Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

नवासीवाँ सर्ग

Page 2563Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

नवासीवाँ सर्ग

बुध और इलाका समागम तथा पुरूरवाकी उत्पत्ति

किंपुरुषजातिकी उत्पत्तिका यह प्रसंग सुनकर लक्ष्मण और भरत दोनोंने महाराज श्रीरामसे कहा—‘यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है’॥ १ ॥

तदनन्तर महायशस्वी धर्मात्मा श्रीरामने प्रजापति कर्दमके पुत्र इलकी इस कथाको फिर इस प्रकार कहना आरम्भ किया—॥ २ ॥

‘वे सब किन्नरियाँ पर्वतके किनारे चली गयीं। यह देख मुनिश्रेष्ठ बुधने उस रूपवती स्त्रीसे हँसते हुए-से कहा—॥ ३ ॥

‘“सुमुखि! मैं सोमदेवताका परम प्रिय पुत्र हूँ। वरारोहे! मुझे अनुराग और स्नेहभरी दृष्टिसे देखकर अपनाओ’॥ ४ ॥

‘स्वजनोंसे रहित उस सूने स्थानमें बुधकी यह बात सुनकर इला उन परम सुन्दर महातेजस्वी बुधसे इस प्रकार बोली—॥ ५ ॥

‘“सौम्य सोमकुमार! मैं अपनी इच्छाके अनुसार विचरनेवाली (स्वतन्त्र) हूँ, किंतु इस समय आपकी आज्ञाके अधीन हो रही हूँ; अतः मुझे उचित सेवाके लिये आदेश दीजिये और जैसी आपकी इच्छा हो, वैसा कीजिये’॥ ६ ॥

‘इलाका यह अद्भुत वचन सुनकर कामासक्त सोमपुत्रको बड़ा हर्ष हुआ। वे उसके साथ रमण करने लगे॥ ७ ॥

‘मनोहर मुखवाली इलाके साथ अतिशय रमण करनेवाले कामासक्त बुधका वैशाख मास एक क्षणके समान बीत गया॥ ८ ॥

‘एक मास पूर्ण होनेपर पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर मुखवाले प्रजापति-पुत्र श्रीमान् इल अपनी शय्यापर जाग उठे॥ ९ ॥

‘उन्होंने देखा, सोमपुत्र बुध वहाँ जलाशयमें तप कर रहे हैं। उनकी भुजाएँ ऊपरको उठी हुई हैं और वे निराधार खड़े हैं। उस समय राजाने बुधसे पूछा—॥ १० ॥

‘“भगवन्! मैं अपने सेवकोंके साथ दुर्गम पर्वतपर आ गया था, परंतु यहाँ मुझे अपनी वह सेना नहीं दिखायी देती है। पता नहीं, वे मेरे सैनिक कहाँ चले गये?’॥ ११ ॥

Page 2564Permalink

‘राजर्षि इलकी स्त्रीत्व-प्राप्तिविषयक स्मृति नष्ट हो गयी थी। उनकी बात सुनकर बुध उत्तम वाणीद्वारा उन्हें सान्त्वना देते हुए यह शुभ वचन बोले—॥ १२ ॥

“राजन्! आपके सारे सेवक ओलोंकी भारी वर्षासे मारे गये। आप भी आँधी-पानीके भयसे पीड़ित हो इस आश्रममें आकर सो गये थे॥ १३ ॥

“वीर! अब आप धैर्य धारण करें। आपका कल्याण हो। आप निर्भय और निश्चिन्त होकर फल-मूलका आहार करते हुए यहाँ सुखपूर्वक निवास कीजिये’॥ १४ ॥

‘बुधके इस वचनसे परम बुद्धिमान् राजा इलको बड़ा आश्वासन मिला, परंतु अपने सेवकोंके नष्ट होनेसे वे बहुत दुःखी थे; इसलिये उनसे इस प्रकार बोले—॥ १५ ॥

“ब्रह्मन्! मैं सेवकोंसे रहित हो जानेपर भी राज्यका परित्याग नहीं करूँगा। अब क्षणभर भी मुझसे यहाँ नहीं रहा जायगा; अतः मुझे जानेकी आज्ञा दीजिये॥ १६ ॥

“ब्रह्मन्! मेरे धर्मपरायण ज्येष्ठ पुत्र बड़े यशस्वी हैं। उनका नाम शशबिन्दु है। जब मैं वहाँ जाकर उनका अभिषेक करूँगा, तभी वे मेरा राज्य ग्रहण करेंगे॥ १७ ॥

“महातेजस्वी मुने! देशमें जो मेरे सेवक और स्त्री, पुत्र आदि परिवारके लोग सुखसे रह रहे हैं, उन सबको छोड़कर मैं यहाँ नहीं ठहर सकूँगा। अतः मुझसे ऐसी कोई अशुभ बात आप न कहें, जिससे स्वजनोंसे बिछुड़कर मुझे यहाँ दुःखपूर्वक रहनेके लिये विवश होना पड़े’॥ १८ ॥

‘राजेन्द्र इलके ऐसा कहनेपर बुधने उन्हें सान्त्वना देते हुए अत्यन्त अद्भुत बात कही—‘राजन्! तुम प्रसन्नतापूर्वक यहाँ रहना स्वीकार करो। कर्दमके महाबली पुत्र! तुम्हें संताप नहीं करना चाहिये। जब तुम एक वर्षतक यहाँ निवास कर लोगे, तब मैं तुम्हारा हित साधन करूँगा’॥ १९-२० ॥

‘पुण्यकर्मा बुधका यह वचन सुनकर उन ब्रह्मवादी महात्माके कथनानुसार राजाने वहाँ रहनेका निश्चय किया॥ २१ ॥

‘वे एक मासतक स्त्री होकर निरन्तर बुधके साथ रमण करते और फिर एक मासतक पुरुष होकर धर्मानुष्ठानमें मन लगाते थे॥ २२ ॥

‘तदनन्तर नवें मासमें सुन्दरी इलाने सोमपुत्र बुधसे एक पुत्रको जन्म दिया, जो बड़ा ही तेजस्वी और बलवान् था। उसका नाम था पुरूरवा॥ २३ ॥

Page 2565Permalink

‘उसके उस महाबली पुत्रकी अङ्गकान्ति बुधके ही समान थी। वह जन्म लेते ही उपनयनके योग्य अवस्थाका बालक हो गया, इसलिये सुन्दरी इलाने उसे पिताके हाथमें सौंप दिया॥ २४ ॥

