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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

दसवाँ सर्ग

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दसवाँ सर्ग

रावण आदिकी तपस्या और वर-प्राप्ति

इतनी कथा सुनकर श्रीरामचन्द्रजीने अगस्त्य मुनिसे पूछा—'ब्रह्मन्! उन तीनों महाबली भाइयोंने वनमें किस प्रकार और कैसी तपस्या की?'॥ १ ॥

तब अगस्त्यजीने अत्यन्त प्रसन्नचित्तवाले श्रीरामसे कहा—'रघुनन्दन! उन तीनों भाइयोंने वहाँ पृथक्-पृथक् धर्मविधियोंका अनुष्ठान किया॥ २ ॥

'कुम्भकर्ण अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखकर प्रतिदिन धर्मके मार्गमें स्थित हो गर्मीके दिनोंमें अपने चारों ओर आग जला धूपमें बैठकर पञ्चाग्निका सेवन करने लगा॥ ३ ॥

'फिर वर्षा-ऋतुमें खुले मैदानमें वीरासनसे बैठकर मेघोंके बरसाये हुए जलसे भीगता रहा और जाड़ेके दिनोंमें प्रतिदिन जलके भीतर रहने लगा॥ ४ ॥

'इस प्रकार सन्मार्गमें स्थित हो धर्मके लिये प्रयत्नशील हुए उस कुम्भकर्णके दस हजार वर्ष बीत गये॥ ५ ॥

'विभीषण तो सदासे ही धर्मात्मा थे। वे नित्यधर्म-परायण रहकर शुद्ध आचार-विचारका पालन करते हुए पाँच हजार वर्षोंतक एक पैरसे खड़े रहे॥ ६ ॥

'उनका नियम समाप्त होनेपर अप्सराएँ नृत्य करने लगीं। उनके ऊपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा हुईं और देवताओंने उनकी स्तुति की॥ ७ ॥

'तदनन्तर विभीषणने अपनी दोनों बाँहें और मस्तक ऊपर उठाकर स्वाध्यायपरायण हो पाँच हजार वर्षोंतक सूर्यदेवकी आराधना की॥ ८ ॥

'इस प्रकार मनको वशमें रखनेवाले विभीषणके भी दस हजार वर्ष बड़े सुखसे बीते, मानो वे स्वर्गके नन्दनवनमें निवास करते हों॥ ९ ॥

'दशमुख रावणने दस हजार वर्षोंतक लगातार उपवास किया। प्रत्येक सहस्र वर्षके पूर्ण होनेपर वह अपना एक मस्तक काटकर आगमें होम देता था॥ १० ॥

'इस तरह एक-एक करके उसके नौ हजार वर्ष बीत गये और नौ मस्तक भी अग्निदेवको भेंट हो गये॥

‘जब दसवाँ सहस्र पूरा हुआ और दशग्रीव अपना दसवाँ मस्तक काटनेको उद्यत हुआ, इसी समय पितामह ब्रह्माजी वहाँ आ पहुँचे॥ १२ ॥

‘पितामह ब्रह्मा अत्यन्त प्रसन्न होकर देवताओंके साथ वहाँ पहुँचे थे। उन्होंने आते ही कहा—दशग्रीव! मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ॥ १३ ॥

‘धर्मज्ञ! तुम्हारे मनमें जिस वरको पानेकी इच्छा हो, उसे शीघ्र माँगो। बोलो, आज मैं तुम्हारी किस अभिलाषाको पूर्ण करूँ? तुम्हारा परिश्रम व्यर्थ नहीं होना चाहिये’॥ १४ ॥

यह सुनकर दशग्रीवकी अन्तरात्मा प्रसन्न हो गयी। उसने मस्तक झुकाकर भगवान् ब्रह्माको प्रणाम किया और हर्ष-गद्गदवाणीमें कहा— ॥ १५ ॥

‘भगवन्! प्राणियोंके लिये मृत्युके सिवा और किसीका सदा भय नहीं रहता है; अतएव मैं अमर होना चाहता हूँ; क्योंकि मृत्युके समान दूसरा कोर्इ शत्रु नहीं है’॥

