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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

उनचासवाँ सर्ग

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उनचासवाँ सर्ग

पितृदेवताओंद्वारा इन्द्रको भेड़के अण्डकोषसे युक्त करना तथा भगवान् श्रीरामके द्वारा अहल्याका उद्धार एवं उन दोनों दम्पतिके द्वारा इनका सत्कार

तदनन्तर इन्द्र अण्डकोषसे रहित होकर बहुत डर गये। उनके नेत्रोंमें त्रास छा गया। वे अग्नि आदि देवताओं, सिद्धों, गन्धर्वों और चारणोंसे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

‘देवताओ! महात्मा गौतमकी तपस्यामें विघ्न डालनेके लिये मैंने उन्हें क्रोध दिलाया है। ऐसा करके मैंने यह देवताओंका कार्य ही सिद्ध किया है॥ २ ॥

‘मुनिने क्रोधपूर्वक भारी शाप देकर मुझे अण्डकोषसे रहित कर दिया और अपनी पत्नीका भी परित्याग कर दिया। इससे मेरे द्वारा उनकी तपस्याका अपहरण हुआ है॥ ३ ॥

‘(यदि मैं उनकी तपस्यामें विघ्न नहीं डालता तो वे देवताओंका राज्य ही छीन लेते। अतः ऐसा करके) मैंने देवताओंका ही कार्य सिद्ध किया है। इसलिये श्रेष्ठ देवताओ! तुम सब लोग, ऋषिसमुदाय और चारणगण मिलकर मुझे अण्डकोषसे युक्त करनेका प्रयत्न करो’ ॥ ४ ॥

इन्द्रका यह वचन सुनकर मरुद्गणोंसहित अग्नि आदि समस्त देवता कव्यवाहन आदि पितृदेवताओंके पास जाकर बोले— ॥ ५ ॥

‘पितृगण! यह आपका भेड़ा अण्डकोषसे युक्त है और इन्द्र अण्डकोषरहित कर दिये गये हैं। अतः इस भेड़ेके दोनों अण्डकोषोंको लेकर आप शीघ्र ही इन्द्रको अर्पित कर दें॥ ६ ॥

‘अण्डकोषसे रहित किया हुआ यह भेड़ा इसी स्थानमें आपलोगोंको परम संतोष प्रदान करेगा। अतः जो मनुष्य आपलोगोंकी प्रसन्नताके लिये अण्डकोषरहित भेड़ा दान करेंगे, उन्हें आपलोग उस दानका उत्तम एवं पूर्ण फल प्रदान करेंगे’ ॥ ७ ॥

अग्निकी यह बात सुनकर पितृदेवताओंने एकत्र हो भेड़ेके अण्डकोषोंको उखाड़कर इन्द्रके शरीरमें उचित स्थानपर जोड़ दिया॥ ८ ॥

ककुत्स्थनन्दन श्रीराम! तभीसे वहाँ आये हुए समस्त पितृ-देवता अण्डकोषरहित भेड़ोंको ही उपयोगमें लाते हैं और दाताओंको उनके दानजनित फलोंके भागी बनाते हैं॥ ९ ॥

रघुनन्दन! उसी समयसे महात्मा गौतमके तपस्याजनित प्रभावसे इन्द्रको भेड़ोंके अण्डकोष धारण करने पड़े॥ १० ॥

महातेजस्वी श्रीराम! अब तुम पुण्यकर्मा महर्षि गौतमके इस आश्रमपर चलो और इन देवरूपिणी महाभागा अहल्याका उद्धार करो॥ ११ ॥

विश्वामित्रजीका यह वचन सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीरामने उन महर्षिको आगे करके उस आश्रममें प्रवेश किया॥ १२ ॥

वहाँ जाकर उन्होंने देखा—महासौभाग्यशालिनी अहल्या अपनी तपस्यासे देदीप्यमान हो रही हैं। इस लोकके मनुष्य तथा सम्पूर्ण देवता और असुर भी वहाँ आकर उन्हें देख नहीं सकते थे॥ १३ ॥

उनका स्वरूप दिव्य था। विधाताने बड़े प्रयत्नसे उनके अंगोंका निर्माण किया था। वे मायामयी-सी प्रतीत होती थीं। धूमसे घिरी हुई प्रज्वलित अग्निशिखा-सी जान पड़ती थीं। ओले और बादलोंसे ढकी हुई पूर्ण चन्द्रमाकी प्रभा-सी दिखायी देती थीं तथा जलके भीतर उद्भासित होनेवाली सूर्यकी दुर्धर्ष प्रभाके समान दृष्टिगोचर होती थीं॥ १४-१५ ॥

गौतमके शापवश श्रीरामचन्द्रजीका दर्शन होनेसे पहले तीनों लोकोंके किसी भी प्राणीके लिये उनका दर्शन होना कठिन था। श्रीरामका दर्शन मिल जानेसे जब उनके शापका अन्त हो गया, तब वे उन सबको दिखायी देने लगीं॥

उस समय श्रीराम और लक्ष्मणने बड़ी प्रसन्नताके साथ अहल्याके दोनों चरणोंका स्पर्श किया। महर्षि गौतमके वचनोंका स्मरण करके अहल्याने बड़ी सावधानीके साथ उन दोनों भाइयोंको आदरणीय अतिथिके रूपमें अपनाया और पाद्य, अर्घ्य आदि अर्पित करके उनका आतिथ्य-सत्कार किया। श्रीरामचन्द्रजीने शास्त्रीय विधिके अनुसार अहल्याका वह आतिथ्य ग्रहण किया॥ १७-१८ ॥

उस समय देवताओंकी दुन्दुभि बज उठी। साथ ही आकाशसे फूलोंकी बड़ी भारी वर्षा होने लगी। गन्धर्वों और अप्सराओंद्वारा महान् उत्सव मनाया जाने लगा॥ १९ ॥

महर्षि गौतमके अधीन रहनेवाली अहल्या अपनी तपःशक्तिसे विशुद्ध स्वरूपको प्राप्त हुईं—यह देख सम्पूर्ण देवता उन्हें साधुवाद देते हुए उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे॥ २० ॥

महातेजस्वी, महातपस्वी गौतम भी अहल्याको अपने साथ पाकर सुखी हो गये। उन्होंने श्रीरामकी विधिवत् पूजा करके तपस्या आरम्भ की॥ २१ ॥

महामुनि गौतमकी ओरसे विधिपूर्वक उत्तम पूजा— आदर-सत्कार पाकर श्रीराम भी मुनिवर विश्वामित्रजीके साथ मिथिलापुरीको चले गये॥ २२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें उनचासवाँ सर्ग पूरा
हुआ॥ ४९॥