श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
ग्यारहवाँ सर्ग
ग्यारहवाँ सर्ग
वह सीता नहीं है—ऐसा निश्चय होनेपर हनुमान्जीका पुनः अन्तःपुरमें और उसकी पानभूमिमें सीताका पता लगाना, उनके मनमें धर्मलोपकी आशंका और स्वतः उसका निवारण होना
फिर उस समय इस विचारको छोड़कर महाकपि हनुमान्जी अपनी स्वाभाविक स्थितिमें स्थित हुए और वे सीताजीके विषयमें दूसरे प्रकारकी चिन्ता करने लगे॥
(उन्होंने सोचा—) ‘भामिनी सीता श्रीरामचन्द्रजीसे बिछुड़ गयी हैं। इस दशामें वे न तो सो सकती हैं, न भोजन कर सकती हैं, न श्रृंगार एवं अलंकार धारण कर सकती हैं, फिर मदिरापानका सेवन तो किसी प्रकार भी नहीं कर सकतीं॥ २ ॥
‘वे किसी दूसरे पुरुषके पास, वह देवताओंका भी ईश्वर क्यों न हो, नहीं जा सकतीं। देवताओंमें भी कोई ऐसा नहीं है जो श्रीरामचन्द्रजीकी समानता कर सके॥ ३ ॥
‘अतः अवश्य ही यह सीता नहीं, कोई दूसरी स्त्री है।’ ऐसा निश्चय करके वे कपिश्रेष्ठ सीताजीके दर्शनके लिये उत्सुक हो पुनः वहाँकी मधुशालामें विचरने लगे॥
वहाँ कोई स्त्रियाँ क्रीड़ा करनेसे थकी हुई थीं तो कोई गीत गानेसे। दूसरी नृत्य करके थक गयी थीं और कितनी ही स्त्रियाँ अधिक मद्यपान करके अचेत हो रही थीं॥ ५ ॥
बहुत-सी स्त्रियाँ ढोल, मृदंग और चेलिका नामक वाद्योंपर अपने अंगोंको टेककर सो गयी थीं तथा दूसरी महिलाएँ अच्छे-अच्छे बिछौनोंपर सोयी हुई थीं॥ ६ ॥
वानरयूथपति हनुमान्जीने उस पानभूमिको ऐसी सहस्रों रमणियोंसे संयुक्त देखा, जो भाँति-भाँतिके आभूषणोंसे विभूषित, रूप-लावण्यकी चर्चा करनेवाली, गीतके समुचित अभिप्रायको अपनी वाणीद्वारा प्रकट करनेवाली, देश और कालको समझनेवाली, उचित बात बोलनेवाली और रति-क्रीड़ामें अधिक भाग लेनेवाली थीं॥ ७-८ ॥
दूसरे स्थानपर भी उन्होंने ऐसी सहस्रों सुन्दरी युवतियोंको सोते देखा, जो आपसमें रूप-सौन्दर्यकी चर्चा करती हुई लेट रही थीं॥ ९ ॥
वानरयूथपति पवनकुमारने ऐसी बहुत-सी स्त्रियोंको देखा, जो देश-कालको जाननेवाली, उचित बात कहनेवाली तथा रतिक्रीड़ाके पश्चात् गाढ़ निद्रामें सोयी हुई थीं॥ १० ॥
उन सबके बीचमें महाबाहु राक्षसराज रावण विशाल गोशालामें श्रेष्ठ गौओंके बीच सोये हुए साँड़की भाँति शोभा पा रहा था॥ ११ ॥
जैसे वनमें हाथियोंसे घिरा हुआ कोई महान् गजराज सो रहा हो, उसी प्रकार उस भवनमें उन सुन्दरियोंसे घिरा हुआ स्वयं राक्षसराज रावण सुशोभित हो रहा था॥ १२ ॥
उस महाकाय राक्षसराजके भवनमें कपिश्रेष्ठ हनुमान्ने वह पानभूमि देखी, जो सम्पूर्ण मनोवाञ्छित भोगोंसे सम्पन्न थी। उस मधुशालामें अलग-अलग मृगों, भैंसों और सूअरोंके मांस रखे गये थे, जिन्हें हनुमान्जीने देखा॥ १३-१४ ॥
वानरसिंह हनुमान्ने वहाँ सोनेके बड़े-बड़े पात्रोंमें मोर, मुर्गे, सूअर, गेंडा, साही, हरिण तथा मयूरोंके मांस देखे, जो दही और नमक मिलाकर रखे गये थे। वे अभी खाये नहीं गये थे॥ १५-१६ ॥
कृकल नामक पक्षी, भाँति-भाँतिके बकरे, खरगोश, आधे खाये हुए भैंसे, एकशल्य नामक मत्स्य और भेड़ें— ये सब-के-सब राँध-पकाकर रखे हुए थे। इनके साथ अनेक प्रकारकी चटनयाँ भी थीं। भाँति-भाँतिके पेय तथा भक्ष्य पदार्थ भी विद्यमान थे। जीभकी शिथिलता दूर करनेके लिये खटाई और नमकके साथ भाँति-भाँतिके राग<sup>१</sup> और खाण्डव भी रखे गये थे॥ १७-१८ ॥
