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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

सर्गः १०] बालकाण्डम् १०५

सर्गः १०] बालकाण्डम् १०५

परे श्रुते न किं शैला इत्युक्तोऽनर्हकृत्यः । इह संति सतो मान्या मान्यास्ते तु स्वभूमिषु ॥९१॥
सवैश्वेदेहसंदेहा वदरैकपाश्रिताः विषवृक्षीषधिव्योऽप्यन्तोऽप्यन्तर्मित्रगभः ॥९२॥
नीलश्च नीलनिलयो मंदरो मंदलोचनः । मलयः स मलयो गंधं नद्याप रैवतः ॥९३॥
हेमकूटत्रिकूटाद्याः कूटाङ्गपदभाग् तु ते । किष्किन्धक्रोञ्चमख्याद्या मागस्त्या न ते भुवः ॥९४॥
इति विंध्यवचः श्रुत्वा नारदो हृद्यचिन्तयत् अहंवंशवेशभंगो न महद्भाव कल्पते ॥९५॥
श्रीशैलमुख्याः किं शैला नेह सन्त्यपलश्रियः येषां शिखरमात्रादिर्शनेन मुक्तये मताम् ॥९६॥
अथास्य बलमालोच्यमिति ज्ञात्वाऽब्रवीन्मुनिः गन्ययुक्तं कि भवता गिरिराजं विमुञ्चता ॥९७॥
परः शैलेषु शैलेन्द्रो मेरुस्त्वामवमन्यते । मया निश्शायित चेन्नत्यद्यापि निवेदितम् ॥९८॥
अथवा मद्विधानां हि केय चिंता महन्मनाम् । पश्यत्यस्तु तुभ्यमित्युक्त्वा ययौस व्योमवर्त्मना ९९॥
गत मुनौ निंदिंद स्वमनायोद्विग्नमानसः । चिंते विचारयामास मेरोः श्रेष्ठ्य कथं विति ॥१००॥
देवं प्रदक्षिणं कुर्यान्नित्यमेव दिवाकरः । सग्रहमंडलो नूनं मन्यमानो बलाधिकम् ॥१०१॥
इति निश्चित्य विंध्याद्रिर्ववृधे स मुधैषणः । निरुध्य त्राध्यमध्वान स्वम्भोऽभूद्गगनांगणे ॥१०२॥
ततः प्रभाते सूर्योऽसौ दिशि याम्यां समुद्यतः । गंतुं रुद्धं स्वपंथानं दृष्ट्वाऽभ्यस्थोऽभवद्गिरौ ॥१०३॥
योजनानां सहस्रे द्वे द्वे शते द्वे च योजने । पः स्वमध्यनिमेपार्द्धाद्याति नापिरिर स्थितः ॥१०४॥
गते बहुतिथे काले प्राच्योदीच्या भृशार्दिताः । चण्डरश्मेः करत्रातशनमतापनाशिताः ॥१०५॥
पाश्चात्या दाक्षिणात्याश्च निद्रापुद्रितलोचनाः । भ्रमिता एव दृश्यंते मतःप्रहमवश्यम् ॥१०६॥
स्वाहास्वधावषट् स्वाहार्जने जपनीताने । पंचयज्ञक्रियालोगात्तच्चक्रम् भुवनत्रयम् ॥१०७॥

