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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

बत्तीसवाँ सर्ग

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बत्तीसवाँ सर्ग

ब्रह्मपुत्र कुशके चार पुत्रोंका वर्णन, शोणभद्र-तटवर्ती प्रदेशको वसुकी भूमि बताना, कुशनाभकी सौ कन्याओंका वायुके कोपसे ‘कुब्जा’ होना

(विश्वामित्रजी कहते हैं—) श्रीराम! पूर्वकालमें कुश नामसे प्रसिद्ध एक महातपस्वी राजा हो गये हैं। वे साक्षात् ब्रह्माजीके पुत्र थे। उनका प्रत्येक व्रत एवं संकल्प बिना किसी क्लेश या कठिनाईके ही पूर्ण होता था। वे धर्मके ज्ञाता, सत्पुरुषोंका आदर करनेवाले और महान् थे॥ १ ॥

उत्तम कुलमें उत्पन्न विदर्भदेशकी राजकुमारी उनकी पत्नी थी। उसके गर्भसे उन महात्मा नरेशने चार पुत्र उत्पन्न किये, जो उन्हींके समान थे॥ २ ॥

उनके नाम इस प्रकार हैं—कुशाम्ब, कुशनाभ, अमूर्तरजस^१ तथा वसु। ये सब-के-सब तेजस्वी तथा महान् उत्साही थे। राजा कुशने ‘प्रजारक्षणरूप’ क्षत्रियधर्मके पालनकी इच्छासे अपने उन धर्मिष्ठ तथा सत्यवादी पुत्रोंसे कहा—‘पुत्रो! प्रजाका पालन करो, इससे तुम्हें धर्मका पूरा-पूरा फल प्राप्त होगा’॥ ३-४ ॥

अपने पिता महाराज कुशकी यह बात सुनकर उन चारों लोकशिरोमणि नरश्रेष्ठ राजकुमारोंने उस समय अपने-अपने लिये पृथक्-पृथक् नगर निर्माण कराया॥ ५ ॥

महातेजस्वी कुशाम्बने ‘कौशाम्बी’ पुरी बसायी (जिसे आजकल ‘कोसम’ कहते हैं)। धर्मात्मा कुशनाभने ‘महोदय’ नामक नगरका निर्माण कराया॥ ६ ॥

परम बुद्धिमान् अमूर्तरजसने ‘धर्मारण्य’ नामक एक श्रेष्ठ नगर बसाया तथा राजा वसुने ‘गिरिव्रज’ नगरकी स्थापना की॥ ७ ॥

महात्मा वसुकी यह ‘गिरिव्रज’ नामक राजधानी वसुमतीके नामसे प्रसिद्ध हुई। इसके चारों ओर ये पाँच श्रेष्ठ पर्वत सुशोभित होते हैं^२॥ ८ ॥

यह रमणीय (सोन) नदी दक्षिण-पश्चिमकी ओरसे बहती हुई मगध देशमें आयी है, इसलिये यहाँ ‘सुमागधी’ नामसे विख्यात हुई है। यह इन पाँच श्रेष्ठ पर्वतोंके बीचमें मालाकी भाँति सुशोभित हो रही है॥ ९ ॥

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श्रीराम! इस प्रकार ‘मागधी’ नामसे प्रसिद्ध हुई यह सोन नदी पूर्वोक्त महात्मा वसुसे सम्बन्ध रखती है। रघुनन्दन! यह दक्षिण-पश्चिमसे आकर पूर्वोत्तर दिशाकी ओर प्रवाहित हुई है। इसके दोनों तटोंपर सुन्दर क्षेत्र (उपजाऊ खेत) हैं, अतः यह सदा सस्य-मालाओंसे अलंकृत (हरी-भरी खेतीसे सुशोभित) रहती है॥ १० ॥

रघुकुलको आनन्दित करनेवाले श्रीराम! धर्मात्मा राजर्षि कुशनाभने घृताची अप्सराके गर्भसे परम उत्तम सौ कन्याओंको जन्म दिया॥ ११ ॥

वे सब-की-सब सुन्दर रूप-लावण्यसे सुशोभित थीं। धीरे-धीरे युवावस्थाने आकर उनके सौन्दर्यको और भी बढ़ा दिया। रघुवीर! एक दिन वस्त्र और आभूषणोंसे विभूषित हो वे सभी राजकन्याएँ उद्यान-भूमिमें आकर वर्षार्ऋतुमें प्रकाशित होनेवाली विद्युन्मालाओंकी भाँति शोभा पाने लगीं। सुन्दर अलंकारोंसे अलंकृत हुई वे अंगनाएँ गाती, बजाती और नृत्य करती हुई वहाँ परम आमोद-प्रमोदमें मग्न हो गयीं॥ १२-१३ ॥

उनके सभी अंग बड़े मनोहर थे। इस भूतलपर उनके रूप-सौन्दर्यकी कहीं भी तुलना नहीं थी। उस उद्यानमें आकर वे बादलोंके ओटमें कुछ-कुछ छिपी हुई तारिकाओंके समान शोभा पा रही थीं॥ १४ ॥

उस समय उत्तम गुणोंसे सम्पन्न तथा रूप और यौवनसे सुशोभित उन सब राजकन्याओंको देखकर सर्वस्वरूप वायु देवताने उनसे इस प्रकार कहा— ॥

‘सुन्दरियो! मैं तुम सबको अपनी प्रेयसीके रूपमें प्राप्त करना चाहता हूँ। तुम सब मेरी भार्याएँ बनोगी। अब मनुष्यभावका त्याग करो और मुझे अंगीकार करके देवांगनाओंकी भाँति दीर्घ आयु प्राप्त कर लो॥

‘विशेषतः मानव-शरीरमें जवानी कभी स्थिर नहीं रहती—प्रतिक्षण क्षीण होती जाती है। मेरे साथ सम्बन्ध हो जानेपर तुमलोग अक्षय यौवन प्राप्त करके अमर हो जाओगी’॥ १७ ॥

अनायास ही महान् कर्म करनेवाले वायुदेवका यह कथन सुनकर वे सौ कन्याएँ अवहेलनापूर्वक हँसकर बोलीं— ॥ १८ ॥

‘सुरश्रेष्ठ! आप प्राणवायुके रूपमें समस्त प्राणियोंके भीतर विचरते हैं (अतः सबके मनकी बातें जानते हैं; आपको यह मालूम होगा कि हमारे मनमें आपके प्रति कोई आकर्षण नहीं है)। हम सब बहिनें आपके अनुपम प्रभावको भी जानती हैं (तो भी हमारा आपके प्रति अनुराग नहीं है); ऐसी दशामें यह अनुचित प्रस्ताव करके आप हमारा अपमान किसलिये कर रहे हैं?॥ १९ ॥