बहुमूल्य बड़े-बड़े नूपुर और बाजूबंद जहाँ-तहाँ पड़े हुए थे। मद्यपानके पात्र इधर-उधर लुढ़काये हुए थे। भाँति-भाँतिके फल भी बिखरे पड़े थे। इन सबसे उपलक्षित होनेवाली वह पानभूमि, जिसे फूलोंसे सजाया गया था, अधिक शोभाका पोषण एवं संवर्धन कर रही थी॥ १९<sup>१/२</sup> ॥
यत्र-तत्र रखी हुई सुदृढ़ शय्याओं और सुन्दर स्वर्णमय सिंहासनोंसे सुशोभित होनेवाली वह मधुशाला ऐसी जगमगा रही थी कि बिना आगके ही जलती हुई-सी दिखायी देती थी॥ २०<sup>१/२</sup> ॥
अच्छी छौंक-बघारसे तैयार किये गये नाना प्रकारके विविध मांस चतुर रसोइयोंद्वारा बनाये गये थे और उस पानभूमिमें पृथक्-पृथक् सजाकर रखे गये थे। उनके साथ ही स्वच्छ दिव्य सुराएँ (जो कदम्ब आदि वृक्षोंसे स्वतः उत्पन्न हुई थीं) और कृत्रिम सुराएँ (जिन्हें शराब बनानेवाले लोग तैयार करते हैं) भी वहाँ रखी गयी थीं। उनमें शर्करासव,<sup>२</sup> माध्वीक,<sup>३</sup> पुष्पासव<sup>४</sup> और फलासव<sup>५</sup> भी थे। इन सबको नाना प्रकारके सुगन्धित चूर्णोंसे पृथक्-पृथक् वासित किया गया था॥ २१—२३ ॥
वहाँ अनेक स्थानोंपर रखे हुए नाना प्रकारके फूलों, सुवर्णमय कलशों, स्फटिकमणिके पात्रों तथा जाम्बूनदके बने हुए अन्यान्य कमण्डलुओंस व्याप्त हुऽइ वह पानभूमि बड़ी शोभा पा रही थी॥ २४१/२ ॥
चाँदी और सोनेके घड़ोंमें, जहाँ श्रेष्ठ पेय पदार्थ रखे थे, उस पानभूमिको कपिवर हनुमान्जीने वहाँ अच्छी तरह घूम-घूमकर देखा॥ २५१/२ ॥
महाकपि पवनकुमारने देखा, वहाँ मदिरासे भरे हुए सोने और मणियोंके भिन्न-भिन्न पात्र रखे गये हैं॥ २६१/२ ॥
किसी घड़ेमें आधी मदिरा शेष थी तो किसी घड़ेकी सारी-की-सारी पी ली गयी थी तथा किन्हीं-किन्हीं घड़ोंमें रखे हुए मद्य सर्वथा पीये नहीं गये थे। हनुमान्जीने उन सबको देखा॥ २७१/२ ॥
कहीं नाना प्रकारके भक्ष्य पदार्थ और कहीं पीनेकी वस्तुएँ अलग-अलग रखी गयी थीं और कहीं उनमेंसे आधी-आधी सामग्री ही बची थी। उन सबको देखते हुए वे वहाँ सर्वत्र विचरने लगे॥ २८१/२ ॥
उस अन्तःपुरमें स्त्रियोंकी बहुत-सी शय्याएँ सूनी पड़ी थीं और कितनी ही सुन्दरियाँ एक ही जगह एक-दूसरीका आलिंगन किये सो रही थीं॥ २९ ॥
निद्राके बलसे पराजित हुऽइ कोऽइ अबला दूसरी स्त्रीका वस्त्र उतारकर उसे धारण किये उसके पास जा उसीका आलिंगन करके सो गयी थी॥ ३० ॥
उनकी साँसकी हवासे उनके शरीरके विविध प्रकारके वस्त्र और पुष्पमाला आदि वस्तुएँ उसी तरह धीरे-धीरे हिल रही थीं, जैसे धीमी-धीमी वायुके चलनेसे हिला करती हैं॥ ३१ ॥
उस समय पुष्पकविमानमें शीतल चन्दन, मद्य, मधुरस, विविध प्रकारकी माला, भाँति-भाँतिके पुष्प, स्नान-सामग्री, चन्दन और धूपकी अनेक प्रकारकी गन्धका भार वहन करती हुऽइ सुगन्धित वायु सब ओर प्रवाहित हो रही थी॥ ३२-३३१/२ ॥
उस राक्षसराजके भवनमें कोऽइ साँवली, कोऽइ गोरी, कोऽइ काली और कोऽइ सुवर्णके समान कान्तिवाली सुन्दरी युवतियाँ सो रही थीं॥ ३४१/२ ॥
