सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

सत्तरवाँ सर्ग

⬅ विषय-सूची (TOC)

सत्तरवाँ सर्ग

हनुमान्‌जीके द्वारा देवान्तक और त्रिशिराका, नीलके द्वारा महोदरका तथा ऋषभके द्वारा महापार्श्वका वध

नरान्तकको मारा गया देख देवान्तक, पुलस्त्य-कुलनन्दन त्रिशिरा और महोदर—ये श्रेष्ठ राक्षस हाहाकार करने लगे॥ १ ॥

महोदरने मेघके समान गजराजपर बैठकर महापराक्रमी अङ्गदके ऊपर बड़े वेगसे धावा किया॥ २ ॥

भाईके मारे जानेसे संतप्त हुए बलवान् देवान्तकने भयानक परिघ हाथमें लेकर अङ्गदपर आक्रमण किया॥ ३ ॥

इस प्रकार वीर त्रिशिरा उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए सूर्यतुल्य तेजस्वी रथपर बैठकर वालिकुमारका सामना करनेके लिये आया॥ ४ ॥

देवताओंका दर्प दलन करनेवाले उन तीनों निशाचरपतियोंके आक्रमण करनेपर वीर अङ्गदने विशाल शाखाओंसे युक्त एक वृक्षको उखाड़ लिया और जैसे इन्द्र प्रज्वलित वज्रका प्रहार करते हैं, उसी प्रकार उन वालिकुमारने बड़ी-बड़ी शाखाओंसे युक्त उस महान् वृक्षको सहसा देवान्तकपर दे मारा॥ ५-६ ॥

परंतु त्रिशिराने विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाण मारकर उस वृक्षके टुकड़े-टुकड़े कर दिये। वृक्षको खण्डित हुआ देख कपिकुञ्जर अङ्गद तत्काल आकाशमें उछले और त्रिशिरापर वृक्षों तथा शिलाओंकी वर्षा करने लगे; किंतु क्रोधसे भरे हुए त्रिशिराने पैने बाणोंद्वारा उनको भी काट गिराया॥ ७-८ ॥

महोदरने अपने परिघके अग्रभागसे उन वृक्षोंको तोड़-फोड़ डाला। तत्पश्चात् सायकोंकी वर्षा करते हुए त्रिशिराने वीर अङ्गदपर धावा किया॥ ९ ॥

साथ ही कुपित हुए महोदरने हाथीके द्वारा आक्रमण करके वालिकुमारकी छातीमें वज्रतुल्य तोमरोंका प्रहार किया॥ १० ॥

इसी प्रकार देवान्तक भी अङ्गदके निकट आ अत्यन्त क्रोधपूर्वक परिघके द्वारा उन्हें चोट पहुँचाकर तुरंत वेगपूर्वक वहाँसे दूर हट गया॥ ११ ॥

उन तीनों प्रमुख निशाचरोंने एक साथ ही धावा किया था, तो भी महातेजस्वी और प्रतापी वालिकुमार अङ्गदके मनमें तनिक भी व्यथा नहीं हुई॥ १२ ॥

वे अत्यन्त दुर्जय और बड़े वेगशाली थे। उन्होंने महान् वेग प्रकट करके महोदरके महान् गजराजपर आक्रमण किया और उसके मस्तकपर जोरसे थप्पड़ मारा॥ १३ ॥

युद्धस्थलमें उनके उस प्रहारसे गजराजकी दोनों आँखें निकलकर पृथ्वीपर गिर गयीं और वह तत्काल मर गया॥ १४ ॥

फिर महाबली वालिकुमारने उस हाथीका एक दाँत उखाड़ लिया और युद्धस्थलमें दौड़कर उसीके द्वारा देवान्तकपर चोट की॥ १५ ॥

तेजस्वी देवान्तक उस प्रहारसे व्याकुल हो गया और वायुके हिलाये हुए वृक्षकी भाँति काँपने लगा। उसके शरीरसे महावरके समान रंगवाला रक्तका महान् प्रवाह बह चला॥ १६ ॥

तत्पश्चात् महातेजस्वी बलवान् देवान्तकने बड़ी कठिनाईसे अपनेको सँभालकर परिघ उठाया और उसे वेगपूर्वक घुमाकर अङ्गदपर दे मारा॥ १७ ॥

उस परिघकी चोट खाकर वानरराजकुमार अङ्गदने भूमिपर घुटने टेक दिये। फिर तुरंत ही उठकर वे ऊपरकी ओर उछले॥ १८ ॥