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‘देव! देवशिरोमणे! हम सब-की-सब राजर्षि कुशनाभकी कन्याएँ हैं। देवता होनेपर भी आपको शाप देकर वायुपदसे भ्रष्ट कर सकती हैं, किंतु ऐसा करना नहीं चाहतीं; क्योंकि हम अपने तपको सुरक्षित रखती हैं॥ २० ॥

‘दुर्मते! वह समय कभी न आवे, जब कि हम अपने सत्यवादी पिताकी अवहेलना करके कामवश या अत्यन्त अधर्मपूर्वक स्वयं ही वर ढूँढ़ने लगें॥ २१ ॥

‘हमलोगोंपर हमारे पिताजीका प्रभुत्व है, वे हमारे लिये सर्वश्रेष्ठ देवता हैं। पिताजी हमें जिसके हाथमें दे देंगे, वही हमारा पति होगा’॥ २२ ॥

उनकी यह बात सुनकर वायुदेव अत्यन्त कुपित हो उठे। उन ऐश्वर्यशाली प्रभुने उनके भीतर प्रविष्ट हो सब अंगोंको मोड़कर टेढ़ा कर दिया। शरीर मुड़ जानेके कारण वे कुबड़ी हो गयीं। उनकी आकृति मुट्ठी बँधे हुए एक हाथके बराबर हो गयी। वे भयसे व्याकुल हो उठीं॥ २३ १/२ ॥

वायुदेवके द्वारा कुबड़ी की हुईं उन कन्याओंने राजभवनमें प्रवेश किया। प्रवेश करके वे लज्जित और उद्विग्न हो गयीं। उनके नेत्रोंसे आँसुओंकी धाराएँ बहने लगीं॥ २४ ॥

अपनी परम सुन्दरी प्यारी पुत्रियोंको कुब्जताके कारण अत्यन्त दयनीय दशामें पड़ी देख राजा कुशनाभ घबरा गये और इस प्रकार बोले— ॥ २५ ॥

‘पुत्रियो! यह क्या हुआ? बताओ। कौन प्राणी धर्मकी अवहेलना करता है? किसने तुम्हें कुबड़ी बना दिया, जिससे तुम तड़प रही हो, किंतु कुछ बताती नहीं हो।’ यों कहकर राजाने लंबी साँस खींची और उनका उत्तर सुननेके लिये वे सावधान होकर बैठ गये॥ २६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें बत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३२॥


१. रामायणशिरोमणि नामक व्याख्याके निर्माताने ‘अमूर्तरजसम्’ पाठ माना है। महाभारतके अनुसार इनका नाम ‘अमूर्तर्यस्’ या ‘अमूर्तर्या’ था (वन० ९५। १७)। यहाँ इनके द्वारा धर्मारण्य नामक नगर बसानेका उल्लेख है। यह नगर धर्मारण्य नामक तीर्थभूत वनमें था। यह वन गयाके आस-पासका ही प्रदेश है। अमूर्तर्याके पुत्र गयने ही गया नामक नगर बसाया था। अतः धर्मारण्य और गयाकी एकता सिद्ध होती है। महाभारत वनपर्व (८४। ८५) में गयाके ब्रह्मसरोवरको धर्मारण्यसे सुशोभित बताया गया है। (वन० ८२। ४७) धर्मारण्यमें पितृ-पूजनकी महत्ता बतायी गयी है।
२. महाभारत सभापर्व (२१। १—१०) में इन पाँचों पर्वतोंके नाम इस प्रकार वर्णित हैं—(१) विपुल, (२) वराह, (३) वृषभ (ऋषभ), (४) ऋषिगिरि (मातङ्ग) तथा (५) चैत्यक।

तैंतीसवाँ सर्ग

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तैंतीसवाँ सर्ग

राजा कुशनाभद्वारा कन्याओंके धैर्य एवं क्षमाशीलताकी प्रशंसा, ब्रह्मदत्तकी उत्पत्ति तथा उनके साथ कुशनाभकी कन्याओंका विवाह

बुद्धिमान् महाराज कुशनाभका वह वचन सुनकर उन सौ कन्याओंने पिताके चरणोंमें सिर रखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

राजन्! सर्वत्र संचार करनेवाले वायुदेव अशुभ मार्गका अवलम्बन करके हमपर बलात्कार करना चाहते थे। धर्मपर उनकी दृष्टि नहीं थी॥ २ ॥

हमने उनसे कहा—‘देव! आपका कल्याण हो, हमारे पिता विद्यमान हैं; हम स्वच्छन्द नहीं हैं। आप पिताजीके पास जाकर हमारा वरण कीजिये। यदि वे हमें आपको सौंप देंगे तो हम आपकी हो जायेंगी’॥ ३ ॥

परंतु उनका मन तो पापसे बँधा हुआ था। उन्होंने हमारी बात नहीं मानी। हम सब बहिनें ये ही धर्मसंगत बातें कह रही थीं, तो भी उन्होंने हमें गहरी चोट पहुँचायी—बिना अपराधके ही हमें पीड़ा दी॥ ४ ॥

उनकी बात सुनकर परम धर्मात्मा महातेजस्वी राजाने उन अपनी परम उत्तम सौ कन्याओंको इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ ५ ॥

‘पुत्रियो! क्षमाशील महापुरुष ही जिसे कर सकते हैं, वही क्षमा तुमने भी की है। यह तुमलोगोंके द्वारा महान् कार्य सम्पन्न हुआ है। तुम सबने एकमत होकर जो मेरे कुलकी मर्यादापर ही दृष्टि रखी है—कामभावको अपने मनमें स्थान नहीं दिया है—यह भी तुमने बहुत बड़ा काम किया है॥ ६ ॥

‘स्त्री हो या पुरुष, उसके लिये क्षमा ही आभूषण है। पुत्रियो! तुम सब लोगोंमें समानरूपसे जैसी क्षमा या सहिष्णुता है, वह विशेषतः देवताओंके लिये भी दुष्कर ही है॥ ७ १/२ ॥

‘पुत्रियो! क्षमा दान है, क्षमा सत्य है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा यश है और क्षमा धर्म है, क्षमापर भी यह सम्पूर्ण जगत् टिका हुआ है’॥ ८ १/२ ॥

