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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

दूसरा सर्ग

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दूसरा सर्ग

लंकापुरीका वर्णन, उसमें प्रवेश करनेके विषयमें हनुमान्‌जीका विचार, उनका लघुरूपसे पुरीमें प्रवेश तथा चन्द्रोदयका वर्णन

महाबली हनुमान्‌जी अलङ्घनीय समुद्रको पार करके त्रिकूट (लम्ब) नामक पर्वतके शिखरपर स्वस्थ भावसे खड़े हो लंकापुरीकी शोभा देखने लगे॥ १ ॥

उस समय उनके ऊपर वहाँ वृक्षोंसे झड़े हुए फूलोंकी वर्षा होने लगी। इससे वहाँ बैठे हुए पराक्रमी हनुमान् फूलके बने हुए वानरके समान प्रतीत होने लगे॥ २ ॥

उत्तम पराक्रमी श्रीमान् वानरवीर हनुमान् सौ योजन समुद्र लाँघकर भी वहाँ लम्बी साँस नहीं खींच रहे थे और न ग्लानिका ही अनुभव करते थे॥ ३ ॥

उलटे वे यह सोचते थे, मैं सौ-सौ योजनोंके बहुत-से समुद्र लाँघ सकता हूँ; फिर इस गिने-गिनाये सौ योजन समुद्रको पार करना कौन बड़ी बात है?॥ ४ ॥

बलवानोंमें श्रेष्ठ तथा वानरोंमें उत्तम वे वेगवान् पवनकुमार महासागरको लाँघकर शीघ्र ही लंकामें जा पहुँचे॥ ५ ॥

रास्तेमें हरी-हरी दूब और वृक्षोंसे भरे हुए मकरन्दपूर्ण सुगन्धित वन देखते हुए वे मध्यममार्गसे जा रहे थे॥ ६ ॥

तेजस्वी वानरशिरोमणि हनुमान् वृक्षोंसे आच्छादित पर्वतों और फूलोंसे भरी हुई वन-श्रेणियोंमें विचरने लगे॥ ७ ॥

उस पर्वतपर स्थित हो पवनपुत्र हनुमान्‌ने बहुत-से वन और उपवन देखे तथा उस पर्वतके अग्रभागमें बसी हुई लंकाका भी अवलोकन किया॥ ८ ॥

उन कपिश्रेष्ठने वहाँ सरल (चीड़), कनेर, खिले हुए खजूर, प्रियाल (चिरौंजी), मुचुलिन्द (जम्बीरी नीबू), कुटज, केतक (केवड़े), सुगन्धपूर्ण प्रियङ्गु (पिप्पली), नीप (कदम्ब या अशोक), छितवन, असन, कोविदार तथा खिले हुए करवीर भी देखे। फूलोंके भारसे लदे हुए तथा मुकुलित (अधखिले) बहुत-से वृक्ष उन्हें दृष्टिगोचर हुए, जिनमें पक्षी भरे हुए थे और हवाके झोंकेसे जिनकी डालियाँ झूम रही थीं॥ ९— ११ ॥

हंसों और कारण्डवोंसे व्याप्त तथा कमल और उत्पलसे आच्छादित हुई बहुत-सी बावड़ियाँ, भाँतिभाँतिके रमणीय क्रीड़ास्थान तथा नाना प्रकारके जलाशय उनके दृष्टिपथमें आये॥ १२ ॥

उन जलाशयोंके चारों ओर सभी ऋतुओंमें फल-फूल देनेवाले अनेक प्रकारके वृक्ष फैले हुए थे। उन वानरशिरोमणिने वहाँ बहुत-से रमणीय उद्यान भी देखे॥ १३ ॥

अद्भुत शोभासे सम्पन्न हनुमान्जी धीरे-धीरे रावण-पालित लंकापुरीके पास पहुँचे। उसके चारों ओर खुदी हुई खाइयाँ उस नगरीकी शोभा बढ़ा रही थीं। उनमें उत्पल और पद्म आदि कई जातियोंके कमल खिले थे। सीताको हर लानेके कारण रावणने लंकापुरीकी रक्षाका विशेष प्रबन्ध कर रखा था। उसके चारों ओर भयंकर धनुष धारण करनेवाले राक्षस घूमते रहते थे॥ १४-१५ ॥