उछलते समय त्रिशिराने तीन सीधे जानेवाले भयंकर बाणोंद्वारा वानरराजकुमारके ललाटमें गहरी चोट पहुँचायी॥

तदनन्तर अङ्गदको तीन प्रमुख निशाचरोंसे घिरा हुआ जान हनुमान् और नील भी उनकी सहायताके लिये अग्रसर हुए॥ २० ॥

उस समय नीलने त्रिशिरापर एक पर्वत-शिखर चलाया; किंतु उस बुद्धिमान् रावणपुत्रने तीखे बाण मारकर उसे तोड़-फोड़ डाला॥ २१ ॥

उसके सैकड़ों बाणोंसे विदीर्ण होकर उसकी एक-एक शिला बिखर गयी और वह पर्वत-शिखर आगकी चिनगारियों तथा ज्वालाके साथ पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २२ ॥

अपने भाईका पराक्रम बढ़ता देख बलवान् देवान्तकको बड़ा हर्ष हुआ और उसने परिघ लेकर युद्धस्थलमें हनुमान्‌जीपर धावा किया॥ २३ ॥

उसे आते देख कपिकुञ्जर हनुमान्‌जीने उछलकर अपने वज्र-सरीखे मुक्केसे उसके सिरपर मारा॥ २४ ॥

बलवान् वायुकुमार महाकपि हनुमान्‌जीने उस समय देवान्तकके मस्तकपर प्रहार किया और अपनी भीषण गर्जनासे राक्षसोंको कम्पित कर दिया॥ २५ ॥

उनके मुष्टि-प्रहारसे देवान्तकका मस्तक फट गया और पिस उठा। दाँत, आँखें और लंबी जीभ बाहर निकल आयीं तथा वह राक्षसराजकुमार प्राणशून्य होकर सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २६ ॥

राक्षस-योद्धाओंमें प्रधान महाबली देवद्रोही देवान्तकके युद्धमें मारे जानेपर त्रिशिराको बड़ा क्रोध हुआ और उसने नीलकी छातीपर पैने बाणोंकी भयंकर वर्षा आरम्भ कर दी॥ २७ ॥

तदनन्तर अत्यन्त क्रोधसे भरा हुआ महोदर पुनः शीघ्र ही एक पर्वताकार हाथीपर सवार हुआ, मानो सूर्यदेव मन्दराचलपर आरूढ हुए हों॥ २८ ॥

हाथीपर चढ़कर उसने नीलके ऊपर बाणोंकी विकट वर्षा की, मानो इन्द्रधनुष एवं विद्युन्मण्डलसे युक्त मेघ किसी पर्वतपर जलकी वर्षा कर रहा हो॥

बाण-समूहोंकी निरन्तर वर्षा होनेसे वानरसेनापति नीलके सारे अङ्ग क्षत-विक्षत हो गये। उनका शरीर शिथिल हो गया। इस प्रकार महाबली महोदरने उन्हें मूर्च्छित करके उनके बल-विक्रमको कुण्ठित कर दिया॥

तत्पश्चात् होशमें आनेपर नीलने वृक्ष-समूहोंसे युक्त एक शैल-शिखरको उखाड़ लिया। उनका वेग बड़ा भयंकर था। उन्होंने उछलकर उस वृक्षको महोदरके मस्तकपर दे मारा॥ ३१ ॥

उस पर्वत-शिखरके आघातसे महोदर उस महान् गजराजके साथ ही चूर-चूर हो गया और मूर्च्छित एवं प्राणशून्य हो वज्रके मारे हुए पर्वतकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ३२ ॥

पिताके भाईको मारा गया देख त्रिशिराके क्रोधकी सीमा न रही। उसने धनुष हाथमें ले लिया और हनुमान्‌जीको पैने बाणोंसे बींधना आरम्भ किया॥ ३३ ॥

तब पवनकुमारने कुपित होकर उस राक्षसके ऊपर पर्वतका शिखर चलाया, परंतु बलवान् त्रिशिराने अपने तीखे सायकोंसे उसके कई टुकड़े कर डाले॥

उस पर्वतशिखरके प्रहारको व्यर्थ हुआ देख कपिवर हनुमान्ने उस रणभूमिमें रावणपुत्र त्रिशिराके ऊपर वृक्षोंकी वर्षा आरम्भ की॥ ३५ ॥

किंतु प्रतापी त्रिशिराने आकाशमें होनेवाली वृक्षोंकी उस वृष्टिको अपने पैने बाणोंसे छिन्न-भिन्न कर दिया और बड़े जोरसे गर्जना की॥ ३६ ॥

