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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

सत्तावनवाँ सर्ग

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सत्तावनवाँ सर्ग

श्रीरामका लौटना, मार्गमें अपशकुन देखकर चिन्तित होना तथा लक्ष्मणसे मिलनेपर उन्हें उलाहना दे सीतापर सङ्कट आनेकी आशङ्का करना

इधर मृगरूपसे विचरते हुए उस इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले राक्षस मारीचका वध करके श्रीरामचन्द्रजी तुरंत ही आश्रमके मार्गपर लौटे॥ १ ॥

वे सीताको देखनेके लिये जल्दी-जल्दी पैर बढ़ाते हुए आ रहे थे। इतनेहीमें पीछेकी ओरसे एक सियारिन बड़े कठोर स्वरमें चीत्कार करने लगी॥ २ ॥

गीदड़ीके उस स्वरसे श्रीरामचन्द्रजीके मनमें कुछ शङ्का हुई। उसका स्वर बड़ा ही भयंकर तथा रोंगटे खड़े कर देनेवाला था। उसका अनुभव करके वे बड़ी चिन्तामें पड़ गये॥ ३ ॥

वे मन-ही-मन कहने लगे— 'यह सियारिन जैसी बोली बोल रही है, इससे तो मुझे मालूम हो रहा है कि कोई अशुभ घटना घटित हो गयी। क्या विदेहनन्दिनी सीता कुशलसे होंगी? उन्हें राक्षस तो नहीं खा गये?॥

‘मृगरूपधारी मारीचने जान-बूझकर मेरे स्वरका अनुसरण करते हुए जो आर्त-पुकार की थी, वह इसलिये कि शायद इसे लक्ष्मण सुन सकें॥ ५ ॥

‘सुमित्रानन्दन लक्ष्मण वह स्वर सुनते ही सीताके ही भेजनेपर उसे अकेली छोड़कर तुरंत मेरे पास यहाँ पहुँचनेके लिये चल देंगे॥ ६ ॥

‘राक्षसलोग तो सब-के-सब मिलकर सीताका वध अवश्य कर देना चाहते हैं। इसी उद्देश्यसे यह मारीच राक्षस सोनेका मृग बनकर मुझे आश्रमसे दूर हटा ले आया था और मेरे बाणोंसे आहत होनेपर जो उसने आर्तनाद करते हुए कहा था कि ‘हा लक्ष्मण! मैं मारा गया’ इसमें भी उसका वही उद्देश्य छिपा था॥ ७-८ ॥

‘वनमें हम दोनों भाइयोंके आश्रमसे अलग हो जानेपर क्या सीता सकुशल वहाँ रह सकेंगी? जनस्थानमें जो राक्षसोंका संहार हुआ है, उसके कारण सारे राक्षस मुझसे वैर बाँधे ही हुए हैं॥ ९ ॥

‘आज बहुत-से भयङ्कर अपशकुन भी दिखायी देते हैं।’ सियारिनकी बोली सुनकर इस प्रकार चिन्ता करते हुए मनको वशमें रखनेवाले श्रीराम तुरंत लौटकर आश्रमकी ओर चले॥ १०

१/२ ॥

मृगरूपधारी राक्षसके द्वारा अपनेको आश्रमसे दूर हटानेकी घटनापर विचार करके श्रीरघुनाथजी शङ्कितहृदयसे जनस्थानको आये॥ ११ १/२ ॥

उनका मन बहुत दुःखी था। वे दीन हो रहे थे। उसी अवस्थामें वनके मृग और पक्षी उन्हें बाँयें रखते हुए वहाँ आये और भयङ्कर स्वरमें अपनी बोली बोलने लगे॥ १२ ॥

उन महाभयङ्कर अपशकुनोंको देखकर श्रीरामचन्द्रजी तुरंत ही बड़े वेगसे अपने आश्रमकी ओर लौटे॥ १३ ॥

इतनेहीमें उन्हें लक्ष्मण आते दिखायी दिये। उनकी कान्ति फीकी पड़ गयी थी। थोड़ी ही देरमें निकट आकर लक्ष्मण श्रीरामचन्द्रजीसे मिले॥ १४ ॥

दुःख और विषादमें डूबे हुए लक्ष्मणने दुःखी और विषादग्रस्त श्रीरामचन्द्रजीसे भेंट की। उस समय राक्षसोंसे सेवित निर्जन वनमें सीताको अकेली छोड़कर आये हुए लक्ष्मणको देख भाँऽइ श्रीरामने उनकी निन्दा की॥ १५ १/२ ॥

लक्ष्मणका बायाँ हाथ पकड़कर रघुनन्दन आर्त-से हो गये और पहले कठोर तथा अन्तमें मधुर वाणीद्वारा इस प्रकार बोले— ॥ १६ १/२ ॥

‘अहो सौम्य लक्ष्मण! यह तुमने बहुत बुरा किया, जो सीताको अकेली छोड़कर यहाँ चले आये। क्या वहाँ सीता सकुशल होगी?॥ १७ १/२ ॥

‘वीर! मुझे इस बातमें संदेह नहीं है कि वनमें विचरनेवाले राक्षसोंने जनककुमारी सीताको या तो सर्वथा नष्ट कर दिया होगा या वे उन्हें खा गये होंगे॥

‘क्योंकि मेरे आस-पास बहुत-से अपशकुन हो रहे हैं। पुरुषसिंह लक्ष्मण! क्या हमलोग जीती-जागती हुँऽइ जनकदुलारी सीताको पूर्णतः स्वस्थ एवं सकुशल पा सकेंगे?॥ १९-२० ॥

‘महाबली लक्ष्मण! ये मृगोंके झुंड (दाहिनी ओरसे आकर) जैसा अमङ्गल सूचित कर रहे हैं, ये गीदड़ जिस तरह भैरवनाद कर रहे हैं तथा जलती-सी प्रतीत होनेवाली सम्पूर्ण दिशाओंमें पक्षी जिस तरहकी बोली बोल रहे हैं—इन सबसे यही अनुमान होता है कि राजकुमारी सीता शायद ही कुशलसे हों॥ २१ ॥

‘यह राक्षस मृगके समान रूप धारण करके मुझे लुभाकर दूर चला आया था। महान् परिश्रम करके जब मैंने इसे किसी तरह मारा, तब यह मरते ही राक्षस हो गया॥ २२ ॥

‘लक्ष्मण! अतः मेरा मन अत्यन्त दीन और अप्रसन्न हो रहा है। मेरी बायीं आँख फड़क रही है, इससे जान पड़ता है, निःसंदेह आश्रमपर सीता नहीं है। उसे कोई हर ले गया, वह मारी गयी अथवा (किसी राक्षसके साथ) मार्गमें होगी’॥ २३ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें सत्तावनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५७॥