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ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम! देवतुल्य पराक्रमी राजा कुशनाभने कन्याओंसे ऐसा कहकर उन्हें अन्तःपुरमें जानेकी आज्ञा दे दी और मन्त्रणाके तत्त्वको जाननेवाले उन नरेशने स्वयं मन्त्रियोंके साथ बैठकर कन्याओंके विवाहके विषयमें विचार आरम्भ किया। विचारणीय विषय यह था कि ‘किस देशमें किस समय और किस सुयोग्य वरके साथ उनका विवाह किया जाय?’॥ ९-१० ॥

उन्हीं दिनों चूली नामसे प्रसिद्ध एक महातेजस्वी, सदाचारी एवं ऊर्ध्वरेता (नैष्ठिक ब्रह्मचारी) मुनि वेदोक्त तपका अनुष्ठान कर रहे थे (अथवा ब्रह्मचिन्तनरूप तपस्यामें संलग्न थे)॥ ११ ॥

श्रीराम! तुम्हारा भला हो, उस समय एक गन्धर्वकुमारी वहाँ रहकर उन तपस्वी मुनिकी उपासना (अनुग्रहकी इच्छासे सेवा) करती थी। उसका नाम था सोमदा। वह ऊर्मिलाकी पुत्री थी॥ १२ ॥

वह प्रतिदिन मुनिको प्रणाम करके उनकी सेवामें लगी रहती थी तथा धर्ममें स्थित रहकर समय-समयपर सेवाके लिये उपस्थित होती थी; इससे उसके ऊपर वे गौरवशाली मुनि बहुत संतुष्ट हुए॥ १३ ॥

रघुनन्दन! शुभ समय आनेपर चूलीने उस गन्धर्वकन्यासे कहा— ‘शुभे! तुम्हारा कल्याण हो, मैं तुमपर बहुत संतुष्ट हूँ। बोलो, तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य सिद्ध करूँ’॥ १४ ॥

मुनिको संतुष्ट जानकर गन्धर्व-कन्या बहुत प्रसन्न हुई। वह बोलनेकी कला जानती थी; उसने वाणीके मर्मज्ञ मुनिसे मधुर स्वरमें इस प्रकार कहा— ॥ १५ ॥

‘महर्षे! आप ब्राह्मी सम्पत्ति (ब्रह्मतेज) से सम्पन्न होकर ब्रह्मस्वरूप हो गये हैं, अतएव आप महान् तपस्वी हैं। मैं आपसे ब्राह्म तप (ब्रह्म-ज्ञान एवं वेदोक्त तप) से युक्त धर्मात्मा पुत्र प्राप्त करना चाहती हूँ॥ १६ ॥

‘मुने! आपका भला हो। मेरे कोई पति नहीं है। मैं न तो किसीकी पत्नी हुई हूँ और न आगे होऊँगी। आपकी सेवामें आयी हूँ; आप अपने ब्राह्म बल (तपःशक्ति) से मुझे पुत्र प्रदान करें’॥ १७ ॥

उस गन्धर्वकन्याकी सेवासे संतुष्ट हुए ब्रह्मर्षि चूलीने उसे परम उत्तम ब्राह्म तपसे सम्पन्न पुत्र प्रदान किया। वह उनके मानसिक संकल्पसे प्रकट हुआ मानस पुत्र था। उसका नाम ‘ब्रह्मदत्त’ हुआ॥ १८ ॥

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(कुशनाभके यहाँ जब कन्याओंके विवाहका विचार चल रहा था) उस समय राजा ब्रह्मदत्त उत्तम लक्ष्मीसे सम्पन्न हो 'काम्पिल्या' नामक नगरीमें उसी तरह निवास करते थे, जैसे स्वर्गकी अमरावतीपुरीमें देवराज इन्द्र॥ १९॥

ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! तब परम धर्मात्मा राजा कुशनाभने ब्रह्मदत्तके साथ अपनी सौ कन्याओंको ब्याह देनेका निश्चय किया॥ २०॥

महातेजस्वी भूपाल राजा कुशनाभने ब्रह्मदत्तको बुलाकर अत्यन्त प्रसन्न चित्तसे उन्हें अपनी सौ कन्याएँ सौंप दीं॥ २१॥

रघुनन्दन! उस समय देवराज इन्द्रके समान तेजस्वी पृथ्वीपति ब्रह्मदत्तने क्रमशः उन सभी कन्याओंका पाणिग्रहण किया॥ २२॥

विवाहकालमें उन कन्याओंके हाथोंका ब्रह्मदत्तके हाथसे स्पर्श होते ही वे सब-की-सब कन्याएँ कुब्जत्वदोषसे रहित, नीरोग तथा उत्तम शोभासे सम्पन्न प्रतीत होने लगीं॥ २३॥

वातरोगके रूपमें आये हुए वायुदेवने उन कन्याओंको छोड़ दिया—यह देख पृथ्वीपति राजा कुशनाभ बड़े प्रसन्न हुए और बारम्बार हर्षका अनुभव करने लगे॥ २४॥

भूपाल राजा ब्रह्मदत्तका विवाह-कार्य सम्पन्न हो जानेपर महाराज कुशनाभने उन्हें पत्नियों तथा पुरोहितोंसहित आदरपूर्वक विदा किया॥ २५॥

गन्धर्वी सोमदाने अपने पुत्रको तथा उसके योग्य विवाह-सम्बन्धको देखकर अपनी उन पुत्रवधुओंका यथोचितरूपसे अभिनन्दन किया। उसने एक-एक करके उन सभी राजकन्याओंको हृदयसे लगाया और महाराज कुशनाभकी सराहना करके वहाँसे प्रस्थान किया॥ २६॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें तैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३३॥

चौंतीसवाँ सर्ग

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चौंतीसवाँ सर्ग

गाधिकी उत्पत्ति, कौशिकीकी प्रशंसा, विश्वामित्रजीका कथा बंद करके आधी रातका वर्णन करते हुए सबको सोनेकी आज्ञा देकर शयन करना

रघुनन्दन! विवाह करके जब राजा ब्रह्मदत्त चले गये, तब पुत्रहीन महाराज कुशनाभने श्रेष्ठ पुत्रकी प्राप्तिके लिये पुत्रेष्टि यज्ञका अनुष्ठान किया॥ १ ॥