वह महापुरी सोनेकी चहारदीवारीसे घिरी हुई थी तथा पर्वतके समान ऊँचे और शरद्-ऋतुके बादलोंके समान श्वेत भवनोंसे भरी हुई थी॥ १६ ॥

श्वेत रंगकी ऊँची-ऊँची सड़कें उस पुरीको सब ओरसे घेरे हुए थीं। सैकड़ों अट्टालिकाएँ वहाँ शोभा पा रही थीं तथा फहराती हुई ध्वजा-पताकाएँ उस नगरीकी शोभा बढ़ा रही थीं॥ १७ ॥

उसके बाहरी फाटक सोनेके बने हुए थे और उनकी दीवारें लता-बेलोंके चित्रसे सुशोभित थीं। हनुमान्जीने उन फाटकोंसे सुशोभित लंकाको उसी प्रकार देखा, जैसे कोई देवता देवपुरीका निरीक्षण कर रहा हो॥ १८ ॥

तेजस्वी कपि हनुमान्ने सुन्दर शुभ्र सदनोंसे सुशोभित और पर्वतके शिखरपर स्थित लंकाको इस तरह देखा, मानो वह आकाशमें विचरनेवाली नगरी हो॥ १९ ॥

कपिवर हनुमान्ने विश्वकर्माद्वारा निर्मित तथा राक्षसराज रावणद्वारा सुरक्षित उस पुरीको आकाशमें तैरती-सी देखा॥ २० ॥

विश्वकर्माकी बनायी हुई लंका मानो उनके मानसिक संकल्पसे रची गयी एक सुन्दरी स्त्री थी। चहारदीवारी और उसके भीतरकी वेदी उसकी जघनस्थली जान पड़ती थीं, समुद्रका विशाल जलराशि और वन उसके वस्त्र थे, शतघ्नी और शूल नामक अस्त्र ही उसके केश थे और बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ उसके लिये कर्णभूषण-सी प्रतीत हो रही थीं॥ २१ १/२ ॥

उस पुरीके उत्तर द्वारपर पहुँचकर वानरवीर हनुमान्जी चिन्तामें पड़ गये। वह द्वार कैलास पर्वतपर बसी हुई अलकापुरीके बहिर्द्वारके समान ऊँचा था और आकाशमें रेखा-सी खींचता जान पड़ता था। ऐसा जान पड़ता था मानो अपने ऊँचे-ऊँचे प्रासादोंपर आकाशको उठा रखा है॥ २२-२३ ॥

लंकापुरी भयानक राक्षसोंसे उसी तरह भरी थी, जैसे पातालकी भोगवतीपुरी नागोंसे भरी रहती है। उसकी निर्माणकला अचिन्त्य थी। उसकी रचना सुन्दर ढंगसे की गयी थी। वह हनुमान्जीको स्पष्ट दिखायी देती थी। पूर्वकालमें साक्षात् कुबेर वहाँ निवास करते थे। हाथोंमें शूल और पट्टिश लिये बड़ी-बड़ी दाढ़ोंवाले बहुत-से शूरवीर घोर राक्षस लंकापुरीकी उसी प्रकार रक्षा करते थे, जैसे विषधर सर्प अपनी पुरीकी करते हैं॥ २४-२५ ॥

उस नगरकी बड़ी भारी चौकसी, उसके चारों ओर समुद्रकी खाईं तथा रावण-जैसे भयंकर शत्रुको देखकर हनुमान्जी इस प्रकार विचारने लगे— ॥ २६ ॥

‘यदि वानर यहाँतक आ जायँ तो भी वे व्यर्थ ही सिद्ध होंगे; क्योंकि युद्धके द्वारा देवता भी लंकापर विजय नहीं पा सकते॥ २७ ॥

‘जिससे बढ़कर विषम (संकटपूर्ण) स्थान और कोई नहीं है, उस रावणपालित इस दुर्गम लंकामें आकर महाबाहु श्रीरघुनाथजी भी क्या करेंगे?॥ २८ ॥

‘राक्षसोंपर सामनीतिका प्रयोगके लिये तो कोई गुंजाइश ही नहीं है। इनपर दान,भेद और युद्ध (दण्ड) नीतिका प्रयोग भी सफल होता नहीं दिखायी देता॥ २९ ॥

