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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

छब्बीसवाँ सर्ग

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छब्बीसवाँ सर्ग

हनुमान्‌जीका सुग्रीवके अभिषेकके लिये श्रीरामचन्द्रजीसे किष्किन्धामें पधारनेकी प्रार्थना, श्रीरामका पुरीमें न जाकर केवल अनुमति देना, तत्पश्चात् सुग्रीव और अङ्गदका अभिषेक

तदनन्तर वानरसेनाके प्रधान-प्रधान वीर (हनुमान् आदि) भीगे वस्त्रवाले शोक-संतप्त सुग्रीवको चारों ओरसे घेरकर उन्हें साथ लिये अनायास ही महान् कर्म करनेवाले महाबाहु श्रीरामकी सेवामें उपस्थित हुए। श्रीरामके पास आकर वे सभी वानर उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े हो गये, जैसे ब्रह्माजीके सम्मुख महर्षिगण खड़े रहते हैं॥ १-२ ॥

तत्पश्चात् सुवर्णमय मेरु पर्वतके समान सुन्दर एवं विशाल शरीरवाले वायुपुत्र हनुमान्‌जी, जिनका मुख प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुण प्रभासे प्रकाशित हो रहा था, दोनों हाथ जोड़कर बोले—॥ ३ ॥

‘ककुत्स्थकुलनन्दन! आपकी कृपासे सुग्रीवको सुन्दर दाढ़वाले पूर्ण बलशाली और महामनस्वी वानरोंका यह विशाल साम्राज्य प्राप्त हुआ, जो इनके बाप-दादोंके समयसे चला आ रहा है। प्रभो! यद्यपि इसका मिलना बहुत ही कठिन था तो भी आपके प्रसादसे यह इन्हें सुलभ हो गया। अब यदि आप आज्ञा दें तो ये अपने सुन्दर नगरमें प्रवेश करके सुहृदोंके साथ अपना सब राजकार्य सँभालें॥ ४-५ १/२ ॥

‘ये शास्त्रविधिके अनुसार नाना प्रकारके सुगन्धित पदार्थों और ओषधियोंसहित जलसे राज्यपर अभिषिक्त होकर मालाओं तथा रत्नोंद्वारा आपकी विशेष पूजा करेंगे। अतः आप इस रमणीय पर्वत-गुफा किष्किन्धामें पधारनेकी कृपा करें और इन्हें इस राज्यका स्वामी बनाकर वानरोंका हर्ष बढ़ावें'॥ ६-७ १/२ ॥

हनुमान्‌जीके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले तथा बातचीतमें कुशल बुद्धिमान् श्रीरघुनाथजीने उन्हें यों उत्तर दिया—॥ ८ १/२ ॥

‘हनुमन्! सौम्य! मैं पिताकी आज्ञाका पालन कर रहा हूँ, अतः चौदह वर्षोंके पूर्ण होनेतक किसी ग्राम या नगरमें प्रवेश नहीं करूँगा॥ ९ १/२ ॥

‘वानरश्रेष्ठ वीर सुग्रीव इस समृद्धिशालिनी दिव्य गुफामें प्रवेश करें और वहाँ शीघ्र ही इनका विधिपूर्वक राज्याभिषेक कर दिया जाय'॥ १० १/२ ॥

हनुमान्‌से ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी सुग्रीवसे बोले—'मित्र! तुम लौकिक और शास्त्रीय सभी व्यवहार जानते हो। कुमार अङ्गद सदाचारसम्पन्न तथा महान् बल-पराक्रमसे परिपूर्ण हैं। इनमें वीरता कूट-कूटकर भरी है, अतः तुम इनको भी युवराजके पदपर अभिषिक्त करो॥ ११-१२ ॥

‘ये तुम्हारे बड़े भार्इके ज्येष्ठ पुत्र हैं। पराक्रममें भी उन्हींके समान हैं तथा इनका हृदय उदार है। अतः अङ्गद युवराजपदके सर्वथा अधिकारी हैं॥ १३ ॥

‘सौम्य! वर्षा कहलानेवाले चार मास या चौमासे आ गये। इनमें पहला मास यह श्रावण, जो जलकी प्राप्ति करानेवाला है, आरम्भ हो गया॥ १४ ॥

‘सौम्य! यह किसीपर चढ़ार्इ करनेका समय नहीं है। इसलिये तुम अपनी सुन्दर नगरीमें जाओ। मैं लक्ष्मणके साथ इस पर्वतपर निवास करूँगा॥ १५ ॥

‘सौम्य सुग्रीव! यह पर्वतीय गुफा बड़ी रमणीय और विशाल है। इसमें आवश्यकताके अनुरूप हवा भी मिल जाती है। यहाँ पर्याप्त जल भी सुलभ है और कमल तथा उत्पल भी बहुत हैं॥ १६ ॥

‘सखे! कार्तिक आनेपर तुम रावणके वधके लिये प्रयत्न करना। यही हमलोगोंका निश्चय रहा। अब तुम अपने महलमें प्रवेश करो और राज्यपर अभिषिक्त होकर सुहृदोंको आनन्दित करो'॥ १७ १/२ ॥

श्रीरामचन्द्रजीकी यह आज्ञा पाकर वानरश्रेष्ठ सुग्रीव उस रमणीय किष्किन्धापुरीमें गये, जिसकी रक्षा वालीने की थी॥ १८ १/२ ॥

