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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

अट्ठावनवाँ सर्ग

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अट्ठावनवाँ सर्ग

सम्पातिका अपने पंख जलनेकी कथा सुनाना, सीता और रावणका पता बताना तथा वानरोंकी सहायतासे समुद्र-तटपर जाकर भाईको जलाञ्जलि देना

जीवनकी आशा त्यागकर बैठे हुए वानरोंके मुखसे यह करुणाजनक बात सुनकर सम्पातिके नेत्रोंमें आँसू आ गये। उन्होंने उच्च स्वरसे उत्तर दिया— ॥ १ ॥

‘वानरो! तुम जिसे महाबली रावणके द्वारा युद्धमें मारा गया बता रहे हो, वह जटायु मेरा छोटा भाई था॥

‘मैं बूढ़ा हुआ। मेरे पंख जल गये। इसलिये अब मुझमें अपने भाईके वैरका बदला लेनेकी शक्ति नहीं रह गयी है। यही कारण है कि यह अप्रिय बात सुनकर भी मैं चुपचाप सहे लेता हूँ॥ ३ ॥

‘पहलेकी बात है जब इन्द्रके द्वारा वृत्रासुरका वध हो गया, तब इन्द्रको प्रबल जानकर हम दोनों भाई उन्हें जीतनेकी इच्छासे पहले आकाशमार्गके द्वारा बड़े वेगसे स्वर्गलोकमें गये। इन्द्रको जीतकर लौटते समय हम दोनों ही स्वर्गको प्रकाशित करनेवाले अंशुमाली सूर्यके पास आये। हममेंसे जटायु सूर्यके मध्याह्नकालमें उनके तेजसे शिथिल होने लगा॥ ४-५ ॥

‘भाईको सूर्यकी किरणोंसे पीड़ित और अत्यन्त व्याकुल देख मैंने स्नेहवश अपने दोनों पंखोंसे उसे ढक लिया॥ ६ ॥

‘वानरशिरोमणियो! उस समय मेरे दोनों पंख जल गये और मैं इस विन्ध्य पर्वतपर गिर पड़ा। यहाँ रहकर मैं कभी अपने भाईका समाचार न पा सका (आज पहले-पहल तुमलोगोंके मुखसे उसके मारे जानेकी बात मालूम हुई है)’॥ ७ ॥

जटायुके भाई सम्पातिके उस समय ऐसा कहनेपर परम बुद्धिमान् युवराज अङ्गदने उनसे इस प्रकार कहा—

‘गृध्रराज! यदि आप जटायुके भाई हैं, यदि आपने मेरी कही हुई बातें सुनी हैं और यदि आप उस राक्षसका निवासस्थान जानते हैं तो हमें बताइये॥ ९ ॥

‘वह अदूरदर्शी नीच राक्षस रावण यहाँसे निकट हो या दूर, यदि आप जानते हैं तो हमें उसका पता बता दें’॥ १० ॥

तब जटायुके बड़े भाई महातेजस्वी सम्पातिने वानरोंका हर्ष बढ़ाते हुए अपने अनुरूप बात कही— ॥ ११ ॥

‘वानरो! मेरे पंख जल गये। अब मैं बेपरका गीध हूँ। मेरी शक्ति जाती रही (अतः मैं शरीरसे तुम्हारी कोई सहायता नहीं कर सकता, तथापि) वचनमात्रसे भगवान् श्रीरामकी उत्तम सहायता अवश्य करूँगा॥ १२ ॥

‘मैं वरुणके लोकोंको जानता हूँ। वामनावतारके समय भगवान् विष्णुने जहाँ-जहाँ अपने तीन पग रखे थे, उन स्थानोंका भी मुझे ज्ञान है। अमृत-मन्थन तथा देवासुरसंग्राम भी मेरी देखी और जानी हुई घटनाएँ हैं॥

‘यद्यपि वृद्धावस्थाने मेरा तेज हर लिया है और मेरी प्राणशक्ति शिथिल हो गयी है तथापि श्रीरामचन्द्रजीका यह कार्य मुझे सबसे पहले करना है॥ १४ ॥

‘एक दिन मैंने भी देखा, दुरात्मा रावण सब प्रकारके गहनोंसे सजी हुई एक रूपवती युवतीको हरकर लिये जा रहा था॥ १५ ॥

‘वह मानिनी देवी ‘हा राम! हा राम! हा लक्ष्मण’ की रट लगाती हुई अपने गहने फेंकती और अपने शरीरके अवयवोंको कम्पित करती हुई छटपटा रही थी॥

‘उसका सुन्दर रेशमी पीताम्बर उदयाचलके शिखरपर फैली हुई सूर्यकी प्रभाके समान सुशोभित होता था। वह उस काले राक्षसके समीप बादलोंमें चमकती हुई बिजलीके समान प्रकाशित हो रही थी॥ १७ ॥

‘श्रीरामका नाम लेनेसे मैं समझता हूँ, वह सीता ही थी। अब मैं उस राक्षसके घरका पता बताता हूँ, सुनो॥