क्या दण्डक०का निवासस्थान सुन्दर भी वह विन्ध्य माननीय नहीं है ॥१०॥ क्या पृथिवीका धारण करने-
अन्य सैकड़ों पर्वत इस संसारमें नहीं हैं? क्या वे सभी पर्वत सज्जनोंके मान्य हैं? नहीं, यदि हैं भी तो
केवल अपने-अपने स्थानपर ॥९१॥ उदयाचल मन्द है। वह राक्षस का आश्रय देनका कृपा कल्पस ही सम्भव
है। त्रिगर्तारि ओषधिमात्र धारण करते हैं, अन्तानल निस्तेज हो गया है ॥९२॥ नीलाञ्जनके नाम
सम्द्रुमात्र है। मन्दराचल मन्ददृष्टि है। मलय पर्वत सर्पोंका घर है। रैवत निर्धन है ॥९३॥ हेमकूट
तथा त्रिकूट आदि केवल कूट दगापदवाले ही हैं। किष्किन्धा, कौञ्च और सह्य पर्वत भी सृष्टिके बाझको
हरण करनेमें समर्थ नहीं है ॥९४॥ विन्ध्याचलकी इस बातको सुनकर नारदन मनमें विचार किया कि
प्राणी महत्त्वके योग्य नहीं होता ॥९५॥ क्या इस श्रीशैल आदि पर्वत निर्मल कान्ति-
सम्पन्न तथा यशस्वी नहीं है ? जिसके शिखरके दर्शनमात्रसे शुद्ध अन्तःकरणवाले महान् पुरुषोंको मुक्ति मिल
जाती है ॥९६॥ अतएव आज इसके बलकी परीक्षा करनी चाहिए। ऐसा विचार करके नारद मुनिने कहा -
दूसर पर्वतोंका बल कुछ वर्णन किया है ॥९७॥ पर पर्वतोंमें श्रेष्ठ मेरुपर्वत तुम्हारा अपमान करता है। वह
तुमसे भी अपनेको बढ़कर मानता है। बस, यही कारण है कि मैंने सम्भाषणत किया था और यह बात
तुमसे भी कह दी ॥९८॥ अथवा हम जैसे महात्माओंको इस बातकी क्या चिंता है। तुम्हारा कल्याण
हो ? इतना कहकर वे व्योममार्गसे चले गये ॥९९॥ नारद मुनिके चले जानेपर अतिशय चिन्ताकुल होकर
विन्ध्याचलने अपने आपको बड़ी निन्दा की और सोचने लगा कि मेरुकी इतनी बड़ी महिमा क्यों है ? ॥१००॥
उस मेरुकी नक्षत्रों सहित सूर्यनारायण प्रतिदिन उसकी परिक्रमा करते हैं। सम्भवतः इसीसे उसको अपने
बल-पौरुष तथा महत्त्वका अभिमान है ॥१०१॥ ऐसा निश्चय करके विन्ध्याचलने उसकी समृद्धि देखने-
की उत्सुकता अपना शरीर बहुत ऊपरको बढ़ाया और मूर्द्धके समान [खम्भा] बनकर आकाशाप्यो बीचमें खड़ा हो गया
॥१०२॥ प्रातःकाल सूर्यने दक्षिण दिशाकी ओर जानेको प्रस्थान किया। तब रास्ता रुका देखकर वे वहीं
रुक गए। जब बहुत दिन बीत गये, तब सूर्यके प्रचण्ड किरणसमूहके हाथसे पूर्व तथा उत्तर दिशाके लोग
जलने लगे ॥१०३-१०५॥ पश्चिम तथा दक्षिण दिशाके लोगोंकी आँखें निद्रासे मुंदी रहीं। ये सब
॥१०६-१०७॥

