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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

एक सौ अठारहवाँ सर्ग

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एक सौ अठारहवाँ सर्ग

मूर्तिमान् अग्निदेवका सीताको लेकर चितासे प्रकट होना और श्रीरामको समर्पित करके उनकी पवित्रताको प्रमाणित करना तथा श्रीरामका सीताको सहर्ष स्वीकार करना

ब्रह्माजीके कहे हुए इन शुभ वचनोंको सुनकर मूर्तिमान् अग्निदेव विदेहनन्दिनी सीताको (पिताकी भाँति) गोदमें लिये चितासे ऊपरको उठे॥ १ ॥

उस चिताको हिलाकर इधर-उधर बिखराते हुए दिव्य रूपधारी हव्यवाहन अग्निदेव वैदेही सीताको साथ लिये तुरंत ही उठकर खड़े हो गये॥ २ ॥

सीताजी प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुण-पीत कान्तिसे प्रकाशित हो रही थीं। तपाये हुए सोनेके आभूषण उनकी शोभा बढ़ा रहे थे। उनके श्रीअङ्गोंपर लाल रंगकी रेशमी साड़ी लहरा रही थी। सिरपर काले-काले घुँघराले केश सुशोभित होते थे। उनकी अवस्था नयी थी और उनके द्वारा धारण किये गये फूलोंके हार कुम्हलायेतक नहीं थे। अनिन्द्य सुन्दरी सती-साध्वी सीताका अग्निमें प्रवेश करते समय जैसा रूप और वेष था, वैसे ही रूप-सौन्दर्यसे प्रकाशित होती हुईं उन वैदेहीको गोदमें लेकर अग्निदेवने श्रीरामको समर्पित कर दिया॥ ३-४ ॥

उस समय लोकसाक्षी अग्निने श्रीरामसे कहा— 'श्रीराम! यह आपकी धर्मपत्नी विदेहराजकुमारी सीता है। इसमें कोई पाप या दोष नहीं है॥ ५ ॥

'उत्तम आचारवाली इस शुभलक्षणा सतीने मन, वाणी, बुद्धि अथवा नेत्रोंद्वारा भी आपके सिवा किसी दूसरे पुरुषका आश्रय नहीं लिया। इसने सदा सदाचारपरायण आपका ही आराधन किया है॥ ६ ॥

'अपने बल-पराक्रमका घमंड रखनेवाले राक्षस रावणने जब इसका अपहरण किया था, उस समय यह बेचारी सती सूने आश्रममें अकेली थी—आप इसके पास नहीं थे; अतः यह विवश थी (इसका कोई वश नहीं चला)॥ ७ ॥

'रावणने इसे लाकर अन्तःपुरमें कैद कर लिया। इसपर पहरा बिठा दिया। भयानक विचारोंवाली भीषण राक्षसियाँ इसकी रखवाली करने लगीं। तब भी इसका चित्त आपमें ही लगा रहा। यह आपहीको अपना परम आश्रय मानती रही॥ ८ ॥

‘तत्पश्चात् तरह-तरहके लोभ दिये गये। इस मिथिलेशकुमारीपर डाँट-फटकार भी पड़ी; परंतु इसकी अन्तरात्मा निरन्तर आपके ही चिन्तनमें लगी रही। इसने उस राक्षसके विषयमें कभी एक बार भी नहीं सोचा॥ ९॥

‘अतः इसका भाव सर्वथा शुद्ध है। यह मिथिलेशनन्दिनी सर्वथा निष्पाप है। आप इसे सादर स्वीकार करें। मैं आपको आज्ञा देता हूँ, आप इससे कभी कोई कठोर बात न कहें’॥ १०॥

अग्निदेवकी यह बात सुनकर वक्ताओंमें श्रेष्ठ धर्मात्मा श्रीरामका मन प्रसन्न हो गया। उनके नेत्रोंमें आनन्दके आँसू छलक आये। वे थोड़ी देरतक विचारमें डूबे रहे॥ ११॥

तदनन्तर महातेजस्वी, धैर्यवान्, महान् पराक्रमी तथा धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ श्रीरामने देवशिरोमणि अग्निदेवसे उनकी पूर्वोक्त बातके उत्तरमें कहा—॥ १२॥

‘भगवन्! लोगोंमें सीताजीकी पवित्रताका विश्वास दिलानेके लिये इनकी यह शुद्धिविषयक परीक्षा आवश्यक थी; क्योंकि शुभलक्षणा सीताको विवश होकर दीर्घकालतक रावणके अन्तःपुरमें रहना पड़ा है॥ १३॥

‘यदि मैं जनकनन्दिनीकी शुद्धिके विषयमें परीक्षा न करता तो लोग यही कहते कि दशरथपुत्र राम बड़ा ही मूर्ख और कामी है॥ १४॥

‘यह बात मैं भी जानता हूँ कि मिथिलेशनन्दिनी जनककुमारी सीताका हृदय सदा मुझमें ही लगा रहता है। मुझसे कभी अलग नहीं होता। ये सदा मेरा ही मन रखतीं—मेरी इच्छाके अनुसार चलती हैं॥ १५॥

‘मुझे यह भी विश्वास है कि जैसे महासागर अपनी तटभूमिको नहीं लाँघ सकता, उसी प्रकार रावण अपने ही तेजसे सुरक्षित इन विशाललोचना सीतापर अत्याचार नहीं कर सकता था॥ १६॥

‘तथापि तीनों लोकोंके प्राणियोंके मनमें विश्वास दिलानेके लिये एकमात्र सत्यका सहारा लेकर मैंने अग्निमें प्रवेश करती हुई विदेहकुमारी सीताको रोकनेकी चेष्टा नहीं की॥ १७॥

‘मिथिलेशकुमारी सीता प्रज्वलित अग्निशिखाके समान दुर्धर्ष तथा दूसरेके लिये अलभ्य है। दुष्टात्मा रावण मनके द्वारा भी इनपर अत्याचार करनेमें समर्थ नहीं हो सकता था॥ १८॥

‘ये सती-साध्वी देवी रावणके अन्तःपुरमें रहकर भी व्याकुलता या घबराहटमें नहीं पड़ सकती थीं; क्योंकि ये मुझसे उसी तरह अभिन्न हैं, जैसे सूर्यदेवसे उनकी प्रभा॥ १९ ॥

‘मिथिलेशकुमारी जानकी तीनों लोकोंमें परम पवित्र हैं। जैसे मनस्वी पुरुष कीर्तिका त्याग नहीं कर सकता, उसी तरह मैं भी इन्हें नहीं छोड़ सकता॥ २० ॥

‘आप सभी लोकपाल मेरे हितकी ही बात कह रहे हैं और आपलोगोंका मुझपर बड़ा स्नेह है; अतः आप सभी देवताओंके हितकर वचनका मुझे अवश्य पालन करना चाहिये’॥ २१ ॥

ऐसा कहकर अपने किये हुए पराक्रमसे प्रशंसित होनेवाले महाबली, महायशस्वी, विजयी वीर रघुकुलनन्दन श्रीराम अपनी प्रिया सीतासे मिले और मिलकर बड़े सुखका अनुभव करने लगे; क्योंकि वे सुख भोगनेके ही योग्य हैं॥ २२ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें एक सौ अठारहवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ११८ ॥