‘वर्ष पूरा होनेमें जितने मास शेष थे, उतने समयतक जब-जब राजा पुरुष होते थे, तब-तब मनको वशमें रखनेवाले बुध धर्मयुक्त कथाओंद्वारा उनका मनोरञ्जन करते थे’॥ २५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें नवासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८९ ॥

नब्बेवाँ सर्ग

Page 2566Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

नब्बेवाँ सर्ग

अश्वमेधके अनुष्ठानसे इलाको पुरुषत्वकी प्राप्ति

श्रीरामचन्द्रजी जब पुरूरवाके जन्मकी अद्भुत कथा कह गये, तब लक्ष्मण तथा महायशस्वी भरतने पुनः पूछा— ॥ १ ॥

‘नरश्रेष्ठ! सोमपुत्र बुधके यहाँ एक वर्षतक निवास करनेके पश्चात् इलाने क्या किया, यह ठीक-ठीक बतानेकी कृपा करें’॥ २ ॥

प्रश्न करते समय उन दोनों भाइयोंकी वाणीमें बड़ा माधुर्य था। उसे सुनकर श्रीरामने प्रजापतिपुत्र इलके विषयमें फिर इस प्रकार कथा आरम्भ की— ॥ ३ ॥

‘शूरवीर! इल जब एक मासके लिये पुरुषभावको प्राप्त हुए, तब परम बुद्धिमान् महायशस्वी बुधने परम उदार महात्मा संवर्तको बुलाया॥ ४ ॥

‘भृगुपुत्र च्यवन मुनि, अरिष्टनेमि, प्रमोदन, मोदकर और दुर्वासा मुनिको भी आमन्त्रित किया॥ ५ ॥

‘इन सबको बुलाकर बातचीतकी कला जाननेवाले तत्त्वदर्शी बुधने धैर्यसे एकाग्रचित्त रहनेवाले इन सभी सुहृदोंसे कहा— ॥ ६ ॥

‘“ये महाबाहु राजा इल प्रजापति कर्दमके पुत्र हैं। इनकी जैसी स्थिति है, इसे आप सब लोग जानते हैं। अतः इस विषयमें ऐसा कोई उपाय कीजिये, जिससे इनका कल्याण हो’॥ ७ ॥

‘वे सब इस प्रकार बातचीत कर ही रहे थे कि महात्मा द्विजॉंके साथ महातेजस्वी प्रजापति कर्दम भी उस आश्रमपर आ पहुँचे॥ ८ ॥

‘साथ ही पुलस्त्य, क्रतु, वषट्कार तथा महातेजस्वी ओंकार भी उस आश्रमपर पधारे॥ ९ ॥

‘परस्पर मिलनेपर वे सभी महर्षि प्रसन्नचित्त हो बाह्लिकदेशके स्वामी राजा इलका हित चाहते हुए भिन्न-भिन्न प्रकारकी राय देने लगे॥ १० ॥

‘तब कर्दमने पुत्रके लिये अत्यन्त हितकर बात कही—‘ब्राह्मणो! आपलोग मेरी बात सुनें, जो इस राजाके लिये कल्याणकारिणी होगी॥ ११ ॥

Page 2567Permalink

“मैं भगवान् शङ्करके सिवा दूसरे किसीको ऐसा नहीं देखता, जो इस रोगकी दवा कर सके तथा अश्वमेध-यज्ञसे बढ़कर दूसरा कोई ऐसा यज्ञ नहीं है, जो महात्मा महादेवजीको प्रिय हो॥ १२ ॥

“अतः हम सब लोग राजा इलके हितके लिये उस दुष्कर यज्ञका अनुष्ठान करें।’ कर्दमके ऐसा कहनेपर उन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने भगवान् रुद्रकी आराधनाके लिये उस यज्ञका अनुष्ठान ही अच्छा समझा॥ १३ १/२ ॥

‘संवर्तके शिष्य तथा शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले सुप्रसिद्ध राजर्षि मरुत्तने उस यज्ञका आयोजन किया॥

‘फिर तो बुधके आश्रमके निकट वह महान् यज्ञ सम्पन्न हुआ तथा उससे महायशस्वी रुद्रदेवको बड़ा संतोष प्राप्त हुआ॥ १५ १/२ ॥

‘यज्ञ समाप्त होनेपर परमानन्दसे परिपूर्णचित्त हुए भगवान् उमापतिने इलके पास ही उन सब ब्राह्मणोंसे कहा—॥ १६ १/२ ॥

“द्विजश्रेष्ठगण! मैं तुम्हारी भक्ति तथा इस अश्वमेध-यज्ञके अनुष्ठानसे बहुत प्रसन्न हूँ। बताओ, मैं बाह्लिकनरेश इलका कौन-सा शुभ एवं प्रिय कार्य करूँ?’॥ १७ १/२ ॥

‘देवेश्वर शिवके ऐसा कहनेपर वे सब ब्राह्मण एकाग्रचित्त हो उन देवाधिदेवको इस तरह प्रसन्न करनेकी चेष्टा करने लगे, जिससे नारी इला सदाके लिये पुरुष इल हो जाय॥ १८ १/२ ॥

‘तब प्रसन्न हुए महातेजस्वी महादेवजीने इलाको सदाके लिये पुरुषत्व प्रदान कर दिया और ऐसा करके वे वहीं अन्तर्धान हो गये॥ १९ १/२ ॥

‘अश्वमेध-यज्ञ समाप्त होनेपर जब महादेवजी दर्शन देकर अदृश्य हो गये, तब वे सब दीर्घदर्शी ब्राह्मण जैसे आये थे, वैसे लौट गये॥ २० १/२ ॥

‘राजा इलने बाह्लिकदेशको छोड़कर मध्य-देशमें (गङ्गा-यमुनाके संगमके निकट) एक परम उत्तम एवं यशस्वी नगर बसाया, जिसका नाम था प्रतिष्ठानपुर*॥ २१ १/२ ॥

‘शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले राजर्षि शशबिन्दुने बाह्लिकदेशका राज्य ग्रहण किया और प्रजापति कर्दमके पुत्र बलवान् राजा इल प्रतिष्ठानपुरके शासक हुए॥

Page 2568Permalink

‘समय आनेपर राजा इल शरीर छोड़कर परम उत्तम ब्रह्मलोकको प्राप्त हुए और इलाके पुत्र राजा पुरूरवाने प्रतिष्ठानपुरका राज्य प्राप्त किया॥ २३ १/२ ॥

