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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

तिरपनवाँ सर्ग

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तिरपनवाँ सर्ग

कामधेनुकी सहायतासे उत्तम अन्न-पानद्वारा सेनासहित तृप्त हुए विश्वामित्रका वसिष्ठसे उनकी कामधेनुको माँगना और उनका देनेसे अस्वीकार करना

‘शत्रुसूदन! महर्षि वसिष्ठके ऐसा कहनेपर चितकबरे रंगकी उस कामधेनुने जिसकी जैसी इच्छा थी, उसके लिये वैसी ही सामग्री जुटा दी॥ १ ॥

‘ईख, मधु, लावा, मैरेय, श्रेष्ठ आसव, पानक रस आदि नाना प्रकारके बहुमूल्य भक्ष्य-पदार्थ प्रस्तुत कर दिये॥ २ ॥

‘गरम-गरम भातके पर्वतके सदृश ढेर लग गये। मिष्ठान्न (खीर) और दाल भी तैयार हो गयी। दूध, दही और घीकी तो नहरें बह चलीं॥ ३ ॥

‘भाँति-भाँतिके सुस्वादु रस, खाण्डव तथा नाना प्रकारके भोजनोंसे भरी हुईं चाँदीकी सहस्रों थालियाँ सज गयीं॥ ४ ॥

‘श्रीराम! महर्षि वसिष्ठने विश्वामित्रजीकी सारी सेनाके लोगोंको भलीभाँति तृप्त किया। उस सेनामें बहुत-से हृष्ट-पुष्ट सैनिक थे। उन सबको वह दिव्य भोजन पाकर बड़ा संतोष हुआ॥ ५ ॥

‘राजर्षि विश्वामित्र भी उस समय अन्तःपुरकी रानियों, ब्राह्मणों और पुरोहितोंके साथ बहुत ही हृष्ट-पुष्ट हो गये॥ ६ ॥

‘अमात्य, मन्त्री और भृत्योंसहित पूजित हो वे बहुत प्रसन्न हुए और वसिष्ठजीसे इस प्रकार बोले— ‘ब्रह्मन्! आप स्वयं मेरे पूजनीय हैं तो भी आपने मेरा पूजन किया, भलीभाँति स्वागत-सत्कार किया। बातचीत करनेमें कुशल महर्षे! अब मैं एक बात कहता हूँ, उसे सुनिये॥ ८ ॥

‘भगवन्! आप मुझसे एक लाख गौएँ लेकर यह चितकबरी गाय मुझे दे दीजिये; क्योंकि यह गौ रत्नरूप है और रत्न लेनेका अधिकारी राजा होता है। ब्रह्मन्! मेरे इस कथनपर ध्यान देकर मुझे यह शबला गौ दे दीजिये; क्योंकि यह धर्मतः मेरी ही वस्तु है’॥ ९ १/२ ॥

‘विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा मुनिवर भगवान् वसिष्ठ राजाको उत्तर देते हुए बोले—॥ १० १/२ ॥

‘शत्रुओंका दमन करनेवाले नरेश्वर! मैं एक लाख या सौ करोड़ अथवा चाँदीके ढेर लेकर भी बदलेमें इस शबला गौको नहीं दूँगा। यह मेरे पाससे अलग होने योग्य नहीं है॥ १२॥

‘जैसे मनस्वी पुरुषकी अक्षय कीर्ति कभी उससे अलग नहीं रह सकती, उसी प्रकार यह सदा मेरे साथ सम्बन्ध रखनेवाली शबला गौ मुझसे पृथक् नहीं रह सकती। मेरा हव्य-कव्य और जीवन-निर्वाह इसीपर निर्भर है॥ १३॥

‘मेरे अग्निहोत्र, बलि, होम, स्वाहा, वषट्कार और भाँति-भाँतिकी विद्याएँ इस कामधेनुके ही अधीन हैं॥ १४॥

‘राजर्षे! मेरा यह सब कुछ इस गौके ही अधीन है, इसमें संशय नहीं है। मैं सच कहता हूँ—यह गौ ही मेरा सर्वस्व है और यही मुझे सब प्रकारसे संतुष्ट करनेवाली है। राजन्! बहुत-से ऐसे कारण हैं, जिनसे बाध्य होकर मैं यह शबला गौ आपको नहीं दे सकता’॥ १५ १/२॥

‘वसिष्ठजीके ऐसा कहनेपर बोलनेमें कुशल विश्वामित्र अत्यन्त क्रोधपूर्वक इस प्रकार बोले—॥ १६ १/२॥

‘मुने! मैं आपको चौदह हजार ऐसे हाथी दे रहा हूँ, जिनके कसनेवाले रस्से, गलेके आभूषण और अंकुश भी सोनेके बने होंगे और उन सबसे वे हाथी विभूषित होंगे॥ १७ १/२॥

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वर! इनके सिवा मैं आठ सौ सुवर्णमय रथ प्रदान करूँगा; जिनमें शोभाके लिये सोनेके घुँघुरु लगे होंगे और हर एक रथमें चारचार सफेद रंगके घोड़े जुते हुए होंगे तथा अच्छी जाति और उत्तम देशमें उत्पन्न महातेजस्वी ग्यारह हजार घोड़े भी आपकी सेवामें अर्पित करूँगा। इतना ही नहीं, नाना प्रकारके रंगवाली नयी अवस्थाकी एक करोड़ गौएँ भी दूँगा, परंतु यह शबला गौ मुझे दे दीजिये॥ १८—२०॥

‘द्विजश्रेष्ठ! इनके अतिरिक्त भी आप जितने रत्न या सुवर्ण लेना चाहें, वह सब आपको देनेके लिये मैं तैयार हूँ; किंतु यह चितकबरी गाय मुझे दे दीजिये’॥ २१॥

‘बुद्धिमान् विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर भगवान् वसिष्ठ बोले—‘राजन्! मैं यह चितकबरी गाय तुम्हें किसी तरह भी नहीं दूँगा॥ २२॥

‘यही मेरा रत्न है, यही मेरा धन है, यही मेरा सर्वस्व है और यही मेरा जीवन है॥ २३॥

‘राजन्! मेरे दर्श, पौर्णमास, प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञ तथा भाँति-भाँतिके पुण्यकर्म—यह गौ ही है। इसीपर ही मेरा सब कुछ निर्भर है॥ २४॥

‘नरेश्वर! मेरे सारे शुभ कर्मोंका मूल यही है, इसमें संशय नहीं है। बहुत व्यर्थ बात करनेसे क्या लाभ। मैं इस कामधेनुको कदापि नहीं दूँगा’॥ २५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५३॥