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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

चौदहवाँ सर्ग

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चौदहवाँ सर्ग

वाली-वधके लिये श्रीरामका आश्वासन पाकर सुग्रीवकी विकट गर्जना

वे सब लोग शीघ्रतापूर्वक वालीकी किष्किन्धापुरीमें पहुँचकर एक गहन वनमें वृक्षोंकी ओटमें अपने-आपको छिपाकर खड़े हो गये॥ १ ॥

वनके प्रेमी विशाल ग्रीवावाले सुग्रीवने उस वनमें चारों ओर दृष्टि दौड़ायी और अपने मनमें अत्यन्त क्रोधका संचय किया॥ २ ॥

तदनन्तर अपने सहायकोंसे घिरे हुए उन्होंने अपने सिंहनादसे आकाशको फाड़ते हुए-से घोर गर्जना की और वालीको युद्धके लिये ललकारा॥ ३ ॥

उस समय सुग्रीव वायुके वेगके साथ गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ते थे। अपनी अङ्गकान्ति और प्रतापके द्वारा प्रातःकालके सूर्यकी भाँति प्रकाशित होते थे। उनकी चाल दर्पभरे सिंहके समान प्रतीत होती थी॥ ४ ॥

कार्यकुशल श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देखकर सुग्रीवने कहा—‘भगवन्! वालीकी यह किष्किन्धापुरी तपाये हुए सुवर्णके द्वारा निर्मित नगरद्वारसे सुशोभित है। इसमें सब ओर वानरोंका जाल-सा बिछा हुआ है तथा यह ध्वजों और यन्त्रोंसे सम्पन्न है। हम सब लोग इस पुरीमें आ पहुँचे हैं। वीर! आपने पहले वाली-वधके लिये जो प्रतिज्ञा की थी, उसे अब शीघ्र सफल कीजिये। ठीक उसी तरह जैसे आया हुआ अनुकूल समय लताको फल-फूलसे सम्पन्न कर देता है’॥ ५-६ १/२ ॥

सुग्रीवके ऐसा कहनेपर शत्रुसूदन धर्मात्मा श्रीरघुनाथजीने फिर अपनी पूर्वोक्त बातको दोहराते हुए ही सुग्रीवसे कहा—॥ ७ १/२ ॥

‘वीर! अब तो इस गजपुष्पी लताके द्वारा तुमने अपनी पहचानके लिये चिह्न धारण कर ही लिया है। लक्ष्मणने इसे उखाड़कर तुम्हारे कण्ठमें पहना ही दिया है। तुम कण्ठमें धारण की हुई इस लताके द्वारा बड़ी शोभा पा रहे हो। यदि आकाशमेंयह विपरीत घटना हो कि सूर्यमण्डल नक्षत्रमालासे घिर जाय तभी इस कण्ठ-लम्बिनी लतासे सुशोभित होनेवाले तुम्हारी उस सूर्यसे तुलना हो सकती है॥ ८-९ १/२ ॥

‘वानरराज! आज मैं वालीसे उत्पन्न हुए तुम्हारे भय और वैर दोनोंको युद्धस्थलमें एक ही बार बाण छोड़कर मिटा दूँगा॥ १० १/२॥

‘सुग्रीव! तुम मुझे अपने उस भ्रातारूपी शत्रुको दिखा तो दो। फिर वाली मारा जाकर वनके भीतर धूलमें लोटता दिखायी देगा॥ ११ १/२॥

‘यदि मेरी दृष्टिमें पड़ जानेपर भी वह जीवित लौट जाय तो तुम मुझे दोषी समझना और तत्काल जी भरकर मेरी निन्दा करना॥ १२ १/२॥

‘तुम्हारी आँखोंके सामने मैंने अपने एक ही बाणसे सात सालके वृक्ष विदीर्ण किये थे, मेरे उसी बलसे आज समराङ्गणमें (एक बाणसे ही) तुम वालीको मारा गया समझो॥ १३ १/२॥

‘बहुत समयसे संकट झेलते रहनेपर भी मैं कभी झूठ नहीं बोला हूँ। मेरे मनमें धर्मका लोभ है। इसलिये किसी तरह मैं झूठ तो बोलूँगा ही नहीं। साथ ही अपनी प्रतिज्ञाको भी अवश्य सफल करूँगा। अतः तुम भय और घबराहटको अपने हृदयसे निकाल दो॥ १४-१५॥

‘जैसे इन्द्र वर्षा करके उगे हुए धानके खेतको फलसे सम्पन्न करते हैं, उसी तरह मैं भी बाणका प्रयोग करके वालीके वधद्वारा तुम्हारा मनोरथ पूर्ण करूँगा। इसलिये सुग्रीव! तुम सुवर्णमालाधारी वालीको बुलानेके लिये इस समय ऐसी गर्जना करो, जिससे तुम्हारा सामना करनेके लिये वह वानर नगरसे बाहर निकल आये॥ १६ १/२॥

‘वह अनेक युद्धोंमें विजय पाकर विजयश्रीसे सुशोभित हुआ है। सबपर विजय पानेकी इच्छा रखता है और उसने कभी तुमसे हार नहीं खायी है। इसके अलावे युद्धसे उसका बड़ा प्रेम है, अतः वाली कहीं भी आसक्त न होकर नगरके बाहर अवश्य निकलेगा॥

‘क्योंकि अपने पराक्रमको जाननेवाले वीर पुरुष, विशेषतः स्त्रियोंके सामने, युद्धके लिये शत्रुओंके तिरस्कारपूर्ण शब्द सुनकर कदापि सहन नहीं करते हैं’॥

श्रीरामचन्द्रजीकी यह बात सुनकर सुवर्णके समान पिङ्गलवर्णवाले सुग्रीवने आकाशको विदीर्ण-सा करते हुए कठोर स्वरमें बड़ी भयंकर गर्जना की॥ १९ १/२॥

उस सिंहनादसे भयभीत हो बड़े-बड़े बैल शक्तिहीन हो राजाके दोषसे परपुरुषोंद्वारा पकड़ी जानेवाली कुलाङ्गनाओंके समान व्याकुलचित्त हो सब ओर भाग चले॥ २०॥

मृग युद्धस्थलमें अस्त्र-शस्त्रोंकी चोट खाकर भागे हुए घोड़ोंके समान तीव्र गतिसे भागने लगे और पक्षी जिनके पुण्य नष्ट हो गये हैं, ऐसे ग्रहोंके समान आकाशसे पृथ्वीपर गिरने लगे॥

२१ ॥

तदनन्तर जिनका सिंहनाद मेघकी गर्जनाके समान गम्भीर था और शौर्यके द्वारा जिनका तेज बढ़ा हुआ था, वे सुविख्यात सूर्यकुमार सुग्रीव बड़ी उतावलीके साथ बारंबार गर्जना करने लगे, मानो वायुके वेगसे चञ्चल हुई उत्ताल तरङ्ग-मालाओंसे सुशोभित सरिताओंका स्वामी समुद्र कोलाहल कर रहा हो॥ २२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें चौदहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १४॥