Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

सत्तरवाँ सर्ग

Page 651Permalink

⬅ विषय-सूची (TOC)

सत्तरवाँ सर्ग

दूतोंका भरतको उनके नाना और मामाके लिये उपहारकी वस्तुएँ अर्पित करना और वसिष्ठजीका संदेश सुनाना, भरतका पिता आदिकी कुशल पूछना और नानासे आज्ञा तथा उपहारकी वस्तुएँ पाकर शत्रुघ्नके साथ अयोध्याकी ओर प्रस्थान करना

इस प्रकार भरत जब अपने मित्रोंको स्वप्नका वृत्तान्त बता रहे थे, उसी समय थके हुए वाहनोंवाले वे दूत उस रमणीय राजगृहपुरमें प्रविष्ट हुए, जिसकी खाईको लाँघनेका कष्ट शत्रुओंके लिये असह्य था॥ १ ॥

नगरमें आकर वे दूत केकयदेशके राजा और राजकुमारसे मिले तथा उन दोनोंने भी उनका सत्कार किया। फिर वे भावी राजा भरतके चरणोंका स्पर्श करके उनसे इस प्रकार बोले— ॥ २ ॥

‘कुमार! पुरोहितजी तथा समस्त मन्त्रियोंने आपसे कुशल-मङ्गल कहा है। अब आप यहाँसे शीघ्र चलिये। अयोध्यामें आपसे अत्यन्त आवश्यक कार्य है॥ ३ ॥

‘विशाल नेत्रोंवाले राजकुमार! ये बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण आप स्वयं भी ग्रहण कीजिये और अपने मामाको भी दीजिये॥ ४ ॥

‘राजकुमार! यहाँ जो बहुमूल्य सामग्री लायी गयी है, इसमें बीस करोड़की लागतका सामान आपके नाना केकयनरेशके लिये है और पूरे दस करोड़की लागतका सामान आपके मामाके लिये है’॥ ५ ॥

वे सारी वस्तुएँ लेकर मामा आदि सुहृदोंमें अनुराग रखनेवाले भरतने उन्हें भेंट कर दीं। तत्पश्चात् इच्छानुसार वस्तुएँ देकर दूतोंका सत्कार करनेके अनन्तर उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ६ ॥

‘मेरे पिता महाराज दशरथ सकुशल तो हैं न? महात्मा श्रीराम और लक्ष्मण नीरोग तो हैं न?॥ ७ ॥

‘धर्मको जानने और धर्मकी ही चर्चा करनेवाली बुद्धिमान् श्रीरामकी माता धर्मपरायणा आर्या कौसल्याको तो कोई रोग या कष्ट नहीं है?॥ ८ ॥

Page 652Permalink

‘क्या वीर लक्ष्मण और शत्रुघ्नकी जननी मेरी मझली माता धर्मज्ञा सुमित्रा स्वस्थ और सुखी हैं?॥ ९ ॥

‘जो सदा अपना ही स्वार्थ सिद्ध करना चाहती और अपनेको बड़ी बुद्धिमती समझती है, उस उग्र स्वभाववाली कोपशीला मेरी माता कैकेयीको तो कोऽइ कष्ट नहीं है? उसने क्या कहा है?’॥ १० ॥

महात्मा भरतके इस प्रकार पूछनेपर उस समय दूतोंने विनयपूर्वक उनसे यह बात कही—॥ ११ ॥

‘पुरुषसिंह! आपको जिनका कुशल-मङ्गल अभिप्रेत है, वे सकुशल हैं। हाथमें कमल लिये रहनेवाली लक्ष्मी (शोभा) आपका वरण कर रही है। अब यात्राके लिये शीघ्र ही आपका रथ जुतकर तैयार हो जाना चाहिये’॥ १२ ॥

उन दूतोंके ऐसा कहनेपर भरतने उनसे कहा— ‘अच्छा मैं महाराजसे पूछता हूँ कि दूत मुझसे शीघ्र अयोध्या चलनेके लिये कह रहे हैं। आपकी क्या आज्ञा है?’॥ १३ ॥

दूतोंसे ऐसा कहकर राजकुमार भरत उनसे प्रेरित हो नानाके पास जाकर बोले—॥ १४ ॥

‘राजन्! मैं दूतोंके कहनेसे इस समय पिताजीके पास जा रहा हूँ। पुनः जब आप मुझे याद करेंगे, यहाँ आ जाऊँगा’॥