उस समय गुफामें प्रविष्ट हुए उन वानरराजको चारों ओरसे घेरकर हजारों वानर उनके साथ ही गुहामें घुसे॥ १९ १/२ ॥

वानरराजको देखकर प्रजा आदि समस्त प्रकृतियोंने एकाग्रचित्त हो पृथ्वीपर माथा टेककर उन्हें प्रणाम किया॥

महाबली पराक्रमी सुग्रीवने उन सबको उठनेकी आज्ञा दी और उन सबसे बातचीत करके वे भार्इके सौम्य अन्तःपुरमें प्रविष्ट हुए॥ २१ १/२ ॥

भयंकर पराक्रम प्रकट करनेवाले वानरश्रेष्ठ सुग्रीवको अन्तःपुरमें आया देख उनके सुहृदोंने उनका उसी प्रकार अभिषेक किया, जैसे देवताओंने सहस्र नेत्रधारी इन्द्रका किया था॥ २२ १/२

॥

पहले तो वे सब लोग उनके लिये सुवर्णभूषित श्वेत छत्र, सोनेकी डाँड़ीवाले दो सफेद चँवर, सब प्रकारके रत्न, बीज और ओषधियाँ, दूधवाले वृक्षोंकी नीचे लटकनेवाली जटाएँ, श्वेत पुष्प, श्वेत वस्त्र, श्वेत अनुलेपन, जल और थलमें होनेवाले सुगन्धित फूलोंकी मालाएँ, दिव्य चन्दन, नाना प्रकारके बहुत-से सुगन्धित पदार्थ, अक्षत, सोना, प्रियङ्गु (कगनी), मधु, घी, दही, व्याघ्रचर्म, सुन्दर एवं बहुमूल्य जूते, अङ्गराग, गोरोचन और मैनसिल आदि सामग्री लेकर वहाँ उपस्थित हुए, साथ ही हर्षसे भरी हुईं सोलह सुन्दरी कन्याएँ भी सुग्रीवके पास आयीं॥ २३—२८॥

तदनन्तर उन सबने श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके रत्न, वस्त्र और भक्ष्य पदार्थोंसे संतुष्ट करके वानरश्रेष्ठ सुग्रीवका विधिपूर्वक अभिषेक-कार्य आरम्भ किया॥ २९॥

मन्त्रवेत्ता पुरुषोंने वेदीपर अग्निकी स्थापना करके उसे प्रज्वलित किया और अग्निवेदीके चारों ओर कुश बिछाये। फिर अग्निका संस्कार करके मन्त्रपूत हविष्यके द्वारा प्रज्वलित अग्निमें आहुति दी॥ ३०॥

तत्पश्चात् रंग-बिरंगी पुष्पमालाओंसे सुशोभित रमणीय अट्टालिकापर एक सोनेका सिंहासन रखा गया और उसपर सुन्दर बिछौना बिछाकर उसके ऊपर सुग्रीवको पूर्वाभिमुख करके विधिवत् मन्त्रोच्चारण करते हुए बिठाया गया॥ ३१ १/२ ॥

इसके बाद श्रेष्ठ वानरोंने नदियों, नदों, सम्पूर्ण दिशाओंके तीर्थों और समस्त समुद्रोंसे लाये हुए निर्मल जलको एकत्र करके उसे सोनेके कलशोंमें रखा। फिर गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, हनुमान् और जाम्बवान्ने महर्षियोंकी बतायी हुई शास्त्रोक्त विधिके अनुसार सुवर्णमय कलशोंमें रखे हुए स्वच्छ और सुगन्धित जलसे साँड़के सींगोंद्वारा सुग्रीवका उसी प्रकार अभिषेक किया, जैसे वसुओंने इन्द्रका अभिषेक किया था॥ ३२—३६ १/२ ॥

सुग्रीवका अभिषेक हो जानेपर वहाँ लाखोंकी संख्यामें एकत्र हुए समस्त महामनस्वी श्रेष्ठ वानर हर्षसे भरकर जयघोष करने लगे॥ ३७॥

श्रीरामचन्द्रजीकी आज्ञाका पालन करते हुए वानरराज सुग्रीवने अङ्गदको हृदयसे लगाकर उन्हें भी युवराजके पदपर अभिषिक्त कर दिया॥ ३८॥

अङ्गदका अभिषेक हो जानेपर महामनस्वी दयालु वानर ‘साधु-साधु’ कहकर सुग्रीवकी सराहना करने लगे॥

इस प्रकार अभिषेक होकर किष्किन्धामें सुग्रीव और अङ्गदके विराजमान होनेपर समस्त वानर परम प्रसन्न हो महात्मा श्रीराम और लक्ष्मणकी बारंबार स्तुति करने लगे॥ ४० ॥

उस समय पर्वतकी गुफामें बसी हुई किष्किन्धापुरी हृष्ट-पुष्ट पुरवासियोंसे व्याप्त तथा ध्वजा-पताकाओंसे सुशोभित होनेके कारण बड़ी रमणीय प्रतीत होती थी॥

वानरसेनाके स्वामी पराक्रमी सुग्रीवने महात्मा श्रीरामचन्द्रजीके पास जाकर अपने महाभिषेकका समाचार निवेदन किया और अपनी पत्नी रुमाको पाकर उन्होंने उसी प्रकार वानरोंका साम्राज्य प्राप्त किया, जैसे देवराज इन्द्रने त्रिलोकीका॥ ४२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें छब्बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ २६॥