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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पचासीवाँ सर्ग

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पचासीवाँ सर्ग

विभीषणके अनुरोधसे श्रीरामचन्द्रजीका लक्ष्मणको इन्द्रजित्के वधके लिये जानेकी आज्ञा देना और सेनासहित लक्ष्मणका निकुम्भिला-मन्दिरके पास पहुँचना

भगवान् श्रीराम शोकसे पीड़ित थे, अतः राक्षस विभीषणने जो कुछ कहा, उनकी उस बातको सुनकर भी वे उसे स्पष्टरूपसे समझ न सके—उसपर पूरा ध्यान न दे सके॥ १ ॥

तदनन्तर शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले श्रीराम धैर्य धारण करके हनुमान्जीके समीप बैठे हुए विभीषणसे बोले— ॥ २ ॥

‘राक्षसराज विभीषण! तुमने अभी-अभी जो बात कही है, उसे मैं फिर सुनना चाहता हूँ। बोलो, तुम क्या कहना चाहते हो?’॥ ३ ॥

श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर बातचीतमें कुशल विभीषणने, वह जो बात कही थी, उसे पुनः दोहराते हुए इस प्रकार कहा— ॥ ४ ॥

‘महाबाहो! आपने जो सेनाओंको यथास्थान स्थापित करनेकी आज्ञा दी थी, वीर! वह काम तो मैंने आपकी आज्ञा होते ही पूरा कर दिया॥ ५ ॥

‘उन सब सेनाओंको विभक्त करके सब ओरके दरवाजोंपर स्थापित किया और यथोचित रीतिसे वहाँ अलग-अलग यूथपतियोंको भी नियुक्त कर दिया है॥

‘महाराज! अब पुनः मुझे जो बात आपकी सेवामें निवेदन करनी है, उसे भी सुन लीजिये। बिना किसी कारणके आपके संतप्त होनेसे हमलोगोंके हृदयमें भी बड़ा संताप हो रहा है॥ ७ ॥

‘राजन्! मिथ्या प्राप्त हुए इस शोक और संतापको त्याग दीजिये; साथ ही इस चिन्ताको भी अपने मनसे निकाल दीजिये; क्योंकि यह शत्रुओंका हर्ष बढ़ानेवाली है॥ ८ ॥

‘वीर! यदि आप सीताको पाना और निशाचरोंका वध करना चाहते हैं तो उद्योग कीजिये; हर्ष और उत्साहका सहारा लीजिये॥ ९ ॥

‘रघुनन्दन! मैं एक आवश्यक बात बताता हूँ, मेरी इस हितकर बातको सुनिये। रावणकुमार इन्द्रजित् निकुम्भिला-मन्दिरकी ओर गया है, अतः ये सुमित्राकुमार लक्ष्मण विशाल सेना साथ लेकर अभी उसपर आक्रमण करें—युद्धमें उस रावणपुत्रका वध करनेके लिये उसपर चढ़ाई कर दें—यही अच्छा होगा॥ १० १/२ ॥

‘युद्धविजयी महाधनुर्धर लक्ष्मण अपने मण्डलाकार धनुषद्वारा छोड़े गये विषधर सर्पोंके तुल्य भयानक बाणोंसे रावणपुत्रका वध करनेमें समर्थ हैं॥ ११ १/२ ॥

‘उस वीरने तपस्या करके ब्रह्माजीके वरदानसे ब्रह्मशिर नामक अस्त्र और मनचाही गतिसे चलनेवाले घोड़े प्राप्त किये हैं॥ १२ ॥

‘निश्चय ही इस समय सेनाके साथ वह निकुम्भिलामें गया है। वहाँसे अपना हवन-कर्म समाप्त करके यदि वह उठेगा तो हम सब लोगोंको उसके हाथसे मरा ही समझिये॥ १३ ॥

‘महाबाहो! सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी ब्रह्माजीने उसे वरदान देते हुए कहा था—‘इन्द्रशत्रो! निकुम्भिला नामक वटवृक्षके पास पहुँचने तथा हवन-सम्बन्धी कार्य पूर्ण करनेके पहले ही जो शत्रु तुझ आततायी (शस्त्रधारी)-को मारनेके लिये आक्रमण करेगा, उसीके हाथसे तुम्हारा वध होगा।’ राजन्! इस प्रकार बुद्धिमान् इन्द्रजित्की मृत्युका विधान किया गया है॥ १४-१५ ॥

‘इसलिये श्रीराम! आप इन्द्रजित्का वध करनेके लिये महाबली लक्ष्मणको आज्ञा दीजिये। उसके मारे जानेपर रावणको अपने सुहृदोंसहित मरा ही समझिये’॥

विभीषणके वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी शोकका परित्याग करके बोले—‘सत्यपराक्रमी विभीषण! उस भयंकर राक्षसकी मायाको मैं जानता हूँ॥ १७ ॥

