श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
इक्यासीवाँ सर्ग
इक्यासीवाँ सर्ग
इन्द्रजित्के द्वारा मायामयी सीताका वध
महात्मा रघुनाथजीके मनोभावको समझकर इन्द्रजित् युद्धसे निवृत्त हो लङ्कापुरीमें चला गया॥ १ ॥
वहाँ जानेपर बलवान् राक्षसोंके वधका स्मरण हो आनेसे शूरवीर रावणकुमारकी आँखें क्रोधसे लाल हो गयीं। वह पुनः युद्धके लिये निकला॥ २ ॥
पुलस्त्यकुलमें उत्पन्न महापराक्रमी इन्द्रजित् देवताओंके लिये कण्टकरूप था। वह राक्षसोंकी बहुत बड़ी सेना साथ लेकर नगरके पश्चिम द्वारसे पुनः बाहर आया॥ ३ ॥
दोनों भाई वीर श्रीराम और लक्ष्मणको युद्धके लिये उद्यत देख इन्द्रजित्ने उस समय माया प्रकट की॥ ४ ॥
उसने मायामयी सीताका निर्माण करके उसे अपने रथपर बिठा लिया और विशाल सेनाके घेरेमें रखकर उसका वध करनेका विचार किया॥ ५ ॥
उसकी बुद्धि बहुत ही खोटी थी। उसने सबको मोहमें डालनेका विचार करके मायासे बनी हुई सीताको मारनेका निश्चय किया। इसी अभिप्रायसे वह वानरोंके सामने गया॥
उसे युद्धके लिये निकलते देख सभी वानर क्रोधसे भर गये और हाथमें शिला उठाये युद्धकी इच्छासे उसके ऊपर टूट पड़े॥ ७ ॥
कपिकुञ्जर हनुमान्जी उन सबके आगे-आगे चले। उन्होंने पर्वतका एक बहुत बड़ा शिखर ले रखा था, जिसे उठाना दूसरेके लिये नितान्त कठिन था॥ ८ ॥
उन्होंने इन्द्रजित्के रथपर सीताको देखा। उनकी खुशी मारी गयी थी। वे एक वेणी धारण किये बहुत दुःखी दिखायी देती थीं और उपवास करनेके कारण उनका मुख दुबला-पतला हो गया था॥ ९ ॥
उनके शरीरपर एक ही मलिन वस्त्र था। श्रीरघुनाथजीकी प्रिया सीताके अङ्गोंमें उबटन आदि नहीं लगे थे। उनके सारे शरीरमें धूल और मैल भरी थी तो भी वे श्रेष्ठ और सुन्दर दिखायी देती थीं॥ १० ॥
हनुमान्जी कुछ देरतक उनकी ओर देखते रहे। अन्तमें यह निश्चय किया कि ये मिथिलेशकुमारी ही हैं। उन्होंने जनककिशोरीको थोड़े ही दिन पहले देखा था, इसलिये वे शीघ्र ही उन्हें पहचान सके थे॥ ११ ॥
राक्षसराजके पुत्र इन्द्रजित्के पास रथपर बैठी हुई तपस्विनी सीता शोकसे पीड़ित, दीन एवं आनन्दशून्य हो रही थीं॥ १२ ॥
सीताको वहाँ देखकर महाकपि हनुमान्जी यह सोचने लगे कि आखिर इस राक्षसका अभिप्राय क्या है? फिर वे मुख्य-मुख्य वानरोंको साथ लेकर रावणपुत्रकी ओर दौड़े॥ १३ ॥
वानरोंकी उस सेनाको अपनी ओर आती देख रावणकुमारके क्रोधकी सीमा न रही। उसने तलवारको म्यानसे बाहर निकाला और सीताके सिरके केश पकड़कर उन्हें घसीटा॥ १४ ॥
मायाद्वारा रथपर बैठायी हुई वह स्त्री ‘हा राम, हा राम’ कहकर चिल्ला रही थी और वह राक्षस उन सबके देखते-देखते उस स्त्रीको पीट रहा था॥ १५ ॥
सीताका केश पकड़ा गया देख हनुमान्जीको बड़ा दुःख हुआ। वे पवनकुमार हनुमान् अपने नेत्रोंसे दुःखजनित आँसू बहाने लगे॥ १६ ॥
श्रीरामचन्द्रजीकी सर्वाङ्गसुन्दरी प्यारी पटरानी सीताको उस अवस्थामें देख हनुमान्जी कुपित हो उठे और उस राक्षसराजकुमार इन्द्रजित्से कठोर वाणीमें बोले— ॥ १७ ॥
‘दुरात्मन्! तू अपने विनाशके लिये ही तुला हुआ है, तभी सीताके केशोंका स्पर्श कर रहा है। तेरा जन्म ब्रह्मर्षियोंके कुलमें हुआ है तथापि तूने राक्षस-जातिके स्वभावका ही आश्रय लिया है॥ १८ ॥
