श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
एक सौ दसवाँ सर्ग
एक सौ दसवाँ सर्ग
भाइयोंसहित श्रीरामका विष्णुस्वरूपमें प्रवेश तथा साथ आये हुए सब लोगोंको संतानक-लोककी प्राप्ति
अयोध्यासे डेढ़ योजन दूर जाकर रघुकुलनन्दन भगवान् श्रीरामने पश्चिमाभिमुख हो निकट प्राप्त हुई पुण्यसलिला सरयूका दर्शन किया॥ १ ॥
सरयूनदीमें सब ओर भँवरे उठ रही थीं। वहाँ सब ओर घूम-फिरकर रघुनन्दन राजा श्रीराम प्रजाजनोंके साथ एक उत्तम स्थानपर आये॥ २ ॥
उसी समय लोकपितामह ब्रह्माजी सम्पूर्ण देवताओं तथा महात्मा ऋषि-मुनियोंसे घिरे हुए उस स्थानपर आ पहुँचे, जहाँ श्रीरघुनाथजी परमधाम पधारनेके लिये उपस्थित थे। उनके साथ करोड़ों दिव्य विमान शोभा पा रहे थे॥ ३-४ ॥
सारा आकाशमण्डल दिव्य तेजसे व्याप्त हो अत्यन्त उत्तम ज्योतिर्मय हो रहा था। पुण्यकर्म करनेवाले स्वर्गवासी स्वयं प्रकाशित होनेवाले अपने तेजसे उस स्थानको उद्भासित कर रहे थे॥ ५ ॥
परम पवित्र, सुगन्धित एवं सुखदायिनी हवा चलने लगी। देवताओंद्वारा गिराये गये राशि-राशि दिव्य पुष्पोंकी भारी वर्षा होने लगी॥ ६ ॥
उस समय सैकड़ों प्रकारके बाजे बजने लगे और गन्धर्वों तथा अप्सराओंसे वहाँका स्थान भर गया। इतनेमें ही श्रीरामचन्द्रजी सरयूके जलमें प्रवेश करनेके लिये दोनों पैरोंसे आगे बढ़ने लगे॥ ७ ॥
तब ब्रह्माजी आकाशसे ही बोले—‘श्रीविष्णु-स्वरूप रघुनन्दन! आइये, आपका कल्याण हो। हमारा बड़ा सौभाग्य है, जो आप अपने परमधामको पधार रहे हैं॥ ८ ॥
‘महाबाहो! आप देवतुल्य तेजस्वी भाइयोंके साथ अपने स्वरूपभूत लोकमें प्रवेश करें। आप जिस स्वरूपमें प्रवेश करना चाहें, अपने उसी स्वरूपमें प्रवेश करें॥
‘महातेजस्वी परमेश्वर! आपकी इच्छा हो तो चतुर्भुज विष्णुरूपमें ही प्रवेश करें अथवा अपने सनातन आकाशमय अव्यक्त ब्रह्मरूपमें ही विराजमान हों। देव! आप ही सम्पूर्ण लोकोंके आश्रय हैं। आपकी पुरातन पत्नी योगमाया (ह्लादिनी शक्ति)-स्वरूपा जो विशाललोचना
सीतादेवी हैं, उनको छोड़कर दूसरे कोई आपको यथार्थरूपसे नहीं जानते हैं; क्योंकि आप अचिन्त्य, अविनाशी तथा जरा आदि अवस्थाओंसे रहित परब्रह्म हैं, अतः महातेजस्वी राघवेन्द्र! आप जिसमें चाहें, अपने उसी स्वरूपमें प्रवेश करें (प्रतिष्ठित हों)'॥ १०-११ ॥
पितामह ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर परम बुद्धिमान् श्रीरघुनाथजीने कुछ निश्चय करके भाइयोंके साथ शरीरसहित अपने वैष्णव तेजमें प्रवेश किया॥
फिर तो इन्द्र और अग्नि आदि सब देवता, साध्य तथा मरुद्गण भी विष्णुस्वरूपमें स्थित हुए भगवान् श्रीरामकी पूजा (स्तुति-प्रशंसा) करने लगे॥ १३ ॥
तदनन्तर जो दिव्य ऋषि, गन्धर्व, अप्सरा, गरुड़, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव और राक्षस थे, वे भी भगवान्का गुणगान करने लगे॥ १४ ॥
