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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६९१

सर्गः ११ ] मनोहरकाण्डम् ६९१

कुम्भोत्थं शशिरश्मिसन्निभमहं मत्वा रामचन्द्रं स्मरेत् । प्रावित्रं शमनात्मजा च यतयो युष्मासि वै ॥११५॥
तस्यैकादशमस्यापि जलं पूर्वस्मृतिर्भवः। ततः सशङ्कनो दूरं स्थित्वा शंभुं व्यजिज्ञपत् ॥११६॥
मामुद्धर मुनिश्रेष्ठ घोराद्राक्षसदेहतः। शरणं ते गतोऽस्म्यद्य जलं पूर्वस्मृतिर्भवम् ॥११७॥
इति तकैतुकं दृष्ट्वा रक्षसं प्राह स द्विजः। कस्मात्ते राक्षसवं हि अप पृष्ठ वदाऽधुना ॥११८॥
राक्षसः प्राह वेगेन शृणु शून्ये निजं वद। जनस्थाने पुरा चाहं विप्रः कर्मपराङ्मुखः ॥११९॥
प्रतिग्रहपरः पापी दुर्मार्गव्यसनी सदा। तस्मिन्नेवौदरे चैत्रे मम भार्या सती शुभा ॥१२०॥
स्नानार्थं गभतीर्थं सा मामपृष्ट्वा गृहाययौ। त्वां मार्गे समया दृष्ट्वा धृत्वा सर्गे चलां सुभाम् ॥१२१॥
प्रोक्ता क्रोधेन्वया रंडे ममपृष्ट्वा क्व यास्यसि। सा प्राह भवभीरु तु रामतीर्थे प्रगम्यते ॥१२२॥
मधुमासऽवगाहार्थं न मया दुष्कृतं कृतम्। एवं ब्रुवति तद्वाक्यं ताडिता सा मया बलात् ॥१२३॥
प्रेषिता स्वगृहं भर्त्सयन्तः कालान्तरे गते। मृतोऽहं च तदा नातो यमलोकं यमानुगैः ॥१२४॥
चित्रगुप्तोऽथ दृष्ट्वा मां धिग्धृत्वा वै पुनः पुनः। यमराजं स वै प्राह घर्षयन्मां रुषान्वितः ॥१२५॥
भो धर्मराज पापोऽयं चैत्रस्नाननिवारकः। लुब्धादी राक्षसीं योनिं निरयान् मोक्तुमर्हति १२६॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा यमः प्राहानुगांस्तदा। भो भटा राक्षसीं योनिदीयतां निर्जने वने ॥१२७॥
पादितेऽस्यै च षष्ठांशात्संस्थाप्य यमार्जुनैः। दत्ता मे राक्षसीं योनिं त्यक्त्व चात्रगता यमम् १२८॥
तदाऽरभ्य वने चाहं क्षुत्तृट्परिपीड़ितः। पञ्चविंशत्सहस्राणि वर्षाण्यत्र स्थितस्त्वियम्। १२९॥
किं मया सुकृतं पूर्वं कृतं यस्मादिने नरा। गंगतिश्चाथ वै जाता मधुसंगतो गतिप्रदः ।१३०॥
इति तद्वचनं श्रुत्वा शंभुर्व्याप्त्वा दृशं हृदि। ज्ञात्वा यत्सुकृतं पूर्वं राक्षसाय न्यवेदयत् ॥१३१॥
शृणु राक्षस यत्पूर्वे कृतं वै सुकृतं त्वया। तस्माज्जाता संगतिर्मे वने निर्भासुरे शुभा ॥१३२॥