‘यहाँ चार ही वेगशाली वानरोंकी पहुँच हो सकती है—बालिपुत्र अंगदकी, नीलकी, मेरी और बुद्धिमान् राजा सुग्रीवकी॥ ३० ॥

‘अच्छा, पहले यह तो पता लगाऊँ कि विदेहकुमारी सीता जीवित हैं या नहीं। जनककिशोरीका दर्शन करनेके पश्चात् ही मैं इस विषयमें कोई विचार करूँगा’॥ ३१ ॥

तदनन्तर उस पर्वत-शिखरपर खड़े हुए कपिश्रेष्ठ हनुमान्जी श्रीरामचन्द्रजीके अभ्युदयके लिये सीताजीका पता लगानेके उपायपर दो घड़ीतक विचार करते रहे॥ ३२ ॥

उन्होंने सोचा—‘मैं इस रूपसे राक्षसोंकी इस नगरीमें प्रवेश नहीं कर सकता; क्योंकि बहुत-से क्रूर और बलवान् राक्षस इसकी रक्षा कर रहे हैं॥ ३३ ॥

‘जानकीकी खोज करते समय मुझे अपनेको छिपानेके लिये यहाँके सभी महातेजस्वी, महापराक्रमी और बलवान् राक्षसोंसे आँख बचानी होगी॥ ३४ ॥

‘अतः मुझे रात्रिके समय ही नगरमें प्रवेश करना चाहिये और सीताका अन्वेषणरूप यह महान् समयोचित कार्य सिद्ध करनेके लिये ऐसे रूपका आश्रय लेना चाहिये, जो आँखसे देखा न जा सके। केवल कार्यसे यह अनुमान हो कि कोई आया था’॥ ३५ ॥

देवताओं और असुरोंके लिये भी दुर्जय वैसी लंकापुरीको देखकर हनुमान्जी बारम्बार लम्बी साँस खींचते हुए यों विचार करने लगे—॥ ३६॥

‘किस उपायसे काम लूँ, जिससे दुरात्मा राक्षसराज रावणकी दृष्टिसे ओझल रहकर मैं मिथिलेशनन्दिनी जनककिशोरी सीताका दर्शन प्राप्त कर सकूँ॥ ३७ ॥

‘किस रीतिसे कार्य किया जाय, जिससे जगद्विख्यात श्रीरामचन्द्रजीका काम भी न बिगड़े और मैं एकान्तमें अकेली जानकीजीसे भेंट भी कर लूँ॥ ३८ ॥

‘कई बार कातर अथवा अविवेकपूर्ण कार्य करनेवाले दूतके हाथमें पड़कर देश और कालके विपरीत व्यवहार होनेके कारण बने-बनाये काम भी उसी तरह बिगड़ जाते हैं, जैसे सूर्योदय होनेपर अन्धकार नष्ट हो जाता है॥ ३९ ॥

‘राजा और मन्त्रियोंके द्वारा निश्चित किया हुआ कर्तव्याकर्तव्यविषयक विचार भी किसी अविवेकी दूतका आश्रय लेनेसे शोभा (सफलता) नहीं पाता है। अपनेको पण्डित माननेवाले अविवेकी दूत सारा काम ही चौपट कर देते हैं॥ ४० ॥

‘अच्छा तो किस उपायका अवलम्बन करनेसे स्वामीका कार्य नहीं बिगड़ेगा; मुझे घबराहट या अविवेक नहीं होगा और मेरा यह समुद्रका लाँघना भी व्यर्थ नहीं होने पायेगा॥ ४१ ॥

‘यदि राक्षसोंने मुझे देख लिया तो रावणका अनर्थ चाहनेवाले उन विख्यातनामा भगवान् श्रीरामका यह कार्य सफल न हो सकेगा॥ ४२ ॥

‘यहाँ दूसरे किसी रूपकी तो बात ही क्या है, राक्षसका रूप धारण करके भी राक्षसोंसे अज्ञात रहकर कहीं ठहरना असम्भव है॥ ४३ ॥

‘मेरा तो ऐसा विश्वास है कि राक्षसोंसे छिपे रहकर वायुदेव भी इस पुरीमें विचरण नहीं कर सकते। यहाँ कोई भी ऐसा स्थान नहीं है, जो इन भयंकर कर्म करनेवाले राक्षसोंको ज्ञात न हो॥ ४४ ॥