‘पुरुषश्रेष्ठ भरत और लक्ष्मण! अश्वमेध-यज्ञका ऐसा ही प्रभाव है। जो स्त्रीरूप हो गये थे, उन राजा इलने इस यज्ञके प्रभावसे पुरुषत्व प्राप्त कर लिया तथा और भी दुर्लभ वस्तुएँ हस्तगत कर लीं’॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें नब्बेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥

९० ॥

इक्यानबेवाँ सर्ग

Page 2569Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

इक्यानबेवाँ सर्ग

श्रीरामके आदेशसे अश्वमेध-यज्ञकी तैयारी

अपने दोनों भाइयोंको यह कथा सुनाकर अमित तेजस्वी श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणसे पुनः यह धर्मयुक्त बात कही—॥ १ ॥

‘लक्ष्मण! मैं अश्वमेध-यज्ञ करानेवाले ब्राह्मणोंमें अग्रगण्य एवं सर्वश्रेष्ठ वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि और काश्यप आदि सभी द्विजोंने बुलाकर और उनसे सलाह लेकर पूरी सावधानीके साथ शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न घोड़ा छोड़ूँगा’॥ २-३ ॥

रघुनाथजीके कहे हुए इस वचनको सुनकर शीघ्रगामी लक्ष्मणने समस्त ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्हें श्रीरामचन्द्रजीसे मिलाया॥ ४ ॥

उन ब्राह्मणोंने देखा, देवतुल्य तेजस्वी और अत्यन्त दुर्जय श्रीराघवेन्द्र हमारे चरणोंमें प्रणाम करके खड़े हैं, तब उन्होंने शुभ-आशीर्वादोंद्वारा उनका सत्कार किया॥ ५ ॥

उस समय रघुकुलभूषण श्रीराम हाथ जोड़कर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंसे अश्वमेध-यज्ञके विषयमें धर्मयुक्त श्रेष्ठ वचन बोले—॥ ६ ॥

वे सब ब्राह्मण भी श्रीरामकी वह बात सुनकर भगवान् शंकरको प्रणाम करके सब प्रकारसे अश्वमेधयज्ञकी सराहना करने लगे॥ ७ ॥

अश्वमेध-यज्ञके विषयमें उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका अद्भुत ज्ञानसे युक्त वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ८ ॥

उस कर्मके लिये उन ब्राह्मणोंकी स्वीकृति जानकर श्रीराम लक्ष्मणसे बोले—‘महाबाहो! तुम महात्मा वानरराज सुग्रीवके पास यह संदेश भेजो कि ‘कपिश्रेष्ठ! तुम बहुत-से विशालकाय वनवासी वानरोंके साथ यहाँ यज्ञ-महोत्सवका आनन्द लेनेके लिये आओ। तुम्हारा कल्याण हो’॥ ९-१० ॥

‘साथ ही अतुल पराक्रमी विभीषणको भी यह सूचना दो कि ‘वे इच्छानुसार चलनेवाले बहुत-से राक्षसोंके साथ हमारे महान् अश्वमेध-यज्ञमें पधारें’॥ ११ ॥

‘इनके सिवा मेरा प्रिय करनेकी इच्छावाले जो महाभाग राजा हैं, वे भी यज्ञ-भूमि देखनेके लिये सेवकोंसहित शीघ्र यहाँ आवें॥ १२ ॥

Page 2570Permalink

‘लक्ष्मण! जो धर्मनिष्ठ ब्राह्मण कार्यवश दूसरे-दूसरे देशोंमें चले गये हैं, उन सबको अपने अश्वमेधयज्ञके लिये आमन्त्रित करो॥ १३ ॥

‘महाबाहो! तपोधन ऋषियोंको तथा अन्य राज्यमें रहनेवाले स्त्रियोंसहित समस्त ब्रह्मर्षियोंको भी बुला लो॥

‘महाबाहो! ताल लेकर रंगभूमिमें संचरण करनेवाले सूत्रधार तथा नट और नर्तक भी बुला लिये जायँ। नैमिषारण्यमें गोमतीके तटपर विशाल यज्ञमण्डप बनानेकी आज्ञा दो; क्योंकि वह वन बहुत ही उत्तम और पवित्र स्थान है॥ १५ १/२ ॥

‘महाबाहु रघुनन्दन! वहाँ यज्ञकी निर्विघ्न-समाप्तिके लिये सर्वत्र शान्ति-विधान प्रारम्भ करा दो। नैमिषारण्यमें सैकड़ों धर्मज्ञ पुरुष उस परम उत्तम और श्रेष्ठ महायज्ञको देखकर कृतार्थ हों॥ १६-१७ ॥

‘धर्मज्ञ लक्ष्मण! शीघ्र लोगोंको आमन्त्रित करो और जो लोग आवें, वे सब विधिपूर्वक तुष्ट, पुष्ट एवं सम्मानित होकर लौटें॥ १८ ॥

‘महाबली सुमित्राकुमार! लाखों बोझ ढोनेवाले पशु खड़े दानेवाले चावल लेकर और दस हजार पशु तिल, मूँग, चना, कुलथी, उड़द और नमकके बोझ लेकर आगे चलें॥ १९ १/२ ॥

‘इसीके अनुरूप घी, तेल, दूध, दही तथा बिना घिसे हुए चन्दन और बिना पिसे हुए सुगन्धित पदार्थ भी भेजे जाने चाहिये। भरत सौ करोड़से भी अधिक सोने-चाँदीके सिक्के साथ लेकर पहले ही जायँ और बड़ी सावधानीके साथ यात्रा करें॥ २०-२१ ॥

‘मार्गमें आवश्यक वस्तुओंके क्रय-विक्रयके लिये जगह-जगह बाजारें भी लगनी चाहिये; अतः इसके प्रवर्तक वणिक् एवं व्यवसायीलोग भी यात्रा करें। समस्त नट और नर्तक भी जायँ। बहुत-से रसोइये तथा सदा युवावस्थासे सुशोभित होनेवाली स्त्रियाँ भी यात्रा करें॥ २२ ॥

‘भरतके साथ आगे-आगे सेनाएँ भी जायँ। महायशस्वी भरत शास्त्रवेत्ता विद्वानों, बालकों, वृद्धों, एकाग्र चित्तवाले ब्राह्मणों, काम करनेवाले नौकरों, बढ़इयों, कोषाध्यक्षों, वैदिकों, मेरी सब माताओं, कुमारोंके अन्तःपुरों (भरत आदिकी स्त्रियों), मेरी पत्नीकी सुवर्णमयी प्रतिमा तथा यज्ञकर्मकी दीक्षाके जानकार ब्राह्मणोंको आगे करके पहले ही यात्रा करें'॥ २३—२५॥