उस यज्ञके होते समय परम उदार ब्रह्मकुमार महाराज कुशने भूपाल कुशनाभसे कहा— ॥ २ ॥

‘बेटा! तुम्हें अपने समान ही परम धर्मात्मा पुत्र प्राप्त होगा। तुम ‘गाधि’ नामक पुत्र प्राप्त करोगे और उसके द्वारा तुम्हें संसारमें अक्षय कीर्ति उपलब्ध होगी’॥ ३ ॥

श्रीराम! पृथ्वीपति कुशनाभसे ऐसा कहकर राजर्षि कुश आकाशमें प्रविष्ट हो सनातन ब्रह्मलोकको चले गये॥ ४ ॥

कुछ कालके पश्चात् बुद्धिमान् राजा कुशनाभके यहाँ परम धर्मात्मा ‘गाधि’ नामक पुत्रका जन्म हुआ॥ ५ ॥

ककुत्स्थकुलभूषण रघुनन्दन! वे परम धर्मात्मा राजा गाधि मेरे पिता थे। मैं कुशके कुलमें उत्पन्न होनेके कारण ‘कौशिक’ कहलाता हूँ॥ ६ ॥

राघव! मेरे एक ज्येष्ठ बहिन भी थी, जो उत्तम व्रतका पालन करनेवाली थी। उसका नाम सत्यवती था। वह ऋचीक मुनिको ब्याही गयी थी॥ ७ ॥

अपने पतिका अनुसरण करनेवाली सत्यवती शरीरसहित स्वर्गलोकको चली गयी थी। वही परम उदार महानदी कौशिकीके रूपमें भी प्रकट होकर इस भूतलपर प्रवाहित होती है॥ ८ ॥

मेरी वह बहिन जगत्के हितके लिये हिमालयका आश्रय लेकर नदीरूपमें प्रवाहित हुई है। वह पुण्यसलिला दिव्य नदी बड़ी रमणीय है॥ ९ ॥

रघुनन्दन! मेरा अपनी बहिन कौशिकीके प्रति बहुत स्नेह है; अतः मैं हिमालयके निकट उसीके तटपर नियमपूर्वक बड़े सुखसे निवास करता हूँ॥ १० ॥

पुण्यमयी सत्यवती सत्य धर्ममें प्रतिष्ठित है। वह परम सौभाग्यशालिनी पतिव्रता देवी यहाँ सरिताओंमें श्रेष्ठ कौशिकीके रूपमें विद्यमान है॥ ११ ॥

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श्रीराम! मैं यज्ञसम्बन्धी नियमकी सिद्धिके लिये ही अपनी बहिनका सांनिध्य छोड़कर सिद्धाश्रम (बक्सर) में आया था। अब तुम्हारे तेजसे मुझे वह सिद्धि प्राप्त हो गयी है॥ १२ ॥

महाबाहु श्रीराम! तुमने मुझसे जो पूछा था, उसके उत्तरमें मैंने तुम्हें शोणभद्रतटवर्ती देशका परिचय देते हुए यह अपनी तथा अपने कुलकी उत्पत्ति बतायी है॥ १३ ॥

काकुत्स्थ! मेरे कथा कहते-कहते आधी रात बीत गयी। अब थोड़ी देर नींद ले लो। तुम्हारा कल्याण हो। मैं चाहता हूँ कि अधिक जागरणके कारण हमारी यात्रामें विघ्न न पड़े॥ १४ ॥

सारे वृक्ष निष्कम्प जान पड़ते हैं—इनका एक पत्ता भी नहीं हिलता है। पशु-पक्षी अपने-अपने वासस्थानमें छिपकर बसेरे लेते हैं। रघुनन्दन! रात्रिके अन्धकारसे सम्पूर्ण दिशाएँ व्याप्त हो रही हैं॥ १५ ॥

धीरे-धीरे संध्या दूर चली गयी। नक्षत्रों तथा ताराओंसे भरा हुआ आकाश (सहस्राक्ष इन्द्रकी भाँति) सहस्रों ज्योतिर्मय नेत्रोंसे व्याप्त-सा होकर प्रकाशित हो रहा है॥ १६ ॥

सम्पूर्ण लोकका अन्धकार दूर करनेवाले शीतरश्मि चन्द्रमा अपनी प्रभासे जगत्के प्राणियोंके मनको आह्लाद प्रदान करते हुए उदित हो रहे हैं*॥ १७ ॥

रातमें विचरनेवाले समस्त प्राणी—यक्ष-राक्षसोंके समुदाय तथा भयंकर पिशाच इधर-उधर विचर रहे हैं॥ १८ ॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी महामुनि विश्वामित्र चुप हो गये। उस समय सभी मुनियोंने साधुवाद देकर विश्वामित्रजीकी भूरि-भूरि प्रशंसा की— ॥ १९ ॥

‘कुशपुत्रोंका यह वंश सदा ही महान् धर्मपरायण रहा है। कुशवंशी महात्मा श्रेष्ठ मानव ब्रह्माजीके समान तेजस्वी हुए हैं॥ २० ॥

‘महायशस्वी विश्वामित्रजी! अपने वंशमें सबसे बड़े महात्मा आप ही हैं तथा सरिताओंमें श्रेष्ठ कौशिकी भी आपके कुलकी कीर्तिको प्रकाशित करनेवाली है’॥

इस प्रकार आनन्दमग्न हुए उन मुनिवरोंद्वारा प्रशंसित श्रीमान् कौशिक मुनि अस्त हुए सूर्यकी भाँति नींद लेने लगे॥ २२ ॥

वह कथा सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीरामको भी कुछ विस्मय हो आया। वे भी मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रकी सराहना करके नींद लेने लगे॥ २३ ॥

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इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें चौंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३४॥


* इस वर्णनसे जान पड़ता है कि उस रात्रिको कृष्णपक्षकी नवमी तिथि थी।

पैंतीसवाँ सर्ग

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पैंतीसवाँ सर्ग

शोणभद्र पार करके विश्वामित्र आदिका गंगाजीके तटपर पहुँचकर वहाँ रात्रिवास करना तथा श्रीरामके पूछनेपर विश्वामित्रजीका उन्हें गंगाजीकी उत्पत्तिकी कथा सुनाना

महर्षियोंसहित विश्वामित्रने रात्रिके शेषभागमें शोणभद्रके तटपर शयन किया। जब रात बीती और प्रभात हुआ, तब वे श्रीरामचन्द्रजीसे इस प्रकार बोले— ॥ १ ॥

‘श्रीराम! रात बीत गयी। सबेरा हो गया। तुम्हारा कल्याण हो, उठो, उठो और चलनेकी तैयारी करो’॥ २ ॥