तब हनुमान्जी कूदकर त्रिशिराके पास जा पहुँचे और जैसे कुपित सिंह गजराजको अपने पंजोंसे चीर डालता है, उसी प्रकार रोषसे भरे हुए उन पवनकुमारने त्रिशिराके घोड़ेको अपने नखोंसे विदीर्ण कर डाला॥ ३७ ॥

यह देख रावणकुमार त्रिशिराने शक्ति हाथमें ली, मानो यमराजने कालरात्रिको साथ ले लिया हो, वह शक्ति लेकर उसने पवनकुमार हनुमान्पर चलायी॥ ३८ ॥

जैसे आकाशसे उल्कापात हुआ हो, उसी प्रकार वह शक्ति, जिसकी गति कहीं कुण्ठित नहीं होती थी, चली; परंतु वानरश्रेष्ठ हनुमान्जीने उसे अपने शरीरमें लगनेसे पहले ही हाथसे पकड़ लिया और तोड़ डाला, तोड़नेके बाद उन्होंने भयंकर गर्जना की॥ ३९ ॥

हनुमान्जीने वह भयानक शक्ति तोड़ दी, यह देख वानरवृन्द अत्यन्त हर्षसे उल्लसित हो मेघोंके समान गम्भीर गर्जना करने लगे॥ ४० ॥

तब राक्षसशिरोमणि त्रिशिराने तलवार उठायी और कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीकी छातीपर उसकी भरपूर चोट की॥ ४१ ॥

तलवारकी चोटसे घायल हो पराक्रमी पवनकुमार हनुमान्ने त्रिशिराकी छातीमें एक तमाचा जड़ दिया॥

उनका थप्पड़ लगते ही महातेजस्वी त्रिशिरा अपनी चेतना खो बैठा। उसके हाथसे हथियार खिसक गया और वह स्वयं भी पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ४३ ॥

गिरते समय उस राक्षसके खड्गको छीनकर पर्वताकार महाकपि हनुमान्जी सब राक्षसोंको भयभीत करते हुए जोर-जोरसे गर्जना करने लगे॥ ४४ ॥

उनकी वह गर्जना उस निशाचरसे सही नहीं गयी, अतः वह सहसा उछलकर खड़ा हो गया। उठते ही उसने हनुमान्जीको एक मुक्का मारा॥ ४५ ॥

उसके मुक्केकी चोट खाकर महाकपि हनुमान्जीको बड़ा क्रोध हुआ। कुपित होनेपर उन्होंने उस राक्षसका मुकुटमण्डित मस्तक पकड़ लिया॥ ४६ ॥

फिर तो जैसे पूर्वकालमें इन्द्रने त्वष्टाके पुत्र विश्वरूपके तीनों मस्तकोंको वज्रसे काट गिराया था, उसी प्रकार कुपित हुए पवनपुत्र हनुमान्ने रावणपुत्र त्रिशिराके किरीट और कुण्डलोंसहित तीनों मस्तकोंको तीखी तलवारसे काट डाला॥ ४७ ॥

उन मस्तकोंकी सभी इन्द्रियाँ विशाल थीं। उनकी आँखें प्रज्वलित अग्निके समान उद्दीप्त हो रही थीं। उस इन्द्रद्रोही त्रिशिराके वे तीनों सिर उसी प्रकार पृथ्वीपर गिरे, जैसे आकाशसे तारे टूटकर गिरते हैं॥ ४८ ॥

देवद्रोही त्रिशिरा जब इन्द्रतुल्य पराक्रमी हनुमान्‌जीके हाथसे मारा गया, तब समस्त वानर हर्षनाद करने लगे, धरती काँपने लगी तथा राक्षस चारों दिशाओंकी ओर भाग चले॥ ४९ ॥

त्रिशिरा तथा महोदरको मारा गया देख और दुर्जय वीर देवान्तक एवं नरान्तकको भी कालके गालमें गया हुआ जान अत्यन्त अमर्षशील राक्षसशिरोमणि मत्त (महापार्श्व) कुपित हो उठा। उसने एक तेजस्विनी गदा हाथमें ली, जो सम्पूर्णतः लोहेकी बनी हुई थी॥

उसपर सोनेका पत्र जड़ा हुआ था। युद्धस्थलमें पहुँचनेपर वह शत्रुओंके रक्त और मांसमें सन जाती थी। उसका आकार विशाल था। वह सुन्दर शोभासे सम्पन्न तथा शत्रुओंके रक्तसे तृप्त होनेवाली थी॥ ५२ ॥

उसका अग्रभाग तेजसे प्रज्वलित होता था। वह लाल रंगके फूलोंसे सजायी गयी थी तथा ऐरावत, पुण्डरीक और सार्वभौम नामक दिग्गजोंको भी भयभीत करनेवाली थी॥ ५३ ॥

