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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पैंसठवाँ सर्ग

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पैंसठवाँ सर्ग

बारी-बारीसे वानर-वीरोंके द्वारा अपनी-अपनी गमनशक्तिका वर्णन, जाम्बवान् और अङ्गदकी बातचीत तथा जाम्बवान्‌का हनुमान्‌जीको प्रेरित करनेके लिये उनके पास जाना

अङ्गदकी यह बात सुनकर वे सभी श्रेष्ठ वानर लम्बी छलाँग मारनेके सम्बन्धमें अपने-अपने उत्साहका—शक्तिका क्रमशः परिचय देने लगे॥ १ ॥

गज, गवाक्ष, गवय, शरभ, गन्धमादन, मैन्द, द्विविद, सुषेण और जाम्बवान्—इन सबने अपनी-अपनी शक्तिका वर्णन किया॥ २ ॥

इनमेंसे गजने कहा—‘मैं दस योजनकी छलाँग मार सकता हूँ।’ गवाक्ष बोले—‘मैं बीस योजनतक चला जाऊँगा’॥ ३ ॥

इसके बाद वहाँ शरभ नामक वानरने उन कपिवरोंसे कहा—‘वानरो! मैं तीस योजनतक एक छलाँगमें चला जाऊँगा’॥ ४ ॥

तदनन्तर कपिवर ऋषभने उन वानरोंसे कहा—‘मैं चालीस योजनतक चला जाऊँगा, इसमें संशय नहीं है’॥

तत्पश्चात् महातेजस्वी गन्धमादनने उन वानरोंसे कहा—‘इसमें संदेह नहीं कि मैं पचास योजनतक एक छलाँगमें चला जाऊँगा’॥ ६ ॥

इसके बाद वहाँ वानर-वीर मैन्द उन वानरोंसे बोले—‘मैं साठ योजनतक एक छलाँगमें कूद जानेका उत्साह रखता हूँ’॥ ७ ॥

तदनन्तर महातेजस्वी द्विविद बोले—‘मैं सत्तर योजनतक चला जाऊँगा, इसमें संदेह नहीं है’॥ ८ ॥

इसके बाद धैर्यशाली कपिश्रेष्ठ महातेजस्वी सुषेण बोले—‘मैं एक छलाँगमें असी योजनतक जानेकी प्रतिज्ञा करता हूँ’॥ ९ ॥

इस प्रकार कहनेवाले सब वानरोंका सम्मान करके ऋक्षराज जाम्बवान्, जो सबसे बूढ़े थे, बोले—॥ १० ॥

‘पहले युवावस्थामें मेरे अंदर भी दूरतक छलाँग मारनेकी कुछ शक्ति थी। यद्यपि अब मैं उस अवस्थाको पार कर चुका हूँ तो भी जिस कार्यके लिये वानरराज सुग्रीव तथा भगवान् श्रीराम

दृढ़ निश्चय कर चुके हैं, उसकी मेरे द्वारा उपेक्षा नहीं की जा सकती। इस समय मेरी जो गति है, उसे आपलोग सुनें। मैं एक छलाँगमें नब्बे योजनतक चला जाऊँगा, इसमें संशय नहीं है' ॥

ऐसा कहकर जाम्बवान् उन समस्त श्रेष्ठ वानरोंसे पुनः इस प्रकार बोले—'पूर्वकालमें मेरे अंदर इतनी ही दूरतक चलनेकी शक्ति नहीं थी। पहले राजा बलिके यज्ञमें सर्वव्यापी एवं सबके कारणभूत सनातन भगवान् विष्णु जब तीन पग भूमि नापनेके लिये अपने पैर बढ़ा रहे थे, उस समय मैंने उनके उस विराट् स्वरूपकी थोड़े ही समयमें परिक्रमा कर ली थी॥ १४-१५ ॥

'इस समय तो मैं बूढ़ा हो गया, अतः छलाँग मारनेकी मेरी शक्ति बहुत कम हो गयी है; किंतु युवावस्थामें मेरे भीतर वह महान् बल था, जिसकी कहीं तुलना नहीं है॥ १६ ॥

'आजकल तो मुझमें स्वतः चलनेकी इतनी ही शक्ति है, परंतु इतनी ही गतिसे समुद्रलङ्घनरूप इस वर्तमान कार्यकी सिद्धि नहीं हो सकती' ॥ १७ ॥

तदनन्तर बुद्धिमान् महाकपि अङ्गदने उस समय जाम्बवान्का विशेष आदर करके यह उदारतापूर्ण बात कही—॥ १८ ॥