मुनिकी बात सुनकर पूर्वाह्नकालका नित्यनियम पूर्ण करके श्रीराम चलनेको तैयार हो गये और इस प्रकार बोले— ॥ ३ ॥

‘ब्रह्मन्! शुभ जलसे परिपूर्ण तथा अपने तटोंसे सुशोभित होनेवाला यह शोणभद्र तो अथाह जान पड़ता है। हमलोग किस मार्गसे चलकर इसे पार करेंगे?’ ॥ ४ ॥

श्रीरामके ऐसा कहनेपर विश्वामित्र बोले— ‘जिस मार्गसे महर्षिगण शोणभद्रको पार करते हैं, उसका मैंने पहलेसे ही निश्चय कर रखा है, वह मार्ग यह है’॥ ५ ॥

बुद्धिमान् विश्वामित्रके ऐसा कहनेपर वे महर्षि नाना प्रकारके वनोंकी शोभा देखते हुए वहाँसे प्रस्थित हुए॥ ६ ॥

बहुत दूरका मार्ग तै कर लेनेपर दोपहर होते-होते उन सब लोगोंने मुनिजनसेवित, सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाजीके तटपर पहुँचकर उनका दर्शन किया॥ ७ ॥

हंसों तथा सारसोंसे सेवित पुण्यसलिला भागीरथीका दर्शन करके श्रीरामचन्द्रजीके साथ समस्त मुनि बहुत प्रसन्न हुए॥ ८ ॥

उस समय सबने गंगाजीके तटपर डेरा डाला। फिर विधिवत् स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण किया। उसके बाद अग्निहोत्र करके अमृतके समान मीठे हविष्यका भोजन किया। तदनन्तर वे सभी कल्याणकारी महर्षि प्रसन्नचित्त हो महात्मा विश्वामित्रको चारों ओरसे घेरकर गंगाजीके तटपर बैठ गये॥ ९-१० १/२ ॥

जब वे सब मुनि स्थिरभावसे विराजमान हो गये और श्रीराम तथा लक्ष्मण भी यथायोग्य स्थानपर बैठ गये, तब श्रीरामने प्रसन्नचित्त होकर विश्वामित्रजीसे पूछा— ॥ ११ ॥

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‘भगवन्! मैं यह सुनना चाहता हूँ कि तीन मार्गोंसे प्रवाहित होनेवाली नदी ये गंगाजी किस प्रकार तीनों लोकोंमें घूमकर नदों और नदियोंके स्वामी समुद्रमें जा मिली हैं?’॥ १२ ॥

श्रीरामके इस प्रश्नद्वारा प्रेरित हो महामुनि विश्वामित्रने गंगाजीकी उत्पत्ति और वृद्धिकी कथा कहना आरम्भ किया— ॥ १३ ॥

‘श्रीराम! हिमवान् नामक एक पर्वत है, जो समस्त पर्वतोंका राजा तथा सब प्रकारके धातुओंका बहुत बड़ा खजाना है। हिमवान्‌की दो कन्याएँ हैं, जिनके सुन्दर रूपकी इस भूतलपर कहीं तुलना नहीं है॥ १४ ॥

‘मेरु पर्वतकी मनोहारिणी पुत्री मेना हिमवान्‌की प्यारी पत्नी है। सुन्दर कटिप्रदेशवाली मेना ही उन दोनों कन्याओंकी जननी हैं॥ १५ ॥

‘रघुनन्दन! मेनाके गर्भसे जो पहली कन्या उत्पन्न हुई, वही ये गंगाजी हैं। ये हिमवान्‌की ज्येष्ठ पुत्री हैं। हिमवान्‌की ही दूसरी कन्या, जो मेनाके गर्भसे उत्पन्न हुई, उमा नामसे प्रसिद्ध हैं॥ १६ ॥

कुछ कालके पश्चात् सब देवताओंने देवकार्यकी सिद्धिके लिये ज्येष्ठ कन्या गंगाजीको, जो आगे चलकर स्वर्गसे त्रिपथगा नदीके रूपमें अवतीर्ण हुई, गिरिराज हिमालयसे माँगा॥ १७ ॥

‘हिमवान्ने त्रिभुवनका हित करनेकी इच्छासे स्वच्छन्द पथपर विचरनेवाली अपनी लोकपावनी पुत्री गंगाको धर्मपूर्वक उन्हें दे दिया॥ १८ ॥

‘तीनों लोकोंके हितकी इच्छावाले देवता त्रिभुवनकी भलाईके लिये ही गंगाजीको लेकर मन-ही-मन कृतार्थताका अनुभव करते हुए चले गये॥ १९ ॥

‘रघुनन्दन! गिरिराजकी जो दूसरी कन्या उमा थीं, वे उत्तम एवं कठोर व्रतका पालन करती हुई घोर तपस्यामें लग गयीं। उन्होंने तपोमय धनका संचय किया॥ २० ॥

‘गिरिराजने उग्र तपस्यामें संलग्न हुई अपनी वह विश्ववन्दिता पुत्री उमा अनुपम प्रभावशाली भगवान् रुद्रको ब्याह दी॥ २१ ॥

‘रघुनन्दन! इस प्रकार सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगा तथा भगवती उमा—ये दोनों गिरिराज हिमालयकी कन्याएँ हैं। सारा संसार इनके चरणोंमें मस्तक झुकाता है॥ २२ ॥

‘गतिशीलोंमें श्रेष्ठ तात श्रीराम! गंगाजीकी उत्पत्तिके विषयमें ये सारी बातें मैंने तुम्हें बता दीं। ये त्रिपथगामिनी कैसे हुईं? यह भी सुन लो। पहले तो ये आकाशमार्गमें गयी थीं।

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तत्पश्चात् ये गिरिराजकुमारी गंगा रमणीया देवनदीके रूपमें देवलोकमें आरूढ़ हुईं थीं। फिर जलरूपमें प्रवाहित हो लोगोंके पाप दूर करती हुईं रसातलमें पहुँची थीं' ॥ २३-२४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३५॥

छत्तीसवाँ सर्ग

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छत्तीसवाँ सर्ग

देवताओंका शिव-पार्वतीको सुरतक्रीडासे निवृत्त करना तथा उमादेवीका देवताओं और पृथ्वीको शाप देना

विश्वामित्रजीकी बात समाप्त होनेपर श्रीराम और लक्ष्मण दोनों वीरोंने उनकी कही हुई कथाका अभिनन्दन करके मुनिवर विश्वामित्रसे इस प्रकार कहा—॥ १ ॥

