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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

पैंसठवाँ सर्ग

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पैंसठवाँ सर्ग

विश्वामित्रकी घोर तपस्या, उन्हें ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति तथा राजा जनकका उनकी प्रशंसा करके उनसे विदा ले राजभवनको लौटना

(शतानन्दजी कहते हैं—) श्रीराम! पूर्वोक्त प्रतिज्ञाके अनन्तर महामुनि विश्वामित्र उत्तर दिशाको त्यागकर पूर्व दिशामें चले गये और वहीं रहकर अत्यन्त कठोर तपस्या करने लगे॥ १ ॥

रघुनन्दन! एक सहस्र वर्षोंतक परम उत्तम मौनव्रत धारण करके वे परम दुष्कर तपस्यामें लगे रहे। उनके उस तपकी कहीं तुलना न थी॥ २ ॥

एक हजार वर्ष पूर्ण होनेतक वे महामुनि काष्ठकी भाँति निश्चेष्ट बने रहे। बीच-बीचमें उनपर बहुत-से विघ्नोंका आक्रमण हुआ, परंतु क्रोध उनके भीतर नहीं घुसने पाया॥ ३ ॥

श्रीराम! अपने निश्चयपर अटल रहकर उन्होंने अक्षय तपका अनुष्ठान किया। उनका एक सहस्र वर्षोंका व्रत पूर्ण होनेपर वे महान् व्रतधारी महर्षि व्रत समाप्त करके अन्न ग्रहण करनेको उद्यत हुए। रघुकुलभूषण! इसी समय इन्द्रने ब्राह्मणके वेषमें आकर उनसे तैयार अन्नकी याचना की॥ ४-५ ॥

तब उन्होंने वह सारा तैयार किया हुआ भोजन उस ब्राह्मणको देनेका निश्चय करके दे डाला। उस अन्नमेंसे कुछ भी शेष नहीं बचा। इसलिये वे महातपस्वी भगवान् विश्वामित्र बिना खाये-पीये ही रह गये॥ ६ ॥

फिर भी उन्होंने उस ब्राह्मणसे कुछ कहा नहीं। अपने मौन-व्रतका यथार्थरूपसे पालन किया। इसके बाद पुनः पहलेकी ही भाँति श्वासोच्छ्वाससे रहित मौन-व्रतका अनुष्ठान आरम्भ किया॥ ७ ॥

पूरे एक हजार वर्षोंतक उन मुनिश्रेष्ठने साँसतक नहीं ली। इस तरह साँस न लेनेके कारण उनके मस्तकसे धुआँ उठने लगा॥ ८ ॥

उससे तीनों लोकोंके प्राणी घबरा उठे, सभी संतप्त-से होने लगे। उस समय देवता, ऋषि, गन्धर्व, नाग, सर्प और राक्षस सब मुनिकी तपस्यासे मोहित हो गये। उनके तेजसे सबकी कान्ति फीकी पड़ गयी। वे सब-के-सब दुःखसे व्याकुल हो पितामह ब्रह्माजीसे बोले— ॥ ९-१० ॥

‘देव! अनेक प्रकारके निमित्तोंद्वारा महामुनि विश्वामित्रको लोभ और क्रोध दिलानेकी चेष्टा की गयी; किंतु वे अपनी तपस्याके प्रभावसे निरन्तर आगे बढ़ते जा रहे हैं॥ ११ ॥

‘हमें उनमें कोई छोटा-सा भी दोष नहीं दिखायी देता। यदि इन्हें इनकी मनचाही वस्तु नहीं दी गयी तो ये अपनी तपस्यासे चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंका नाश कर डालेंगे। इस समय सारी दिशाएँ धूमसे आच्छादित हो गयी हैं, कहीं कुछ भी सूझता नहीं है॥

‘समुद्र क्षुब्ध हो उठे हैं, सारे पर्वत विदीर्ण हुए जाते हैं, धरती डगमग हो रही है और प्रचण्ड आँधी चलने लगी है॥ १४ ॥

‘ब्रह्मन्! हमें इस उपद्रवके निवारणका कोई उपाय नहीं समझमें आता है। सब लोग नास्तिककी भाँति कर्मानुष्ठानसे शून्य हो रहे हैं। तीनों लोकोंके प्राणियोंका मन क्षुब्ध हो गया है। सभी किंकर्तव्यविमूढ़-से हो रहे हैं॥ १५ ॥

‘महर्षि विश्वामित्रके तेजसे सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी है। भगवन्! ये महाकान्तिमान् मुनि अग्निस्वरूप हो रहे हैं। देव! महामुनि विश्वामित्र जबतक जगत्के विनाशका विचार नहीं करते तबतक ही इन्हें प्रसन्न कर लेना चाहिये॥ १६ १/२ ॥

‘जैसे पूर्वकालमें प्रलयकालिक अग्निने सम्पूर्ण त्रिलोकीको दग्ध कर डाला था, उसी प्रकार ये भी सबको जलाकर भस्म कर देंगे। यदि ये देवताओंका राज्य प्राप्त करना चाहें तो वह भी इन्हें दे दिया जाय। इनके मनमें जो भी अभिलाषा हो, उसे पूर्ण किया जाय’॥

तदनन्तर ब्रह्मा आदि सब देवता महात्मा विश्वामित्रके पास जाकर मधुर वाणीमें बोले—॥ १८ १/२ ॥

‘ब्रह्मर्षे! तुम्हारा स्वागत है, हम तुम्हारी तपस्यासे बहुत संतुष्ट हुए हैं। कुशिकनन्दन! तुमने अपनी उग्र तपस्यासे ब्राह्मणत्व प्राप्त कर लिया॥ १९ १/२ ॥