‘यदि यहाँ मैं अपने इस रूपसे छिपकर भी रहूँगा तो मारा जाऊँगा और मेरे स्वामीके कार्यमें भी हानि पहुँचेगी॥ ४५ ॥

‘अतः मैं श्रीरघुनाथजीका कार्य सिद्ध करनेके लिये रातमें अपने इसी रूपसे छोटा-सा शरीर धारण करके लंकामें प्रवेश करूँगा॥ ४६ ॥

‘यद्यपि रावणकी इस पुरीमें जाना बहुत ही कठिन है तथापि रातको इसके भीतर प्रवेश करके सभी घरोंमें घुसकर मैं जानकीजीकी खोज करूँगा’॥ ४७ ॥

ऐसा निश्चय करके वीर वानर हनुमान् विदेहनन्दिनीके दर्शनके लिये उत्सुक हो उस समय सूर्यास्तकी प्रतीक्षा करने लगे॥ ४८ ॥

सूर्यास्त हो जानेपर रातके समय उन पवनकुमारने अपने शरीरको छोटा बना लिया। वे बिल्लीके बराबर होकर अत्यन्त अद्भुत दिखायी देने लगे॥ ४९ ॥

प्रदोषकालमें पराक्रमी हनुमान् तुरंत ही उछलकर उस रमणीय पुरीमें घुस गये। वह नगरी पृथक्-पृथक् बने हुए चौड़े और विशाल राजमार्गोंसे सुशोभित थी॥ ५० ॥

उसमें प्रासादोंकी लंबी पंक्तियाँ दूरतक फैली हुई थीं। सुनहरे रंगके खम्भों और सोनेकी जालियोंसे विभूषित वह नगरी गन्धर्वनगरके समान रमणीय प्रतीत होती थी॥ ५१ ॥

हनुमान्जीने उस विशाल पुरीको सतमहले, अठमहले मकानों और सुवर्णजटित स्फटिक मणिकी फर्शोंसे सुशोभित देखा। उनमें वैदूर्य (नीलम) भी जड़े गये थे, जिससे उनकी विचित्र शोभा होती थी। मोतियोंकी जालियाँ भी उन महलोंकी शोभा बढ़ाती थीं। ६३३

उन सबके कारण राक्षसोंके वे भवन बड़ी सुन्दर शोभासे सम्पन्न हो रहे थे॥ ५२-५३ ॥

सोनेके बने हुए विचित्र फाटक सब ओरसे सजी हुई राक्षसोंकी उस लंकाको और भी उद्दीप्त कर रहे थे॥ ५४ ॥

ऐसी अचिन्त्य और अद्भुत आकारवाली लंकाको देखकर महाकपि हनुमान् विषादमें पड़ गये; परंतु जानकीजीके दर्शनके लिये उनके मनमें बड़ी उत्कण्ठा थी, इसलिये उनका हर्ष और उत्साह भी कम नहीं हुआ॥ ५५ ॥

परस्पर सटे हुए श्वेतवर्णके सतमंजिले महलोंकी पंक्तियाँ लंकापुरीकी शोभा बढ़ा रही थीं। बहुमूल्य जाम्बूनद नामक सुवर्णकी जालियों और वन्दनवारोंसे वहाँके घरोंको सजाया गया था। भयंकर बलशाली निशाचर उस पुरीकी अच्छी तरह रक्षा करते थे। रावणके बाहुबलसे भी वह

सुरक्षित थी। उसके यशकी ख्याति सुदूरतक फैली हुई थी। ऐसी लंकापुरीमें हनुमान्‌जीने प्रवेश किया॥ ५६ ॥

उस समय तारागणोंके साथ उनके बीचमें विराजमान अनेक सहस्र किरणोंवाले चन्द्रदेव भी हनुमान्‌जीकी सहायता-सी करते हुए समस्त लोकोंपर अपनी चाँदनीका चंदोवा-सा तानकर उदित हो गये॥ ५७ ॥

वानरोंके प्रमुख वीर श्रीहनुमान्‌जीने शङ्खकी-सी कान्ति तथा दूध और मृणालके-से वर्णवाले चन्द्रमाको आकाशमें इस प्रकार उदित एवं प्रकाशित होते देखा, मानो किसी सरोवरमें कोई हंस तैर रहा हो॥ ५८ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके सुन्दरकाण्डमें दूसरा सर्ग पूरा हुआ॥

२ ॥