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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

एक सौ पंद्रहवाँ सर्ग

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एक सौ पंद्रहवाँ सर्ग

सीताके चरित्रपर संदेह करके श्रीरामका उन्हें ग्रहण करनेसे इनकार करना और अन्यत्र जानेके लिये कहना

मिथिलाकुमारी सीताको विनयपूर्वक अपने समीप खड़ी देख श्रीरामचन्द्रजीने अपना हार्दिक अभिप्राय बताना आरम्भ किया—॥ १ ॥

‘भद्रे! समराङ्गणमें शत्रुको पराजित करके मैंने तुम्हें उसके चंगुलसे छुड़ा लिया। पुरुषार्थके द्वारा जो कुछ किया जा सकता था, वह सब मैंने किया॥ २ ॥

‘अब मेरे अमर्षका अन्त हो गया। मुझपर जो कलङ्क लगा था, उसका मैंने मार्जन कर दिया। शत्रुजनित अपमान और शत्रु दोनोंको एक साथ ही नष्ट कर डाला॥

‘आज सबने मेरा पराक्रम देख लिया। अब मेरा परिश्रम सफल हो गया और इस समय प्रतिज्ञा पूर्ण करके मैं उसके भारसे मुक्त एवं स्वतन्त्र हो गया॥ ४ ॥

‘जब तुम आश्रममें अकेली थी, उस समय वह चञ्चल चित्तवाला राक्षस तुम्हें हर ले गया। यह दोष मेरे ऊपर दैववश प्राप्त हुआ था, जिसका मैंने मानवसाध्य पुरुषार्थके द्वारा मार्जन कर दिया॥ ५ ॥

‘जो पुरुष प्राप्त हुए अपमानका अपने तेज या बलसे मार्जन नहीं कर देता है, उस मन्दबुद्धि मानवके महान् पुरुषार्थसे भी क्या लाभ हुआ?॥ ६ ॥

‘हनुमान्ने जो समुद्रको लाँघा और लङ्काका विध्वंस किया, उनका वह प्रशंसनीय कर्म आज सफल हो गया॥

‘सेनासहित सुग्रीवने युद्धमें पराक्रम दिखाया तथा समय-समयपर ये मुझे हितकर सलाह देते रहे हैं, इनका परिश्रम भी अब सार्थक हो गया॥ ८ ॥

‘ये विभीषण दुर्गुणोंसे भरे हुए अपने भाईका परित्याग करके स्वयं ही मेरे पास उपस्थित हुए थे। अबतकका किया हुआ इनका परिश्रम भी निष्फल नहीं हुआ’॥ ९ ॥

इस तरह कहते हुए श्रीरामजीकी बातें सुनकर मृगीके समान विकसित नेत्रोंवाली सीताकी आँखोंमें आँसू भर आया॥ १० ॥

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वे अपने स्वामीकी हृदयवल्लभा थीं। उनके प्राणवल्लभ उन्हें अपने समीप देख रहे थे; परंतु लोकापवादके भयसे राजा श्रीरामका हृदय उस समय विदीर्ण हो रहा था॥ ११ ॥

वे काले-काले घुँघराले बालोंवाली कमललोचना सुन्दरी सीतासे वानर और राक्षसोंकी भरी सभामें पुनः इस प्रकार कहने लगे—॥ १२ ॥

‘अपने तिरस्कारका बदला चुकानेके लिये मनुष्यका जो कर्तव्य है, वह सब मैंने अपनी मानरक्षाकी अभिलाषासे रावणका वध करके पूर्ण किया॥ १३ ॥

‘जैसे तपस्यासे भावित अन्तःकरणवाले अथवा तपस्यापूर्वक परमात्मस्वरूपका चिन्तन करनेवाले महर्षि अगस्त्यने वातापि और इल्वलके भयसे जीवजगत्के लिये दुर्गम हुऽइ दक्षिण दिशाको जीता था, उसी प्रकार मैंने रावणके वशमें पड़ी हुऽइ तुमको जीता है॥ १४ ॥

‘तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हें मालूम होना चाहिये कि मैंने जो यह युद्धका परिश्रम उठाया है तथा इन मित्रोंके पराक्रमसे जो इसमें विजय पायी है, यह सब तुम्हें पानेके लिये नहीं किया गया है॥ १५ ॥

‘सदाचारकी रक्षा, सब ओर फैले हुए अपवादका निवारण तथा अपने सुविख्यात वंशपर लगे हुए कलङ्कका परिमार्जन करनेके लिये ही यह सब मैंने किया है॥

‘तुम्हारे चरित्रमें संदेहका अवसर उपस्थित है; फिर भी तुम मेरे सामने खड़ी हो। जैसे आँखके रोगीको दीपककी ज्योति नहीं सुहाती, उसी प्रकार आज तुम मुझे अत्यन्त अप्रिय जान पड़ती हो॥ १७ ॥

‘अतः जनककुमारी! तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, चली जाओ। मैं अपनी ओरसे तुम्हें अनुमति देता हूँ। भद्रे! ये दसों दिशाएँ तुम्हारे लिये खुली हैं। अब तुमसे मेरा कोऽइ प्रयोजन नहीं है॥ १८ ॥

‘कौन ऐसा कुलीन पुरुष होगा, जो तेजस्वी होकर भी दूसरेके घरमें रही हुऽइ स्त्रीको, केवल इस लोभसे कि यह मेरे साथ बहुत दिनोंतक रहकर सौहार्द स्थापित कर चुकी है, मनसे भी ग्रहण कर सकेगा॥ १९ ॥

‘रावण तुम्हें अपनी गोदमें उठाकर ले गया और तुमपर अपनी दूषित दृष्टि डाल चुका है, ऐसी दशामें अपने कुलको महान् बताता हुआ मैं फिर तुम्हें कैसे ग्रहण कर सकता हूँ॥ २० ॥

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‘अतः जिस उद्देश्यसे मैंने तुम्हें जीता था, वह सिद्ध हो गया—मेरे कुलके कलङ्कका मार्जन हो गया। अब मेरी तुम्हारे प्रति ममता या आसक्ति नहीं है; अतः तुम जहाँ जाना चाहो, जा सकती हो॥ २१ ॥

‘भद्रे! मेरा यह निश्चित विचार है। इसके अनुसार ही आज मैंने तुम्हारे सामने ये बातें कही हैं। तुम चाहो तो भरत या लक्ष्मणके संरक्षणमें सुखपूर्वक रहनेका विचार कर सकती हो॥ २२ ॥

