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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

तिरपनवाँ सर्ग

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तिरपनवाँ सर्ग

सीताका रावणको धिक्कारना

रावणको आकाशमें उड़ते देख मिथिलेशकुमारी जानकी दुःखमग्न हो अत्यन्त उद्विग्न हो रही थीं। वे बहुत बड़े भयमें पड़ गयी थीं॥ १ ॥

रोष और रोदनके कारण उनकी आँखें लाल हो गयी थीं। हरी जाती हुईं सीता करुणाजनक स्वरमें रोती हुईं उस भयंकर नेत्रवाले राक्षसराजसे इस प्रकार बोलीं— 'ओ नीच रावण! क्या तुझे अपने इस कुकर्मसे लज्जा नहीं आती है, जो मुझे स्वामीसे रहित अकेली और असहाय जानकर चुराये लिये भागा जाता है?॥ ३ ॥

'दुष्टात्मन्! तू बड़ा कायर और डरपोक है। निश्चय ही मुझे हर ले जानेकी इच्छासे तूने ही मायाद्वारा मृगरूपमें उपस्थित हो मेरे स्वामीको आश्रमसे दूर हटा दिया था॥ ४ ॥

'मेरे श्वशुरके सखा वे जो बूढ़े जटायु मेरी रक्षा करनेके लिये उद्यत हुए थे, उनको भी तूने मार गिराया॥ ५ ॥

'नीच राक्षस! अवश्य तुझमें बड़ा भारी बल दिखायी देता है (क्योंकि—तू बूढ़े पक्षीको भी मार गिराता है!), तूने अपना नाम बताकर श्रीराम-लक्ष्मणके साथ युद्ध करके मुझे नहीं जीता है। ओ नीच! जहाँ कोई रक्षक न हो—ऐसे स्थानपर जाकर परायी स्त्रीके अपहरण-जैसा निन्दित कर्म करके तू लज्जित कैसे नहीं होता है?॥ ६-७ ॥

'तू तो अपनेको बड़ा शूर-वीर मानता है, परंतु संसारके सभी वीर पुरुष तेरे इस कर्मको घृणित, क्रूरतापूर्ण और पापरूप ही बतायेंगे॥ ८ ॥

'तूने पहले स्वयं ही जिसका बड़े तावसे वर्णन किया था, तेरे उस शौर्य और बलको धिक्कार है! कुलमें कलङ्क लगानेवाले तेरे ऐसे चरित्रको संसारमें सदा धिक्कार ही प्राप्त होगा॥ ९ ॥

'किंतु इस समय क्या किया जा सकता है? क्योंकि तू बड़े वेगसे भागा जा रहा है। अरे! दो घड़ी भी तो ठहर जा, फिर यहाँसे जीवित नहीं लौट सकेगा॥

'उन दोनों राजकुमारोंके दृष्टिपथमें आ जानेपर तू सेनाके साथ हो तो भी दो घड़ी भी जीवित नहीं रह सकता॥ ११ ॥

‘जैसे कोई आकाशचारी पक्षी वनमें प्रज्वलित हुए दावानलका स्पर्श सहन करनेमें समर्थ नहीं होता, उसी प्रकार तू मेरे पति और उनके भाई दोनोंके बाणोंका स्पर्श किसी तरह सह नहीं सकता॥ १२ ॥

‘रावण! यदि तू मुझे छोड़ नहीं देता है तो मेरे तिरस्कारसे कुपित हुए मेरे पतिदेव अपने भाईके साथ चढ़ आयेंगे और तेरे विनाशका उपाय करेंगे, अतः तू अच्छी तरह अपनी भलाई सोच ले और मुझे छोड़ दे। यही तेरे लिये अच्छा होगा॥ १३ १/२ ॥

‘नीच! तू जिस संकल्प या अभिप्रायसे बलपूर्वक मेरा हरण करना चाहता है, तेरा वह अभिप्राय व्यर्थ होगा॥ १४ १/२ ॥

‘मैं अपने देवोपम पतिका दर्शन न पानेपर शत्रुके अधीनतामें अधिक कालतक अपने प्राणोंको नहीं धारण कर सकूँगी॥ १५ १/२ ॥

‘निश्चय ही तू अपने कल्याण और हितका विचार नहीं करता है। जैसे मरनेके समय मनुष्य स्वास्थ्यके विरोधी पदार्थोंका सेवन करने लगता है, वही दशा तेरी है। प्रायः सभी मरणासन्न मनुष्योंको पथ्य (हितकारक सलाह या भोजन) नहीं रुचता है॥ १६-१७ ॥

‘निशाचर! मैं देखती हूँ, तेरे गलेमें कालकी फाँसी पड़ चुकी है, इसीसे इस भयके स्थानपर भी तू निर्भय बना हुआ है॥ १८ ॥

‘रावण! अवश्य ही तू सुवर्णमय वृक्षोंको देख रहा है, रक्तका स्रोत बहानेवाली भयंकर वैतरणी नदीका दर्शन कर रहा है, भयानक असिपत्र-वनको भी देखना चाहता है तथा जिसमें तपाये हुए सुवर्णके समान फूल तथा श्रेष्ठ वैदूर्यमणि (नीलम) के समान पत्ते हैं और जिसमें लोहेके काँटे चिने गये हैं, उस तीखी शाल्मलिका भी अब तू शीघ्र ही दर्शन करेगा॥ १९-२० १/२ ॥

‘निर्दयी निशाचर! तू महात्मा श्रीरामका ऐसा महान् अपराध करके विषपान किये हुए मनुष्यकी भाँति अधिक कालतक जीवन धारण नहीं कर सकेगा। रावण! तू अटल कालपाशसे बँध गया है॥ २१-२२ ॥

‘मेरे महात्मा पतिसे बचकर तू कहाँ जाकर शान्ति पा सकेगा। जिन्होंने अपने भाई लक्ष्मणकी सहायता लिये बिना ही युद्धमें पलक मारते-मारते चौदह हजार राक्षसोंका विनाश कर डाला, वे सम्पूर्ण अस्त्रोंका प्रयोग करनेमें कुशल बलवान् वीर रघुनाथजी अपनी प्यारी पत्नीका

अपहरण करनेवाले तुझ-जैसे पापीको तीखे बाणोंद्वारा क्यों नहीं कालके गालमें भेज देंगे'॥ २३-२४ १/२ ॥

रावणके चंगुलमें फँसी हुई विदेहराजकुमारी सीता भय और शोकसे व्याकुल हो ये तथा और भी बहुत-से कठोर वचन सुनाकर करुण-स्वरमें विलाप करने लगीं॥ २५ ॥

अत्यन्त दुःखसे आतुर हो विलापपूर्वक बहुत-सी करुणाजनक बातें कहती और छूटनेके लिये नाना प्रकारकी चेष्टा करती हुई तरुणी भामिनी राजकुमारी सीताको वह पापी निशाचर हर ले गया। उस समय अधिक बोझके कारण उसका शरीर काँप रहा था॥ २६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अरण्यकाण्डमें तिरपनवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ५३॥