१०६ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १०


ततः सुरा विधेर्वाक्यादगस्तिं तन्निषेधतुम् । प्रार्थयामासुरात्रेय स मुनिर्विकलोऽभवत् ॥१०८॥
तदाऽगस्तिर्मयोक्तः स गच्छ त्वं दक्षिणां दिशम् । वाक्यान्मे गिरि बद्ध्वा मा खिद त्वं मरुत्प्रभाम् ॥१०९॥
अहमप्यचिरेणैव तत्र सिद्धास्तवे सेतौ श्रीराघवार्थं यास्यामि दक्षिणां दिशम् ॥११०॥
इति मद्बचनं श्रुत्वाऽगस्तिर्मुष्टमनास्तदा । मुक्त्वा काशीं ययौ विन्ध्यं लोपामुद्रामन्वितः॥१११॥
तमगस्त्यं सपत्नीकं दृष्ट्वा विन्ध्योऽतिकम्पितः । अतिखर्वनरो भूत्वा निनिंसुरवनीमिव ॥११२॥
आज्ञाप्रसादः क्रियतां किं करोमोति चाब्रवीत् तद्विन्ध्यवचनं श्रुत्वाऽगस्तिः प्राह च सादरम् । ११३॥
विन्ध्य साधुरसि प्राज्ञो मां च जानासि तत्त्वतः । पुनरागमनं चैन्मे तावत्त्वं त्वंतरो भव ॥११४॥
इत्युक्त्वा दक्षिणामाशामगस्तिः स ययौ तदा । वेपमानो गिरिः प्राह पुनर्जन्यमाद्य मेऽभवत् ॥११५॥
उच्छ्रिते द्वात्रिंशाब्दैः स मुनिं पश्यति दक्षिणे । नागमं तं मुनिं दृष्ट्वा पुनः खर्वोऽवनिष्ठिते ॥११६॥
अद्य श्वो वा परश्वो वा ह्यागमिष्यति वै मुनिः । इति चिन्तन्महाभागो गिरिर्ज्ञाताववस्थितः । ११७॥
मासापि मुनिशतानि नाद्यापि गिरिरागवे । अगस्त्येऽपि च तत्काले कालज्ञाऽबालकाल्पयत् ॥११८॥
जगत्स्वास्थ्यमवापोर्ध्वं पूर्ववद्भानुमन्वरैः । स मुनिर्दण्डके गत्वा मद्ध्वयं सम्प्रणच्छति । ११९॥
करोति मन्प्रतीक्षां च तस्माद्यास्याम्यहं कपे । इत्युक्तो मारुतिः काश्यां मया देवि विसर्जितः ॥१२०॥
जगामाकाशमार्गेण शीघ्रं गर्वं स मारुतिः । किंचिद्रर्वममाविष्ठो लिंगद्वयसमन्वितः ॥१२१॥
दृष्ट्वै तद्गर्वतो ज्ञात्वा सुग्रीवादीन् उचेऽब्रवीत् । मुहूर्त्तानिक्रमे सेतुर भविष्यति मनावहम् ॥१२२॥
कृत्वा लिंगं सैकतं च सेत्वादौ स्थापयामि वै । इत्युक्त्वा वानरान् सर्वान्मुनिभिः सनिषेचितः ॥१२३॥


की देखकर वा आकाशका गृह और नक्षत्र ही विद्यमान दिखायी देते थे । १०६ ।। संसारका व्यवहार, अग्निहोत्र तथा पंचयज्ञकी क्रियाओंके लोप हो जानेसे संसार क्षीण होने लगा ॥ १०७ ॥ अनन्तर ब्रह्माजीके कहनेसे देवताओने जाकर विन्ध्य पर्वतके गुरु अगस्त्य मुनिसे प्रार्थना की। तब मुनि घबराकर यहां काशीमें आये ॥ १०८ ॥ मैने (शिवजीने) अगस्त्य मुनिसे कहा कि तुम दक्षिण दिशाकी ओर जाओ, वहां जाकर विन्ध्यपर्वतको अपने बाक्यमें बांधकर निश्चिन्त भावसे मेरा भजन करना ॥ १०९ ॥ काशीत्यागसे मैं जो तुम्हारा खेद दूर करनेके लिए सेतुबन्धपर रामकी पूजा प्राप्त करनेके लिए शीघ्र ही दक्षिण प्रदेशमें आऊंगा ॥ ११० ॥ मेरे इस कथनको सुनकर अगस्त्यमुनि प्रसन्नतापूर्वक उसी समय काशी छोड़कर अपनी स्त्री लोपामुद्राके साथ विन्ध्यपर्वतकी ओर चल पड़े ॥ १११ ॥ सपत्नीक मुनिको देखकर विन्ध्याचल कंपने लगा और मानो पृथ्वीमें घुस जाना चाहता हो, इस प्रकार अतिखर्व (छोटा) रूप धारण करके बोला कि मैं आपका दास हूँ। मुझे कुछ आज्ञा देनको कृपा करें। विन्ध्यकी बात सुनकर अगस्त्य मुनि बोले- ॥ ११२ ॥ ॥ ११३ ॥ हे विन्ध्य तुम साधु, पण्डित तथा बुद्धिमन् हो और मुझे भली भांति जानते हो। अतः जबतक मैं उधरसे लौटकर पुनः यहाँ न आऊं, तब तक तुम इसी प्रकार वामनरूप नीचा सिर किये हुए रहो ॥११४॥ इतना कहकर अगस्त्य दक्षिणकी ओर चले गये। तब कम्पित होकर विन्ध्यने कहा कि आजके दिन मेरा पुनर्जन्म हुआ है ॥ ११५ ॥ बत्तीस वर्ष बाद जब उसने सिर उठाकर दक्षिणकी ओर देखा तो मुनि नहीं दिखायी दिये। तब फिर उसने वैसे ही नीचा सिर कर लिया ॥ ११६ ॥ आज, कल या परसोंतक मुनिको यहाँ अवश्य आ जाना चाहिये । इस प्रकार सोचता हुआ विन्ध्य बड़ी चिन्ता करने लगा । ११७॥ पर न वे मुनि आज तक आये और न पर्वत खड़ा हुआ । काशीमें रविका गमनवान् सूर्यके साथही वरुणने भी उसी समय अपने दण्डका क्षोभ किया । ११८॥ तब सूर्यके संचारसे जगत् पूर्ववत् पुनः स्वस्थ हुआ। वे अगस्त्य मुनि दण्डकारण्यमे जाकर मेरे वचनका स्मरण करते हुए मेरा प्रणोता कर रहे हैं, इस कारण हे कपि हनुमन् ! तू वही अवश्य जायेगा। हे देवि ! इतना कहकर मैने मारुतिको काशीसे विदा किया ॥ ११९ ॥ १२० ॥ तब मारुति शीघ्र आकाशमार्गसे रामके पास चले। उस समय मेरे दो लिंग प्राप्त करके उनके मनमें कुछ अभिमान हुआ ॥ १२१ ॥ रामने इस गर्वको जान लिया और सुग्रीव आदिसे कहा कि प्रतिज्ञाका मुहूर्त बीता जा रहा है। इसलिए मैं बालूका लिंग बनाकर सेतुके इस छोरपर स्थापित किये देता हूँ। तदनुसार सब मुनियों और