‘सीते! तुम्हारी इच्छा हो तो तुम शत्रुघ्न, वानरराज सुग्रीव अथवा राक्षसराज विभीषणके पास भी रह सकती हो। जहाँ तुम्हें सुख मिले, वहीं अपना मन लगाओ॥ २३ ॥

‘सीते! तुम-जैसी दिव्यरूप-सौन्दर्यसे सुशोभित मनोरम नारीको अपने घरमें स्थित देखकर रावण चिरकालतक तुमसे दूर रहनेका कष्ट नहीं सह सका होगा’॥ २४ ॥

जो सदा प्रिय वचन सुननेके ही योग्य थीं, वे मानिनी सीता चिरकालके बाद मिले हुए प्रियतमके मुखसे ऐसी अप्रिय बात सुनकर उस समय हाथीकी सूँड़से आहत हुई लताके समान आँसू बहाने और रोने लगीं॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ पंद्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११५ ॥

एक सौ सोलहवाँ सर्ग

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एक सौ सोलहवाँ सर्ग

सीताका श्रीरामको उपालम्भपूर्ण उत्तर देकर अपने सतीत्वकी परीक्षा देनेके लिये अग्निमें प्रवेश करना

श्रीरघुनाथजीने रोषपूर्वक जब इस तरह रोंगटे खड़े कर देनेवाली कठोर बात कही, तब उसे सुनकर विदेहराजकुमारी सीताके मनमें बड़ी व्यथा हुई॥ १ ॥

इतने बड़े जनसमुदायमें अपने स्वामीके मुँहसे ऐसी भयंकर बात, जो पहले कभी कानोंमें नहीं पड़ी थी, सुनकर मिथिलेशकुमारी लाजसे गड़ गयीं॥ २ ॥

उन वाग्बाणोंसे पीड़ित होकर वे जनककिशोरी अपने ही अङ्गोंमें विलीन-सी होने लगीं। उनके नेत्रोंसे आँसुओंका अविरल प्रवाह जारी हो गया॥ ३ ॥

नेत्रोंके जलसे भीगे हुए अपने मुखको अंचलसे पोंछती हुईं वे धीरे-धीरे गद्गद वाणीमें पतिदेवसे इस प्रकार बोलीं— ॥ ४ ॥

‘वीर! आप ऐसी कठोर, अनुचित, कर्णकटु और रूखी बात मुझे क्यों सुना रहे हैं। जैसे कोई निम्न श्रेणीका पुरुष निम्नकोटिकी ही स्त्रीसे न कहने योग्य बातें भी कह डालता है, उसी तरह आप भी मुझसे कह रहे हैं॥

‘महाबाहो! आप मुझे अब जैसी समझते हैं, वैसी मैं नहीं हूँ। मुझपर विश्वास कीजिये। मैं अपने सदाचारकी ही शपथ खाकर कहती हूँ कि मैं संदेहके योग्य नहीं हूँ॥ ६ ॥

‘नीच श्रेणीकी स्त्रियोंका आचरण देखकर यदि आप समूची स्त्री-जातिपर ही संदेह करते हैं तो यह उचित नहीं है। यदि आपने मुझे अच्छी तरह परख लिया हो तो अपने इस संदेहको मनसे निकाल दीजिये॥ ७ ॥

‘प्रभो! रावणके शरीरसे जो मेरे इस शरीरका स्पर्श हो गया है, उसमें मेरी विवशता ही कारण है। मैंने स्वेच्छासे ऐसा नहीं किया था। इसमें मेरे दुर्भाग्यका ही दोष है॥ ८ ॥

‘जो मेरे अधीन है, वह मेरा हृदय सदा आपमें ही लगा रहता है (उसपर दूसरा कोई अधिकार नहीं कर सकता); परंतु मेरे अङ्ग तो पराधीन थे। उनका यदि दूसरेसे स्पर्श हो गया तो मैं विवश अबला क्या कर सकती थी॥ ९ ॥

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‘दूसरोंको मान देनेवाले प्राणनाथ! हम दोनोंका परस्पर अनुराग सदा साथ-साथ बढ़ा है। हम सदा एक साथ रहते आये हैं। इतनेपर भी यदि आपने मुझे अच्छी तरह नहीं समझा तो मैं सदाके लिये मारी गयी॥ १० ॥

‘महाराज! लङ्कामें मुझे देखनेके लिये जब आपने महावीर हनुमान्‌को भेजा था, उसी समय मुझे क्यों नहीं त्याग दिया?॥ ११ ॥

‘उस समय वानरवीर हनुमान्‌के मुखसे आपके द्वारा अपने त्यागकी बात सुनकर तत्काल इनके सामने ही मैंने अपने प्राणोंका परित्याग कर दिया होता॥ १२ ॥

‘फिर इस प्रकार अपने जीवनको संकटमें डालकर आपको यह युद्ध आदिका व्यर्थ परिश्रम नहीं करना पड़ता तथा आपके ये मित्रलोग भी अकारण कष्ट नहीं उठाते॥ १३ ॥

‘नृपश्रेष्ठ! आपने ओछे मनुष्यकी भाँति केवल रोषका ही अनुसरण करके मेरे शील-स्वभावका विचार छोड़कर केवल निम्नकोटिकी स्त्रियोंके स्वभावको ही अपने सामने रखा है॥ १४ ॥

‘सदाचारके मर्मको जाननेवाले देवता! राजा जनककी यज्ञभूमिसे आविर्भूत होनेके कारण ही मुझे जानकी कहकर पुकारा जाता है। वास्तवमें मेरी उत्पत्ति जनकसे नहीं हुईँ है। मैं भूतलसे प्रकट हुईँ हूँ। (साधारण मानव-जातिसे विलक्षण हूँ—दिव्य हूँ। उसी तरह मेरा आचारविचार भी अलौकिक एवं दिव्य है; मुझमें चारित्रिक बल विद्यमान है, परंतु) आपने मेरी इन विशेषताओंको अधिक महत्त्व नहीं दिया—इन सबको अपने सामने नहीं रखा॥ १५ ॥

‘बाल्यावस्थामें आपने मेरा पाणिग्रहण किया है, इसकी ओर भी ध्यान नहीं दिया। आपके प्रति मेरे हृदयमें जो भक्ति है और मुझमें जो शील है, वह सब आपने पीछे ढकेल दिया—एक साथ ही भुला दिया’॥ १६ ॥