बिन्दुजल समीप पहुँचने पर उसका घमण्ड देखकर शम्भुने रामचन्द्रका स्मरण करके अपना तूंबीका जल उस राक्षसके मुखमें फेंक दिया। रामनामसे पवित्रोभूत जलके पड़नेसे उस राक्षसको अपने पूर्वजन्मका स्मरण हो आया। इसलिए वह दूर ही खड़ा होकर शम्भुसे कहने लगा—हे मुनिराज ! इस घोर राक्षसदेह-से आप मेरी रक्षा करिए। मैं आपकी शरण हूँ। आपके जलसिञ्चनसे मुझे अपने पूर्वजन्मका स्मरण हो आया है॥ ११५-११७॥ इस प्रकारका कौतुक देखकर ब्राह्मणने उस राक्षससे कहा—पहले तुम हमें यह बतलाओ कि तुम राक्षसदेहका किस तरह प्राप्त हुए ॥११८॥ राक्षसने अपने पूर्वजन्मका हाल बताना प्रारम्भ किया। उसने कहा—इसके पहले मै जन्ममें जनस्थान पुरमें एक ब्राह्मण था ॥ ११९॥ उस समय मै जैसे तैसे द्रव्य लेता हुआ दुराचार और व्यसन में अपना जीवन बिता रहा था। उसी समय मेरी स्त्री बिना मुझसे पूछे ही चैत्रस्नान करनेके लिए रामतीर्थको चल पड़ी। मैंने उसे रास्तेमें देखा तो पकड़ लिया और उससे कहा—अरी राँड ! बिना हमसे पूछे तू कहाँ जा रही है ? भयभीत होकर उसने उत्तर दिया कि मै चैत्रस्नान करनेके लिए रामतीर्थ (अयोध्या) जा रही हूँ ॥ १२०-१२२॥ ऐसा करनेमें मैंने कोई पाप नहीं समझा इसलिए चल पड़ी। ऐसी निष्कपट बात सुनकर भी मैंने उसे बहुत मारा और घर लौटा दिया। कुछ दिन बाद मेरी मृत्यु हुई और यमके दूत पकड़कर मुझे यमलोक ले गये ॥ १२३ ॥ १२४॥ चित्रगुप्तने मुझे देखा तो बहुत धिक्कारा और धमकाकर यमराजसे कहा—हे धर्मराज ! इस पापीने अच्छी स्त्रीको चैत्रस्नानसे रोका था। अतएव यह लुब्ध राक्षसी योनिको भोगकर दण्ड पाने का अधिकारी है ॥ १२५ ॥ १२६ ॥ इस प्रकार चित्रगुप्तकी बात सुनकर धर्मराजने अपने कर्मचारियों से कहा कि इसे किसी निर्जन वनमें राक्षसी योनि दे दो। उनके आज्ञानुसार यमदूत मुझे इस वनमें छोड़ कर लौट गये। तभीसे भूखे-प्यासे रहकर मैंने पच्चीस हजार वर्ष बिताये हैं ॥ १२७-१२९॥ मुझे नहीं मालूम कि मैंने कौन सा पुण्य किया था, जिसके प्रभावसे इस निर्जन वनमें आप जैसे सज्जनका दर्शनरूप गतिप्रद उत्तम फल प्राप्त हुआ ॥ १३० ॥ उसकी बात सुनकर शंभुने क्षणभर अपने हृदयमें उसके पूर्व सुकृतका ध्यान किया और कहने लगे—॥ १३१ ॥ हे राक्षस तुमने पूर्वजन्ममें जो सुकृत किया था, वह

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आनन्दरामायणे
[ सर्ग ११

एकादश्यां चैत्रशुक्ले कृतवान्ब्राह्मणोजनम् । ताम्बूलो दक्षिणायुक्तः कट्या वस्त्रेन्वया धृतः ॥१३३॥
द्वादश्यां प्रातरुत्थाय गत्वा स्नानं त्वया कृतम् । पतितः स हि तांबूलो विस्मृत्या गौतमीतटे ॥१३४॥
दक्षिणामहितो दृष्टः स केनापि द्विजेन वै । गृहीत्वा स हि द्वादश्यां न जानंश्च त्वया पुनः ॥१३५॥
तांबूलदानाद्दुश्चैत्रमासे जाता बने मेऽद्य हि संगतिस्ते ।
तस्मान्मधौ राक्षस मानवैर्हि ताम्बूलदानं करणीयमेतत् ॥१३६॥
इत्युक्त्वा राक्षसं शम्भुश्चैत्रमाहात्म्यमुत्तमम् । उभाभ्यां श्रावयित्वाऽथ कर्कशं वाक्यमब्रवीत् ॥१३७॥
भो कर्कश महाबुद्धे शृणुष्व वचनं मम । आगच्छ त्वं महैवाद्य मयाऽयोध्यापुरीं प्रति ॥१३८॥
सरयूस्रानमात्रेण सद्यो पापाद्विमोक्ष्यसे । इत्युक्त्वा कर्कशं शम्भुस्ततः प्रोवाच राक्षसस् ॥१३९॥
भो राक्षस त्वमत्रैव मासमात्रं स्थितो भव । अयोध्यायां प्रवेशश्च राक्षसानां न विद्यते ॥१४०॥
अतोऽहं मधुमासे हि स्नानस्त्रानेन परा पुनः । यदागच्छामि कांचीं त्वां चोद्धरिष्याम्यहं तदा ॥१४१॥
मा संदेहोऽस्तु ते चित्ते शपथं कारयाम्यहम् । यत्पापं ब्रह्महत्यायास्तथा गायत्रिनिंदनात् ॥१४२॥
नोद्धृत्य त्वां हि गच्छामि तर्हि तन्मयि तिष्ठतु मद्यपने च यत्पापं हेमस्तेयादिकं च यत् ॥१४३॥
नोद्धृत्य त्वां हि गच्छामि तर्हि तन्मयि तिष्ठतु । यत्पापं भ्रूणहत्यायास्तथा चैत्रे ह्यमज्जनात् ॥१४४॥
नोद्धृत्य त्वां हि गच्छामि तर्हि तन्मयि तिष्ठतु । इत्यादिशपथैर्नर्हि राक्षसं दृढयन् द्विजः ॥१४५॥
यावत्पश्यति सर्वत्र तावज्जातं हि कौतुकम् । व्याधाय चैत्रमासस्य माहात्म्यस्योपदेशतः ॥१४६॥
तरवः फलिनो जाता परितो दशयोजनम् । पत्रैः पुष्पैर्नित्राश्च सौगंधः पवनो ववौ ॥१४७॥
नद्यस्तोयं वहन्त्यश्च ननृतुर्बर्हिणो वने । तद्दृष्ट्वा कर्कशश्चापि चैत्रमाहात्म्यकीर्तनात् ॥१४८॥
दुर्वर्णं सुवर्णं जातं चैत्रश्रेष्ठत्यमन्यत । ततस्ते द्वितयस्तस्मादनाम्नागोष्ठं निर्गताः ॥१४९॥

