोंसे उन्हें सन्तुष्ट करेंगी ॥ १९ ॥ हम पहले दुर्गाजीकी पूजा करके उनको नैवेद्य चढ़ावेंगी। उसके बाद रामको भोजन कराकर स्वयं भोजन करेंगी ॥ २० ॥ यह सुनकर सुवर्णके अलंकारोसे अलंकृत, पीछे कण्ठे पहने, सुन्दर मुख एवं मृगीके समान नेत्रवाली, के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्रक घरोंकी स्त्रियें तुरन्त हाथोमे नैवेद्यके पात्र लेकर नूपुरकी मनोहर ध्वनि करती हुई चल पड़ीं ॥ २१ ॥ २२ ॥ उधर दुर्गाजीने चारों ओरसे मन्दिरका फाटक बन्द कर लिया और भीतर चुपचाप बैठ गयीं ॥ २३ ॥ वे स्त्रियाँ मन्दिरम पहुँची तो द्वार बन्द पाया । एक-एक करके वे सब द्वारोंपर घूम आयीं। लेकिन किसी तरफसे भी उन्हें भीतर जानेका मार्ग नहीं मिला ॥ २४ ॥ ऐसी अवस्था में वे विस्मित होकर वहीं बैठ गयीं। थोड़ी देर बाद मन्दिरके भीतरसे यह वाणी सुनायी दी, जिसे उन स्त्रियोंने सुना - २५ ॥ मैं ही सीता हूँ और राम साक्षात् शिव हैं। जो हममें और सीतामें, राममें तथा शिवमे भेद मानते हैं, वे करोड़ों कल्पपर्यन्त रौरव नरकमें सड़ते हैं। इस कारण हे स्त्रियो ! पहले मुझलोग अच्छे-अच्छे अन्नोंसे अघाले मेरे प्रभु रामको प्रसन्न करो। उनके जो बचें, सो लाकर मेरी पूजा करो। इससे मैं प्रसन्न होऊँगी। अच्छा, अब तुम लोग जाओ। रामचन्द्रजी भूखे-प्यासे बैठे हैं ॥२६-२८॥

४०२आनन्दरामायणे( सर्गः १२

ततः सा शबरी ताभ्यो दर्शयामास राघवम् । ता नेत्रपङ्कजैः सर्व्वा दृष्ट्वा नत्वा रघूत्तमम् ॥३०॥
दिव्यान्नानि पुरः स्थाप्य हेमपात्रैर्जलान्यपि । ततस्तं प्रार्थयामासुः स्त्रियः सर्व्वा पुरःस्थिताः ॥३१॥
त्वयाऽद्य हारिता राम वयं भार्य्यैः सहस्रशः । शबरीं प्रेष्य गहने वनेऽत्र परमादरात् ॥३२॥
अन्नानि स्वीकुरुष्वान्त्र देव्या त्वां प्रेषितानि हि । तासां वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह सस्मितः ॥३३॥
देव्या किमुक्तं भो भार्य्यः कथ्यतां ममार्थ तत् । ताः प्रोचु राघव नारी दुर्गावाक्यं सविस्तरम् ॥३४॥
दुर्गावाक्यं शृणुष्वाद्य त्वहमेवात्र जानकी । रामः साक्षान्महादेवो नात्र भेदः कदाचन ॥३५॥
मानयन्त्यत्र भेदं ये रौरवेषु पतन्ति ते । ममो रामं तोषयित्वा तदुच्छिष्ट त्वहं ततः ॥३६॥
भोक्ष्यामि नार्यो गच्छध्वं क्षुधान्तं रघुनन्दनम् । देव्येत्थं भाषिते राम ततस्त्वां समुपागताः ॥३७।
अग्रे त्वं पूर्वपुण्यैर्नो भुङ्क्षवान्नं रघुनन्दन । ततस्ताः प्राह श्रीरामो विहस्य मुदिताननः ॥३८॥
यदि देवीवचः सत्यं तत्रांत्र गहने वने । सीतारूपेण सा दुर्गा मां समायातु सत्वरम् ॥३९॥
युष्मन्नारीप्रसङ्गात्तु काचिन्नारी गिरीन्द्रजाम् । गत्वा मद्वचनं दुर्गा श्रावयन्त्वद्य कौतुकात् ॥४०॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा त्वेका स्त्री लोकदण्डकात् । गत्वा दुर्गां रामवाक्यं श्रावयामास सादरम् ॥४१॥
दुर्गा श्रुत्वा रामवाक्यं तद्वेत्थ्युक्त्वा तु तां स्त्रियम् ।
किञ्चित्कपाटमुद्घाट्य सीतारूपेण निर्ययौ ॥४२॥
ततः पुनर्दृढं बद्ध्वा कपाटं जानकी जवात् । तोयपात्रं करे धृत्वा ययौ रामं स्मितानना ॥४३॥
नमस्कृत्या रामचन्द्रं तस्यार्धं संस्थिताऽभवत् । तदा ताः सकला नार्यस्तद्भूवन् विस्मिता हृदि ॥४४।
ततो रामो वरान्नानि विप्रस्त्रीणां तथा पुनः । क्षत्रियाणां च नारीणां भोक्तुं स्नानार्थमुद्यतः ॥४५॥
ततः शरासने बाण संधाय जगदीश्वरः । भुवं भित्त्वाऽथ पातालाज्जलं तत्र समाह्वयत् ॥४६॥