भरतके ऐसा कहनेपर नाना केकयनरेशने उस समय उन रघुकुलभूषण भरतका मस्तक सूँघकर यह शुभ वचन कहा—॥ १६ ॥

‘तात! जाओ, मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ। तुम्हें पाकर कैकेयी उत्तम संतानवाली हो गयी। शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर! तुम अपनी माता और पितासे यहाँका कुशल-समाचार कहना॥ १७ ॥

‘तात! अपने पुरोहितजीसे तथा अन्य जो श्रेष्ठ ब्राह्मण हों, उनसे भी मेरा कुशल-मङ्गल कहना। उन महाधनुर्धर दोनों भाऽइ श्रीराम और लक्ष्मणसे भी यहाँका कुशल-समाचार सुना देना’॥ १८ ॥

ऐसा कहकर केकयनरेशने भरतका सत्कार करके उन्हें बहुत-से उत्तम हाथी, विचित्र कालीन, मृगचर्म और बहुत-सा धन दिये॥ १९ ॥

Page 653Permalink

जो अन्तःपुरमें पाल-पोसकर बड़े किये गये थे, बल और पराक्रममें बाघोंके समान थे, जिनकी दाढ़ें बड़ी-बड़ी और काया विशाल थी, ऐसे बहुत-से कुत्ते भी केकयनरेशने भरतको भेंटमें दिये॥ २० ॥

दो हजार सोनेकी मोहरें और सोलह सौ घोड़े भी दिये। इस प्रकार केकयनरेशने केकयीकुमार भरतको सत्कारपूर्वक बहुत-सा धन दिया॥ २१ ॥

उस समय केकयनरेश अश्वपतिने अपने अभीष्ट, विश्वासपात्र और गुणवान् मन्त्रियोंको भरतके साथ जानेके लिये शीघ्र आज्ञा दी॥ २२ ॥

भरतके मामाने उन्हें उपहारमें दिये जानेवाले फलके रूपमें इरावान् पर्वत और इन्द्रशिर नामक स्थानके आस-पास उत्पन्न होनेवाले बहुत-से सुन्दर-सुन्दर हाथी तथा तेज चलनेवाले सुशिक्षित खच्चर दिये॥ २३ ॥

उस समय जानेकी जल्दी होनेके कारण केकयीपुत्र भरतने केकयराजके दिये हुए उस धनका अभिनन्दन नहीं किया॥ २४ ॥

उस अवसरपर उनके हृदयमें बड़ी भारी चिन्ता हो रही थी। इसके दो कारण थे, एक तो दूत वहाँसे चलनेकी जल्दी मचा रहे थे, दूसरे उन्हें दुःस्वप्नका दर्शन भी हुआ था॥ २५ ॥

वे यात्राकी तैयारीके लिये पहले अपने आवास-स्थानपर गये। फिर वहाँसे निकलकर मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंसे भरे हुए परम उत्तम राजमार्गपर गये। उस समय भरतजीके पास बहुत बड़ी सम्पत्ति जुट गयी थी॥

सड़कको पार करके श्रीमान् भरतने राजभवनके परम उत्तम अन्तःपुरका दर्शन किया और उसमें वे बेरोक-टोक घुस गये॥ २७ ॥

वहाँ नाना, नानी, मामा युधाजित् और मामीसे विदा ले शत्रुघ्नसहित रथपर सवार हो भरतने यात्रा आरम्भ की॥ २८ ॥

गोलाकार पहियेवाले सौसे भी अधिक रथोंमें ऊँट, बैल, घोड़े और खच्चर जोतकर सेवकोंने जाते हुए भरतका अनुसरण किया॥ २९ ॥

शत्रुहीन महामना भरत अपनी और मामाकी सेनासे सुरक्षित हो शत्रुघ्नको अपने साथ रथपर लेकर नानाके अपने ही समान माननीय मन्त्रियोंके साथ मामाके घरसे चले; मानो कोई सिद्ध पुरुष इन्द्रलोकसे किसी अन्य स्थानके लिये प्रस्थित हुआ हो॥ ३० ॥

Page 654Permalink

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें सत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ७०॥