मैं बतला रहा हूँ उसके प्रभावसे हमारे तुम्हार साक्षात्कार हुआ है । एक बार तुमने चैत्रशुक्ल एका-
दशीको किसीके यहां भोजन किया, ताम्बूल दक्षिणा ली और एक वस्त्रम रखकर उसे तुमने अपनी कमरमें लपेट
लिया ॥१३३॥ द्वादशीको तुम सबेरे उठे और गङ्गास्नान करने चले गये । वह कमरमें लिपटी हुई दक्षिणा और
ताम्बूल भूलसे गौतमी नदीके तटपर गिर गया । उस किसी ब्राह्मणने उठा लिया, किन्तु उसके विषयमें तुम्हें
कुछ ख्याल नहीं था । १३३-१३५॥ चैत्रमासम उस दक्षिणा और ताम्बूलके दानसे ही आज इस निर्जन वनमें हम-
से साक्षात्कार हुआ है । देखो, केवल ताम्बूलके दानका कितना बडा माहात्म्य है ! अतएव इस मासमें ताम्बूल-
दान अवश्य करना चाहिए ॥१३६॥ इस तरह उस राक्षसको चैत्रम मासका माहात्म्य सुनाकर शम्भुने कर्कशसे
कहा—हे महाबुद्धिमान् कर्कश ! मेरी बात मानो और आज ही मेरे साथ अयोध्यापुरीको चल दो
॥१३७॥ १३८॥ चैत्रमासम सरयूस्नानमात्र से तुम सब पापोंसे मुक्त हो जाओगे ऐसा कर्कशसे कहकर
शम्भुने उस राक्षससे कहा कि तुम महीना भर इसी स्थानपर रहो । क्योंकि अयोध्या नगरमें राक्षसलोक
नहीं जा सकते ॥१३६ ॥ १४०॥ इस कारण जब मैं चैत्रस्नान करके उधरसे लौटूंगा और यहां आऊँगा, तब
तुम्हारा उद्धार करूँगा ॥१४१॥ तुम इसमें कुछ सन्देह मत करो । मैं कसम खाता हूँ कि ब्राह्मणहत्या करने
तथा गौ एवं मुनियोंकी निन्दा करनेसे जो पातक होता है, वह पातक मुझे लगे यदि मैं तुम्हारा उद्धार किए
बिना जाऊँ। मद्य पीने और सुवर्ण चुरानेसे जो पातक होता है यदि मैं तुम्हारा उद्धार किये बिना जाऊं
तो मुझे वे पातक लगे जो पाप भ्रूणहत्या तथा चैत्रमासमें स्नान न करनेसे लगता है वह मुझे लगे । यदि
विना तुम्हारा उद्धार किये विना जाऊँ । इस तरह विविध प्रकारकी शपथें खाकर शम्भुन उस ब्रह्मराक्षसको
आश्वासन दिया इसके बाद जब व्याधन चारों ओर दृष्टि उठाकर देखा तो चैत्रस्नानका माहात्म्य सुननेके
कारण उस वनके दस योजन तक उसे सब वृक्ष फल फूलोंसे लद दिखायी दिये और सुगन्धित वायु चलने लगा
॥१४२-१४७॥ उस वनकी सब नदियां घणघोर निनाद करता हुआ जल बहने लगा और मयूरमण्डल