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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

तीसरा सर्ग

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तीसरा सर्ग

विश्रवासे वैश्रवण (कुबेर) की उत्पत्ति, उनकी तपस्या, वरप्राप्ति तथा लङ्कामें निवास

पुलस्त्यके पुत्र मुनिवर विश्रवा थोड़े ही समयमें पिताकी भाँति तपस्यामें संलग्न हो गये॥ १ ॥

वे सत्यवादी, शीलवान्, जितेन्द्रिय, स्वाध्यायपरायण, बाहर-भीतरसे पवित्र, सम्पूर्ण भोगोंमें अनासक्त तथा सदा ही धर्ममें तत्पर रहनेवाले थे॥ २ ॥

विश्रवाके इस उत्तम आचरणको जानकर महामुनि भरद्वाजने अपनी कन्याका, जो देवाङ्गनाके समान सुन्दरी थी, उनके साथ विवाह कर दिया॥ ३ ॥

धर्मके ज्ञाता मुनिवर विश्रवाने बड़ी प्रसन्नताके साथ धर्मानुसार भरद्वाजकी कन्याका पाणिग्रहण किया और प्रजाका हित-चिन्तन करनेवाली बुद्धिके द्वारा लोककल्याणका विचार करते हुए उन्होंने उसके गर्भसे एक अद्भुत और पराक्रमी पुत्र उत्पन्न किया। उसमें सभी ब्राह्मणोचित गुण विद्यमान थे। उसके जन्मसे पितामह पुलस्त्य मुनिको बड़ी प्रसन्नता हुई॥ ४—६ ॥

उन्होंने दिव्य दृष्टिसे देखा—'इस बालकमें संसारका कल्याण करनेकी बुद्धि है तथा यह आगे चलकर धनाध्यक्ष होगा' तब उन्होंने बड़े हर्षसे भरकर देवर्षियोंके साथ उसका नामकरण-संस्कार किया॥ ७ ॥

वे बोले—'विश्रवाका यह पुत्र विश्रवाके ही समान उत्पन्न हुआ है; इसलिये यह वैश्रवण नामसे विख्यात होगा'॥ ८ ॥

कुमार वैश्रवण वहाँ तपोवनमें रहकर उस समय आहुति डालनेसे प्रज्वलित हुई अग्निके समान बढ़ने लगे और महान् तेजसे सम्पन्न हो गये॥ ९ ॥

आश्रममें रहनेके कारण उन महात्मा वैश्रवणके मनमें भी यह विचार उत्पन्न हुआ कि मैं उत्तम धर्मका आचरण करूँ; क्योंकि धर्म ही परमगति है॥ १० ॥

यह सोचकर उन्होंने तपस्याका निश्चय करनेके पश्चात् महान् वनके भीतर सहस्रों वर्षोंतक कठोर नियमोंसे बँधकर बड़ी भारी तपस्या की॥ ११ ॥

वे एक-एक सहस्त्र वर्ष पूर्ण होनेपर तपस्याकी नयी-नयी विधि ग्रहण करते थे। पहले तो उन्होंने केवल जलका आहार किया। तत्पश्चात् वे हवा पीकर रहने लगे; फिर आगे चलकर उन्होंने उसका भी त्याग कर दिया और वे एकदम निराहार रहने लगे। इस तरह उन्होंने कई सहस्त्र वर्षोंको एक वर्षके समान बिता दिया॥ १२ १/२ ॥

तब उनकी तपस्यासे प्रसन्न होकर महातेजस्वी ब्रह्माजी इन्द्र आदि देवताओंके साथ उनके आश्रमपर पधारे और इस प्रकार बोले— ॥ १३ १/२ ॥

‘उत्तम व्रतका पालन करनेवाले वत्स! मैं तुम्हारे इस कर्मसे—तपस्यासे बहुत संतुष्ट हूँ। महामते! तुम्हारा भला हो। तुम कोई वर माँगो; क्योंकि वर पानेके योग्य हो’॥ १४ १/२ ॥

यह सुनकर वैश्रवणने अपने निकट खड़े हुए पितामहसे कहा— ‘भगवन्! मेरा विचार लोककी रक्षा करनेका है, अतः मैं लोकपाल होना चाहता हूँ’॥ १५ १/२ ॥

वैश्रवणकी इस बातसे ब्रह्माजीके चित्तको और भी संतोष हुआ। उन्होंने सम्पूर्ण देवताओंके साथ प्रसन्नतापूर्वक कहा— ‘बहुत अच्छा’॥ १६ १/२ ॥

इसके बाद वे फिर बोले— ‘बेटा! मैं चौथे लोकपालकी सृष्टि करनेके लिये उद्यत था। यम, इन्द्र और वरुणको जो पद प्राप्त है, वैसा ही लोकपाल-पद तुम्हें भी प्राप्त होगा, जो तुमको अभीष्ट है॥ १७ १/२ ॥