सर्गः १०] सारकाण्डम् २०७

सैकतं स्थापयामास लिङ्गं रामो विधानतः। तदा संस्मार मनसि कौतुकं रघुनन्दनः ॥१२४॥
श्रावयन्ती मणिः द्यौश्च सायंकोटिशतप्रभोपमः। तं वरं च मणिं कण्ठे बबन्ध रघुनन्दनः ॥१२५॥
वस्त्रपुष्पैर्धनैर्वस्त्रैश्चामरव्येषुभिः दिव्यैः पाद्यार्घ्यं च पूजयामास तान् मुनीन्द्रान्॥१२६॥
दत्तस्वं मुनयस्तश वरंवेगातिपूरिताः। ययुः स्वीयाश्रमान् मार्गे द्राग्ददर्श स मारुतिः ॥१२७॥
पप्रच्छ मारुतिर्विप्रान् यूयं केन प्रपूरिताः। तेऽप्यूचुर्लिङ्गमाराध्य रामेणैव पूरिताः ॥१२८॥
तत्तेषां वचनं श्रुत्वा क्रोधाविष्टोऽप्यचिन्तयत् । वृथाऽहं भ्रमितस्तेन रामेणाद्य प्रतारितः ॥१२९॥
इत्थं वदन्ययौ रामं क्रोधात्स्वीये पदद्वयम् । भुवि हतात्थ पतितस्तदा भूम्यां पदद्वयम् ॥१३०॥
गतं कपिस्तदा राममब्रवीत्किं न मे स्मृतः। सीताशुद्धिर्मया लङ्कां गत्वानीतेति सोऽद्य हि ॥१३१॥
तस्य मेऽद्योपवापोऽत्र काशीं प्रेष्य त्वया कृतः । किमर्थं भ्रमितश्चाहं यदीत्थं ते हृदि स्थितम् ॥१३२॥
अमरिष्यन्मया ज्ञातं चेत्पूर्वं हृद्गतं तव। काशीमद्य हि गत्वा किमर्थं लिङ्गमानये ॥१३३॥
एकं त्वदर्थमानीतमपरं लिङ्गमुत्तमम्। मयाऽऽप्यार्यं समानीतं तदग्रे किं करोम्यहम् ॥१३४॥
एवं क्रोधयुतं वाक्यं किञ्चिद्गर्वसमन्वितम्। रामः श्रुत्वा कपिं प्राह कपे त्वं सत्यवागसि ॥१३५॥
पर्यन्तस्थापितं लिङ्गं समुत्पाट्य त्वं बलात् । स्थापयामि त्वयानीतं ह्यद्या विश्वेश्वराभिधम्॥१३६॥
तथेत्युक्त्वा मारुतिः स संवृतस्येश्वरस्य च। प्रवेष्ट्य मस्तके पुच्छं बलेनान्दोलयन्मुहुः ॥१३७॥
त्रुटितं वत्कपेः पुच्छं पपात भुवि मूर्च्छितः। असुर्वानराः सर्वे न चचालेशस्तदा ॥१३८॥
स्वस्थो भूत्वा मारुतिः स गलगर्वस्तदाऽभवत् । ननाम परया भक्त्या प्रार्थयामास तं मुहुः ॥१३९॥
मायाऽपराधितं राम तत्क्षमस्व कृपानिधे । तदाह मारुतिं रामस्त्वं मल्लिङ्गोत्तरे न्विदम् ॥१४०॥