‘अरे! तेरी बुद्धि ऐसी बिगड़ी हुई है? धिक्कार है तुझ-जैसे पापाचारीको! नृशंस! अनार्य! दुराचारी तथा पापपूर्ण पराक्रम करनेवाले नीच! तेरी यह करतूत नीच पुरुषोंके ही योग्य है। निर्दयी! तेरे हृदयमें तनिक भी दया नहीं है॥ १९ ॥
‘बेचारी मिथिलेशकुमारी घरसे, राज्यसे और श्रीरामचन्द्रजीके करकमलोंके आश्रयसे भी बिछड़ गयी हैं। निष्ठुर! इन्होंने तेरा क्या अपराध किया है, जो तू इन्हें इतनी निर्दयतासे मार रहा है?॥ २० ॥
‘सीताको मारकर तू अधिक कालतक किसी तरह जीवित नहीं रह सकेगा। वधके योग्य नीच! तू अपने पापकर्मके कारण मेरे हाथमें पड़ गया है (अब तेरा जीना कठिन है)॥ २१ ॥
‘लोकमें अपने पापके कारण वधके योग्य माने गये जो चोर आदि हैं, वे भी जिन लोकोंकी निन्दा करते हैं तथा जो स्त्री-हत्यारोंको ही मिलते हैं, तू यहाँ अपने प्राणोंका परित्याग करके उन्हीं नरक-लोकोंमें जायगा’॥ २२ ॥
ऐसी बातें कहते हुए हनुमान्जी अत्यन्त कुपित हो शिला आदि आयुध धारण करनेवाले वानरवीरोंके साथ राक्षसराजकुमारपर टूट पड़े॥ २३ ॥
वानरोंके उस महापराक्रमी सैन्य-समुदायको आक्रमण करते देख इन्द्रजित्ने भयानक क्रोधवाले राक्षसोंकी सेनाके द्वारा उसे आगे बढ़नेसे रोका॥ २४ ॥
फिर सहस्रों बाणोंद्वारा उस वानरवाहिनीमें हलचल मचाकर इन्द्रजित्ने कपिश्रेष्ठ हनुमान्जीसे कहा—॥ २५ ॥
‘वानर! सुग्रीव, राम और तुम सब लोग जिसके लिये यहाँतक आये हो, उस विदेहकुमारी सीताको मैं अभी तुम्हारे देखते-देखते मार डालूँगा। इसे मारकर मैं क्रमशः राम-लक्ष्मणका, तुम्हारा, सुग्रीवका तथा उस अनार्य विभीषणका भी वध कर डालूँगा॥ २६-२७ ॥
‘बंदर! तुम जो यह कह रहे थे कि स्त्रियोंको मारना नहीं चाहिये, उसके उत्तरमें मुझे यह कहना है कि जिस कार्यके करनेसे शत्रुओंको अधिक कष्ट पहुँचे, वह कर्तव्य ही माना गया है॥ २८ ॥
हनुमान्जीसे ऐसा कहकर इन्द्रजित्ने स्वयं ही तेज धारवाली तलवारसे उस रोती हुई मायामयी सीतापर घातक प्रहार किया॥ २९ ॥
शरीरमें यज्ञोपवीत धारण करनेका जो स्थान है, उसी जगहसे उस मायामयी सीताके दो टुकड़े हो गये और वह स्थूल कटिप्रदेशवाली प्रियदर्शना तपस्विनी पृथ्वीपर गिर पड़ी॥ ३० ॥
उस स्त्रीका वध करके इन्द्रजित्ने हनुमान्से कहा—‘देख लो, मैंने रामकी इस प्यारी पत्नीको तलवारसे काट डाला। यह रही कटी हुई विदेह-राजकुमारी सीता। अब तुमलोगोंका युद्धके लिये परिश्रम व्यर्थ है’॥ ३१ ॥
इस प्रकार स्वयं इन्द्रजित् विशाल खड्गसे उस मायामयी स्त्रीका वध करके रथपर बैठा-बैठा बड़े हर्षके साथ जोर-जोरसे सिंहनाद करने लगा॥ ३२ ॥
पास ही खड़े हुए वानरोंने उसकी उस गर्जनाको सुना। वह उस दुर्गम रथपर बैठकर मुँह बाये विकट सिंहनाद करता था॥ ३३ ॥
रावणके उस पुत्रकी बुद्धि बड़ी खोटी थी। उसने इस प्रकार मायामयी सीताका वध करके अपने मनमें बड़ी प्रसन्नताका अनुभव किया। उसे हर्षसे उत्फुल्ल देख वानर विषादग्रस्त हो भाग खड़े हुए॥ ३४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इक्यासीवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ८१ ॥