इतना कहते-कहते सीताका गला भर आया। वे रोती और आँसू बहाती हुईँ दुःखी एवं चिन्तामग्न होकर बैठे हुए लक्ष्मणसे गद्गद वाणीमें बोलीं— ॥ १७ ॥

‘सुमित्रानन्दन! मेरे लिये चिता तैयार कर दो। मेरे इस दुःखकी यही दवा है। मिथ्या कलङ्कसे कलङ्कित होकर मैं जीवित नहीं रह सकती॥ १८ ॥

‘मेरे स्वामी मेरे गुणोंसे प्रसन्न नहीं हैं। इन्होंने भरी सभामें मेरा परित्याग कर दिया है। ऐसी दशामें मेरे लिये जो उचित मार्ग है, उसपर जानेके लिये मैं अग्निमें प्रवेश करूँगी’॥ १९ ॥

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विदेहनन्दिनीके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले लक्ष्मणने अमर्षके वशीभूत होकर श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देखा (उनसे सीताजीका वह अपमान सहा नहीं जाता था)॥ २०॥

परंतु श्रीरामके इशारेसे सूचित होनेवाले उनके हार्दिक अभिप्रायको जानकर पराक्रमी लक्ष्मणने उनकी सम्मतिसे ही चिता तैयार की॥ २१॥

उस समय श्रीरघुनाथजी प्रलयकालीन संहारकारी यमराजके समान लोगोंके मनमें भय उत्पन्न कर रहे थे। उनका कोर्ऽइ भी मित्र उन्हें समझाने, उनसे कुछ कहने अथवा उनकी ओर देखनेका साहस न कर सका॥ २२॥

भगवान् श्रीराम सिर झुकाये खड़े थे। उसी अवस्थामें सीताजीने उनकी परिक्रमा की। इसके बाद वे प्रज्वलित अग्निके पास गयीं॥ २३॥

वहाँ देवताओं तथा ब्राह्मणोंको प्रणाम करके मिथिलेशकुमारीने दोनों हाथ जोड़कर अग्निदेवके समीप इस प्रकार कहा—॥ २४॥

‘यदि मेरा हृदय कभी एक क्षणके लिये भी श्रीरघुनाथजीसे दूर न हुआ हो तो सम्पूर्ण जगत्के साक्षी अग्निदेव मेरी सब ओरसे रक्षा करें॥ २५॥

‘मेरा चरित्र शुद्ध है फिर भी श्रीरघुनाथजी मुझे दूषित समझ रहे हैं। यदि मैं सर्वथा निष्कलङ्क होऊँ तो सम्पूर्ण जगत्के साक्षी अग्निदेव मेरी सब ओरसे रक्षा करें॥ २६॥

‘यदि मैंने मन, वाणी और क्रियाद्वारा कभी सम्पूर्ण धर्मोंके ज्ञाता श्रीरघुनाथजीका अतिक्रमण न किया हो तो अग्निदेव मेरी रक्षा करें’॥ २७॥

‘यदि भगवान् सूर्य, वायु, दिशाएँ, चन्द्रमा, दिन, रात, दोनों संध्याएँ, पृथ्वी देवी तथा अन्य देवता भी मुझे शुद्ध चरित्रसे युक्त जानते हों तो अग्निदेव मेरी सब ओरसे रक्षा करें’॥ २८॥

ऐसा कहकर विदेहराजकुमारीने अग्निदेवकी परिक्रमा की और निःशङ्क चित्तसे वे उस प्रज्वलित अग्निमें समा गयीं॥ २९॥

बालकों और वृद्धोंसे भरे हुए वहाँके महान् जनसमुदायने उन दीप्तिमती मिथिलेशकुमारीको जलती आगमें प्रवेश करते देखा॥ ३०॥

तपाये हुए नूतन सुवर्णकी-सी कान्तिवाली सीता आगमें तपाकर शुद्ध किये गये सुवर्णके आभूषणोंसे विभूषित थीं। वे सब लोगोंके निकट उनके देखते-देखते उस जलती आगमें कूद पड़ीं॥ ३१॥

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सोनेकी बनी हुई वेदीके समान कान्तिमती विशाल-लोचना सीतादेवीको उस समय सम्पूर्ण भूतोंने आगमें गिरते देखा॥ ३२ ॥

ऋषियों, देवताओं और गन्धर्वोंने देखा, जैसे यज्ञमें पूर्णाहुतिका होम होता है, उसी प्रकार महाभागा सीता जलती आगमें प्रवेश कर रही हैं॥ ३३ ॥

जैसे यज्ञमें मन्त्रोंद्वारा संस्कार की हुई वसुधाराकी* आहुति दी जाती है, उसी प्रकार दिव्य आभूषणोंसे विभूषित सीताको आगमें गिरते देख वहाँ आयी हुई सभी स्त्रियाँ चीख उठीं॥ ३४ ॥

तीनों लोकोंके दिव्य प्राणी, ऋषि, देवता, गन्धर्व तथा दानवोंने भी भगवती सीताको आगमें गिरते देखा, मानो स्वर्गसे कोई देवी शापग्रस्त होकर नरकमें गिरी हो॥ ३५ ॥

उनके अग्निमें प्रवेश करते समय राक्षस और वानर जोर-जोरसे हाहाकार करने लगे। उनका वह अद्भुत आर्तनाद चारों ओर गूँज उठा॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ सोलहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११६ ॥


* घीकी अनवच्छिन्न धारा।

एक सौ सत्रहवाँ सर्ग

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एक सौ सत्रहवाँ सर्ग

भगवान् श्रीरामके पास देवताओंका आगमन तथा ब्रह्माद्वारा उनकी भगवत्ताका प्रतिपादन एवं स्तवन

तदनन्तर धर्मात्मा श्रीराम हाहाकार करनेवाले वानर और राक्षसोंकी बातें सुनकर मन-ही-मन बहुत दुःखी हुए और आँखोंमें आँसू भरकर दो घड़ीतक कुछ सोचते रहे॥ १ ॥

इसी समय विश्रवाके पुत्र यक्षराज कुबेर, पितरोंसहित यमराज, देवताओंके स्वामी सहस्र नेत्रधारी इन्द्र, जलके अधिपति वरुण, त्रिनेत्रधारी श्रीमान् वृषभध्वज महादेव तथा सम्पूर्ण जगत्के स्रष्टा ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजी— ये सब देवता सूर्यतुल्य विमानोंद्वारा लङ्कापुरीमें आकर श्रीरघुनाथजीके पास गये॥ २—४ ॥