‘धर्मज्ञ! तुम प्रसन्नतापूर्वक उस पदको ग्रहण करो और अक्षय निधियोंके स्वामी बनो। इन्द्र, वरुण और यमके साथ तुम चौथे लोकपाल कहलाओगे॥ १८ १/२ ॥

‘यह सूर्यतुल्य तेजस्वी पुष्पकविमान है। इसे अपनी सवारीके लिये ग्रहण करो और देवताओंके समान हो जाओ॥ १९ १/२ ॥

‘तात! तुम्हारा कल्याण हो। अब हम सब लोग जैसे आये हैं, वैसे लौट जायँगे। तुम्हें ये दो वर देकर हम अपनेको कृतकृत्य समझते हैं’॥ २० १/२ ॥

ऐसा कहकर ब्रह्माजी देवताओंके साथ अपने स्थानको चले गये। ब्रह्मा आदि देवताओंके आकाशमें चले जानेपर अपने मनको संयममें रखनेवाले धनाध्यक्षने पितासे हाथ जोड़कर कहा— ‘भगवन्! मैंने पितामह ब्रह्माजीसे मनोवाञ्छित फल प्राप्त किया है॥ २१-२२ १/२ ॥

‘परंतु उन प्रजापतिदेवने मेरे लिये कोऽइ निवास-स्थान नहीं बताया। अतः भगवन्! अब आप ही मेरे रहनेके योग्य किसी ऐसे स्थानकी खोज कीजिये, जो सभी दृष्टियोंसे अच्छा हो। प्रभो! वह स्थान ऐसा होना चाहिये, जहाँ रहनेसे किसी भी प्राणीको कष्ट न हो’॥ २३-२४ ॥

अपने पुत्रके ऐसा कहनेपर मुनिवर विश्रवा बोले— ‘धर्मज्ञ! साधुशिरोमणे! सुनो—दक्षिण समुद्रके तटपर एक त्रिकूट नामक पर्वत है। उसके शिखरपर एक विशाल पुरी है, जो देवराज इन्द्रकी अमरावती पुरीके समान शोभा पाती है॥ २५-२६ ॥

‘उसका नाम लङ्का है। इन्द्रकी अमरावतीके समान उस रमणीय पुरीका निर्माण विश्वकर्माने राक्षसोंके रहनेके लिये किया है॥ २७ ॥

‘बेटा! तुम्हारा कल्याण हो। तुम निःसंदेह उस लङ्कापुरीमें ही जाकर रहो। उसकी चहारदीवारी सोनेकी बनी हुऽइ है। उसके चारों ओर चौड़ी खाइयाँ खुदी हुऽइँ हैं और वह अनेकानेक यन्त्रों तथा शस्त्रोंसे सुरक्षित है॥

‘वह पुरी बड़ी ही रमणीय है। उसके फाटक सोने और नीलमके बने हुए हैं। पूर्वकालमें भगवान् विष्णुके भयसे पीड़ित हुए राक्षसोंने उस पुरीको त्याग दिया था॥ २९ ॥

‘वे समस्त राक्षस रसातलको चले गये थे, इसलिये लङ्कापुरी सूनी हो गयी। इस समय भी लङ्कापुरी सूनी ही है, उसका कोऽइ स्वामी नहीं है॥ ३० ॥

‘अतः बेटा! तुम वहाँ निवास करनेके लिये सुखपूर्वक जाओ। वहाँ रहनेमें किसी प्रकारका दोष या खटका नहीं है। वहाँ किसीकी ओरसे कोऽइ विघ्न-बाधा नहीं आ सकती’॥ ३१ ॥

अपने पिताके इस धर्मयुक्त वचनको सुनकर धर्मात्मा वैश्रवणने त्रिकूट पर्वतके शिखरपर बनी हुऽइ लङ्कापुरीमें निवास किया॥ ३२ ॥

उनके निवास करनेपर थोड़े ही दिनोंमें वह पुरी सहस्रों हृष्टपुष्ट राक्षसोंसे भर गयी। उनकी आज्ञासे वे राक्षस वहाँ आकर आनन्दपूर्वक रहने लगे॥ ३३ ॥

समुद्र जिसके लिये खाऽइका काम देता था, उस लङ्कानगरीमें विश्रवाके धर्मात्मा पुत्र वैश्रवण राक्षसोंके राजा हो बड़ी प्रसन्नताके साथ निवास करने लगे॥ ३४ ॥

धर्मात्मा धनेश्वर समय-समयपर पुष्पकविमानके द्वारा आकर अपने माता-पितासे मिल जाया करते थे। उनका हृदय बड़ा ही विनीत था॥ ३५ ॥

देवता और गन्धर्व उनकी स्तुति करते थे। उनका भव्य भवन अप्सराओंके नृत्यसे सुशोभित होता था। वे धनपति कुबेर अपनी किरणोंसे प्रकाशित होनेवाले सूर्यकी भाँति सब ओर प्रकाश बिखेरते हुए अपने पिताके समीप गये॥ ३६ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तीसरा सर्ग पूरा हुआ॥

३ ॥