तत्पश्चात् महाबली नरश्रेष्ठ श्रीरामने सेवकोंसहित महातेजस्वी नरेशोंके ठहरनेके लिये बहुमूल्य वासस्थान बनाने (खेमे आदि लगाने)-के लिये आदेश दिया तथा सेवकोंसहित उन

Page 2571Permalink

महात्मा नरेशोंके लिये अन्न-पान एवं वस्त्र आदिकी भी व्यवस्था करायी॥ २६ १/२ ॥

तदनन्तर शत्रुघ्नसहित भरतने नैमिषारण्यको प्रस्थान किया। उस समय वहाँ सुग्रीवसहित महात्मा वानर जितने भी श्रेष्ठ ब्राह्मण वहाँ उपस्थित थे, उन सबको रसोऽइ परोसनेका काम करते थे॥ २७-२८ ॥

स्त्रियों तथा बहुत-से राक्षसोंके साथ विभीषण उग्र तपस्वी महात्मा मुनियोंके स्वागत-सत्कारका काम सँभालते थे॥ २९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें इक्यानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९१ ॥

बानबेवाँ सर्ग

Page 2572Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

बानबेवाँ सर्ग

श्रीरामके अश्वमेध-यज्ञमें दान-मानकी विशेषता

इस प्रकार सब सामग्री पूर्णरूपसे भेजकर भरतके बड़े भाई श्रीरामने उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न तथा कृष्णसार मृगके समान काले रंगवाले एक घोड़ेको छोड़ा॥ १ ॥

ऋत्विजोंसहित लक्ष्मणको उस अश्वकी रक्षाके लिये नियुक्त करके श्रीरघुनाथजी सेनाके साथ नैमिषारण्यको गये॥ २ ॥

वहाँ बने हुए अत्यन्त अद्भुत यज्ञ-मण्डपको देखकर महाबाहु श्रीरामको अनुपम प्रसन्नता प्राप्त हुई और वे बोले—'बहुत सुन्दर है'॥ ३ ॥

नैमिषारण्यमें निवास करते समय श्रीरामचन्द्रजीके पास भूमण्डलके सभी नरेश भाँति-भाँतिके उपहार ले आये और श्रीरामचन्द्रजीने उन सबका स्वागत-सत्कार किया॥

उन्हें अन्न, पान, वस्त्र तथा अन्य सब आवश्यक सामान दिये गये। शत्रुघ्नसहित भरत उन राजाओंके स्वागत-सत्कारमें नियुक्त किये गये थे॥ ५ ॥

सुग्रीवसहित महामनस्वी वानर परम पवित्र एवं संयतचित्त हो उस समय वहाँ ब्राह्मणोंको भोजन परोसते थे॥ ६ ॥

बहुतेरे राक्षसोंसे घिरे हुए विभीषण अत्यन्त सावधान रहकर उग्र तपस्वी ऋषियोंके सेवाकार्यमें संलग्न थे॥ ७ ॥

महाबली नरश्रेष्ठ श्रीरामने सेवकोंसहित महा-मनस्वी भूपालोंको ठहरनेके लिये बहुमूल्य वासस्थान (खेमे) दिये॥ ८ ॥

इस प्रकार सुन्दर ढंगसे अश्वमेध-यज्ञका कार्य प्रारम्भ हुआ और लक्ष्मणके संरक्षणमें रहकर घोड़ेके भूमण्डलमें भ्रमणका कार्य भी भलीभाँति सम्पन्न हो गया॥ ९ ॥

राजाओंमें सिंहके समान पराक्रमी महात्मा श्रीरघुनाथजीका वह श्रेष्ठ यज्ञ इस प्रकार उत्तम विधिसे होने लगा। उस अश्वमेध-यज्ञमें केवल एक ही बात सब ओर सुनायी पड़ती थी—जबतक याचक संतुष्ट न हों, तबतक उनकी इच्छाके अनुसार सब वस्तुएँ दिये जाओ, इसके सिवा दूसरी बात नहीं सुनायी देती थी। इस प्रकार महात्मा श्रीरामके श्रेष्ठ यज्ञमें नाना प्रकारके

Page 2573Permalink

गुड़के बने हुए खाद्य पदार्थ और खाण्डव आदि तबतक निरन्तर दिये जाते थे जबतक कि पानेवाले पूर्णतः संतुष्ट होकर बस न कर दें॥ १०-११ १/२ ॥

जबतक याचकोंके मनकी बात ओठसे बाहर नहीं निकलने पाती थी, तबतक ही राक्षस और वानर उन्हें उनकी अभीष्ट वस्तुएँ दे देते थे। यह बात सबने देखी॥ १२ १/२ ॥

राजा श्रीरामके उस श्रेष्ठ यज्ञमें हृष्ट-पुष्ट मनुष्य भरे हुए थे, वहाँ कोई भी मलिन, दीन अथवा दुर्बल नहीं दिखायी देता था॥ १३ १/२ ॥

उस यज्ञमें जो चिरजीवी महात्मा मुनि पधारे थे, उन्हें ऐसे किसी भी यज्ञका स्मरण नहीं था, जिसमें दानकी ऐसी धूम रही हो। वह यज्ञ दानराशिसे पूर्णतः अलंकृत दिखायी देता था॥ १४ १/२ ॥

जिसे सुवर्णकी आवश्यकता थी, वह सुवर्ण पाता था, धन चाहनेवालेको धन मिलता था और रत्नकी इच्छावालेको रत्न॥ १५ १/२ ॥

वहाँ निरन्तर दिये जानेवाले चाँदी, सोने, रत्न और वस्त्रोंके ढेर लगे दिखायी देते थे॥ १६ १/२ ॥

वहाँ आये हुए तपस्वी मुनि कहते थे कि ऐसा यज्ञ तो पहले कभी इन्द्र, चन्द्रमा, यम और वरुणके यहाँ भी नहीं देखा गया॥ १७ १/२ ॥

वानर और राक्षस सर्वत्र हाथोंमें देनेकी सामग्री लिये खड़े रहते थे और वस्त्र, धन तथा अन्नकी इच्छा रखनेवाले याचकोंको अधिक-से-अधिक देते थे॥ १८ १/२ ॥

राजसिंह भगवान् श्रीरामका ऐसा सर्वगुणसम्पन्न यज्ञ एक वर्षसे भी अधिक कालतक चलता रहा। उसमें कभी किसी बातकी कमी नहीं हुई॥ १९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें बानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९२ ॥