भगवान् श्रीराम उनके सामने हाथ जोड़े खड़े थे। वे श्रेष्ठ देवता आभूषणोंसे अलंकृत अपनी विशाल भुजाओंको उठाकर उनसे बोले—॥ ५ ॥

‘श्रीराम! आप सम्पूर्ण विश्वके उत्पादक, ज्ञानियोंमें श्रेष्ठ और सर्वव्यापक हैं। फिर इस समय आगमें गिरी हुई सीताकी उपेक्षा कैसे कर रहे हैं? आप समस्त देवताओंमें श्रेष्ठ विष्णु ही हैं। इस बातको कैसे नहीं समझ रहे हैं॥ ६ ॥

‘पूर्वकालमें वसुओंके प्रजापति जो ऋतधामा नामक वसु थे, वे आप ही हैं। आप तीनों लोकोंके आदिकर्ता स्वयं प्रभु हैं॥ ७ ॥

‘रुद्रोंमें आठवें रुद्र और साध्योंमें पाँचवें साध्य भी आप ही हैं। दो अश्विनीकुमार आपके कान हैं और सूर्य तथा चन्द्रमा नेत्र हैं॥ ८ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले देव! सृष्टिके आदि, अन्त और मध्यमें भी आप ही दिखायी देते हैं। फिर एक साधारण मनुष्यकी भाँति आप सीताकी उपेक्षा क्यों कर रहे हैं?’॥ ९ ॥

उन लोकपालोंके ऐसा कहनेपर धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ लोकनाथ रघुनाथ श्रीरामने उन श्रेष्ठ देवताओंसे कहा—॥ १० ॥

‘देवगण! मैं तो अपनेको मनुष्य दशरथपुत्र राम ही समझता हूँ। भगवन्! मैं जो हूँ और जहाँसे आया हूँ, वह सब आप ही मुझे बताइये’॥ ११ ॥

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श्रीरघुनाथजीके ऐसा कहनेपर ब्रह्मवेत्ताओंमें श्रेष्ठ ब्रह्माजीने उनसे इस प्रकार कहा—'सत्यपराक्रमी श्रीरघुवीर! आप मेरी सच्ची बात सुनिये॥ १२ ॥

'आप चक्र धारण करनेवाले सर्वसमर्थ श्रीमान् भगवान् नारायण देव हैं, एक दाढ़वाले पृथ्वीधारी वराह हैं तथा देवताओंके भूत एवं भावी शत्रुओंको जीतनेवाले हैं॥ १३ ॥

'रघुनन्दन! आप अविनाशी परब्रह्म हैं। सृष्टिके आदि, मध्य और अन्तमें सत्यरूपसे विद्यमान हैं। आप ही लोकोंके परम धर्म हैं। आप ही विष्वक्सेन तथा चार भुजाधारी श्रीहरि हैं॥ १४ ॥

'आप ही शार्ङ्गधन्वा, हृषीकेश, अन्तर्यामी पुरुष और पुरुषोत्तम हैं। आप किसीसे पराजित नहीं होते। आप नन्दक नामक खड्ग धारण करनेवाले विष्णु एवं महाबली कृष्ण हैं॥ १५ ॥

'आप ही देवसेनापति तथा गाँवोंके मुखिया अथवा नेता हैं। आप ही बुद्धि, सत्त्व, क्षमा, इन्द्रियनिग्रह तथा सृष्टि एवं प्रलयके कारण हैं। आप ही उपेन्द्र (वामन) और मधुसूदन हैं॥ १६ ॥

'इन्द्रको भी उत्पन्न करनेवाले महेन्द्र और युद्धका अन्त करनेवाले शान्तस्वरूप पद्मनाभ भी आप ही हैं। दिव्य महर्षिगण आपको शरणदाता तथा शरणागतवत्सल बताते हैं॥ १७ ॥

'आप ही सहस्रों शाखारूप सींग तथा सैकड़ों विधिवाक्यरूप मस्तकोंसे युक्त वेदरूप महावृषभ हैं। आप ही तीनों लोकोंके आदिकर्ता और स्वयंप्रभु (परम स्वतन्त्र) हैं॥ १८ ॥

'आप सिद्ध और साध्योंके आश्रय तथा पूर्वज हैं। यज्ञ, वषट्कार और ओंकार भी आप ही हैं। आप श्रेष्ठसे भी श्रेष्ठ परमात्मा हैं॥ १९ ॥

'आपके आविर्भाव और तिरोभावको कोऽइ नहीं जानता। आप कौन हैं—इसका भी किसीको पता नहीं है। समस्त प्राणियोंमें, गौओंमें तथा ब्राह्मणोंमें भी आप ही दिखायी देते हैं॥ २० ॥

'समस्त दिशाओंमें, आकाशमें, पर्वतोंमें और नदियोंमें भी आपकी ही सत्ता है। आपके सहस्रों चरण, सैकड़ों मस्तक और सहस्रों नेत्र हैं॥ २१ ॥

'आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंको, पृथ्वीको और समस्त पर्वतोंको धारण करते हैं। पृथ्वीका अन्त हो जानेपर आप ही जलके ऊपर महान् सर्प—शेषनागके रुपमें दिखायी देते हैं॥ २२ ॥

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‘श्रीराम! आप ही तीनों लोकोंको तथा देवता, गन्धर्व और दानवोंको धारण करनेवाले विराट् पुरुष नारायण हैं। सबके हृदयमें रमण करनेवाले परमात्मन्! मैं ब्रह्मा आपका हृदय हूँ और देवी सरस्वती आपकी जिह्वा हैं॥ २३ ॥

‘प्रभो! मुझ ब्रह्माने जिनकी सृष्टि की है, वे सब देवता आपके विराट् शरीरमें रोम हैं। आपके नेत्रोंका बन्द होना रात्रि और खुलना ही दिन है॥ २४ ॥

‘वेद आपके संस्कार हैं। आपके बिना इस जगत्का अस्तित्व नहीं है। सम्पूर्ण विश्व आपका शरीर है। पृथ्वी आपकी स्थिरता है॥ २५ ॥