(वे बोले—) 'प्रभो! यहाँ आपके पदार्पण करनेसे देवलोकवासियोंका यह सारा समुदाय सफलमनोरथ होनेके कारण हृष्ट-पुष्ट एवं आनन्दमग्न हो गया है। सबके पाप-ताप नष्ट हो गये हैं। प्रभो! आपको हमारा शतशः साधुवाद है।' ऐसा उन देवताओंने कहा॥ १५ ॥
तत्पश्चात् विष्णुरूपमें विराजमान महातेजस्वी श्रीराम ब्रह्माजीसे बोले—'उत्तम व्रतका पालन करनेवाले पितामह! इस सम्पूर्ण जनसमुदायको भी आप उत्तम लोक प्रदान करें॥ १६ ॥
'ये सब लोग स्नेहवश मेरे पीछे आये हैं। ये सब-के-सब यशस्वी और मेरे भक्त हैं। इन्होंने मेरे लिये अपने लौकिक सुखोंका परित्याग कर दिया है, अतः ये सर्वथा मेरे अनुग्रहके पात्र हैं'॥ १७ ॥
भगवान् विष्णुका यह वचन सुनकर लोकगुरु भगवान् ब्रह्माजी बोले—'भगवन्! यहाँ आये हुए ये सब लोग 'संतानक' नामक लोकोंमें जायँगे॥ १८ ॥
'पशु-पक्षियोंकी योनिमें पड़े हुए जीवोंमेंसे भी जो कोई आपका ही भक्तिभावसे चिन्तन करता हुआ प्राणोंका परित्याग करेगा, वह भी संतानक-लोकोंमें ही निवास करेगा। यह संतानकलोक ब्रह्मलोकके ही निकट है (साकेत-धामका ही अङ्ग है)। वह ब्रह्माके सत्य-संकल्पत्व आदि सभी उत्तम गुणोंसे युक्त है। उसीमें ये आपके भक्तजन निवास करेंगे'॥ १९ १/२ ॥
जिन वानरों और रीछोंकी देवताओंसे उत्पत्ति हुई थी, वे अपनी-अपनी योनिमें ही मिल गये—जिन-जिन देवताओंसे प्रकट हुए थे, उन्हींमें प्रविष्ट हो गये। सुग्रीवने सूर्यमण्डलमें प्रवेश
किया। इसी प्रकार अन्य वानर भी सब देवताओंके देखते-देखते अपने-अपने पिताके स्वरूपको प्राप्त हो गये॥ २०-२१ १/२ ॥
देवेश्वर ब्रह्माजीने जब संतानक-लोकोंकी प्राप्तिकी घोषणा की, तब सरयूके गोप्रतारघाटपर आये हुए उन सब लोगोंने आनन्दके आँसू बहाते हुए सरयूके जलमें डुबकी लगायी॥ २२ १/२ ॥
जिसने-जिसने जलमें गोता लगाया, वही-वही बड़े हर्षके साथ प्राणों और मनुष्य-शरीरको त्यागकर विमानपर जा बैठा॥ २३ १/२ ॥
पशु-पक्षीकी योनिमें पड़े हुए सैकड़ों प्राणी सरयूके जलमें गोता लगाकर तेजस्वी शरीर धारण करके दिव्यलोकमें जा पहुँचे। वे दिव्य शरीर धारण करके दिव्य अवस्थामें स्थित हो देवताओंके समान दीप्तिमान् हो गये॥ २४-२५ ॥
स्थावर और जङ्गम सभी तरहके प्राणी सरयूके जलमें प्रवेश करके उस जलसे अपने शरीरको भिगोकर दिव्य लोकमें जा पहुँचे॥ २६ ॥
उस समय जो कोई भी रीछ, वानर या राक्षस वहाँ आ गये, वे सभी अपने शरीरको सरयूके जलमें डालकर भगवान्के परमधाममें जा पहुँचे॥ २७ ॥
इस प्रकार वहाँ आये हुए सब प्राणियोंको संतानक-लोकोंमें स्थान देकर लोकगुरु ब्रह्माजी हर्ष और आनन्दसे भरे हुए देवताओंके साथ अपने महान् धाममें चले गये॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें एक सौ दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११० ॥