‘उसके ऐसा कहनेपर ब्रह्माजीने दशग्रीवसे कहा— ‘तुम्हें सर्वथा अमरत्व नहीं मिल सकता; इसलिये दूसरा कोर्इ वर माँगो’॥ १७ ॥

‘श्रीराम! लोकस्रष्टा ब्रह्माजीके ऐसा कहनेपर दशग्रीवने उनके सामने हाथ जोड़कर कहा—॥ १८ ॥

‘सनातन प्रजापते! मैं गरुड़, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस तथा देवताओंके लिये अवध्य हो जाऊँ॥ १९ ॥

‘देववन्द्य पितामह! अन्य प्राणियोंसे मुझे तनिक भी चिन्ता नहीं है। मनुष्य आदि अन्य जीवोंको तो मैं तिनकेके समान समझता हूँ’॥ २० ॥

राक्षस दशग्रीवके ऐसा कहनेपर देवताओंसहित भगवान् ब्रह्माजीने कहा—॥ २१ ॥

राक्षसप्रवर! तुम्हारा यह वचन सत्य होगा।’ श्रीराम! दशग्रीवसे ऐसा कहकर पितामह फिर बोले—॥ २२ ॥

‘निष्पाप राक्षस! सुनो—मैं प्रसन्न होकर पुनः तुम्हें यह शुभ वर प्रदान करता हूँ—तुमने पहले अग्निमें अपने जिन-जिन मस्तकोंका हवन किया है, वे सब तुम्हारे लिये फिर पूर्ववत् प्रकट हो जायँगे। सौम्य! इसके सिवा एक और भी दुर्लभ वर मैं तुम्हें यहाँ दे रहा हूँ—तुम अपने मनसे जब जैसा रूप धारण करना चाहोगे, तुम्हारी इच्छाके अनुसार उस समय तुम्हारा वैसा ही रूप हो जायगा’॥ २३-२४ १/२ ॥

‘पितामह ब्रह्माके इतना कहते ही राक्षस दशग्रीवके वे मस्तक, जो पहले आगमें होम दिये गये थे, फिर नये रूपमें प्रकट हो गये॥ २५ १/२ ॥

‘श्रीराम! दशग्रीवसे पूर्वोक्त बात कहकर लोक-पितामह ब्रह्माजी विभीषणसे बोले—॥ २६ १/२ ॥

‘बेटा विभीषण! तुम्हारी बुद्धि सदा धर्ममें लगी रहनेवाली है, अतः मैं तुमसे बहुत संतुष्ट हूँ। उत्तम व्रतका पालन करनेवाले धर्मात्मन्! तुम भी अपनी रुचिके अनुसार कोऽइ वर माँगो’॥ २७ १/२ ॥

‘तब किरणमालामण्डित चन्द्रमाकी भाँति सदा समस्त गुणोंसे सम्पन्न धर्मात्मा विभीषणने हाथ जोड़कर कहा—‘भगवन्! यदि साक्षात् लोकगुरु आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं कृतार्थ हूँ। मुझे कुछ भी पाना शेष नहीं रहा। उत्तम व्रतको धारण करनेवाले पितामह! यदि आप प्रसन्न होकर मुझे वर देना ही चाहते हैं तो सुनिये॥

‘भगवन्! बड़ी-से-बड़ी आपत्तिमें पड़नेपर भी मेरी बुद्धि धर्ममें ही लगी रहे—उससे विचलित न हो और बिना सीखे ही मुझे ब्रह्मास्त्रका ज्ञान हो जाय॥

‘जिस-जिस आश्रमके विषयमें मेरा जो-जो विचार हो, वह धर्मके अनुकूल ही हो और उस-उस धर्मका मैं पालन करूँ; यही मेरे लिये सबसे उत्तम और अभीष्ट वरदान है॥ ३१-३२ ॥

‘क्योंकि जो धर्ममें अनुरक्त हैं, उनके लिये कुछ भी दुर्लभ नहीं है’ यह सुनकर प्रजापति ब्रह्मा पुनः प्रसन्न हो विभीषणसे बोले—॥ ३३ ॥

