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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

बासठवाँ सर्ग

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बासठवाँ सर्ग

दुःखी हुए राजा दशरथका कौसल्याको हाथ जोड़कर मनाना और कौसल्याका उनके चरणोंमें पड़कर क्षमा माँगना

शोकमग्न हो कुपित हुई श्रीराममाता कौसल्याने जब राजा दशरथको इस प्रकार कठोर वचन सुनाया, तब वे दुःखित होकर बड़ी चिन्तामें पड़ गये॥ १ ॥

चिन्तित होनेके कारण राजाकी सारी इन्द्रियाँ मोहसे आच्छन्न हो गयीं। तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् शत्रुओंको संताप देनेवाले राजा दशरथको चेत हुआ॥ २ ॥

होशमें आनेपर उन्होंने गरम-गरम लंबी साँस ली और कौसल्याको बगलमें बैठी हुई देख वे फिर चिन्तामें पड़ गये॥ ३ ॥

चिन्तामें पड़े-पड़े ही उन्हें अपने एक दुष्कर्मका स्मरण हो आया, जो इन शब्दवेधी बाण चलानेवाले नरेशके द्वारा पहले अनजानमें बन गया था॥ ४ ॥

उस शोकसे तथा श्रीरामके शोकसे भी राजाके मनमें बड़ी वेदना हुई। उन दोनों ही शोकोंसे महाराज संतप्त होने लगे॥ ५ ॥

उन दोनों शोकोंसे दग्ध होते हुए दुःखी राजा दशरथ नीचे मुँह किये थर-थर काँपने लगे और कौसल्याको मनानेके लिये हाथ जोड़कर बोले— ॥ ६ ॥

‘कौसल्ये! मैं तुमसे निहोरा करता हूँ, तुम प्रसन्न हो जाओ। देखो, मैंने ये दोनों हाथ जोड़ लिये हैं। तुम तो दूसरोंपर भी सदा वात्सल्य और दया दिखानेवाली हो (फिर मेरे प्रति क्यों कठोर हो गयी?)॥ ७ ॥

‘देवि! पति गुणवान् हो या गुणहीन, धर्मका विचार करनेवाली सती नारियोंके लिये वह प्रत्यक्ष देवता है॥

‘तुम तो सदा धर्ममें तत्पर रहनेवाली और लोकमें भले-बुरेको समझनेवाली हो। यद्यपि तुम भी दुःखित हो तथापि मैं भी महान् दुःखमें पड़ा हुआ हूँ, अतः तुम्हें मुझसे कठोर वचन नहीं कहना चाहिये’॥ ९ ॥

दुःखी हुए राजा दशरथके मुखसे कहे गये उस करुणाजनक वचनको सुनकर कौसल्या अपने नेत्रोंसे आँसू बहाने लगीं, मानो छतकी नालीसे नूतन (वर्षाका) जल गिर रहा हो॥ १० ॥

वे अधर्मके भयसे रो पड़ीं और राजाके जुड़े हुए कमलसदृश हाथोंको अपने सिरसे सटाकर घबराहटके कारण शीघ्रतापूर्वक एक-एक अक्षरका उच्चारण करती हुईं बोलीं— ॥ ११ ॥

‘देव! मैं आपके सामने पृथ्वीपर पड़ी हूँ। आपके चरणोंमें मस्तक रखकर याचना करती हूँ, आप प्रसन्न हों। यदि आपने उलटे मुझसे ही याचना की, तब तो मैं मारी गयी। मुझसे अपराध हुआ हो तो भी मैं आपसे क्षमा पानेके योग्य हूँ, प्रहार पानेके नहीं॥ १२ ॥

‘पति अपनी स्त्रीके लिये इहलोक और परलोकमें भी स्पृहणीय है। इस जगतमें जो स्त्री अपने बुद्धिमान् पतिके द्वारा मनायी जाती है, वह कुल-स्त्री कहलानेके योग्य नहीं है॥ १३ ॥

‘धर्मज्ञ महाराज! मैं स्त्री-धर्मको जानती हूँ और यह भी जानती हूँ कि आप सत्यवादी हैं। इस समय मैंने जो कुछ भी न कहने योग्य बात कह दी है, वह पुत्रशोकसे पीड़ित होनेके कारण मेरे मुखसे निकल गयी है॥ १४ ॥

‘शोक धैर्यका नाश कर देता है। शोक शास्त्रज्ञानको भी लुप्त कर देता है तथा शोक सब कुछ नष्ट कर देता है; अतः शोकके समान दूसरा कोई शत्रु नहीं है॥ १५ ॥

‘शत्रुके हाथसे अपने ऊपर पड़ा हुआ शस्त्रोंका प्रहार सह लिया जा सकता है; परंतु दैववश प्राप्त हुआ थोड़ा-सा भी शोक नहीं सहा जा सकता॥ १६ ॥

‘श्रीरामको वनमें गये आज पाँच रातें बीत गयीं। मैं यही गिनती रहती हूँ। शोकने मेरे हर्षको नष्ट कर दिया है, अतः ये पाँच रात मेरे लिये पाँच वर्षोंके समान प्रतीत हुईं हैं॥ १७ ॥

‘श्रीरामका ही चिन्तन करनेके कारण मेरे हृदयका यह शोक बढ़ता जा रहा है, जैसे नदियोंके वेगसे समुद्रका जल बहुत बढ़ जाता है’॥ १८ ॥

कौसल्या इस प्रकार शुभ वचन कह ही रही थीं कि सूर्यकी किरणें मन्द पड़ गयीं और रात्रिकाल आ पहुँचा। देवी कौसल्याकी इन बातोंसे राजाको बड़ी प्रसन्नता हुई। साथ ही वे श्रीरामके शोकसे भी पीड़ित थे। इस हर्ष और शोककी अवस्थामें उन्हें नींद आ गयी॥ १९-२० ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके अयोध्याकाण्डमें बासठवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६२॥