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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

साठवाँ सर्ग

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साठवाँ सर्ग

श्रीरामके दरबारमें च्यवन आदि ऋषियोंका शुभागमन, श्रीरामके द्वारा उनका सत्कार करके उनके अभीष्ट कार्यको पूर्ण करनेकी प्रतिज्ञा तथा ऋषियोंद्वारा उनकी प्रशंसा

श्रीराम और लक्ष्मण परस्पर इस प्रकार कथावार्ता करते हुए प्रतिदिन प्रजापालनके कार्यमें लगे रहते थे। एक समय वसन्त-ऋतुकी रात आयी, जो न अधिक सर्दी लानेवाली थी और न गर्मी॥ १ ॥

वह रात बीतनेपर जब निर्मल प्रभातकाल आया, तब पुरवासियोंके कार्योंको जाननेवाले श्रीरघुनाथजी पूर्वाह्णकालके नित्यकर्म—संध्या-वन्दन आदिसे निवृत्त हो बाहर निकलकर प्रजाजनोंके दृष्टिपथमें आये॥ २ ॥

उसी समय सुमन्त्रने आकर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा— 'राजन्! ये तपस्वी महर्षि भृगुपुत्र च्यवन मुनिको आगे करके द्वारपर खड़े हैं। द्वारपालोंने इनका भीतर आना रोक दिया है। महाराज! इन्हें आपके दर्शनकी जल्दी लगी हुई है और ये अपने आगमनकी सूचना देनेके लिये हमें बारंबार प्रेरित करते हैं॥ ३-४ ॥

'पुरुषसिंह! ये सब महर्षि यमुनाटटपर निवास करते हैं और आपसे विशेष प्रेम रखते हैं।' सुमन्त्रकी यह बात सुनकर धर्मज्ञ श्रीरामने कहा—'सूत! भार्गव, च्यवन आदि सभी महाभाग ब्रह्मर्षियोंको भीतर बुलाया जाय'॥ ५ १/२ ॥

राजाकी यह आज्ञा शिरोधार्य करके द्वारपालने मस्तकपर दोनों हाथ जोड़ लिये और उन अत्यन्त दुर्जय तेजस्वी तापसोंको वह राजभवनके भीतर ले आया॥ ६ १/२ ॥

उन तपस्वी महात्माओंकी संख्या सौसे अधिक थी। वे सब-के-सब अपने तेजसे प्रकाशित हो रहे थे। उन सबने राजभवनमें प्रवेश किया और समस्त तीर्थोंके जलसे भरे हुए घड़ोंके साथ बहुत-से फल-मूल लेकर श्रीरामचन्द्रजीको भेंट किये॥ ७-८ १/२ ॥

महाबाहु श्रीरामने बड़ी प्रसन्नताके साथ वह सारा उपहार—वे सारे तीर्थजल और नाना प्रकारके फल लेकर उन सभी महामुनियोंसे कहा— ॥ ९-१० ॥

'महात्माओ! ये उत्तमोत्तम आसन प्रस्तुत हैं। आपलोग यथायोग्य इन आसनोंपर बैठ जायँ।' श्रीरामचन्द्रजीका यह वचन सुनकर वे सभी महर्षि रुचिर शोभासे सम्पन्न उन सुवर्णमय

आसनोंपर बैठे॥ ११ १/२ ॥

उन महर्षियोंको वहाँ आसनोंपर विराजमान देख शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले श्रीरघुनाथजीने हाथ जोड़ संयतभावसे कहा— ॥ १२ ॥

‘महर्षियो! किस कामसे यहाँ आपलोगोंका शुभागमन हुआ है! मैं एकाग्रचित्त होकर आपकी क्या सेवा करूँ? यह सेवक आपकी आज्ञा पानेके योग्य है। आदेश मिलनेपर मैं बड़े सुखसे आपकी सभी इच्छाओंको पूर्ण कर सकता हूँ॥ १३ ॥

‘यह सारा राज्य, इस हृदयकमलमें विराजमान यह जीवात्मा तथा यह मेरा सारा वैभव ब्राह्मणोंकी सेवाके लिये ही है, मैं आपके समक्ष यह सच्ची बात कहता हूँ’॥ १४ ॥

श्रीरघुनाथजीके ये वचन सुनकर उन यमुनातीरनिवास ◌ी उग्र तपस्वी महर्षियोंने उच्च स्वरसे उन्हें साधुवाद दिया॥ १५ ॥

फिर वे महात्मा बड़े हर्षके साथ बोले— ‘नरश्रेष्ठ! इस भूमण्डलमें ऐसी बातें आपके ही योग्य हैं। दूसरे किसीके मुखसे इस तरहकी बात नहीं निकलती॥ १६ ॥

‘राजन्! हम बहुत-से महाबली राजाओंके पास गये; परंतु उन्होंने कार्यके गौरवको समझकर उसे सुननेके बाद भी ‘करूँगा’ ऐसी प्रतिज्ञा करनेकी रुचि नहीं दिखायी॥ १७ ॥

‘परंतु आपने हमारे आनेका कारण जाने बिना ही केवल ब्राह्मणोंके प्रति आदरका भाव होनेसे हमारा काम करनेकी प्रतिज्ञा कर डाली है; इसलिये आप अवश्य यह काम कर सकेंगे, इसमें संशय नहीं है। आप ही महान् भयसे ऋषियोंको बचा सकेंगे’॥ १८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें साठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥

६०॥