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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

इकहत्तरवाँ सर्ग

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इकहत्तरवाँ सर्ग

शत्रुघ्नका थोड़े-से सैनिकोंके साथ अयोध्याको प्रस्थान, मार्गमें वाल्मीकिके आश्रममें रामचरितका गान सुनकर उन सबका आश्चर्यचकित होना

तदनन्तर बारहवें वर्षमें थोड़े-से सेवकों और सैनिकोंको साथ ले शत्रुघ्नने श्रीरामपालित अयोध्याको जानेका विचार किया॥ १ ॥

अतः अपने मुख्य-मुख्य मन्त्रियों तथा सेनापतियोंको लौटाकर—पुरीकी रक्षाके लिये वहीं छोड़कर वे अच्छे-अच्छे घोड़ेवाले सौ रथ साथ ले अयोध्याकी ओर चल पड़े॥ २ ॥

महायशस्वी रघुकुलनन्दन शत्रुघ्न यात्रा करनेके पश्चात् मार्गमें सात-आठ परिगणित स्थानोंपर पड़ाव डालते हुए वाल्मीकि मुनिके आश्रमपर जा पहुँचे और रातमें वहीं ठहरे॥ ३ ॥

उन पुरुषप्रवर रघुवीरने वाल्मीकिजीके चरणोंमें प्रणाम करके उनके हाथसे पाद्य और अर्घ्य आदि आतिथ्य-सत्कारकी सामग्री ग्रहण की॥ ४ ॥

वहाँ महर्षि वाल्मीकिने महात्मा शत्रुघ्नको सुनानेके लिये भाँति-भाँतिकी सहस्रों सुमधुर कथाएँ कहीं॥ ५ ॥

फिर वे लवणवधके विषयमें बोले—'लवणासुरको मारकर तुमने अत्यन्त दुष्कर कर्म किया है॥ ६ ॥

'सौम्य! महाबाहो! लवणासुरके साथ युद्ध करके बहुत-से महाबली भूपाल सेना और सवारियोंसहित मारे गये हैं॥ ७ ॥

'पुरुषश्रेष्ठ! वही पापी लवणासुर तुम्हारे द्वारा अनायास ही मार डाला गया। उसके कारण जगत्में जो भय छा गया था, वह तुम्हारे तेजसे शान्त हो गया॥ ८ ॥

'रावणका घोर वध महान् प्रयत्नसे किया गया था; परंतु यह महान् कर्म तुमने बिना यत्नके ही सिद्ध कर दिया॥ ९ ॥

'लवणासुरके मारे जानेसे देवताओंको बड़ी प्रसन्नता हुई है। तुमने समस्त प्राणियों और सारे जगत्का प्रिय कार्य किया है॥ १० ॥

'नरश्रेष्ठ! मैं इन्द्रकी सभामें बैठा था। जब वह विमानाकार सभा युद्ध देखनेके लिये आयी, तब वहीं बैठे-बैठे मैंने भी तुम्हारे और लवणके युद्धको भलीभाँति देखा था॥ ११ ॥

‘शत्रुघ्न! मेरे हृदयमें भी तुम्हारे लिये बड़ा प्रेम है। अतः मैं तुम्हारा मस्तक सँघूँगा। यही स्नेहकी पराकाष्ठा है’॥ १२ ॥

ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् वाल्मीकिने शत्रुघ्नका मस्तक सँघा और उनका तथा उनके साथियोंका आतिथ्य सत्कार किया॥ १३ ॥

नरश्रेष्ठ शत्रुघ्नने भोजन किया और उस समय श्रीरामचन्द्रजीके चरित्रका क्रमशः वर्णन सुना, जो गीतकी मधुरताके कारण बड़ा ही प्रिय एवं उत्तम जान पड़ता था॥ १४ ॥

उस वेलामें उन्हें जो रामचरित सुननेको मिला, वह पहले ही काव्यबद्ध कर लिया गया था। वह काव्यगान वीणाकी लयके साथ हो रहा था। हृदय, कण्ठ और मूर्धा—इन तीन स्थानोंमें मन्द्र, मध्यम और तार स्वरके भेदसे उच्चारित हो रहा था। संस्कृत भाषामें निर्मित होकर व्याकरण, छन्द, काव्य और संगीत-शास्त्रके लक्षणोंसे सम्पन्न था और गानोचित तालके साथ गाया गया था॥ १५ १/२ ॥

उस काव्यके सभी अक्षर एवं वाक्य सच्ची घटनाका प्रतिपादन करते थे और पहले जो वृत्तान्त घटित हो चुके थे, उनका यथार्थ परिचय दे रहे थे। वह अद्भुत काव्यगान सुनकर पुरुषसिंह शत्रुघ्न मूर्च्छित-से हो गये। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धारा बहने लगी॥ १६ १/२ ॥

वे दो घड़ीतक अचेत-से होकर बारम्बार लम्बी साँस खींचते रहे। उस गानमें उन्होंने बीती हुई बातोंको वर्तमानकी भाँति सुना॥ १७ १/२ ॥

राजा शत्रुघ्नके जो साथी थे, वे भी उस गीत-सम्पत्तिको सुनकर दीन और नतमस्तक हो बोले—‘यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है’॥ १८ १/२ ॥

शत्रुघ्नके जो सैनिक वहाँ मौजूद थे, वे परस्पर कहने लगे—‘यह क्या बात है? हमलोग कहाँ हैं? यह कोई स्वप्न तो नहीं देख रहे हैं। जिन बातोंको हम पहले देख चुके हैं, उन्हींको इस आश्रमपर ज्यों-की-त्यों सुन रहे हैं॥ १९-२० ॥

‘क्या इस उत्तम गीतबन्धको हमलोग स्वप्नमें सुन रहे हैं?’ फिर अत्यन्त विस्मयमें पड़कर वे शत्रुघ्नसे बोले—॥ २१ ॥

‘नरश्रेष्ठ! आप इस विषयमें मुनिवर वाल्मीकिजीसे भलीभाँति पूछें।’ शत्रुघ्नने कौतूहलमें भरे हुए उन सब सैनिकोंसे कहा—‘मुनिके इस आश्रममें ऐसी अनेक आश्चर्यजनक घटनाएँ होती रहती हैं। उनके विषयमें उनसे कुछ पूछताछ करना हमारे लिये उचित नहीं है॥ २२-२३ ॥

‘कौतूहलवश महामुनि वाल्मीकिसे इन बातोंके विषयमें जानना या पूछना उचित न होगा।’ अपने सैनिकोंसे ऐसा कहकर रघुकुलनन्दन शत्रुघ्न महर्षिको प्रणाम करके अपने खेमेमें चले गये॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें इकहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७१॥