वानरोंको बुलाकर रामने विधिवत् बालुका लिङ्गको स्थापित कर दिया। पश्चात् भगवान् रामने कौतुक मणिका स्मरण किया ॥ १२३-१२४ ॥ स्मरण करते ही करोड़ों सूर्यके समान प्रभाशाली वह मणि आकाशमार्गसे आ गया। तब रघुनन्दन रामने उस मणिको कण्ठमें बाँध लिया ॥ १२५ ॥ उस मणिसे प्राप्त धन, वस्त्र, आभरण, शंख, धनु, दिव्य बाणवान तथा पायस आदिसे रामने मुनियोंका पूजन-सत्कार किया ॥ १२६ ॥ श्रीरामसे पूजा प्राप्त करके प्रसन्न हो मुनि अपने-अपने आश्रमोंको जा रहे थे, तभी रास्ते में उन्हें मारुतिने देख लिया ॥ १२७ ॥ तब हनुमान्ने उनसे पूछा कि आपकी पूजा किसने की है ? उन्होंने उत्तर दिया कि रामने शिवालयकी आराधना तथा स्थापना करके हम लोगोंका पूजन की है ॥ १२८ ॥ हनुमान् उनकी बात सुनते ही क्रुद्ध होकर विचारने लगे कि रामने आज मुझसे व्यर्थ इतना परिश्रम कराके ठगा है ॥ १२९ ॥ यह विचारते हुए वे क्रोधसे रामके पास गये और जातेही उन्होंने अपने दोनों पाँवोंको जमीनपर पटका। इससे उनके दोनों पांव पृथ्वीमें धंस गये। बादमें हनुमान्ने रामसे कहा कि क्या आपका मेरा स्मरण नहीं था ? जिस हनुमान्ने लङ्कामें सीताकी खोज की थी और लौटकर आपको उनकी खबर दी थी, ॥ १३० । १३१ ॥ उसी हनुमान्का आज आपने काशी भेजकर ऐसा उपहास किया ? यदि आपके मनमें यह था तो फिर मुझे इस तरह व्यर्थ क्यों सताया ? ॥ १३२ । यदि मुझे आपका अभिप्राय ज्ञात हो जाता तो मैं कभी काशी जाकर ये दो शिवलिंग न लाता ॥ १३३ ॥ इनमें से एक आपके लिए और दूसरा उत्तम शिवलिंग अपने लिये ले आया हूँ। अब मैं इस आपके शिवलिंगका क्या करूँ ! ॥ १३४ ॥ इस प्रकार कुछ क्रोध तथा गर्वयुक्त हनुमान्का वाक्य सुनकर रामने कहा कि हे कपे ! तुम्हारा कहना सत्य है । १३५॥ अब तुम यदि इस मेरे स्थापित लिङ्गको पूँछसे लपेटकर उखाड़ लो तो मैं तुम्हारे लाये हुए विश्वेश्वरलिङ्गको यहीं तुरन्त स्थापित कर दूँ। ॥ १३६॥ 'बहुत अच्छा' कहकर हनुमान्ने उस बालूके लिंगके उपरी भागमें पूँछ लपेटकर बारम्बार खूब जोरसे हिलाया ॥ १३७॥ जिससे सहसा उनकी पूँछ टूट गयी। वे जमीनपर गिर पड़े और मूर्च्छित हो गये। परन्तु बालुका लिंग तनिक भी नहीं हिला यह देखकर सब वानर हंसने लगे ॥ १३८॥ थोड़ी देरमें मारुति स्वस्थ हो गया गर्व छोड़कर भक्तिसे रामको नमस्कार करके प्रार्थना करने लगे — ॥ १३९॥