‘अग्नि आपका कोप है और चन्द्रमा प्रसन्नता है, वक्षःस्थलमें श्रीवत्सका चिह्न धारण करनेवाले भगवान् विष्णु आप ही हैं। पूर्वकालमें (वामनावतारके समय) आपने ही अपने तीन पगोंसे तीनों लोक नाप लिये थे॥ २६ ॥

‘आपने अत्यन्त दारुण दैत्यराज बलिको बाँधकर इन्द्रको तीनों लोकोंका राजा बनाया था। सीता साक्षात् लक्ष्मी हैं और आप भगवान् विष्णु हैं। आप ही सच्चिदानन्दस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण एवं प्रजापति हैं॥ २७ ॥

‘धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ रघुवीर! आपने रावणका वध करनेके लिये ही इस लोकमें मनुष्यके शरीरमें प्रवेश किया था। हमलोगोंका कार्य आपने सम्पन्न कर दिया॥ २८ ॥

‘श्रीराम! आपके द्वारा रावण मारा गया। अब आप प्रसन्नतापूर्वक अपने दिव्य धाममें पधारिये। देव! आपका बल अमोघ है। आपके पराक्रम भी व्यर्थ होनेवाले नहीं हैं॥ २९ ॥

‘श्रीराम! आपका दर्शन अमोघ है। आपका स्तवन भी अमोघ है तथा आपमें भक्ति रखनेवाले मनुष्य भी इस भूमण्डलमें अमोघ ही होंगे॥ ३० ॥

‘आप पुराणपुरुषोत्तम हैं। दिव्यरूपधारी परमात्मा हैं। जो लोग आपमें भक्ति रखेंगे, वे इस लोक और परलोकमें अपने सभी मनोरथ प्राप्त कर लेंगे’॥ ३१ ॥

यह परम ऋषि ब्रह्माका कहा हुआ दिव्य स्तोत्र तथा पुरातन इतिहास है। जो लोग इसका कीर्तन करेंगे, उनका कभी पराभव नहीं होगा॥ ३२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ सत्रहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११७ ॥

एक सौ अठारहवाँ सर्ग

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एक सौ अठारहवाँ सर्ग

मूर्तिमान् अग्निदेवका सीताको लेकर चितासे प्रकट होना और श्रीरामको समर्पित करके उनकी पवित्रताको प्रमाणित करना तथा श्रीरामका सीताको सहर्ष स्वीकार करना

ब्रह्माजीके कहे हुए इन शुभ वचनोंको सुनकर मूर्तिमान् अग्निदेव विदेहनन्दिनी सीताको (पिताकी भाँति) गोदमें लिये चितासे ऊपरको उठे॥ १ ॥

उस चिताको हिलाकर इधर-उधर बिखराते हुए दिव्य रूपधारी हव्यवाहन अग्निदेव वैदेही सीताको साथ लिये तुरंत ही उठकर खड़े हो गये॥ २ ॥

सीताजी प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुण-पीत कान्तिसे प्रकाशित हो रही थीं। तपाये हुए सोनेके आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनके श्रीअङ्गोंपर लाल रंगकी रेशमी साड़ी लहरा रही थी। सिरपर काले-काले घुँघराले केश सुशोभित होते थे। उनकी अवस्था नयी थी और उनके द्वारा धारण किये गये फूलोंके हार कुम्हलायेतक नहीं थे। अनिन्द्य सुन्दरी सती-साध्वी सीताका अग्निमें प्रवेश करते समय जैसा रूप और वेष था, वैसे ही रूप-सौन्दर्यसे प्रकाशित होती हुईं उन वैदेहीको गोदमें लेकर अग्निदेवने श्रीरामको समर्पित कर दिया॥ ३-४ ॥

उस समय लोकसाक्षी अग्निने श्रीरामसे कहा— 'श्रीराम! यह आपकी धर्मपत्नी विदेहराजकुमारी सीता है। इसमें कोई पाप या दोष नहीं है॥ ५ ॥

'उत्तम आचारवाली इस शुभलक्षणा सतीने मन, वाणी, बुद्धि अथवा नेत्रोंद्वारा भी आपके सिवा किसी दूसरे पुरुषका आश्रय नहीं लिया। इसने सदा सदाचारपरायण आपका ही आराधन किया है॥ ६ ॥

'अपने बल-पराक्रमका घमंड रखनेवाले राक्षस रावणने जब इसका अपहरण किया था, उस समय यह बेचारी सती सूने आश्रममें अकेली थी—आप इसके पास नहीं थे; अतः यह विवश थी (इसका कोई वश नहीं चला)॥ ७ ॥

'रावणने इसे लाकर अन्तःपुरमें कैद कर लिया। इसपर पहरा बिठा दिया। भयानक विचारोंवाली भीषण राक्षसियाँ इसकी रखवाली करने लगीं। तब भी इसका चित्त आपमें ही लगा रहा। यह आपहीको अपना परम आश्रय मानती रही॥ ८ ॥

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‘तत्पश्चात् तरह-तरहके लोभ दिये गये। इस मिथिलेशकुमारीपर डाँट-फटकार भी पड़ी; परंतु इसकी अन्तरात्मा निरन्तर आपके ही चिन्तनमें लगी रही। इसने उस राक्षसके विषयमें कभी एक बार भी नहीं सोचा॥ ९॥

‘अतः इसका भाव सर्वथा शुद्ध है। यह मिथिलेशनन्दिनी सर्वथा निष्पाप है। आप इसे सादर स्वीकार करें। मैं आपको आज्ञा देता हूँ, आप इससे कभी कोई कठोर बात न कहें’॥ १०॥

अग्निदेवकी यह बात सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा श्रीरामका मन प्रसन्न हो गया। उनके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये। वे थोड़ी देरतक विचारमें डूबे रहे॥ ११॥

तदनन्तर महातेजस्वी, धैर्यवान्, महान् पराक्रमी तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामने देवशिरोमणि अग्निदेवसे उनकी पूर्वोक्त बातके उत्तरमें कहा—॥ १२॥

‘भगवन्! लोगोंमें सीताजीकी पवित्रताका विश्वास दिलानेके लिये इनकी यह शुद्धिविषयक परीक्षा आवश्यक थी; क्योंकि शुभलक्षणा सीताको विवश होकर दीर्घकालतक रावणके अन्तःपुरमें रहना पड़ा है॥ १३॥