‘वत्स! तुम धर्ममें स्थित रहनेवाले हो; अतः जो कुछ चाहते हो, वह सब पूर्ण होगा। शत्रुनाशन! राक्षसयोनिमें उत्पन्न होकर भी तुम्हारी बुद्धि अधर्ममें नहीं लगती है; इसलिये मैं तुम्हें अमरत्व प्रदान करता हूँ॥ ३४ १/२ ॥

‘विभीषणसे ऐसा कहकर जब ब्रह्माजी कुम्भकर्णको वर देनेके लिये उद्यत हुए, तब सब देवता उनसे हाथ जोड़कर बोले—॥ ३५ १/२ ॥

‘प्रभो! आप कुम्भकर्णको वरदान न दीजिये; क्योंकि आप जानते हैं कि यह दुर्बुद्धि निशाचर किस तरह समस्त लोकोंको त्रास देता है॥ ३६ १/२ ॥

‘ब्रह्मन्! इसने नन्दनवनकी सात अप्सराओं, देवराज इन्द्रके दस अनुचरों तथा बहुत-से ऋषियों और मनुष्योंको भी खा लिया है॥ ३७ १/२ ॥

‘पहले वर न पानेपर भी इस राक्षसने जब इस प्रकार प्राणियोंके भक्षणका क्रूरतापूर्ण कर्म कर डाला है, तब यदि इसे वर प्राप्त हो जाय, उस दशामें तो यह तीनों लोकोंको खा जायगा॥ ३८ १/२ ॥

‘अमिततेजस्वी देव! आप वरके बहाने इसको मोह प्रदान कीजिये। इससे समस्त लोकोंका कल्याण होगा और इसका भी सम्मान हो जायगा’॥ ३९ १/२ ॥

‘देवताओंके ऐसा कहनेपर कमलयोनि ब्रह्माजीने सरस्वतीका स्मरण किया। उनके चिन्तन करते ही देवी सरस्वती पास आ गयीं॥ ४० १/२ ॥

उनके पार्श्वभागमें खड़ी हो सरस्वतीने हाथ जोड़कर कहा— ‘देव! यह मैं आ गयी। मेरे लिये क्या आज्ञा है? मैं कौन-सा कार्य करूँ?’॥ ४१ १/२ ॥

‘तब प्रजापतिने वहाँ आयी हुई सरस्वतीदेवीसे कहा— ‘वाणि! तुम राक्षसराज कुम्भकर्णकी जिह्वापर विराजमान हो देवताओंके अनुकूल वाणीके रूपमें प्रकट होओ’॥ ४२ १/२ ॥

‘तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर सरस्वती कुम्भकर्णके मुखमें समा गयीं। इसके बाद प्रजापतिने उस राक्षससे कहा— ‘महाबाहु कुम्भकर्ण! तुम भी अपने मनके अनुकूल कोई वर माँगो’॥ ४३ १/२ ॥

‘उनकी बात सुनकर कुम्भकर्ण बोला— ‘देवदेव! मैं अनेकानेक वर्षोंतक सोता रहूँ। यही मेरी इच्छा है।’ तब ‘एवमस्तु (ऐसा ही हो)’ कहकर ब्रह्माजी देवताओंके साथ चले गये॥ ४४-४५ ॥

‘फिर सरस्वतीदेवीने भी उस राक्षसको छोड़ दिया। ब्रह्माजीके साथ देवताओंके आकाशमें चले जानेपर जब सरस्वतीजी उसके ऊपरसे उतर गयीं, तब दुष्टात्मा कुम्भकर्णको चेत हुआ और वह दुःखी होकर इस प्रकार चिन्ता करने लगा॥ ४६-४७ ॥

‘अहो! आज मेरे मुँहसे ऐसी बात क्यों निकल गयी। मैं समझता हूँ, ब्रह्माजीके साथ आये हुए देवताओंने ही उस समय मुझे मोहमें डाल दिया था’॥ ४८ ॥

‘इस प्रकार वे तीनों तेजस्वी भ्राता वर पाकर श्लेष्मातकवन (लसोड़ेके जंगल)-में गये और वहाँ सुखपूर्वक रहने लगे॥ ४९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें दसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥

१० ॥