तिरानबेवाँ सर्ग

Page 2574Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

तिरानबेवाँ सर्ग

श्रीरामके यज्ञमें महर्षि वाल्मीकिका आगमन और उनका रामायणगानके लिये कुश और लवको आदेश

इस प्रकार वह अत्यन्त अद्भुत यज्ञ जब चालू हुआ, उस समय भगवान् वाल्मीकि मुनि अपने शिष्योंके साथ उसमें शीघ्रतापूर्वक पधारे॥ १ ॥

उन्होंने उस दिव्य एवं अद्भुत यज्ञका दर्शन किया और ऋषियोंके लिये जो बाड़े बने थे, उनके पास ही उन्होंने अपने लिये भी सुन्दर पर्णशालाएँ बनवायीं॥ २ ॥

वाल्मीकिजीके सुन्दर बाड़ेके समीप अन्न आदिसे भरे-पूरे बहुत-से छकड़े खड़े कर दिये गये थे। साथ ही अच्छे-अच्छे फल और मूल भी रख दिये गये थे॥ ३ ॥

राजा श्रीराम तथा बहुसंख्यक महात्मा मुनियोंद्वारा भलीभाँति पूजित एवं सम्मानित हो महातेजस्वी आत्मज्ञानी वाल्मीकि मुनिने बड़े सुखसे वहाँ निवास किया॥ ४ ॥

उन्होंने अपने हृष्ट-पुष्ट दो शिष्योंसे कहा—‘तुम दोनों भांऽइ एकाग्रचित्त हो सब ओर घूम-फिरकर बड़े आनन्दके साथ सम्पूर्ण रामायण-काव्यका गान करो॥ ५ ॥

‘ऋषियों और ब्राह्मणोंके पवित्र स्थानोंपर, गलियोंमें, राजमार्गोंपर तथा राजाओंके वासस्थानोंमें भी इस काव्यका गान करना॥ ६ ॥

‘श्रीरामचन्द्रजीका जो गृह बना है, उसके दरवाजेपर, जहाँ ब्राह्मणलोग यज्ञकार्य कर रहे हैं, वहाँ तथा ऋत्विजोंके आगे भी इस काव्यका विशेषरूपसे गान करना चाहिये॥ ७ ॥

‘यहाँ पर्वतके शिखरोंपर नाना प्रकारके स्वादिष्ट एवं मीठे फल लगे हैं, (भूख लगनेपर) उनका स्वाद ले-लेकर इस काव्यका गान करते रहना॥ ८ ॥

‘बच्चो! यहाँके सुमधुर फल-मूलोंका भक्षण करनेसे न तो तुम्हें कभी थकावट होगी और न तुम्हारे गलेकी मधुरता ही नष्ट होने पायेगी॥ ९ ॥

‘यदि महाराज श्रीराम तुम दोनोंको गान सुननेके लिये बुलावें तो तुम उनसे तथा वहाँ बैठे हुए ऋषि-मुनियोंसे यथायोग्य विनयपूर्ण बर्ताव करना॥ १० ॥

‘मैंने पहले भिन्न-भिन्न संख्यावाले श्लोकोंसे युक्त रामायण काव्यके सर्गोंका जिस तरह तुम्हें उपदेश दिया है, उसीके अनुसार प्रतिदिन बीस-बीस सर्गोंका मधुर स्वरसे गान करना॥ ११

Page 2575Permalink

॥

‘धनकी इच्छासे थोड़ा-सा भी लोभ न करना, आश्रममें रहकर फल-मूल भोजन करनेवाले वनवासियोंको धनसे क्या काम?॥ १२ ॥

‘यदि श्रीरघुनाथजी पूछें—‘बच्चो! तुम दोनों किसके पुत्र हो?’ तो तुम दोनों महाराजसे इतना ही कह देना कि हम दोनों भांऽइ महर्षि वाल्मीकिके शिष्य हैं॥ १३ ॥

‘ये वीणाके सात तार हैं। इनसे बड़ी मधुर आवाज निकलती है। इसमें अपूर्व स्वरोंका प्रदर्शन करनेवाले ये स्थान बने हैं। इनके स्वरोंको झंकृत करके— मिलाकर सुमधुर स्वरमें तुम दोनों भांऽइ काव्यका गान करो और सर्वथा निश्चिन्त रहो॥ १४ ॥

‘आरम्भसे ही इस काव्यका गान करना चाहिये। तुमलोग ऐसा कोऽइ बर्ताव न करना, जिससे राजाका अपमान हो; क्योंकि राजा धर्मकी दृष्टिसे सम्पूर्ण प्राणियोंका पिता होता है॥ १५ ॥

‘अतएव तुम दोनों भांऽइ प्रसन्न और एकाग्रचित्त होकर कल सबेरेसे ही वीणाके लयपर मधुर स्वरसे रामायण-गान आरम्भ कर दो’॥ १६ ॥

इस तरह बहुत कुछ आदेश देकर वरुणके पुत्र परम उदार महामुनि वाल्मीकि चुप हो गये॥ १७ ॥

मुनिके इस प्रकार आदेश देनेपर मिथिलेशकुमारी सीताके वे दोनों शत्रुदमन पुत्र ‘बहुत अच्छा, हम ऐसा ही करेंगे’ यह कहकर वहाँसे चल दिये॥ १८ ॥

शुक्राचार्यकी बनायी हुंऽइ नीतिसंहिताको धारण करनेवाले अश्विनीकुमारोंकी भाँति ऋषिकी कही हुंऽइ उस अद्भुत वाणीको हृदयमें धारण करके वे दोनों कुमार मन-ही-मन उत्कण्ठित हो वहाँ रातभर सुखसे रहे॥ १९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तिरानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९३ ॥

चौरानबेवाँ सर्ग

Page 2576Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

चौरानबेवाँ सर्ग

लव-कुशद्वारा रामायण-काव्यका गान तथा श्रीरामका उसे भरी सभामें सुनना

रात बीतनेपर जब सबेरा हुआ, तब स्नान-संध्याके पश्चात् समिधा-होमका कार्य पूरा करके वे दोनों भाई ऋषिके बताये अनुसार वहाँ सम्पूर्ण रामायणका गान करने लगे॥ १ ॥

श्रीरघुनाथजीने भी वह गान सुना, जो पूर्ववर्ती आचार्योंके बताये हुए नियमोंके अनुकूल था। संगीतकी विशेषताओंसे युक्त स्वरोंके अलापनेकी अपूर्व शैली थी॥ २ ॥

