श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
छियालीसवाँ सर्ग
छियालीसवाँ सर्ग
सुग्रीवका श्रीरामचन्द्रजीको अपने भूमण्डल-भ्रमणका वृत्तान्त बताना
उन समस्त वानरयूथपतियोंके चले जानेपर श्रीरामचन्द्रजीने सुग्रीवसे पूछा—‘सखे! तुम समस्त भूमण्डलके स्थानोंका परिचय कैसे जानते हो?’॥ १ ॥
तब सुग्रीवने विनीत होकर श्रीरामचन्द्रजीसे कहा—‘भगवन्! मैं सब कुछ विस्तारके साथ बता रहा हूँ। मेरी बातें सुनिये॥ २ ॥
‘जब वाली महिषरूपधारी दानव दुन्दुभि* (उसके पुत्र मायावी) का पीछा कर रहे थे, उस समय वह महिष मलयपर्वतकी ओर भागा और उस पर्वतकी कन्दरामें घुस गया। यह देख वालीने उसके वधकी इच्छासे उस गुफाके भीतर भी प्रवेश किया॥ ३-४ ॥
‘उस समय मैं विनीतभावसे उस गुफाके द्वारपर खड़ा रहा; क्योंकि वालीने मुझे वहीं रख छोड़ा था। परंतु एक वर्ष व्यतीत हो जानेपर भी वाली उसके भीतरसे नहीं निकले॥ ५ ॥
‘तदनन्तर वेगपूर्वक बहे हुए रक्तकी धारासे उस समय वह सारी गुफा भर गयी। यह देखकर मुझे बड़ा विस्मय हुआ तथा मैं भांऽइके शोकसे व्यथित हो उठा॥ ६ ॥
‘फिर मेरी बुद्धिमें यह बात आयी कि अब मेरे बड़े भांऽइ निश्चय ही मारे गये। यह विचार पैदा होते ही मैंने उस गुफाके द्वारपर एक पहाड़-जैसी चट्टान रख दी॥ ७ ॥
‘सोचा—इस शिलासे द्वार बंद हो जानेपर मायावी निकल नहीं सकेगा, भीतर ही घुट-घुटकर मर जायगा। इसके बाद भांऽइके जीवनसे निराश होकर मैं किष्किन्धापुरीमें लौट आया॥ ८ ॥
‘यहाँ विशाल राज्य तथा रुमासहित ताराको पाकर मित्रोंके साथ मैं निश्चिन्ततापूर्वक रहने लगा॥ ९ ॥
‘तत्पश्चात् वानरश्रेष्ठ वाली उस दानवका वध करके आ पहुँचे। उनके आते ही मैंने भांऽइके गौरवसे भयभीत हो वह राज्य उन्हें वापस कर दिया॥ १० ॥
‘परंतु दुष्टात्मा वाली मुझे मार डालना चाहता था, उसकी सारी इन्द्रियाँ यह सोचकर व्यथित हो उठी थीं कि ‘यह मुझे मारनेके लिये ही गुफाका द्वार बंद करके भाग आया था।’ मैं अपनी प्राण-रक्षाके लिये मन्त्रियोंके साथ भागा और वाली मेरा पीछा करने लगा॥ ११ ॥
‘वाली मेरे पीछे लगा रहा और मैं जोर-जोरको भागता गया। उसी समय मैंने विभिन्न नदियों, वनों और नगरोंको देखते हुए सारी पृथ्वीको गायकी खुरीकी भाँति मानकर उसकी परिक्रमा कर डाली। भागते समय मुझे यह पृथ्वी दर्पण और अलातचक्रके समान दिखायी दी॥ १२-१३ ॥
‘तदनन्तर पूर्व दिशामें जाकर मैंने नाना प्रकारके वृक्ष, कन्दराओंसहित रमणीय पर्वत और भाँतिभाँ तिके सरोवर देखे॥ १४ ॥
‘वहीं नाना प्रकारके धातुओंसे मण्डित उदयाचल तथा अप्सराओंके नित्य-निवासस्थान क्षीरोद सागरका भी मैंने दर्शन किया॥ १५ ॥
‘उस समय वाली पीछा करते रहे और मैं भागता रहा। प्रभो! जब मैं यहाँ फिर लौटकर आया, तब वालीके डरसे पुनः सहसा मुझे भागना पड़ा॥ १६ ॥
‘उस दिशाको छोड़कर मैं फिर दक्षिण दिशाकी ओर प्रस्थित हुआ, जहाँ विन्ध्यपर्वत और नाना प्रकारके वृक्ष भरे हुए हैं तथा चन्दनके वृक्ष जिसकी शोभा बढ़ाते हैं॥ १७ ॥
‘वृक्षों और पर्वतोंकी ओटमें बारंबार वालीको देखकर मैंने दक्षिण दिशाको छोड़ दिया तथा वालीके खदेड़नेपर पश्चिम दिशाकी शरण ली॥ १८ ॥
‘वहाँ नाना प्रकारके देशोंको देखता हुआ मैं गिरिश्रेष्ठ अस्ताचलतक जा पहुँचा। वहाँ पहुँचकर मैं पुनः उत्तर दिशाकी ओर भागा॥ १९ ॥
‘हिमालय, मेरु और उत्तर समुद्रतक पहुँचकर भी जब वालीके पीछा करनेके कारण मुझे कहीं शरण नहीं मिली, तब परम बुद्धिमान् हनुमान्जीने मुझसे यह बात कही—॥ २० १/२ ॥
“राजन्! इस समय मुझे उस घटनाका स्मरण हो आया है, जैसा कि मतङ्गमुनिने उन दिनों वानरराज वालीको शाप दिया था कि ‘यदि वाली इस आश्रम-मण्डलमें प्रवेश करेगा तो उसके मस्तकके सैकड़ों टुकड़े हो जायेंगे’॥ २१-२२ ॥
“अतः वहीं निवास करना हमलोगोंके लिये सुखद और निर्भय होगा’। राजकुमार! इस निश्चयके अनुसार हमलोग ऋष्यमूक पर्वतपर आकर रहने लगे। उस समय मतङ्ग ऋषिके भयसे वालीने वहाँ प्रवेश नहीं किया॥ २३ ॥
‘राजन्! इस प्रकार मैंने उन दिनों समस्त भूमण्डलको प्रत्यक्ष देखा था। उसके बाद ऋष्यमूककी गुफामें आया था’॥ २४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके किष्किन्धाकाण्डमें छियालीसवाँ
सर्ग पूरा हुआ॥ ४६॥
^* यहाँ दुन्दुभि और महिष शब्दसे उसके पुत्र मायावी नामक दानवका ही वर्णन हुआ है—ऐसा मानना चाहिये; क्योंकि आगे कही जानेवाली सारी बातें उसीके वृत्तान्तसे सम्बन्ध रखती हैं। पिता भैंसेका रूप धारण करता था, यही गुण उसके पुत्र मायावीमें भी था। इसलिये उसको भी महिष या महिषाकृति कहना असङ्गत नहीं है।