१०८आनन्दरामायणे[ सर्गः १०

विश्वनाथाभिधं लिङ्गं स्वीयं संस्थापयाधुना । तथेति मारुतिर्लिङ्गं स्थापयामास सादरम् ॥१४१॥
मारुतेश्चैव लिङ्गाय ददौ रामो वरं तदा अमपूज्य विश्वनाथं मारुते त्वत्प्रतिष्ठितम् ॥१४२॥
यमादौ पूजयन्त्यत्र ये नरा लिङ्गमनुत्तमम् । रामेश्वराभिधं सेतौ तेषां पूजा वृथा भवेत् ॥१४३॥
इत्युक्त्वा तं पुनः प्राह रामो राजीवलोचनः । मदर्थं यत्समानीतं त्वया लिङ्गं महत्तमम् ॥१४४॥
विश्वनाथस्य तत्पृष्ठामस्तु देवालये चिरम् । अनर्चितमवन्यां तदप्रतिष्ठितमुत्तमम् ॥१४५॥
अग्र कालान्तरेणाहं तच्चापि स्थापयामि वै । तत्तत्र वर्ततेऽद्यापि लिङ्गं विश्वेश्वरान्तिके ॥१४६॥
अप्रतिष्ठापितं भूमौ न केनापि प्रपूजितम् । पुनः प्राह कपिं रामस्त्वमत्र च्छिन्नलाङ्गुलः ॥१४७॥
वस भूमौ गुप्तपादः स्मरन्मद्रूपगर्वित निवृतम् । ततः कपिः स्वीयमूर्तिं स्थापयामास स्वाग्रतः ॥१४८॥
छिन्नपुच्छा गुप्तपादा सा तत्राद्यापि वर्तते । पतितो मूर्च्छितो यत्र मारुतिस्तत्र तद्ध्रुवम् । १४९॥
बभूव मारुतेर्नाम्ना तीर्थं पापप्रणाशनम् । रामस्तत्राकरोत्पुण्यं स्वनाम्ना तीर्थमुत्तमम् । १५०।
स्वाङ्गेन स्थापयामास मूर्तिं तत्र रघूद्वहः । सेतुमाधवनाम्नी सा वर्ततेऽद्यापि पार्वति ॥१५१॥
स्वनाम्ना लक्ष्मणश्चापि चकार तीर्थमुत्तमम् । ततो रामः स्वहस्तेन स्पृष्ट्वा मारुतिलाङ्गुलम् ॥१५२॥
चकार पूर्ववद्रम्यं दृढसन्धिसमन्वितः । तत्पुच्छवेष्टनाज्जातः कृशो रामेशमस्तकः ॥१५३।
स तथैव कृशोऽद्यापि तत्रास्ति शिवमस्तकः । तदारभ्य त्यक्तगर्वश्चाभूद्रामे स मारुतिः ॥१५४।
ततोऽहं सैकताल्लिङ्गादाविर्भूय रघूद्वहम् । अब्रुवं देवि तत्सर्वं शृणुष्व ते वदाम्यहम् ॥१५५।
राघवेन्द्र गुणश्रेष्ठ शृणु वृत्तं पुरातनम् । एकदाऽहं पुरा भूमौ मलिनाम्बरसंयुतः । १५६।
भिक्षार्थं कौतुकाद्विप्ररूपेणाविचरं सुखम् । ऋषीणामाश्रमायेषु ह्यटनन् मां विलोक्य च ॥१५७॥