‘ब्रह्मन्! मरुद्गणोंसहित मैं तुम्हें दीर्घायु प्रदान करता हूँ। तुम्हारा कल्याण हो। सौम्य! तुम मंगलके भागी बनो और तुम्हारी जहाँ इच्छा हो वहाँ सुखपूर्वक जाओ’॥ २० १/२ ॥

पितामह ब्रह्माजीकी यह बात सुनकर महामुनि विश्वामित्रने अत्यन्त प्रसन्न होकर सम्पूर्ण देवताओंको प्रणाम किया और कहा—॥ २१ १/२ ॥

‘देवगण! यदि मुझे (आपकी कृपासे) ब्राह्मणत्व मिल गया और दीर्घ आयुकी भी प्राप्ति हो गयी तो ॐकार, वषट्कार और चारों वेद स्वयं आकर मेरा वरण करें। इसके सिवा जो

क्षत्रिय-वेद (धनुर्वेद आदि) तथा ब्रह्मवेद (ऋक् आदि चारों वेद) के ज्ञाताओंमें भी सबसे श्रेष्ठ हैं, वे ब्रह्मपुत्र वसिष्ठ स्वयं आकर मुझसे ऐसा कहें (कि तुम ब्राह्मण हो गये), यदि ऐसा हो जाय तो मैं समझूँगा कि मेरा उत्तम मनोरथ पूर्ण हो गया। उस अवस्थामें आप सभी श्रेष्ठ देवगण यहाँसे जा सकते हैं'॥ २२—२४ ॥

तब देवताओंने मन्त्रजप करनेवालोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठ मुनिको प्रसन्न किया। इसके बाद ब्रह्मर्षि वसिष्ठने ‘एवमस्तु’ कहकर विश्वामित्रका ब्रह्मर्षि होना स्वीकार कर लिया और उनके साथ मित्रता स्थापित कर ली॥ २५॥

‘मुने! तुम ब्रह्मर्षि हो गये, इसमें संदेह नहीं है। तुम्हारा सब ब्राह्मणोचित संस्कार सम्पन्न हो गया।' ऐसा कहकर सम्पूर्ण देवता जैसे आये थे वैसे लौट गये॥ २६॥

इस प्रकार उत्तम ब्राह्मणत्व प्राप्त करके धर्मात्मा विश्वामित्रजीने भी मन्त्र-जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि वसिष्ठका पूजन किया॥ २७॥

इस तरह अपना मनोरथ सफल करके तपस्यामें लगे रहकर ही ये सम्पूर्ण पृथ्वीपर विचरने लगे। श्रीराम! इस प्रकार कठोर तपस्या करके इन महात्माने ब्राह्मणत्व प्राप्त किया॥ २८॥

रघुनन्दन! ये विश्वामित्रजी समस्त मुनियोंमें श्रेष्ठ हैं, ये तपस्याके मूर्तिमान् स्वरूप हैं, उत्तम धर्मके साक्षात् विग्रह हैं और पराक्रमकी परम निधि हैं॥ २९॥

ऐसा कहकर महातेजस्वी विप्रवर शतानन्दजी चुप हो गये। शतानन्दजीके मुखसे यह कथा सुनकर महाराज जनकने श्रीराम और लक्ष्मणके समीप विश्वामित्रजीसे हाथ जोड़कर कहा—॥ ३० १/२ ॥

‘मुनिप्रवर कौशिक! आप ककुत्स्थकुलनन्दन श्रीराम और लक्ष्मणके साथ मेरे यज्ञमें पधारे, इससे मैं धन्य हो गया। आपने मुझपर बड़ी कृपा की। महामुने! ब्रह्मन्! आपने दर्शन देकर मुझे पवित्र कर दिया॥

‘आपके दर्शनसे मुझे बड़ा लाभ हुआ, अनेक प्रकारके गुण उपलब्ध हुए। ब्रह्मन्! आज इस सभामें आकर मैंने महात्मा राम तथा अन्य सदस्योंके साथ आपके महान् तेज (प्रभाव) का वर्णन सुना है, बहुत-से गुण सुने हैं। ब्रह्मन्! शतानन्दजीने आपके महान् तपका वृत्तान्त विस्तारपूर्वक बताया है॥ ३३-३४ ॥

‘कुशिकनन्दन! आपकी तपस्या अप्रमेय है, आपका बल अनन्त है तथा आपके गुण भी सदा ही माप और संख्यासे परे हैं॥ ३५ ॥

‘प्रभो! आपकी आश्चर्यमयी कथाओंके श्रवणसे मुझे तृप्ति नहीं होती है; किंतु मुनिश्रेष्ठ! यज्ञका समय हो गया है, सूर्यदेव ढलने लगे हैं॥ ३६ ॥

‘जप करनेवालोंमें श्रेष्ठ महातेजस्वी मुने! आपका स्वागत है। कल प्रातःकाल फिर मुझे दर्शन दें, इस समय मुझे जानेकी आज्ञा प्रदान करें’॥ ३७ ॥

राजाके ऐसा कहनेपर मुनिवर विश्वामित्रजी मन-ही-मन बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रीतियुक्त नरश्रेष्ठ राजा जनककी प्रशंसा करके शीघ्र ही उन्हें विदा कर दिया॥ ३८ ॥

उस समय मिथिलापति विदेहराज जनकने मुनिश्रेष्ठ विश्वामित्रसे पूर्वोक्त बात कहकर अपने उपाध्याय और बन्धु-बान्धवोंके साथ उनकी शीघ्र ही परिक्रमा की। फिर वहाँसे वे चल दिये॥ ३९ ॥

तत्पश्चात् धर्मात्मा विश्वामित्र भी महात्माओंसे पूजित होकर श्रीराम और लक्ष्मणके साथ अपने विश्राम-स्थानपर लौट आये॥ ४० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें पैंसठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६५॥