बहुसंख्यक प्रमाणों—ध्वनिपरिच्छेदके साधनभूत द्रुत, मध्य और विलम्बित—इन तीनोंकी आवृत्तियों अथवा सप्तविध स्वरोंके भेदकी सिद्धिके लिये बने हुए स्थानोंसे बँधा और वीणाकी लयसे मिलता हुआ उन दोनों बालकोंका वह मधुर गान सुनकर श्रीरामचन्द्रजीको बड़ा कौतूहल हुआ॥ ३ ॥

तदनन्तर पुरुषसिंह राजा श्रीरामने कर्मानुष्ठानसे अवकाश मिलनेपर बड़े-बड़े मुनियों, राजाओं, वेदवेत्ता पण्डितों, पौराणिकों, वैयाकरणों, बड़े-बूढ़े ब्राह्मणों, स्वरों और लक्षणोंके ज्ञाताओं, गीत सुननेके लिये उत्सुक द्विजों, सामुद्रिक लक्षणों तथा संगीत-विद्याके जानकारों, विशेषतः निगमागमके विद्वानों अथवा पुरवासियों, भिन्न-भिन्न छन्दोंके चरणों, उनके गुरु-लघु अक्षरों तथा उनके सम्बन्धोंका ज्ञान रखनेवाले पण्डितों, वैदिक छन्दोंके परिनिष्ठित विद्वानों, स्वरोंकी ह्रस्व, दीर्घ आदि मात्राओंके विशेषज्ञों, ज्योतिष विद्याके पारंगत पण्डितों, कर्मकाण्डियों, कार्यकुशल पुरुषों, विभिन्न भाषाओं और चेष्टा तथा संकेतोंको समझनेवाले पुरुषों एवं सारे महाजनोंको बुलवाया॥ ४—७ ½ ॥

इतना ही नहीं, तर्कके प्रयोगमें निपुण नैयायिकों, युक्तिवादी एवं बहुज्ञ विद्वानों, छन्दों, पुराणों और वेदोंके ज्ञाता द्विजवरों, चित्रकलाके जानकारों, धर्मशास्त्रके अनुकूल सदाचारके ज्ञाताओं, दर्शन एवं कल्पसूत्रके विद्वानों, नृत्य और गीतमें प्रवीण पुरुषों, विभिन्न शास्त्रोंके ज्ञाताओं, नीति-निपुण पुरुषों तथा वेदान्तके अर्थको प्रकाशित करनेवाले ब्रह्मवेत्ताओंको भी वहाँ बुलवाया। इन सबको एकत्र करके भगवान् श्रीरामने रामायण-गान करनेवाले उन दोनों बालकोंको सभामें बुलाकर बिठाया॥ ८—१० ॥

सभासदोंमें श्रोताओंका हर्ष बढ़ानेवाली बातें होने लगीं। उसी समय दोनों मुनिकुमारोंने गाना आरम्भ किया॥ ११ ॥

Page 2577Permalink

फिर तो मधुर संगीतका तार बँध गया। बड़ा अलौकिक गान था। गेय वस्तुकी विशेषताओंके कारण सभी श्रोता मुग्ध होकर सुनने लगे। किसीको तृप्ति नहीं होती थी॥ १२ ॥

मुनियोंके समुदाय और महापराक्रमी भूपाल सभी आनन्दमग्न होकर उन दोनोंकी ओर बारम्बार इस तरह देख रहे थे, मानो उनकी रूपमाधुरीको नेत्रोंसे पी रहे हों॥ १३ ॥

वे सब एकाग्रचित्त हो परस्पर इस प्रकार कहने लगे—‘इन दोनों कुमारोंकी आकृति श्रीरामचन्द्रजीसे बिलकुल मिलती-जुलती है। ये बिम्बसे प्रकट हुए प्रतिबिम्बके समान जान पड़ते हैं॥ १४ ॥

‘यदि इनके सिरपर जटा न होती और ये वल्कल न पहने होते तो हमें श्रीरामचन्द्रजीमें तथा गान करनेवाले इन दोनों कुमारोंमें कोई अन्तर नहीं दिखायी देता’॥ १५ ॥

नगर और जनपदमें निवास करनेवाले मनुष्य जब इस प्रकार बातें कर रहे थे, उसी समय नारदजीके द्वारा प्रदर्शित प्रथम सर्ग—मूल-रामायणका आरम्भसे ही गान प्रारम्भ हुआ॥ १६ ॥

वहाँसे लेकर बीस सर्गोंतकका उन्होंने गान किया। तत्पश्चात् अपराह्नका समय हो गया। उतनी देरमें बीस सर्गोंका गान सुनकर भ्रातृवत्सल श्रीरघुनाथजीने भाई भरतसे कहा—‘काकुत्स्थ! तुम इन दोनों महात्मा बालकोंको अठारह हजार स्वर्ण-मुद्राएँ पुरस्कारके रूपमें शीघ्र प्रदान करो। इसके सिवा यदि और किसी वस्तुके लिये इनकी इच्छा हो तो उसे भी शीघ्र ही दे दो’॥ १७-१८ १/२ ॥

आज्ञा पाकर भरत शीघ्र ही उन दोनों बालकोंको अलग-अलग स्वर्ण-मुद्राएँ देने लगे; किंतु उस दिये जाते हुए सुवर्णको कुश और लवने नहीं ग्रहण किया॥ १९ १/२ ॥

वे दोनों महामनस्वी बन्धु विस्मित होकर बोले—‘इस धनकी क्या आवश्यकता है। हम वनवासी हैं। जंगली फल-मूलसे जीवन-निर्वाह करते हैं। सोनाचाँदी वनमें ले जाकर क्या करेंगे?’॥ २०-२१ ॥

उनके ऐसा कहनेपर सब श्रोताओंके मनमें बड़ा कौतूहल हुआ। श्रोता और श्रीराम सभी आश्चर्यचकित हो गये॥ २२ ॥

तब श्रीरामचन्द्रजी यह सुननेके लिये उत्सुक हुए कि इस काव्यकी उपलब्धि कहाँसे हुई है। फिर उन महातेजस्वी रघुनाथजीने दोनों मुनिकुमारोंसे पूछा—॥

Page 2578Permalink

‘इस महाकाव्यकी श्लोक-संख्या कितनी है? इसके रचयिता महात्मा कविका आवासस्थान कौन-सा है? इस महान् काव्यके कर्ता कौन मुनीश्वर हैं और वे कहाँ हैं?’॥ २४ ॥