‘ब्रह्मन्! आपने यह बड़ी उत्तम धर्मयुक्त कथा सुनायी। अब आप गिरिराज हिमवान्‌की ज्येष्ठ पुत्री गंगाके दिव्यलोक तथा मनुष्यलोकसे सम्बन्ध होनेका वृत्तान्त विस्तारके साथ सुनाइये; क्योंकि आप विस्तृत वृत्तान्तके ज्ञाता हैं॥ २ ॥

‘लोकको पवित्र करनेवाली गंगा किस कारणसे तीन मार्गोंमें प्रवाहित होती हैं? सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाकी ‘त्रिपथगा’ नामसे प्रसिद्धि क्यों हुई?॥ ३ ॥

‘धर्मज्ञ महर्षे! तीनों लोकोंमें वे अपनी तीन धाराओंके द्वारा कौन-कौन-से कार्य करती हैं?’ श्रीरामचन्द्रजीके इस प्रकार पूछनेपर तपोधन विश्वामित्रने मुनिमण्डलीके बीच गंगाजीसे सम्बन्ध रखनेवाली सारी बातें पूर्णरूपसे कह सुनायीं—॥ ४ १/२ ॥

‘श्रीराम! पूर्वकालमें महातपस्वी भगवान् नीलकण्ठने उमादेवीके साथ विवाह करके उनको नववधूके रूपमें अपने निकट आयी देख उनके साथ रति-क्रीडा आरम्भ की॥ ५ १/२ ॥

‘परम बुद्धिमान् महान् देवता भगवान् नीलकण्ठके उमादेवीके साथ क्रीडा-विहार करते सौ दिव्य वर्ष बीत गये॥ ६ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीराम! इतने वर्षोंतक विहारके बाद भी महादेवजीके उमादेवीके गर्भसे कोई पुत्र नहीं हुआ। यह देख ब्रह्मा आदि सभी देवता उन्हें रोकनेका उद्योग करने लगे॥ ७ ॥

‘उन्होंने सोचा—इतने दीर्घकालके पश्चात् यदि रुद्रके तेजसे उमादेवीके गर्भसे कोई महान् प्राणी प्रकट हो भी जाय तो कौन उसके तेजको सहन करेगा? यह विचारकर सब देवता भगवान् शिवके पास जा उन्हें प्रणाम करके यों बोले—॥ ८ ॥

‘इस लोकके हितमें तत्पर रहनेवाले देवदेव महादेव! देवता आपके चरणोंमें मस्तक झुकाते हैं। इससे प्रसन्न होकर आप इन देवताओंपर कृपा करें॥ ९ ॥

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‘सुरश्रेष्ठ! ये लोक आपके तेजको नहीं धारण कर सकेंगे; अतः आप क्रीडासे निवृत्त हो वेदबोधित तपस्यासे युक्त होकर उमादेवीके साथ तप कीजिये॥ १०॥

‘तीनों लोकोंके हितकी कामनासे अपने तेज (वीर्य) को तेजःस्वरूप अपने-आपमें ही धारण कीजिये। इन सब लोकोंकी रक्षा कीजिये। लोकोंका विनाश न कर डालिये’॥ ११॥

‘देवताओंकी यह बात सुनकर सर्वलोकमहेश्वर शिवने ‘बहुत अच्छा’ कहकर उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया; फिर उनसे इस प्रकार कहा—॥ १२॥

‘देवताओ! उमासहित मैं अर्थात् हम दोनों अपने तेजसे ही तेजको धारण कर लेंगे। पृथ्वी आदि सभी लोकोंके निवासी शान्ति लाभ करें॥ १३॥

‘किंतु सुरश्रेष्ठगण! यदि मेरा यह सर्वोत्तम तेज (वीर्य) क्षुब्ध होकर अपने स्थानसे स्खलित हो जाय तो उसे कौन धारण करेगा?—यह मुझे बताओ’॥ १४॥

उनके ऐसा कहनेपर देवताओंने वृषभध्वज भगवान् शिवसे कहा—‘भगवन्! आज आपका जो तेज क्षुब्ध होकर गिरेगा, उसे यह पृथ्वीदेवी धारण करेगी’॥ १५॥

‘देवताओंका यह कथन सुनकर महाबली देवेश्वर शिवने अपना तेज छोड़ा, जिससे पर्वत और वनोंसहित यह सारी पृथ्वी व्याप्त हो गयी॥ १६॥

‘तब देवताओंने अग्निदेवसे कहा—‘अग्ने! तुम वायुके सहयोगसे भगवान् शिवके इस महान् तेजको अपने भीतर रख लो’॥ १७॥

‘अग्निसे व्याप्त होनेपर वह तेज श्वेत पर्वतके रूपमें परिणत हो गया। साथ ही वहाँ दिव्य सरकंडोंका वन भी प्रकट हुआ, जो अग्नि और सूर्यके समान तेजस्वी प्रतीत होता था॥ १८॥

‘उसी वनमें अग्निजनित महातेजस्वी कार्तिकेयका प्रादुर्भाव हुआ। तदनन्तर ऋषियोंसहित देवताओंने अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर देवी उमा और भगवान् शिवका बड़े भक्तिभावसे पूजन किया॥ १९ १/२ ॥

‘श्रीराम! इसके बाद गिरिराजनन्दिनी उमाके नेत्र क्रोधसे लाल हो गये। उन्होंने समस्त देवताओंको रोषपूर्वक शाप दे दिया। वे बोलीं—॥ २० १/२ ॥

‘देवताओ! मैंने पुत्र-प्राप्तिकी इच्छासे पतिके साथ समागम किया था, परंतु तुमने मुझे रोक दिया। अतः अब तुमलोग भी अपनी पत्नियोंसे संतान उत्पन्न करने योग्य नहीं रह जाओगे। आजसे तुम्हारी पत्नियाँ संतानोत्पादन नहीं कर सकेंगी—संतानहीन हो जायँगी’॥ २१-२२॥

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‘सब देवताओंसे ऐसा कहकर उमादेवीने पृथिवीको भी शाप दिया— ‘भूमे! तेरा एक रूप नहीं रह जायगा। तू बहुतोंकी भार्या होगी॥ २३ ॥

‘खोटी बुद्धिवाली पृथ्वी! तू चाहती थी कि मेरे पुत्र न हो। अतः मेरे क्रोधसे कलुषित होकर तू भी पुत्रजनित सुख या प्रसन्नताका अनुभव न कर सकेगी’॥ २४ ॥