‘यदि मैं जनकनन्दिनीकी शुद्धिके विषयमें परीक्षा न करता तो लोग यही कहते कि दशरथपुत्र राम बड़ा ही मूर्ख और कामी है॥ १४॥

‘यह बात मैं भी जानता हूँ कि मिथिलेशनन्दिनी जनककुमारी सीताका हृदय सदा मुझमें ही लगा रहता है। मुझसे कभी अलग नहीं होता। ये सदा मेरा ही मन रखतीं—मेरी इच्छाके अनुसार चलती हैं॥ १५॥

‘मुझे यह भी विश्वास है कि जैसे महासागर अपनी तटभूमिको नहीं लाँघ सकता, उसी प्रकार रावण अपने ही तेजसे सुरक्षित इन विशाललोचना सीतापर अत्याचार नहीं कर सकता था॥ १६॥

‘तथापि तीनों लोकोंके प्राणियोंके मनमें विश्वास दिलानेके लिये एकमात्र सत्यका सहारा लेकर मैंने अग्निमें प्रवेश करती हुई विदेहकुमारी सीताको रोकनेकी चेष्टा नहीं की॥ १७॥

‘मिथिलेशकुमारी सीता प्रज्वलित अग्निशिखाके समान दुर्धर्ष तथा दूसरेके लिये अलभ्य है। दुष्टात्मा रावण मनके द्वारा भी इनपर अत्याचार करनेमें समर्थ नहीं हो सकता था॥ १८॥

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‘ये सती-साध्वी देवी रावणके अन्तःपुरमें रहकर भी व्याकुलता या घबराहटमें नहीं पड़ सकती थीं; क्योंकि ये मुझसे उसी तरह अभिन्न हैं, जैसे सूर्यदेवसे उनकी प्रभा॥ १९ ॥

‘मिथिलेशकुमारी जानकी तीनों लोकोंमें परम पवित्र हैं। जैसे मनस्वी पुरुष कीर्तिका त्याग नहीं कर सकता, उसी तरह मैं भी इन्हें नहीं छोड़ सकता॥ २० ॥

‘आप सभी लोकपाल मेरे हितकी ही बात कह रहे हैं और आपलोगोंका मुझपर बड़ा स्नेह है; अतः आप सभी देवताओंके हितकर वचनका मुझे अवश्य पालन करना चाहिये’॥ २१ ॥

ऐसा कहकर अपने किये हुए पराक्रमसे प्रशंसित होनेवाले महाबली, महायशस्वी, विजयी वीर रघुकुलनन्दन श्रीराम अपनी प्रिया सीतासे मिले और मिलकर बड़े सुखका अनुभव करने लगे; क्योंकि वे सुख भोगनेके ही योग्य हैं॥ २२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११८ ॥

एक सौ उन्नीसवाँ सर्ग

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एक सौ उन्नीसवाँ सर्ग

महादेवजीकी आज्ञासे श्रीराम और लक्ष्मणका विमानद्वारा आये हुए राजा दशरथको प्रणाम करना और दशरथका दोनों पुत्रों तथा सीताको आवश्यक संदेश दे इन्द्रलोकको जाना

श्रीरघुनाथजीके कहे हुए इन शुभ वचनोंको सुनकर श्रीमहादेवजी और भी शुभतर वचन बोले— ॥ १ ॥

‘शत्रुओंको संताप देनेवाले, विशाल वक्षःस्थलसे सुशोभित, महाबाहु कमलनयन! आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ हैं। आपने रावण-वधरूप कार्य सम्पन्न कर दिया—यह बड़े सौभाग्यकी बात है॥ २ ॥

‘श्रीराम! रावणजनित भय और दुःख सारे लोकोंके लिये बढ़े हुए घोर अन्धकारके समान था, जिसे आपने युद्धमें मिटा दिया॥ ३ ॥

‘महाबली वीर! अब दुःखी भरतको धीरज बँधाकर, यशस्विनी कौसल्या, कैकेयी तथा लक्ष्मणजननी सुमित्रासे मिलकर, अयोध्याका राज्य पाकर, सुहृदोंको आनन्द देकर, इक्ष्वाकुकुलमें अपना वंश स्थापित करके, अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान कर, सर्वोत्तम यशका उपार्जन करके तथा ब्राह्मणोंको धन देकर आपको अपने परम धाममें जाना चाहिये॥ ४—६ ॥

‘ककुत्स्थकुलनन्दन! देखिये, ये आपके पिता राजा दशरथ विमानपर बैठे हुए हैं। मनुष्यलोकमें ये ही आपके महायशस्वी गुरु थे॥ ७ ॥

‘ये श्रीमान् नरेश इन्द्रलोकको प्राप्त हुए हैं। आप-जैसे सुपुत्रने इन्हें तार दिया। आप भार्इ लक्ष्मणके साथ इन्हें नमस्कार करें’॥ ८ ॥

महादेवजीकी यह बात सुनकर लक्ष्मणसहित श्रीरघुनाथजीने विमानमें उच्च स्थानपर बैठे हुए अपने पिताजीको प्रणाम किया॥ ९ ॥

भार्इ लक्ष्मणसहित भगवान् श्रीरामने पिताको अच्छी तरह देखा। वे निर्मल वस्त्र धारण करके अपनी दिव्य शोभासे देदीप्यमान थे॥ १० ॥

विमानपर बैठे हुए महाराज दशरथ अपने प्राणोंसे भी प्यारे पुत्र श्रीरामको देखकर बहुत प्रसन्न हुए॥ ११ ॥

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श्रेष्ठ आसनपर बैठे हुए उन महाबाहु नरेशने उन्हें गोदमें बिठाकर दोनों बाँहोंमें भर लिया और इस प्रकार कहा— ॥ १२ ॥

‘राम! मैं तुमसे सच कहता हूँ, तुमसे विलग होकर मुझे स्वर्गका सुख तथा देवताओंद्वारा प्राप्त हुआ सम्मान भी अच्छा नहीं लगता॥ १३ ॥

‘आज तुम शत्रुओंका वध करके पूर्णमनोरथ हो गये और तुमने वनवासकी अवधि भी पूरी कर ली, यह सब देखकर मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई है॥ १४ ॥

‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ रघुनन्दन! तुम्हें वनमें भेजनेके लिये कैकेयीने जो-जो बातें कही थीं, वे सब आज भी मेरे हृदयमें बैठी हुई हैं॥ १५ ॥