निद्राके वशमें होनेके कारण उनका काममोहित रूप मुँदे हुए मुखवाले कमलपुष्पोंके समान जान पड़ता था॥
इस प्रकार महातेजस्वी कपिवर हनुमान्ने रावणका सारा अन्तःपुर छान डाला तो भी वहाँ उन्हें जनकनन्दिनी सीताका दर्शन नहीं हुआ॥ ३६ ॥
उन सोती हुईं स्त्रियोंको देखते-देखते महाकपि हनुमान् धर्मके भयसे शंकित हो उठे। उनके हृदयमें बड़ा भारी संदेह उपस्थित हो गया॥ ३७ ॥
वे सोचने लगे कि 'इस तरह गाढ़ निद्रामें सोयी हुईं परायी स्त्रियोंको देखना अच्छा नहीं है। यह तो मेरे धर्मका अत्यन्त विनाश कर डालेगा॥ ३८ ॥
'मेरी दृष्टि अबतक कभी परायी स्त्रियोंपर नहीं पड़ी थी। यहीं आनेपर मुझे परायी स्त्रियोंका अपहरण करनेवाले इस पापी रावणका भी दर्शन हुआ है (ऐसे पापीको देखना भी धर्मका लोप करनेवाला होता है)'॥ ३९ ॥
तदनन्तर मनस्वी हनुमान्जीके मनमें एक दूसरी विचारधारा उत्पन्न हुईं। उनका चित्त अपने लक्ष्यमें सुस्थिर था; अतः यह नयी विचारधारा उन्हें अपने कर्तव्यका ही निश्चय करानेवाली थी॥ ४० ॥
(वे सोचने लगे—) 'इसमें संदेह नहीं कि रावणकी स्त्रियाँ निःशंक सो रही थीं और उसी अवस्थामें मैंने उन सबको अच्छी तरह देखा है, तथापि मेरे मनमें कोई विकार नहीं उत्पन्न हुआ है॥ ४१ ॥
'सम्पूर्ण इन्द्रियोंको शुभ और अशुभ अवस्थाओंमें लगनेकी प्रेरणा देनेमें मन ही कारण है; किंतु मेरा वह मन पूर्णतः स्थिर है (उसका कहीं राग या द्वेष नहीं है; इसलिये मेरा यह परस्त्री-दर्शन धर्मका लोप करनेवाला नहीं हो सकता)'॥ ४२ ॥
'विदेहनन्दिनी सीताको दूसरी जगह मैं ढूँढ़ भी तो नहीं सकता था; क्योंकि स्त्रियोंको ढूँढ़ते समय उन्हें स्त्रियोंके ही बीचमें देखा जाता है॥ ४३ ॥
'जिस जीवकी जो जाति होती है, उसीमें उसे खोजा जाता है। खोयी हुई युवती स्त्रीको हरिनियोंके बीचमें नहीं ढूँढ़ा जा सकता है॥ ४४ ॥
'अतः मैंने रावणके इस सारे अन्तःपुरमें शुद्ध हृदयसे ही अन्वेषण किया है; किंतु यहाँ जानकीजी नहीं दिखायी देती हैं'॥ ४५ ॥
अन्तःपुरका निरीक्षण करते हुए पराक्रमी हनुमान्ने देवताओं, गन्धर्वों और नागोंकी कन्याओंको वहाँ देखा, किंतु जनकनन्दिनी सीताको नहीं देखा॥ ४६ ॥
दूसरी सुन्दरियोंको देखते हुए वीर वानर हनुमान्ने जब वहाँ सीताको नहीं देखा, तब वे वहाँसे हटकर अन्यत्र जानेको उद्यत हुए॥ ४७ ॥
फिर तो श्रीमान् पवनकुमारने उस पानभूमिको छोड़कर अन्य सब स्थानोंमें उन्हें बड़े यत्नका आश्रय लेकर खोजना आरम्भ किया॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें ग्यारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११ ॥
१. अंगूर और अनारके रसमें मिश्री और मधु आदि मिलानेसे जो मधुर रस तैयार होता है, वह पतला हो तो ‘राग’ कहलाता है और गाढ़ा हो जाय तो ‘खाण्डव’ नाम धारण करता है। जैसा कि कहा है— सितामध्वादिमधुरो द्राक्षादाडिमयो रसः। विरलश्चेत् कृतो रागः सान्द्रश्चेत् खाण्डवः स्मृतः॥
२. शर्करासे तैयार की हुई सुरा ‘शर्करासव’ कहलाती है।
३. मधुसे बनायी हुई ‘मदिरा’।
४. महुआके फूलसे तथा अन्यान्य पुष्पोंके मकरन्दसे बनायी हुई सुराको ‘पुष्पासव’ कहते हैं।
५. द्राक्षा आदि फलोंके रससे तैयार की हुई ‘सुरा’।