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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

DevanagariHindipublished2,621 पृष्ठ

अड़तीसवाँ सर्ग

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अड़तीसवाँ सर्ग

राजा सगरके पुत्रोंकी उत्पत्ति तथा यज्ञकी तैयारी

विश्वामित्रजीने मधुर अक्षरोंसे युक्त वह कथा श्रीरामको सुनाकर फिर उनसे दूसरा प्रसंग इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

‘वीर! पहलेकी बात है, अयोध्यामें सगर नामसे प्रसिद्ध एक धर्मात्मा राजा राज्य करते थे। उन्हें कोई पुत्र नहीं था; अतः वे पुत्र-प्राप्तिके लिये सदा उत्सुक रहा करते थे॥ २ ॥

‘श्रीराम! विदर्भराजकुमारी केशिनी राजा सगरकी ज्येष्ठ पत्नी थी। वह बड़ी धर्मात्मा और सत्यवादिनी थी॥ ३ ॥

‘सगरकी दूसरी पन्तीका नाम सुमति था। वह अरिष्टनेमि कश्यपकी पुत्री तथा गरुड़की बहिन थी॥ ४ ॥

‘महाराज सगर अपनी उन दोनों पत्नियोंके साथ हिमालय पर्वतपर जाकर भृगुप्रस्रवण नामक शिखरपर तपस्या करने लगे॥ ५ ॥

‘सौ वर्ष पूर्ण होनेपर उनकी तपस्याद्वारा प्रसन्न हुए सत्यवादियोंमें श्रेष्ठ महर्षि भृगुने राजा सगरको वर दिया॥ ६ ॥

‘निष्पाप नरेश! तुम्हें बहुत-से पुत्रोंकी प्राप्ति होगी। पुरुषप्रवर! तुम इस संसारमें अनुपम कीर्ति प्राप्त करोगे॥ ७ ॥

‘तात! तुम्हारी एक पत्नी तो एक ही पुत्रको जन्म देगी, जो अपनी वंशपरम्पराका विस्तार करनेवाला होगा तथा दूसरी पत्नी साठ हजार पुत्रोंकी जननी होगी॥ ८ ॥

‘महात्मा भृगु जब इस प्रकार कह रहे थे, उस समय उन दोनों राजकुमारियों (रानियों)-ने उन्हें प्रसन्न करके स्वयं भी अत्यन्त आनन्दित हो दोनों हाथ जोड़कर पूछा— ॥ ९ ॥

‘ब्रह्मन्! किस रानीके एक पुत्र होगा और कौन बहुत-से पुत्रोंकी जननी होगी? हम दोनों यह सुनना चाहती हैं। आपकी वाणी सत्य हो’॥ १० ॥

‘उन दोनोंकी यह बात सुनकर परम धर्मात्मा भृगुने उत्तम वाणीमें कहा— ‘देवियो! तुमलोग यहाँ अपनी इच्छा प्रकट करो। तुम्हें वंश चलानेवाला एक ही पुत्र प्राप्त हो अथवा महान्

बलवान्, यशस्वी एवं अत्यन्त उत्साही बहुत-से पुत्र? इन दो वरोंमेंसे किस वरको कौन-सी रानी ग्रहण करना चाहती है?'॥ ११-१२ ॥

‘रघुकुलनन्दन श्रीराम! मुनिका यह वचन सुनकर केशिनीने राजा सगरके समीप वंश चलानेवाले एक ही पुत्रका वर ग्रहण किया॥ १३ ॥

‘तब गरुड़की बहिन सुमतिने महान् उत्साही और यशस्वी साठ हजार पुत्रोंको जन्म देनेका वर प्राप्त किया॥ १४ ॥

‘रघुनन्दन! तदनन्तर रानियोंसहित राजा सगरने महर्षिकी परिक्रमा करके उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया और अपने नगरको प्रस्थान किया॥ १५ ॥

‘कुछ काल व्यतीत होनेपर बड़ी रानी केशिनीने सगरके औरस पुत्र ‘असमञ्ज’ को जन्म दिया॥ १६ ॥

‘पुरुषसिंह! (छोटी रानी) सुमतिने तूंबीके आकारका एक गर्भपिण्ड उत्पन्न किया। उसको फोड़नेसे साठ हजार बालक निकले॥ १७ ॥

‘उन्हें घीसे भरे हुए घड़ोंमें रखकर धाइयाँ उनका पालन-पोषण करने लगीं। धीरे-धीरे जब बहुत दिन बीत गये, तब वे सभी बालक युवावस्थाको प्राप्त हुए॥

‘इस तरह दीर्घकालके पश्चात् राजा सगरके रूप और युवावस्थासे सुशोभित होनेवाले साठ हजार पुत्र तैयार हो गये॥ १९ ॥

‘नरश्रेष्ठ रघुनन्दन! सगरका ज्येष्ठ पुत्र असमञ्ज नगरके बालकोंको पकड़कर सरयूके जलमें फेंक देता और जब वे डूबने लगते, तब उनकी ओर देखकर हँसा करता॥ २० १/२ ॥

‘इस प्रकार पापाचारमें प्रवृत्त होकर जब वह सत्पुरुषोंको पीड़ा देने और नगर-निवासियोंका अहित करने लगा, तब पिताने उसे नगरसे बाहर निकाल दिया॥ २१ १/२ ॥

‘असमञ्जके पुत्रका नाम था अंशुमान्। वह बड़ा ही पराक्रमी, सबसे मधुर वचन बोलनेवाला तथा सब लोगोंको प्रिय था॥ २२ १/२ ॥

‘नरश्रेष्ठ! कुछ कालके अनन्तर महाराज सगरके मनमें यह निश्चित विचार हुआ कि ‘मैं यज्ञ करूँ’॥ २३ १/२ ॥

‘यह दृढ़ निश्चय करके वे वेदवेत्ता नरेश अपने उपाध्यायोंके साथ यज्ञ करनेकी तैयारीमें लग गये’॥ २४ ॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें अड़तीसवाँ सर्ग पूरा
हुआ॥ ३८॥