हे राम ! मम वा अपराध हुआ हो, उसे क्षम कर । यह श्लोक अप श्रुतिनिधि है । तदनन्तर रामने कहा हे मारुति तुम मत्स्थापित लिङ्गके उत्तरकी ओर इस विश्वनाथ नामक अपने लिङ्गको स्थापित करो । 'तथास्तु' कहकर मारुतिने सादर शिवलिंगकी स्थापना कर दी ॥१४०॥१४१॥ तब रामने उस मारुतिलिङ्गको वरदान देत हुए कहा हे मारुते तुम्हारे द्वारा स्थापित विश्वनाथलिङ्गकी पूजा किये बिना जो सेतुबन्धरामेश्वरकी पूजा करेगा उसकी पूजा व्यर्थ हो जायगी ॥ १४२॥ १४३॥ इतना कहकर रामने फिर हनुमान्‌से कहा कि जो तुम मेरे लिए उत्तम लिङ्ग लाये हो ॥ १४४॥ वह विश्वनाथलिङ्ग यों ही इस देवालयमें पड़ा रहे । बहुत कालतक यह उत्तम लिङ्ग पृथ्वीपर अपूजित ही पड़ा रहेगा । १४५॥ आगे चलकर बहुत दिनों बाद इसकी भी मैं अच्छी स्थापना करूंगा। वह लिङ्ग अभी भी वहीं विश्वेश्वरलिङ्गके पास पड़ा हुआ है । १४६ ॥ न अभी उसका प्रतिष्ठा हुई है और न कोई उसकी पूजा ही करता है रामने फिर हनुमान्‌से कहा कि तुम्हारी पूंछ यहींपर छिन्न हुई है । अतः तुम यहींपर भूमिमें छिन्नपुच्छ तथा गुप्तपाद होकर अपने गर्वका स्मरण करते हुए पड़े रहो, तब हनुमान्‌ने अपने आगे वहीं अपनी मूर्ति स्थापित कर दी । १४७ १४८।, तथा का वहीं हनुमान्‌की छिन्नपुच्छ और गुप्त पांवकी मूर्ति विद्यमान है । जहाँपर मारुति मूर्छित होकर गिरे थे, वह उत्तम स्थान मारुतिके नामसे पवित्र तथा पापोंको नष्ट करनेवाला तीर्थ प्रसिद्ध हुआ । वहीं ही रामने भी अपने नामसे एक उत्तम तीर्थ बनाया ॥ १४९ ॥ १५० । रामने वहीं अपने अंगकी एक मूर्ति भी स्थापित कर दी । सेतुमाधव नामकी वह मूर्ति अभी भी वहां प्रस्तुत है ॥ १५१ ॥ हे पार्वति ! लक्ष्मणने भी वहीं अपने नामका उत्तम तीर्थ स्थापित किया । पश्चात् रामने अपने हाथसे छूकर हनुमान्‌की पूंछको पूर्ववत् सुन्दर तथा दृढ़ सन्धियुक्त बनाकर हनुमान्‌को प्रसन्न कर लिया । पूंछके लपेटे जानेके कारण रामेश्वरका मस्तक कुछ दब गया था ॥ १५२ ॥ १५३ ॥ वह शिवमस्तक अभी भी वैसा ही चिपटा है, तबसे हनुमान् रामके समक्ष सर्वथा गर्व्वरहित हो गये । १५४। हे देवि ! उस समय बालुक लिङ्गमसे प्रकट होकर मैने रघूद्वह रामसे जो कुछ कहा था, वह सब तुमको सुनाता हूँ । ध्यान देकर सुनो ॥१५५ । मैन कहा - हे राघवेन्द्र ! हे रघुश्रेष्ठ तुम्हें मैं एक प्राचीन इतिहास सुनाता हूँ । एक समय कौतुकवश मै पुराने कपड़े पहिन तथा ब्राह्मणका