‘उन सब देवताओंको उमादेवीके शापसे पीडित देख देवेश्वर भगवान् शिवने उस समय पश्चिम दिशाकी ओर प्रस्थान कर दिया॥ २५ ॥

‘वहाँसे जाकर हिमालय पर्वतके उत्तर भागमें उसीके एक शिखरपर उमादेवीके साथ भगवान् महेश्वर तप करने लगे॥ २६ ॥

‘लक्ष्मणसहित श्रीराम! यह मैंने तुम्हें गिरिराज हिमवान्की छोटी पुत्री उमादेवीका विस्तृत वृत्तान्त बताया है। अब मुझसे गंगाके प्रादुर्भावकी कथा सुनो’॥ २७ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें छत्तीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३६॥

सैंतीसवाँ सर्ग

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सैंतीसवाँ सर्ग

गंगासे कार्तिकेयकी उत्पत्तिका प्रसंग

जब महादेवजी तपस्या कर रहे थे, उस समय इन्द्र और अग्नि आदि सम्पूर्ण देवता अपने लिये सेनापतिकी इच्छा लेकर ब्रह्माजीके पास आये॥ १ ॥

देवताओंको आराम देनेवाले श्रीराम! इन्द्र और अग्निसहित समस्त देवताओंने भगवान् ब्रह्माको प्रणाम करके इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥

‘प्रभो! पूर्वकालमें जिन भगवान् महेश्वरने हमें (बीजरूपसे) सेनापति प्रदान किया था, वे उमादेवीके साथ उत्तम तपका आश्रय लेकर तपस्या करते हैं॥ ३ ॥

‘विधि-विधानके ज्ञाता पितामह! अब लोकहितके लिये जो कर्तव्य प्राप्त हो, उसको पूर्ण कीजिये; क्योंकि आप ही हमारे परम आश्रय हैं’॥ ४ ॥

देवताओंकी यह बात सुनकर सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजीने मधुर वचनोंद्वारा उन्हें सान्त्वना देते हुए कहा— ॥ ५ ॥

‘देवताओ! गिरिराजकुमारी पार्वतीने जो शाप दिया है, उसके अनुसार तुम्हें अपनी पत्नियोंके गर्भसे अब कोई संतान नहीं होगी। उमादेवीकी वाणी अमोघ है; अतः वह सत्य होकर ही रहेगी; इसमें संशय नहीं है॥

‘ये हैं उमाकी बड़ी बहिन आकाशगंगा, जिनके गर्भमें शङ्करजीके उस तेजको स्थापित करके अग्निदेव एक ऐसे पुत्रको जन्म देंगे, जो देवताओंके शत्रुओंका दमन करनेमें समर्थ सेनापति होगा॥ ७ ॥

‘ये गंगा गिरिराजकी ज्येष्ठ पुत्री हैं, अतः अपनी छोटी बहिनके उस पुत्रको अपने ही पुत्रके समान मानेंगी। उमाको भी यह बहुत प्रिय लगेगा। इसमें संशय नहीं है’॥ ८ १/२ ॥

रघुनन्दन! ब्रह्माजीका यह वचन सुनकर सब देवता कृतकृत्य हो गये। उन्होंने ब्रह्माजीको प्रणाम करके उनका पूजन किया॥ ९ ॥

श्रीराम! विविध धातुओंसे अलंकृत उत्तम कैलास पर्वतपर जाकर उन सम्पूर्ण देवताओंने अग्निदेवको पुत्र उत्पन्न करनेके कार्यमें नियुक्त किया॥ १० ॥

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वे बोले—‘देव! हुताशन! यह देवताओंका कार्य है, इसे सिद्ध कीजिये। भगवान् रुद्रके उस महान् तेजको अब आप गंगाजीमें स्थापित कर दीजिये’॥ ११॥

तब देवताओंसे ‘बहुत अच्छा’ कहकर अग्निदेव गंगाजीके निकट आये और बोले—‘देवि! आप इस गर्भको धारण करें। यह देवताओंका प्रिय कार्य है’॥ १२॥

अग्निदेवकी यह बात सुनकर गंगादेवीने दिव्यरूप धारण कर लिया। उनकी यह महिमा—यह रूप-वैभव देखकर अग्निदेवने उस रुद्र-तेजको उनके सब ओर बिखेर दिया॥ १३॥

रघुनन्दन! अग्निदेवने जब गंगादेवीको सब ओरसे उस रुद्र-तेजद्वारा अभिषिक्त कर दिया, तब गंगाजीके सारे स्रोत उससे परिपूर्ण हो गये॥ १४॥

तब गंगाने समस्त देवताओंके अग्रगामी अग्निदेवसे इस प्रकार कहा—‘देव! आपके द्वारा स्थापित किये गये इस बढ़े हुए तेजको धारण करनेमें मैं असमर्थ हूँ। इसकी आँचसे जल रही हूँ और मेरी चेतना व्यथित हो गयी है’॥ १५ १/२ ॥

तब सम्पूर्ण देवताओंके हविष्यको भोग लगानेवाले अग्निदेवने गंगादेवीसे कहा—‘देवि! हिमालय पर्वतके पार्श्वभागमें इस गर्भको स्थापित कर दीजिये’॥ १६ १/२ ॥

निष्पाप रघुनन्दन! अग्निकी यह बात सुनकर महातेजस्विनी गंगाने उस अत्यन्त प्रकाशमान गर्भको अपने स्रोतोंसे निकालकर यथोचित स्थानमें रख दिया॥

गंगाके गर्भसे जो तेज निकला, वह तपाये हुए जाम्बूनद नामक सुवर्णके समान कान्तिमान् दिखायी देने लगा (गंगा सुवर्णमय मेरुगिरिसे प्रकट हुई हैं; अतः उनका बालक भी वैसे ही रूप-रंगका हुआ)। पृथ्वीपर जहाँ वह तेजस्वी गर्भ स्थापित हुआ, वहाँकी भूमि तथा प्रत्येक वस्तु सुवर्णमयी हो गयी। उसके आस-पासका स्थान अनुपम प्रभासे प्रकाशित होनेवाला रजत हो गया। उस तेजकी तीक्ष्णतासे ही दूरवर्ती भूभागकी वस्तुएँ ताँबे और लोहेके रूपमें परिणत हो गयीं॥ १८-१९॥