‘आज लक्ष्मणसहित तुमको सकुशल देखकर और हृदयसे लगाकर मैं समस्त दुःखोंसे छुटकारा पा गया हूँ। ठीक उसी तरह, जैसे चन्द्रमा कुहरेसे निकल आये हों॥ १६ ॥

‘बेटा! जैसे अष्टावक्रने अपने धर्मात्मा पिता कहोल नामक ब्राह्मणको तार दिया था, वैसे ही तुम-जैसे महात्मा पुत्रने मेरा उद्धार कर दिया॥ १७ ॥

‘सौम्य! आज इन देवताओंके द्वारा मुझे मालूम हुआ कि रावणका वध करनेके लिये स्वयं पुरुषोत्तम भगवान् ही तुम्हारे रूपमें अवतीर्ण हुए हैं॥ १८ ॥

‘श्रीराम! कौसल्याका जीवन सार्थक है, जो वनसे लौटनेपर तुम-जैसे शत्रुसूदन वीर पुत्रको अपने घरमें हर्ष और उल्लासके साथ देखेंगी॥ १९ ॥

‘रघुनन्दन! वे प्रजाजन भी कृतार्थ हैं, जो अयोध्या पहुँचनेपर तुम्हें राज्यसिंहासनपर भूमिपालके रूपमें अभिषिक्त होते देखेंगे॥ २० ॥

‘भरत बड़ा ही धर्मात्मा, पवित्र और बलवान् है। वह तुममें सच्चा अनुराग रखता है। मैं उसके साथ तुम्हारा शीघ्र ही मिलन देखना चाहता हूँ॥ २१ ॥

‘सौम्य! तुमने मेरी प्रसन्नताके लिये लक्ष्मण और सीताके साथ रहते हुए वनमें चौदह वर्ष व्यतीत किये॥ २२ ॥

‘अब तुम्हारे वनवासकी अवधि पूरी हो गयी। मेरी प्रतिज्ञा भी तुमने पूर्ण कर दी तथा संग्राममें रावणको मारकर देवताओंको भी संतुष्ट कर दिया॥ २३ ॥

‘शत्रुसूदन! ये सभी काम तुम कर चुके। इससे तुम्हें स्पृहणीय यश प्राप्त हुआ है। अब तुम भाइयोंके साथ राज्यपर प्रतिष्ठित हो दीर्घ आयु प्राप्त करो’॥ २४ ॥

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जब राजा इस प्रकार कह चुके, तब श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोड़कर उनसे बोले— 'धर्मज्ञ महाराज! आप कैकेयी और भरतपर प्रसन्न हों—उन दोनोंपर कृपा करें॥ २५ ॥

'प्रभो! आपने जो कैकेयीसे कहा था कि मैं पुत्रसहित तेरा त्याग करता हूँ, आपका वह घोर शाप पुत्रसहित कैकेयीका स्पर्श न करे'॥ २६ ॥

तब श्रीरामसे 'बहुत अच्छा' कहकर महाराज दशरथने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और हाथ जोड़े खड़े हुए लक्ष्मणको हृदयसे लगाकर फिर यह बात कही— ॥

'वत्स! तुमने विदेहनन्दिनी सीताके साथ श्रीरामकी भक्तिपूर्वक सेवा करके मुझे बहुत प्रसन्न किया है। तुम्हें धर्मका फल प्राप्त हुआ है॥ २८ ॥

'धर्मज्ञ! भविष्यमें भी तुम्हें धर्मका फल प्राप्त होगा और भूमण्डलमें महान् यशकी उपलब्धि होगी। श्रीरामकी प्रसन्नतासे तुम्हें उत्तम स्वर्ग और महत्व प्राप्त होगा॥ २९ ॥

'सुमित्राका आनन्द बढ़ानेवाले लक्ष्मण! तुम्हारा कल्याण हो। तुम श्रीरामकी निरन्तर सेवा करते रहो। ये श्रीराम सदा सम्पूर्ण लोकोंके हितमें तत्पर रहते हैं॥ ३० ॥

'देखो, इन्द्रसहित ये तीनों लोक, सिद्ध और महर्षि भी परमात्मस्वरूप पुरुषोत्तम रामको प्रणाम करके इनका पूजन कर रहे हैं॥ ३१ ॥

'सौम्य! शत्रुओंको संताप देनेवाले ये श्रीराम देवताओंके हृदय और परम गुह्य तत्त्व हैं। ये ही वेदोंद्वारा प्रतिपादित अव्यक्त एवं अविनाशी ब्रह्म हैं॥ ३२ ॥

'विदेहनन्दिनी सीताके साथ शान्तभावसे इनकी सेवा करते हुए तुमने सम्पूर्ण धर्माचरणका फल और महान् यश प्राप्त किया है'॥ ३३ ॥

लक्ष्मणसे ऐसा कहकर राजा दशरथने हाथ जोड़कर खड़ी हुईं पुत्रवधू सीताको 'बेटी' कहकर पुकारा और धीरे-धीरे मधुर वाणीमें कहा— ॥ ३४ ॥

'विदेहनन्दिनि! तुम्हें इस त्यागको लेकर श्रीरामपर कुपित नहीं होना चाहिये; क्योंकि ये तुम्हारे हितैषी हैं और संसारमें तुम्हारी पवित्रता प्रकट करनेके लिये ही इन्होंने ऐसा व्यवहार किया है॥ ३५ ॥

'बेटी! तुमने अपने विशुद्ध चरित्रको परिलक्षित करानेके लिये जो अग्निप्रवेशरूप कार्य किया है, यह दूसरी स्त्रियोंके लिये अत्यन्त दुष्कर है। तुम्हारा यह कर्म अन्य नारियोंके यशको ढक लेगा॥ ३६ ॥

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‘पति-सेवाके सम्बन्धमें भले ही तुम्हें कोई उपदेश देनेकी आवश्यकता न हो; किंतु इतना तो मुझे अवश्य बता देना चाहिये कि ये श्रीराम ही तुम्हारे सबसे बड़े देवता हैं’॥ ३७ ॥

इस प्रकार दोनों पुत्रों और सीताको आदेश एवं उपदेश देकर रघुवंशी राजा दशरथ विमानके द्वारा इन्द्रलोकको चले गये॥ ३८ ॥