'मैं इस महासागरके सौ योजनकी विशाल दूरीको लाँघ जाऊँगा, किंतु उधरसे लौटनेमें मेरी ऐसी ही शक्ति रहेगी या नहीं, यह निश्चितरूपसे नहीं कहा जा सकता' ॥ १९ ॥

तब बातचीतकी कलामें चतुर जाम्बवान्ने कपिश्रेष्ठ अङ्गदसे कहा—'रीछों और वानरोंमें श्रेष्ठ युवराज! तुम्हारी गमनशक्तिसे हमलोग भलीभाँति परिचित हैं॥ २० ॥

'भले ही, तुम एक लाख योजनतक चले जाओ, तथापि तुम सबके स्वामी हो, अतः तुम्हें भेजना हमारे लिये उचित नहीं है। तुम लाखों योजन जाने और वहाँसे लौटनेमें समर्थ हो॥ २१ ॥

'किंतु तात! वानरशिरोमणे! जो सबको भेजनेवाला स्वामी है, वह किसी तरह प्रेष्य (आज्ञापालक) नहीं हो सकता। ये सब लोग तुम्हारे सेवक हैं, तुम इन्हींमेंसे किसीको भेजो॥ २२ ॥

'तुम कलत्र (स्त्रीकी भाँति रक्षणीय) हो, (जैसे नारी पतिके हृदयकी स्वामिनी होती है, उसी प्रकार) तुम हमारे स्वामीके पदपर प्रतिष्ठित हो। परंतप! स्वामी सेनाके लिये कलत्र (स्त्री) के समान संरक्षणीय होता है। यही लोककी मान्यता है॥ २३ ॥

'शत्रुदमन! तात! तुम्हीं उस कार्यके मूल हो, अतः सदा कलत्रकी भाँति तुम्हारा पालन करना उचित है॥ २४ ॥

‘कार्यके मूलकी रक्षा करनी चाहिये। यही कार्यके तत्त्वको जाननेवाले विद्वानोंकी नीति है; क्योंकि मूलके रहनेपर ही सभी गुण सफल सिद्ध होते हैं॥ २५ ॥

‘अतः सत्यपराक्रमी शत्रुदमन वीर! तुम्हीं इस कार्यके साधन तथा बुद्धि और पराक्रमसे सम्पन्न हेतु हो॥ २६ ॥

‘कपिश्रेष्ठ! तुम्हीं हमारे गुरु और गुरुपुत्र हो। तुम्हारा आश्रय लेकर ही हम सब लोग कार्यसाधनमें समर्थ हो सकते हैं’॥ २७ ॥

जब परम बुद्धिमान् जाम्बवान् पूर्वोक्त बात कह चुके, तब महाकपि वालिकुमार अङ्गदने उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया— ॥ २८ ॥

‘यदि मैं नहीं जाऊँगा और दूसरा कोऽंइ भी श्रेष्ठ वानर जानेको तैयार न होगा, तब फिर हमलोगोंको निश्चितरूपसे मरणान्त उपवास ही करना चाहिये॥ २९ ॥

‘बुद्धिमान् वानरराज सुग्रीवके आदेशका पालन किये बिना यदि हमलोग किष्किन्धाको लौट चलें तो वहाँ जाकर भी हमें अपने प्राणोंकी रक्षाका कोऽंइ उपाय नहीं दिखायी देता॥ ३० ॥

‘वे हमपर कृपा करने और अत्यन्त कुपित होकर हमें दण्ड देनेमें भी समर्थ हैं। उनकी आज्ञाका उल्लङ्घन करके जानेपर हमारा विनाश अवश्यम्भावी है॥ ३१ ॥

‘अतः जिस उपायसे इस सीता दर्शनरूपी कार्यकी सिद्धिमें कोऽंइ रुकावट न पड़े, उसका आप ही विचार करें; क्योंकि आपको सब बातोंका अनुभव है’॥ ३२ ॥

उस समय अङ्गदके ऐसा कहनेपर वीर वानर-शिरोमणि जाम्बवान्ने उनसे यह उत्तम बात कही— ॥ ३३ ॥

‘वीर! तुम्हारे इस कार्यमें कोऽंइ किंचित् भी त्रुटि नहीं आने पायेगी। अब मैं ऐसे वीरको प्रेरित कर रहा हूँ, जो इस कार्यको सिद्ध कर सकेगा’॥ ३४ ॥

ऐसा कहकर वानरों और भालुओंके वीर यूथपति जाम्बवान्ने वानरसेनाके श्रेष्ठ वीर हनुमान्जीको ही प्रेरित किया, जो एकान्तमें जाकर मौजसे बैठे हुए थे। उन्हें किसी बातकी चिन्ता नहीं थी और वे दूरतककी छलाँग मारनेवालोंमें सबसे श्रेष्ठ थे॥ ३५ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६५ ॥