उस गदाको हाथमें लेकर क्रोधसे भरा हुआ राक्षस-शिरोमणि मत्त (महापार्श्व) प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित हो उठा और वानरोंकी ओर दौड़ा॥ ५४ ॥

तब ऋषभ नामक बलवान् वानर उछलकर रावणके छोटे भाई मत्तानीक (महापार्श्व)-के पास आ पहुँचे और उसके सामने खड़े हो गये॥ ५५ ॥

पर्वताकार वानरवीर ऋषभको सामने खड़ा देख कुपित हुए महापार्श्वने अपनी वज्रतुल्य गदासे उनकी छातीपर प्रहार किया॥ ५६ ॥

उसकी उस गदाके आघातसे वानरशिरोमणि ऋषभका वक्षःस्थल क्षत-विक्षत हो गया। वे काँप उठे और अधिक मात्रामें खूनकी धारा बहाने लगे॥ ५७ ॥

बहुत देरके बाद होशमें आनेपर वानरराज ऋषभ कुपित हो उठे और महापार्श्वकी ओर देखने लगे। उस समय उनके ओठ फड़क रहे थे॥ ५८ ॥

वानरवीरोंमें प्रधान ऋषभका रूप पर्वतके समान जान पड़ता था। वे बड़े वेगशाली थे। उन्होंने वेगपूर्वक उस राक्षसके पास पहुँचकर मुक्का ताना और सहसा उसकी छातीपर प्रहार किया॥ ५९ ॥

फिर तो महापार्श्व जड़से कटे हुए वृक्षकी भाँति सहसा पृथ्वीपर गिर पड़ा। उसके सारे अङ्ग रक्तसे नहा उठे। इधर ऋषभ उस निशाचरकी यमदण्डके समान भयंकर गदाको शीघ्र ही हाथमें लेकर जोर-जोरसे गर्जना करने लगे॥ ६० ॥

देवद्रोही महापार्श्व दो घड़ीतक मुर्देकी भाँति पड़ा रहा। फिर होशमें आनेपर वह सहसा उछलकर खड़ा हो गया। उसका रक्तरंजित शरीर संध्याकालके बादलोंके समान लाल दिखायी देता था। उसने वरुणपुत्र ऋषभको गहरी चोट पहुँचायी॥ ६१ ॥

उस चोटसे ऋषभ मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। दो घड़ीके बाद होशमें आनेपर वे पुनः उछलकर सामने आ गये और उन्होंने युद्धस्थलमें महापार्श्वकी उसी गदाको, जो किसी पर्वतराजकी चट्टानके समान जान पड़ती थी, घुमाकर उस निशाचरपर दे मारा॥ ६२ ॥

उसकी उस भयंकर गदाने देवता, यज्ञ और ब्राह्मणसे शत्रुता रखनेवाले उस रौद्र-राक्षसके शरीरपर चोट करके उसके वक्षःस्थलको विदीर्ण कर दिया। फिर तो जैसे पर्वतराज हिमालय गेरु आदि धातुओंसे मिला हुआ जल बहाता है, उसी प्रकार वह भी अधिक मात्रामें रक्त बहाने लगा॥ ६३ ॥

उस समय उस राक्षसने महामना ऋषभके हाथसे अपनी गदा लेनेके लिये उनपर धावा किया; किंतु ऋषभने उस भयानक गदाको हाथमें लेकर बारंबार घुमाया और बड़े वेगसे महापार्श्वपर आक्रमण किया। इस तरह उन महामनस्वी वानर-वीरने युद्धके मुहानेपर उस निशाचरकी जीवन-लीला समाप्त कर दी थी॥ ६४ १/२ ॥

अपनी ही गदाकी चोट खाकर महापार्श्वके दाँत टूट गये और आँखें फूट गयीं। वह वज्रके मारे हुए पर्वत-शिखरकी भाँति तत्काल धराशायी हो गया॥ ६५ १/२ ॥

जिसकी आँखें नष्ट और चेतना विलुप्त हो गयी थी, वह राक्षस महापार्श्व जब गतायु होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा, तब राक्षसोंकी सेना सब ओर भाग चली॥ ६६ ॥

रावणके भा०इ महापार्श्वका वध हो जानेपर राक्षसोंकी वह समुद्रके समान विशाल सेना हथियार फेंककर केवल जान बचानेके लिये सब ओर भागने लगी, मानो महासागर फूटकर सब ओर बहने लगा हो॥ ६७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥

७० ॥