नृपश्रेष्ठ महानुभाव दशरथ अद्भुत शोभासे सम्पन्न थे। उनका शरीर हर्षसे पुलकित हो रहा था। वे विमानपर बैठकर सीतासहित दोनों पुत्रोंसे विदा ले देवराज इन्द्रके लोकमें चले गये॥ ३९ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ उन्नीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११९ ॥

एक सौ बीसवाँ सर्ग

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एक सौ बीसवाँ सर्ग

श्रीरामके अनुरोधसे इन्द्रका मरे हुए वानरोंको जीवित करना, देवताओंका प्रस्थान और वानरसेनाका विश्राम

महाराज दशरथके लौट जानेपर पाकशासन इन्द्रने अत्यन्त प्रसन्न हो हाथ जोड़े खड़े हुए श्रीरघुनाथजीसे कहा— ॥ १ ॥

‘नरश्रेष्ठ श्रीराम! तुम्हें जो हमारा दर्शन हुआ, वह व्यर्थ नहीं जाना चाहिये और हम तुमपर बहुत प्रसन्न हैं। इसलिये तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, वह मुझसे कहो’॥

महात्मा इन्द्रने जब प्रसन्न होकर ऐसी बात कही, तब श्रीरघुनाथजीके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने हर्षसे भरकर कहा— ॥ ३ ॥

‘वक्ताओंमें श्रेष्ठ देवेश्वर! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मैं आपसे एक प्रार्थना करूँगा। आप मेरी उस प्रार्थनाको सफल करें॥ ४ ॥

‘मेरे लिये युद्धमें पराक्रम करके जो यमलोकको चले गये हैं, वे सब वानर नया जीवन पाकर उठ खड़े हों॥ ५ ॥

‘मानद! जो वानर मेरे लिये अपने स्त्री-पुत्रोंसे बिछुड़ गये हैं, उन सबको मैं प्रसन्नचित्त देखना चाहता हूँ॥ ६ ॥

‘पुरंदर! वे पराक्रमी और शूरवीर थे तथा मृत्युको कुछ भी नहीं गिनते थे। उन्होंने मेरे लिये बड़ा प्रयत्न किया है और अन्तमें कालके गालमें चले गये हैं। आप उन सबको जीवित कर दें॥ ७ ॥

‘जो वानर सदा मेरा प्रिय करनेमें लगे रहते थे और मौतको कुछ नहीं समझते थे, वे सब आपकी कृपासे फिर मुझसे मिलें—यह वर मैं चाहता हूँ॥ ८ ॥

‘दूसरोंको मान देनेवाले देवराज! मैं उन वानर, लंगूर और भालुओंको नीरोग, व्रणहीन और बल-पौरुषसे सम्पन्न देखना चाहता हूँ॥ ९ ॥

‘ये वानर जिस स्थानपर रहें, वहाँ असमयमें भी फल-मूल और पुष्पोंकी भरमार रहे तथा निर्मल जलवाली नदियाँ बहती रहें’॥ १० ॥

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महात्मा श्रीरघुनाथजीकी यह बात सुनकर महेन्द्रने प्रसन्नतापूर्वक यों उत्तर दिया—॥ ११ ॥

‘तात! रघुवंशविभूषण! आपने जो वर माँगा है, यह बहुत बड़ा है, तथापि मैंने कभी दो तरहकी बात नहीं की है; इसलिये यह वर अवश्य सफल होगा॥ १२ ॥

‘जो युद्धमें मारे गये हैं और राक्षसोंने जिनके मस्तक तथा भुजाएँ काट डाली हैं, वे सब वानर, भालू और लंगूर जी उठें॥ १३ ॥

‘नींद टूटनेपर सोकर उठे हुए मनुष्योंकी भाँति वे सभी वानर नीरोग, व्रणहीन तथा बल-पौरुषसे सम्पन्न होकर उठ बैठेंगे॥ १४ ॥

‘सभी परमानन्दसे युक्त हो अपने सुहृदों, बान्धवों, जाति-भाइयों तथा स्वजनोंसे मिलेंगे॥ १५ ॥

‘महाधनुर्धर वीर! ये वानर जहाँ रहेंगे, वहाँ असमयमें भी वृक्ष फल-फूलोंसे लद जायँगे और नदियाँ जलसे भरी रहेंगी’॥ १६ ॥

इन्द्रके इस प्रकार कहनेपर वे सब श्रेष्ठ वानर जिनके सब अङ्ग पहले घावोंसे भरे थे, उस समय घावरहित हो गये और सभी सोकर जगे हुएकी भाँति सहसा उठकर खड़े हो गये॥ १७ ॥

उन्हें इस प्रकार जीवित होते देख सब वानर आश्चर्यचकित होकर कहने लगे कि यह क्या बात हो गयी? श्रीरामचन्द्रजीको सफलमनोरथ हुआ देख समस्त श्रेष्ठ देवता अत्यन्त प्रसन्न हो लक्ष्मणसहित श्रीरामकी स्तुति करके बोले—‘राजन्! अब आप यहाँसे अयोध्याको पधारें और समस्त वानरोंको बिदा कर दें॥ १८-१९ ॥

‘ये मिथिलेशकुमारी यशस्विनी सीता सदा आपमें अनुराग रखती हैं। इन्हें सान्त्वना दीजिये और भाई भरत आपके शोकसे पीड़ित हो व्रत कर रहे हैं, अतः उनसे जाकर मिलिये॥ २० ॥

‘परंतप! आप महात्मा शत्रुघ्नसे और समस्त माताओंसे भी जाकर मिलें, अपना अभिषेक करावें और पुरवासियोंको हर्ष प्रदान करें’॥ २१ ॥

श्रीराम और लक्ष्मणसे ऐसा कहकर देवराज इन्द्र सब देवताओंके साथ सूर्यतुल्य तेजस्वी विमानोंद्वारा बड़ी प्रसन्नताके साथ अपने लोकको चले गये॥ २२ ॥

उन समस्त श्रेष्ठ देवताओंको नमस्कार करके भाई लक्ष्मणसहित श्रीरामने सबको विश्राम करनेकी आज्ञा दी॥ २३ ॥

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श्रीराम और लक्ष्मणके द्वारा सुरक्षित तथा हृष्ट-पुष्ट सैनिकोंसे भरी हुई वह यशस्विनी विशाल सेना चन्द्रमाकी चाँदनीसे प्रकाशित होनेवाली रात्रिके समान अद्भुत शोभासे उद्भासित होती हुई विराज रही थी॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ बीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ १२० ॥