उस तेजस्वी गर्भका जो मल था, वही वहाँ राँगा और सीसा हुआ। इस प्रकार पृथ्वीपर पड़कर वह तेज नाना प्रकारके धातुओंके रूपमें वृद्धिको प्राप्त हुआ॥ २०॥

पृथ्वीपर उस गर्भके रखे जाते ही उसके तेजसे व्याप्त होकर पूर्वोक्त श्वेतपर्वत और उससे सम्बन्ध रखनेवाला सारा वन सुवर्णमय होकर जगमगाने लगा॥ २१॥

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पुरुषसिंह रघुनन्दन! तभीसे अग्निके समान प्रकाशित होनेवाले सुवर्णका नाम जातरूप हो गया; क्योंकि उसी समय सुवर्णका तेजस्वी रूप प्रकट हुआ था। उस गर्भके सम्पर्कसे वहाँका तृण, वृक्ष, लता और गुल्म — सब कुछ सोनेका हो गया॥ २२ ॥

तदनन्तर इन्द्र और मरुद्गणोंसहित सम्पूर्ण देवताओंने वहाँ उत्पन्न हुए कुमारको दूध पिलानेके लिये छहों कृत्तिकाओंको नियुक्त किया॥ २३ ॥

तब उन कृत्तिकाओंने 'यह हम सबका पुत्र हो' ऐसी उत्तम शर्त रखकर और इस बातका निश्चित विश्वास लेकर उस नवजात बालकको अपना दूध प्रदान किया॥ २४ ॥

उस समय सब देवता बोले— 'यह बालक कार्तिकेय कहलायेगा और तुमलोगोंका त्रिभुवनविख्यात पुत्र होगा—इसमें संशय नहीं है'॥ २५ ॥

देवताओंका यह अनुकूल वचन सुनकर शिव और पार्वतीसे स्कन्दित (स्खलित) तथा गङ्गाद्वारा गर्भस्राव होनेपर प्रकट हुए अग्निके समान उत्तम प्रभासे प्रकाशित होनेवाले उस बालकको कृत्तिकाओंने नहलाया॥ २६ ॥

ककुत्स्थकुलभूषण श्रीराम! अग्नितुल्य तेजस्वी महाबाहु कार्तिकेय गर्भस्रावकालमें स्कन्दित हुए थे; इसलिये देवताओंने उन्हें स्कन्द कहकर पुकारा॥ २७ ॥

तदनन्तर कृत्तिकाओंके स्तनोंमें परम उत्तम दूध प्रकट हुआ। उस समय स्कन्दने अपने छः मुख प्रकट करके उन छहोंका एक साथ ही स्तनपान किया॥ २८ ॥

एक ही दिन दूध पीकर उस सुकुमार शरीरवाले शक्तिशाली कुमारने अपने पराक्रमसे दैत्योंकी सारी सेनाओंपर विजय प्राप्त की॥ २९ ॥

तत्पश्चात् अग्नि आदि सब देवताओंने मिलकर उन महातेजस्वी स्कन्दका देवसेनापतिके पदपर अभिषेक किया॥ ३० ॥

श्रीराम! यह मैंने तुम्हें गंगाजीके चरित्रको विस्तारपूर्वक बताया है; साथ ही कुमार कार्तिकेयके जन्मका भी प्रसंग सुनाया है, जो श्रोताको धन्य एवं पुण्यात्मा बनानेवाला है॥ ३१ ॥

काकुत्स्थ! इस पृथ्वीपर जो मनुष्य कार्तिकेयमें भक्तिभाव रखता है, वह इस लोकमें दीर्घायु तथा पुत्र-पौत्रोंसे सम्पन्न हो मृत्युके पश्चात् स्कन्दके लोकमें जाता है॥

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इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें सैंतीसवाँ सर्ग पूरा
हुआ॥ ३७॥

अड़तीसवाँ सर्ग

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अड़तीसवाँ सर्ग

राजा सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति तथा यज्ञकी तैयारी

विश्वामित्रजीने मधुर अक्षरोंसे युक्त वह कथा श्रीरामको सुनाकर फिर उनसे दूसरा प्रसंग इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

‘वीर! पहलेकी बात है, अयोध्यामें सगर नामसे प्रसिद्ध एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। उन्हें कोई पुत्र नहीं था; अतः वे पुत्र-प्राप्तिके लिये सदा उत्सुक रहा करते थे॥ २ ॥

‘श्रीराम! विदर्भराजकुमारी केशिनी राजा सगरकी ज्येष्ठ पत्नी थी। वह बड़ी धर्मात्मा और सत्यवादिनी थी॥ ३ ॥

‘सगरकी दूसरी पन्तीका नाम सुमति था। वह अरिष्टनेमि कश्यपकी पुत्री तथा गरुड़की बहिन थी॥ ४ ॥

‘महाराज सगर अपनी उन दोनों पत्नियोंके साथ हिमालय पर्वतपर जाकर भृगुप्रस्रवण नामक शिखरपर तपस्या करने लगे॥ ५ ॥

‘सौ वर्ष पूर्ण होनेपर उनकी तपस्याद्वारा प्रसन्न हुए सत्यवादियोंमें श्रेष्ठ महर्षि भृगुने राजा सगरको वर दिया॥ ६ ॥

‘निष्पाप नरेश! तुम्हें बहुत-से पुत्रोंकी प्राप्ति होगी। पुरुषप्रवर! तुम इस संसारमें अनुपम कीर्ति प्राप्त करोगे॥ ७ ॥

‘तात! तुम्हारी एक पत्नी तो एक ही पुत्रको जन्म देगी, जो अपनी वंशपरम्पराका विस्तार करनेवाला होगा तथा दूसरी पत्नी साठ हजार पुत्रोंकी जननी होगी॥ ८ ॥

‘महात्मा भृगु जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय उन दोनों राजकुमारियों (रानियों)-ने उन्हें प्रसन्न करके स्वयं भी अत्यन्त आनन्दित हो दोनों हाथ जोड़कर पूछा— ॥ ९ ॥

‘ब्रह्मन्! किस रानीके एक पुत्र होगा और कौन बहुत-से पुत्रोंकी जननी होगी? हम दोनों यह सुनना चाहती हैं। आपकी वाणी सत्य हो’॥ १० ॥

‘उन दोनोंकी यह बात सुनकर परम धर्मात्मा भृगुने उत्तम वाणीमें कहा— ‘देवियो! तुमलोग यहाँ अपनी इच्छा प्रकट करो। तुम्हें वंश चलानेवाला एक ही पुत्र प्राप्त हो अथवा महान्