इस प्रकार पूछते हुए श्रीरघुनाथजीसे वे दोनों मुनिकुमार बोले—‘महाराज! जिस काव्यके द्वारा आपके इस सम्पूर्ण चरित्रका प्रदर्शन कराया गया है, उसके रचयिता भगवान् वाल्मीकि हैं और वे इस यज्ञस्थलमें पधारे हुए हैं॥ २५ ॥

‘उन तपस्वी कविके बनाये हुए इस महाकाव्यमें चौबीस हजार श्लोक और एक सौ उपाख्यान हैं॥ २६ ॥

‘राजन्! उन महात्माने आदिसे लेकर अन्ततक पाँच सौ सर्ग तथा छः काण्डोंका निर्माण किया है। इनके सिवा उन्होंने उत्तरकाण्डकी भी रचना की है॥ २७ ॥

‘हमारे गुरु महर्षि वाल्मीकिने ही उन सबका निर्माण किया है। उन्होंने आपके चरित्रको महाकाव्यका रूप दिया है। इसमें आपके जीवनतककी सारी बातें आ गयी हैं॥ २८ ॥

‘महारथी नरेश! यदि आपने इसे सुननेका विचार किया हो तो यज्ञ-कर्मसे अवकाश मिलनेपर इसके लिये निश्चित समय निकालिये और अपने भाइयोंके साथ बैठकर इसे नियमितरूपसे सुनिये’॥ २९ ॥

‘तब श्रीरामचन्द्रजीने कहा—‘बहुत अच्छा। हम इस काव्यको सुनेंगे।’ तत्पश्चात् श्रीरघुनाथजीकी आज्ञा ले दोनों भाई कुश और लव प्रसन्नतापूर्वक उस स्थानपर गये, जहाँ मुनिवर वाल्मीकिजी ठहरे हुए थे॥ ३० ॥

श्रीरामचन्द्रजी भी महात्मा मुनियों और राजाओंके साथ उस मधुर संगीतको सुनकर कर्मशाला (यज्ञमण्डप) में चले गये॥ ३१ ॥

इस प्रकार प्रथम दिन कतिपय सर्गोंसे युक्त सुन्दर स्वर एवं मधुर शब्दोंसे पूर्ण, ताल और लयसे सम्पन्न तथा वीणाके लयकी व्यञ्जनासे युक्त वह काव्यगान, जिसे कुश और लवने गाया था, श्रीरामने सुना॥ ३२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौरानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९४ ॥

पञ्चानबेवाँ सर्ग

Page 2579Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

पञ्चानबेवाँ सर्ग

श्रीरामका सीतासे उनकी शुद्धता प्रमाणित करनेके लिये शपथ करानेका विचार

इस प्रकार श्रीरघुनाथजी ऋषियों, राजाओं और वानरोंके साथ कॆंइ दिनोंतक वह उत्तम रामायण-गान सुनते रहे॥ १ ॥

उस कथासे ही उन्हें यह मालूम हुआ कि ‘कुश और लव दोनों कुमार सीताके ही सुपुत्र हैं।’ यह जानकर सभाके बीचमें बैठे हुए श्रीरामचन्द्रजीने शुद्ध आचारविचार वाले दूतोंको बुलाया और अपनी बुद्धिसे विचारकर कहा—‘तुमलोग यहाँसे भगवान् वाल्मीकि मुनिके पास जाओ और उनसे मेरा यह संदेश कहो॥ २-३ ॥

‘यदि सीताका चरित्र शुद्ध है और यदि उनमें किसी तरहका पाप नहीं है तो वे आप महामुनिकी अनुमति ले यहाँ आकर जनसमुदायमें अपनी शुद्धता प्रमाणित करें’॥ ४ ॥

‘तुम इस विषयमें महर्षि वाल्मीकि तथा सीताके भी हार्दिक अभिप्रायको जानकर शीघ्र मुझे सूचित करो कि क्या वे यहाँ आकर अपनी शुद्धिका विश्वास दिलाना चाहती हैं॥ ५ ॥

‘कल सबेरे मिथिलेशकुमारी जानकी भरी सभामें आवें और मेरा कलंक दूर करनेके लिये शपथ करें’॥

श्रीरघुनाथजीका यह अत्यन्त अद्भुत वचन सुनकर दूत उस बाड़ेमें गये, जहाँ मुनिवर वाल्मीकि विराजमान थे॥ ७ ॥

महात्मा वाल्मीकि अमित तेजस्वी थे और अपने तेजसे अग्निके समान प्रज्वलित हो रहे थे। उन दूतोंने उन्हें प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रजीके वचन मधुर एवं कोमल शब्दोंमें कह सुनाये॥ ८ ॥

उन दूतोंकी वह बात सुनकर और श्रीरामके हार्दिक अभिप्रायको समझकर वे महातेजस्वी मुनि इस प्रकार बोले-॥९ ॥

‘ऐसा ही होगा, तुमलोगोंका भला हो। श्रीरघुनाथजी जो आज्ञा देते हैं, सीता वही करेगी; क्योंकि पति स्त्रीके लिये देवता है’॥ १० ॥

मुनिके ऐसा कहनेपर वे सब राजदूत महातेजस्वी श्रीरघुनाथजीके पास लौट आये। उन्होंने मुनिकी कही हुॆंइ सारी बातें ज्यों-की-त्यों कह सुनायीं॥ ११ ॥

Page 2580Permalink

महात्मा वाल्मीकिकी बातें सुनकर श्रीरघुनाथजीको बड़ी प्रसन्नता हुई और उन्होंने वहाँ आये हुए ऋषियों तथा राजाओंसे कहा—॥ १२ ॥

‘आप सब पूज्यपाद मुनि शिष्योंसहित सभामें पधारें। सेवकोंसहित राजालोग भी उपस्थित हों तथा दूसरा भी जो कोई सीताकी शपथ सुनना चाहता हो, वह आ जाय। इस प्रकार सब लोग एकत्र होकर सीताका शपथ-ग्रहण देखें’॥ १३ ॥

महात्मा राघवेन्द्रका यह वचन सुनकर समस्त महर्षियोंके मुखसे महान् साधुवादकी ध्वनि गूँज उठी॥ १४ ॥

राजालोग भी महात्मा रघुनाथजीकी प्रशंसा करते हुए बोले— ‘नरश्रेष्ठ! इस पृथ्वीपर सभी उत्तम बातें केवल आपमें ही सम्भव हैं, दूसरे किसीमें नहीं’॥ १५ ॥