‘वह ब्रह्मास्त्रका ज्ञाता, बुद्धिमान्, बहुत बड़ा मायावी और महान् बलवान् है। वरुणसहित सम्पूर्ण देवताओंको भी वह युद्धमें अचेत कर सकता है॥ १८ ॥

‘महायशस्वी वीर! जब इन्द्रजित् रथसहित आकाशमें विचरने लगता है, उस समय बादलोंमें छिपे हुए सूर्यकी भाँति उसकी गतिका कुछ पता ही नहीं चलता।’ विभीषणसे ऐसा कहकर भगवान् श्रीरामने अपने शत्रु दुरात्मा इन्द्रजित्की मायाशक्तिको जानकर यशस्वी वीर लक्ष्मणसे यह बात कही—॥ १९-२० ॥

‘लक्ष्मण! वानरराज सुग्रीवकी जो भी सेना है, वह सब साथ ले हनुमान् आदि यूथपतियों, ऋक्षराज जाम्बवान् तथा अन्य सैनिकोंसे घिरे रहकर तुम मायाबलसे सम्पन्न राक्षसराजकुमार इन्द्रजित्का वध करो॥ २१-२२ ॥

‘ये महामना राक्षसराज विभीषण उसकी मायाओंसे अच्छी तरह परिचित हैं, अतः अपने मन्त्रियोंके साथ ये भी तुम्हारे पीछे-पीछे जायँगे’॥ २३ ॥

श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर विभीषण-सहित भयानक पराक्रमी लक्ष्मणने अपना श्रेष्ठ धनुष हाथमें लिया॥ २४ ॥

वे युद्धकी सब सामग्री लेकर तैयार हो गये। उन्होंने कवच धारण किया, तलवार बाँध ली और उत्तम बाण तथा बायें हाथमें धनुष ले लिये। तत्पश्चात् श्रीरामचन्द्रजीके चरण छूकर हर्षसे भरे हुए सुमित्राकुमारने कहा— ॥ २५ ॥

‘आर्य! आज मेरे धनुषसे छूटे हुए बाण रावणकुमारको विदीर्ण करके उसी तरह लङ्कामें गिरेंगे, जैसे हंस कमलोंसे भरे हुए सरोवरमें उतरते हैं॥ २६ ॥

‘इस विशाल धनुषसे छूटे हुए मेरे बाण आज ही उस भयंकर राक्षसके शरीरको विदीर्ण करके उसे कालके गालमें डाल देंगे’॥ २७ ॥

इन्द्रजित्के वधकी अभिलाषा रखनेवाले तेजस्वी लक्ष्मण अपने भाईके सामने ऐसी बात कहकर तुरंत वहाँसे चल दिये॥ २८ ॥

पहले उन्होंने अपने बड़े भाईके चरणोंमें प्रणाम किया, फिर उनकी परिक्रमा करके रावणकुमारद्वारा पालित निकुम्भिला-मन्दिरकी ओर प्रस्थान किया॥ २९ ॥

भाई श्रीरामद्वारा स्वस्तिवाचन किये जानेके पश्चात् विभीषणसहित प्रतापी राजकुमार लक्ष्मण बड़ी उतावलीके साथ चले॥ ३० ॥

कई हजार वानरवीरोंके साथ हनुमान् और मन्त्रियोंसहित विभीषण भी लक्ष्मणके पीछे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थित हुए॥ ३१ ॥

विशाल वानर-सेनासहित घिरे हुए लक्ष्मणने वेगपूर्वक आगे बढ़कर मार्गमें खड़ी हुई ऋक्षराज जाम्बवान्की सेनाको देखा॥ ३२ ॥

दूरतकका रास्ता तै कर लेनेपर मित्रोंको आनन्दित करनेवाले सुमित्राकुमारने कुछ दूरसे ही देखा, राक्षसराज रावणकी सेना मोर्चा बाँधे खड़ी है॥ ३३ ॥

शत्रुओंका दमन करनेवाले रघुकुलनन्दन लक्ष्मण हाथमें धनुष ले ब्रह्माजीके निश्चित किये हुए विधानके अनुसार उस मायावी राक्षसको जीतनेके लिये निकुम्भिला नामक स्थानमें पहुँचकर एक जगह खड़े हो गये॥ ३४ ॥

उस समय प्रतापी राजकुमार लक्ष्मणके साथ विभीषण, वीर अङ्गद तथा पवनकुमार हनुमान् भी थे॥

चमकीले अस्त्र-शस्त्रोंसे जो प्रकाशित हो रही थी, ध्वजों और महारथियोंके कारण गहन दिखायी देती थी, जिसके वेगका कोई माप नहीं था तथा जो अनेक प्रकारकी वेश-भूषामें दृष्टिगोचर होती थी, अन्धकारके समान काली उस शत्रुसेनामें विभीषण आदिके साथ लक्ष्मणने प्रवेश किया॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें पचासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८५ ॥