इस तरह देवीकी बात सुनकर वे सब गजगामिनी स्त्रियें विस्मित होकर शबरीके पीछे-पीछे चलीं ॥२९॥ वहाँ जाकर शबरीने उन सब स्त्रियोंको रामचन्द्रजीका दर्शन कराया । उन नारियोंने कमल सरीखे नेत्रोंवाले रामको देखा और प्रणाम किया । इसके बाद दिव्य अ न्न सामने रखकर सुवर्णके पात्रोंमें जल भरकर रक्खा और उन सब स्त्रयोंने एक स्वरसे भगवान्से प्रार्थना की-॥३०। ३१॥ हे राम ! आपने शबराके द्वारा अपने आनेका संदेश भेजकर हम लोगोंको हार दिया है ॥३२॥ साक्षात् दुर्गाजीके द्वारा भेजवाये इस खाद्य पदार्थोंको आप स्वीकार करें । उनकी बातोंको सुन तो मुसकाकर राम बोले-हे नारियों ! दुर्गाजीने हमारे विषयमें क्या कहा था, सो तो बतलाओ । स्त्रियां विस्तारपूर्वक दुर्गाजीके द्वारा कही गयी ब त बतलाती हुई कहने लगीं-उन्होंने कहा था कि राम साक्षात् महेश्वर हैं और मैं जानकी हूँ जो लोग हम दोनोंम किसी प्रकारका भेद मानते हैं, वे रौरव नरकम पड़ते हैं । इसलिए तुमलोग बहुने रामको भोजन कराके प्रसन्न कर आओ। उनमे जो कुछ बचेगा सो मैं सहर्ष स्वीकार करूंगी । हे स्त्रिया ! अब तुमलोग उस भूखे रामजीके पास जाओ । इस तरह देवीकी ब त सुनकर हम सब आपके पास दौड़े आयीं ॥३३-३७॥ अब हमारे पूर्वसञ्चित पुण्योंके प्रतापसे इस अन्नको ग्रहण करिए । इसके अनन्तर हंसकर श्रीरामचन्द्रजीने कहा-॥३८। यदि देवीकी बात सच है तो वे सीतारूपसे यहाँ मेरे पास आय ॥३९। तुममेंसे कोई स्त्री जाकर मेरा यह सन्देश दुर्गाजीको सुना आये । ४०॥ रामके आज्ञानुसार उनमेंसे एक स्त्री दौड़ती हुई दुर्गाजीके पास पहुँची और रामका संदेश कह सुनाया ॥ ४१॥ उस स्त्रीके मुखसे इस प्रकार रामका संदेश सुनकर दुर्गाजीने थोड़ासा दरवाजा खोला और सीतारूपमें बाहर निकल आया । ४२॥ उन्होंने मन्दिरके दरवाजाको मजबूत बन्द किया और हाथमें जलपात्र लेकर मुसकराती हुई रामकी ओर चल पड़ीं ॥४३॥ वहाँ पहुँचकर उन्होंने रामको प्रणाम किया और उनकी बगलमें जा बैठीं । यह कौतुक देखकर सब स्त्रियां बहुत विस्मित हुईं ॥ ४४॥ इसके बाद राम उन ब्राह्मणों, क्षत्रियों तथा वैश्योंकी स्त्रियोंका अन्न लानेके लिए स्नान करनेको उद्यत हुए ॥ ४५॥ एतदर्थं रामने अपने धनुषपर बाण चढ़ाया और पृथिवीको फोड़कर पाताल-