इस प्रकार दूसरे दिन सीतासे शपथ लेनेका निश्चय करके शत्रुसूदन श्रीरामने उस समय सबको बिदा कर दिया॥ १६ ॥

इस प्रकार दूसरे दिन सबेरे सीतासे शपथ लेनेका निश्चय करके महानुभाव महात्मा राजसिंह श्रीरामने उन सब मुनियों और नरेशोंको अपने-अपने स्थानपर जानेकी अनुमति दे दी॥ १७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पञ्चानबेवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ९५ ॥

छानबेवाँ सर्ग

Page 2581Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

छानबेवाँ सर्ग

महर्षि वाल्मीकिद्वारा सीताकी शुद्धताका समर्थन

रात बीती, सबेरा हुआ और महातेजस्वी राजा श्रीरामचन्द्रजी यज्ञशालामें पधारे। उस समय उन्होंने समस्त ऋषियोंको बुलवाया॥ १ ॥

वसिष्ठ, वामदेव, जाबालि, काश्यप, विश्वामित्र, दीर्घतमा, महातपस्वी दुर्वासा, पुलस्त्य, शक्ति, भार्गव, वामन, दीर्घजीवी मार्कण्डेय, महायशस्वी मौद्गल्य, गर्ग, च्यवन, धर्मज्ञ शतानन्द, तेजस्वी भरद्वाज, अग्निपुत्र सुप्रभ, नारद, पर्वत, महायशस्वी गौतम, कात्यायन, सुयज्ञ और तपोनिधि अगस्त्य—ये तथा दूसरे कठोर व्रतका पालन करनेवाले सभी बहुसंख्यक महर्षि कौतूहलवश वहाँ एकत्र हुए॥ २—६ ॥

महापराक्रमी राक्षस और महाबली वानर—ये सभी महामना कौतूहलवश वहाँ आये॥ ७ ॥

नाना देशोंसे पधारे हुए तीक्ष्ण व्रतधारी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सहस्रोंकी संख्यामें वहाँ उपस्थित हुए॥ ८ ॥

सीताजीका शपथ-ग्रहण देखनेके लिये ज्ञाननिष्ठ, कर्मनिष्ठ और योगनिष्ठ सभी तरहके लोग पधारे थे॥

राजसभामें एकत्र हुए सब लोग पत्थरकी भाँति निश्चल होकर बैठे हैं—यह सुनकर मुनिवर वाल्मीकि सीताजीको साथ लेकर तुरंत वहाँ आये॥ १० ॥

महर्षिके पीछे सीता सिर झुकाये चली आ रही थीं। उनके दोनों हाथ जुड़े थे और नेत्रोंसे आँसू झर रहे थे। वे अपने हृदयमन्दिरमें बैठे हुए श्रीरामका चिन्तन कर रही थीं॥ ११ ॥

वाल्मीकिके पीछे-पीछे आती हुई सीता ब्रह्माजीका अनुसरण करनेवाली श्रुतिके समान जान पड़ती थीं। उन्हें देखकर वहाँ धन्य-धन्यकी भारी आवाज गूँज उठी॥ १२ ॥

उस समय समस्त दर्शकोंका हृदय दुःख देनेवाले महान् शोकसे व्याकुल था। उन सबका कोलाहल सब ओर व्याप्त हो गया॥ १३ ॥

कोई कहते थे—‘श्रीराम! तुम धन्य हो।’ दूसरे कहते थे—‘देवि सीते! तुम धन्य हो’ तथा वहाँ कुछ अन्य दर्शक भी ऐसे थे, जो सीता और राम दोनोंको उच्च स्वरसे साधुवाद दे रहे

Page 2582Permalink

थे॥ १४ ॥

तब उस जनसमुदायके बीचमें सीतासहित प्रवेश करके मुनिवर वाल्मीकि श्रीरघुनाथजीसे इस प्रकार बोले— ॥ १५ ॥

‘दशरथनन्दन! यह सीता उत्तम व्रतका पालन करनेवाली और धर्मपरायणा है। आपने लोकापवादसे डरकर इसे मेरे आश्रमके समीप त्याग दिया था॥ १६ ॥

‘महान् व्रतधारी श्रीराम! लोकापवादसे डरे हुए आपको सीता अपनी शुद्धताका विश्वास दिलायेगी। इसके लिये आप इसे आज्ञा दें॥ १७ ॥

‘ये दोनों कुमार कुश और लव जानकीके गर्भसे जुड़वे पैदा हुए हैं। ये आपके ही पुत्र हैं और आपके ही समान दुर्धर्ष वीर हैं, यह मैं आपको सच्ची बात बता रहा हूँ॥ १८ ॥

‘रघुकुलनन्दन! मैं प्रचेता (वरुण) का दसवाँ पुत्र हूँ। मेरे मुँहसे कभी झूठ बात निकली हो, इसकी याद मुझे नहीं है। मैं सत्य कहता हूँ ये दोनों आपके ही पुत्र हैं॥ १९ ॥

‘मैंने कई हजार वर्षोंतक भारी तपस्या की है। यदि मिथिलेशकुमारी सीतामें कोई दोष हो तो मुझे उस तपस्याका फल न मिले॥ २० ॥

‘मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा भी पहले कभी कोई पाप नहीं किया है। यदि मिथिलेशकुमारी सीता निष्पाप हों, तभी मुझे अपने उस पापशून्य पुण्यकर्मका फल प्राप्त हो॥ २१ ॥

‘रघुनन्दन! मैंने अपनी पाँचों इन्द्रियों और मन-बुद्धिके द्वारा सीताकी शुद्धताका भलीभाँति निश्चय करके ही इसे अपने संरक्षणमें लिया था। यह मुझे जंगलमें एक झरनेके पास मिली थी॥ २२ ॥

‘इसका आचरण सर्वथा शुद्ध है। पाप इसे छू भी नहीं सका है तथा यह पतिको ही देवता मानती है। अतः लोकापवादसे डरे हुए आपको अपनी शुद्धताका विश्वास दिलायेगी॥ २३ ॥

‘राजकुमार! मैंने दिव्य दृष्टिसे यह जान लिया था कि सीताका भाव और विचार परम पवित्र है; इसलिये यह मेरे आश्रममें प्रवेश पा सकी है। आपको भी यह प्राणोंसे अधिक प्यारी है और आप यह भी जानते हैं कि सीता सर्वथा शुद्ध है तथापि लोकापवादसे कलुषितचित्त होकर आपने इसका त्याग किया है’॥ २४ ॥