‘रावण नामक राक्षस महर्षि विश्रवाका पुत्र और साक्षात् कुबेरका भाई है। वह लङ्का नामवाली नगरीमें निवास करता है॥ १९ ॥

‘यहाँसे पूरे चार सौ कोसके अन्तरपर समुद्रमें एक द्वीप है, जहाँ विश्वकर्माने अत्यन्त रमणीय लङ्कापुरीका निर्माण किया है॥ २० ॥

‘उसके विचित्र दरवाजे और बड़े-बड़े महल सुवर्णके बने हुए हैं। उनके भीतर सोनेके चबूतरे या वेदियाँ हैं॥ २१ ॥

‘उस नगरीकी चहारदीवारी बहुत बड़ी है और सूर्यकी भाँति चमकती रहती है। उसीके भीतर पीले रंगकी रेशमी साड़ी पहने विदेहकुमारी सीता बड़े दुःखसे निवास करती हैं॥ २२ ॥

‘रावणके अन्तःपुरमें नजरबंद हैं। बहुत-सी राक्षसियाँ उनके पहरेपर तैनात हैं। वहाँ पहुँचनेपर तुमलोग राजा जनककी कन्या मैथिली सीताको देख सकोगे॥ २३ ॥

‘लङ्का चारों ओरसे समुद्रके द्वारा सुरक्षित है। पूरे सौ योजन समुद्रको पार करके उसके दक्षिण तटपर पहुँचनेपर तुमलोग रावणको देख सकोगे। अतः वानरो! समुद्रको पार करनेमें ही तुरंत शीघ्रतापूर्वक अपने पराक्रमका परिचय दो॥ २४-२५ ॥

‘निश्चय ही मैं ज्ञानदृष्टिसे देखता हूँ। तुमलोग सीताका दर्शन करके लौट आओगे। आकाशका पहला मार्ग गौरैयों तथा अन्न खानेवाले कबूतर आदि पक्षियोंका है॥ २६ ॥

‘उससे ऊपरका दूसरा मार्ग कौओं तथा वृक्षोंके फल खाकर रहनेवाले दूसरे-दूसरे पक्षियोंका है। उससे भी ऊँचा जो आकाशका तीसरा मार्ग है, उससे चील, क्रौञ्च और कुरर आदि पक्षी जाते हैं॥ २७ ॥

‘बाज चौथे और गीध पाँचवें मार्गसे उड़ते हैं। रूप, बल और पराक्रमसे सम्पन्न तथा यौवनसे सुशोभित होनेवाले हंसोंका छठा मार्ग है। उनसे भी ऊँची उड़ान गरुड़की है। वानरशिरोमणियो! हम सबका जन्म गरुड़से ही हुआ है॥ २८-२९ ॥

‘परंतु पूर्वजन्ममें हमसे कोई निन्दित कर्म बन गया था, जिससे इस समय हमें मांसाहारी होना पड़ा है। तुमलोगोंकी सहायता करके मुझे रावणसे अपने भाईके वैरका बदला लेना है॥ ३० ॥

‘मैं यहींसे रावण और जानकीको देखता हूँ। हमलोगोंमें भी गरुड़की भाँति दूरतक देखनेकी दिव्य शक्ति है॥ ३१ ॥

‘इसलिये वानरो! हम भोजनजनित बलसे तथा स्वाभाविक शक्तिसे भी सदा सौ योजन और उससे आगेतक भी देख सकते हैं॥ ३२ ॥

‘जातीय स्वभावके अनुसार हमलोगोंकी जीविकावृत्ति दूरसे देखे गये दूरस्थ भक्ष्यविशेषके द्वारा नियत की गयी है तथा जो कुक्कुट आदि पक्षी हैं, उनकी जीवन-वृत्ति वृक्षकी जड़तक ही सीमित है—वे वहींतक उपलब्ध होनेवाली वस्तुसे जीवन-निर्वाह करते हैं॥ ३३ ॥

‘अब तुम इस खारे पानीके समुद्रको लाँघनेका कोई उपाय सोचो। विदेहकुमारी सीताके पास जा सफलमनोरथ होकर किष्किन्धापुरीको लौटोगे॥ ३४ ॥

‘अब मैं तुम्हारी सहायतासे समुद्रके किनारे चलना चाहता हूँ। वहाँ अपने स्वर्गवासी भाई महात्मा जटायुको जलाञ्जलि प्रदान करूँगा’॥ ३५ ॥

यह सुनकर महापराक्रमी वानरोंने जले पंखवाले पक्षिराज सम्पातिको उठाकर समुद्रके किनारे पहुँचा दिया और जलाञ्जलि देनेके पश्चात् वे पुनः उनको वहाँसे उठाकर उनके रहनेके स्थानपर ले आये। उनके मुखसे सीताका समाचार जानकर उन सभी वानरोंको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें अट्ठावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५८ ॥